Sahitya sangam Madhu

Sahitya sangam Madhu

By Madan LalArtsBooks
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Sahitya sangam Madhu episodes

  • लघुकथा : 'माँ का मोल' स्वर : मदन लाल 'मधु'
    ".....एक दिन भरपाई पूत तांई बोल्ली अक बेटा साच्ची बता इब तेरी नजरां म्ह मेरा के मोल सै ? छोरा बोल्या- दिखे माँ तू तो मनै सब्जी रोटी बरगी लागै है, अर बहू हलवे-पूरी बरगी लागै सै.....या सुणकै भरपाई नै खाट पकड़ ली......!
    4 min
  • जीवन-मूल्यों की लघुकथाएँ
    "......तमतमाया जिलेसिंह मनदीप के कमरे में घुसा। बाहर की आवाजें वहाँ पहले ही पहुंच चुकी थी। पति को सामने देखकर मनदीप ने डबडबाई आँखें पोंछते हुए अपना मुँह अपराध-भाव से दूसरी ओर घुमा लिया ......!
    8 min
  • कहानी: 'मुझे तुमसे मिलना है इसी वक्त' (हरभगवान चावला) स्वर: मदन लाल 'मधु'
    "उसने उसे फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी। दो दिन बाद उसकी 'रिक्वेस्ट कन्फर्म' कर दी गई। भारत भूषण ने इन्बाॅक्स में संदेश छोड़ा- क्या आप वही रमेश कपूर हैं, जिन्होंने 1985 में एम डी युनिवर्सिटी से अंग्रेज़ी में एम ए किया ? यदि हाँ तो मेरी तलाश सफल रही ।"........
    12 min
  • कहानी : 'मोहिनी' (लेखिका-अंजली जोशी) स्वर: मदन लाल 'मधु'
    "............सलीके से पहने हुए सलवार कुर्ता, हाथ में घड़ी, माथे पर छोटी-सी बिंदी और कमर तक आती ढीली-सी चोटी....सब कुछ साधारण सा, कुछ अलग होता तो वो थे कान के झुमके। रोज़ बड़े सुन्दर सुन्दर झुमके पहना करती थी। कितना मोहित था मैं उस पर। फिर एक रोज़ वो घटना भी घटी जिसके बाद मुझे एहसास हुआ कि मैं मोहित नहीं हूँ मोहिनी पर बल्कि प्रेम करने लगा हूँ उससे। उस दिन एक...........!
    20 min
  • कहानी: 'अमर प्रेम' अंतिम भाग (सरिता शर्मा) स्वर-मदन लाल 'मधु'
    "....फेरे खत्म होते ही मंगलसूत्र और मांग भरते ही वह बेहोश हो गई, क्योंकि शादी संपूर्ण हो चुकी थी तो उसे सुधा और उसकी माँ अंदर ले गई। तभी एक वृद्धा जो कि नर्स का काम जानती थी, उसने उसकी नब्ज देखी और ठकुराइन से कहा कि ये पेट से है ! माँ ने सिर पकड़ लिया। उस नर्स को किसी को न बताने के एवज में खूब पैसे देकर गाँव छोड़ने को कहा..........."
    19 min
  • कहानी: 'अमर प्रेम' लेखिका : सरिता शर्मा (स्वर-मदन लाल 'मधु'
    " अरे सुनो कुमुद ! तुमने चंद्र शेखर को देखा है ? देखो न, आज वह आया ही नहीं और मुझे बहुत डर लग रहा है, कहीं वह किसी मुसीबत में तो नहीं ! मुझे बहुत आश्चर्य हुआ, माँ दो चुटिया करे बैठी थी और उन्होंने छोटी सी बिंदी लगाई हुई थी, अपने हाथों में संस्कृत महाकाव्य 'मेघदूतम' लेकर बैठी थी। मुझे देखकर बार-बार कुमुद कुमुद कह रही थी। मुझे समझ नहीं आया यह कुमुद कौन है और मेरी माँ के पास मेघदूतम कहाँ से आई ?.........
    30 min
  • कहानी: 'और उसी क्षण' (मृदुला सिन्हा)
    मैं ऐसे चुप रहती, जैसे दाँतों के बीच जिह्वा ही न हो। उनका कहना बिल्कुल ठीक ही तो होता था। उन गठरियों में भरे सामानों में से अधिकांश का तो मैं उपयोग भी नहीं कर पाती थी। फिर क्यों उठा लाती थी ? माँ को तो मना कर सकती थी, 'माँ, तुम्हारी यह दो सेर मूंग, एक पाव सरसों, एक पाव धनिया, थोड़ी सी मिर्च, नींबू, एक-दो किया, एक कद्दू....मुझे नहीं चाहिए। आखिर मेरे अफसर पति की कमाई और खर्च के आगे ऊँट के मुँह में जीरा ही तो होगा यह सब। इतना सामान तो मेरा नौकर ही फेंक देता है।'........
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    Send in a voice message: https://anchor.fm/madan-lal326/message
    29 min

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