Sahitya sangam Madhu

Sahitya sangam Madhu

By Madan LalArtsBooks
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Sahitya sangam Madhu episodes

  • कहानी: 'पत्थरों का दरवेश' भाग-3 (अपराजिता अनामिका) स्वर: मदन लाल 'मधु'
    ".....एक औरत से माँ बनने का हक छीनने जैसा घृणित काम......मैंने जब तफ्तीश की तो बड़ी बेशर्मी से कहा..."बच्चे पैदा करके बूढ़ी बनना है तुम्हें ? मैंने इसलिए शादी थोड़े न की है तुमसे कि बच्चे और उनके पालन के झंझट पालता फिरूं ..." "तो फिर ?" आँखें छलक उठीं इस बेशर्मी पर...मैं अपना स्थान समझ चुकी थी और अचानक ही घृणा आई मुझे खुद से...ये सोचकर कि मात्र शरीर हूँ मैं इस आदमी के लिए ....मात्र गोश्त जिसे जब जैसे नोचा...या एक चादर जिसे जब चाहे बिछाया और फेंका.....!
    24 min
  • कहानी: 'पत्थरों का दरवेश' भाग-2 (अपराजिता अनामिका)
    "....एक शाम आँखें बंद किए लेटा था कि तभी वही खुशबू महसूस हुई ....मैं आँखों को जोर से मीचे पड़ा रहा...जानता था कि आजकल मैं बौराया सा बस यही गंध महसूसता जी रहा हूँ, जो हकीकत नहीं बल्कि एक दिलकश फ़रेब सा है। "सर तो ठंडा है और नब्ज़ भी सामान्य " अपने सर पर एक अलग ही छुअन और कलाई पर नर्म अंगुलियों की दबिश महसूसता मैंने उस गंध को अपने बिल्कुल करीब पा कर आँखें खोल दी........"
    35 min
  • कहानी: 'पत्थरों का दरवेश' भाग-1 (अपराजिता अनामिका) स्वर: मदन लाल 'मधु'
    "....जंगल के बीच पहाड़ी नदी के किनारे लगभग दो एकड़ में फैले सघन पेड़ों पर बंधे मचान के ऊपर बने कमरे इन अय्याशियों का असल अड्डा थे । लगभग दस सालों में मैंने कपडों की तरह अपना ईमान बदलती औरतों को देखकर एक नफरत-सी पाल ली थी इस नस्ल के लिए। मुझे लगता कि कभी किसी भी औरत के लिए मेरे मन में कोई भाव प्रस्फूटित न होगा.....लड़कियाँ इसलिए नहीं कहा क्योंकि लड़कियाँ तो मुझे देखते ही दूर भागती....चाँदी के ऊपर फैला पिघले तांबे सा रंग और शुष्क रुखाई के साथ आँखों में धधकता-सा कुछ मुझे डरावना और आम इनसानी भीड़ से अलग करता...इतना अलग मानों मैं आदमखोर होऊं। "
    34 min
  • कहानी: ' काश! तुम मेरे होते' (सूरज सिंह 'सारथी') स्वर: मदन लाल 'मधु' !
    '' मैं घर...अपने पति का घर छोड़ आई।" "जी..जी..आपका निर्णय " मैं अटकते हुए बोला। मेरी बाईं हथेलीअपनी दोनों हथेलियों के बीच रखकर सिसकते हुए फिर बोली, "मैंने ठीक किया न, रोहित" उसकी गर्म हथेली का स्पर्श अनुभव कर ही रहा था, तभी आंसू की गर्म बूंद मेरी बायीं कलाई पर गिरी और तभी मानो मेरी बहती हुई प्रेम लहरी उसके प्रति रुक सी गई ....
    26 min
  • कहानी: 'बुरी आदत' (देवेन्द्र कुमार मिश्रा) स्वर : मदन लाल 'मधु'
    "मेरी माँ को कभी अलग से लाड़ दिखाने की जरूरत नहीं पड़ी और न मुझे कभी माँ की ममता का यशोगान करने की। मेरे और माँ के मध्य यह क्रिया हमारे प्रेम को सार्थक कर देती। ऐसी बहुत सी बातें हैं, आदतें हैं, लेकिन उम्र बढने के साथ ही बहुत सी चीजें, बातें, क्रिया-कलाप छूट जाते हैं, उन्हें हम भूल जाते हैं लेकिन ये माँ के पल्लू वाली बात अब आदत में आ चुकी थी........"
    19 min
  • कहानी: 'पत्थर शहर' (डाॅ गायेल कृष्ण शर्मा 'मृदुल') स्वर : मदन लाल 'मधु'
    "मरीज का उपचार प्रारंभ हो गया। मरीज के गले में पड़ी सोने की जंजीर, कलाई में बँधी कीमती घड़ी और उँगली में पहनी हीरे की अँगूठी उतार कर नर्स ने जगेसर की ओर बढ़ाई तो उसने इन्हें लेने से इनकार करते हुए डाॅक्टर से कहा-"हुजूर ! मैं गरीब आदमी हूँ। सब्जी बेचने का धंधा करता हूँ। मेरे पास इस वक्त सौ-पचास रुपये से अधिक न होंगे। इस सामान को गिरवी रखकर आप घायल का इलाज कर दीजिए ।"
    19 min
  • 'डायन' भाग-3 (महेंद्र नैन सिंह) स्वर: मदन लाल 'मधु'
    "तू औरत नहीं है क्या ?" आवाज़ पर उसके हाथ रुके, उसने चौंक कर इधर-उधर देखा। "औरत मनहूस नहीं होती ...न ही वह डायन होती ...वह तो सृष्टि करती है ...सृजन करती है...प्रेम, ममता, मातृत्व, क्षमा, दया, संहार, सृजन, बलिदान, करुणा की प्रतीक नौ दुर्गाओं का रूप है उसके भीतर...कहता है ज़माना कि अबला होती है औरत, जिंदगी भर मर्द का सहारा चाहिए उसे, मगर असल में शक्ति है।" अगर औरत ही टूटेगी-बिखरेगी तो दुनिया नहीं चलने की, उसका तो हर पल, हर कदम इम्तिहानों से भरा होता है...
    20 min
  • 'डायन भाग-2 (महेंद्र नैन सिंह) स्वर: मदन लाल 'मधु'
    "तू देख रही है न सासू माँ अपने बेटे को...खूब बड़ा हो गया है ...पूरे पाँच हाथ का...तगड़ा ताकतवर ...लंबी बांहें ...चौड़ा सीना...एकदम बैल की सी चाल...पर तेरा बेटा मुझसे बात नहीं करता सासू माँ ...नहीं ...तू जो समझ रही है वो बात नहीं है...पर उसका घर में आते ही चुप-चुप रहना...शर्मीला सा रहना...नज़र उठाकर भी नहीं देखना...अच्छा नहीं लगता मुझे"
    24 min
  • कहानी: 'डायन' भाग-1 (महेंद्र नैन सिंह) स्वर: मदन लाल 'मधु'
    "तू क्या समझती है ...नहीं बताएगी तो पता नहीं लगेगा क्या?" कहते हुए मुस्कराई भरतो...,मैंने भी एक बेटी और दो बेटे जने हैं ...सब कुछ छिपाले औरत...पर यही न छिपता। भुलाना आसान तो नहीं जीजी...पर फिर भी जो हो गया भूल उसे...अब इसकी सोच...खुश रह...यही काम ढंग से निपटा दे...इसी काम के लिए तो बनाया है भगवान ने औरत जात को"
    1 hr 8 min

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