मैं ऐसे चुप रहती, जैसे दाँतों के बीच जिह्वा ही न हो। उनका कहना बिल्कुल ठीक ही तो होता था। उन गठरियों में भरे सामानों में से अधिकांश का तो मैं उपयोग भी नहीं कर पाती थी। फिर क्यों उठा लाती थी ? माँ को तो मना कर सकती थी, 'माँ, तुम्हारी यह दो सेर मूंग, एक पाव सरसों, एक पाव धनिया, थोड़ी सी मिर्च, नींबू, एक-दो किया, एक कद्दू....मुझे नहीं चाहिए। आखिर मेरे अफसर पति की कमाई और खर्च के आगे ऊँट के मुँह में जीरा ही तो होगा यह सब। इतना सामान तो मेरा नौकर ही फेंक देता है।'........
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