"तू औरत नहीं है क्या ?" आवाज़ पर उसके हाथ रुके, उसने चौंक कर इधर-उधर देखा। "औरत मनहूस नहीं होती ...न ही वह डायन होती ...वह तो सृष्टि करती है ...सृजन करती है...प्रेम, ममता, मातृत्व, क्षमा, दया, संहार, सृजन, बलिदान, करुणा की प्रतीक नौ दुर्गाओं का रूप है उसके भीतर...कहता है ज़माना कि अबला होती है औरत, जिंदगी भर मर्द का सहारा चाहिए उसे, मगर असल में शक्ति है।" अगर औरत ही टूटेगी-बिखरेगी तो दुनिया नहीं चलने की, उसका तो हर पल, हर कदम इम्तिहानों से भरा होता है...