Sahitya sangam Madhu

Sahitya sangam Madhu

By Madan LalArtsBooks
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Sahitya sangam Madhu episodes

  • कविता: नींद में एक घरेलू स्त्री (रामकुमार आत्रेय)
    वह घरेलू स्त्री नींद में है उसके दायीं ओर सोया हुआ है गहरी नींद किसी जंगली पशु की गुर्राहट जैसे खर्राटे भरता हुआ उसका पति जिसे वह स्त्री प्यार करती है पूरी नफरत के साथ उसके बाईं ओर सोया हुआ है उसका छोटा बच्चा जो थोड़ी देर पहले चीखने लगा था हाथ पाँवों को पटकता हुआ भूख के कारण स्त्री नींद में रहते हुए ही करवट बदलकर ठूंस दिया था उसके मुंह में अपना एक सूखा स्तन बच्चा जिसे अब तक चूसे जा रहा है ढेर सारा मीठा दूध पाने की आस में नींद में रहते हुए भी वह स्त्री बच्चे के पेशाब से गीले हुए गीले हुए बिस्तर पर खिसका लेती है अपनी देह चिपचिपी हो जाने के लिए और बच्चे को खिसका देती है सूखी साफ़ जगह पर थोड़ी देर पहले ही नींद में खूब रोई थी वह स्त्री आँखों से बहे आँसुओं की लकीरें अब भी मौजूद हैं उसके गालों पर पति ने सोने से पहले उसकी देह पर सवारी करते हुए झिड़का था उसे कि उसकी देह से बू आ रही है लहसुन-प्याज़ और हरे धनिये की, बच्चे की टट्टी और पेशाब की उससे तो ज़्यादा चुस्त-दुरुस्त और बन-ठन कर रहती हैं झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाली स्त्रियाँ ऐसा कहते हुए पति के मुँह से निकल रहे थे शराब की बदबू से भरे भभके नींद में ही चिंता परेशान किए जा रही है उसे सुबह जल्दी उठकर पति के लिए नाश्ता तैयार करने की कपड़े धोने और बाजार से सामान खरीदकर लाने की बच्चे के लिए डाॅक्टर से दवा लाने की और लो नींद में ही ठोकर खाकर गिर पड़ी है स्त्री हाथ में थमी दवा की बोतल छिटक कर जा पड़ी है दूर फूट गई है छनाक से एक चीख़ के साथ खुल गई हैं उसकी आँखें सुनकर दहाड़ा है उसका पति कि रात में भी उसे चैन से नहीं सोने देती है वह हरामजादी नींद में होते हुए भी दो पल की चैन भरी नींद के लिए तरस कर रह गई है स्त्री !
    4 min
  • लघुकथा: उसकी हँसी (बलराम अग्रवाल) स्वर: मदन लाल ।
    "उसकी हँसी" चौराहे पर उत्तर और पूर्व की ओर जाने वाली सड़कों के बीच ईशान में काफ़ी पीछे बरगद का घना पेड़ था। कहीं से आकर एक बुढ़िया कई सालों से उसके नीचे रहने लगी थी। उसी पेड़ के नीचे कुलचे-छोले का ठीया लगाने वाले शंकर का एक नियम था, सुबह को सबसे पहला और शाम को घर लौटने से पहले आखिरी पत्ता वह बुढ़िया के लिए बनाता था। आसपास के सभी खोमचे वाले देखा करते कि खाली समय में बुढ़िया फटी सी अपनी झोली से एक गोल डिबिया निकालती थी, धीमे से उसे खोलती और अपलक ऊपर वाले ढक्कन को निहारती। कभी शरमाती, कभी मुस्कराती और कभी खिलखिला कर हँस पड़ती। वह हँसती तो जैसे सारा आसपास हँस उठता । पेड़ पर बैठी गौरैयाँ चहक उठतीं । चीलें चौकन्नी हो जाती, कौए डरकर इधर-उधर ताकने लगते। उस दिन शंकर की दस वर्षीय बेटी साथ आ गई थी। शंकर ने कुलचे छोले का पत्ता उसके हाथ में थमाकर कहा ," परी, पेड़ के नीचे बैठी उस दादी को दे आ।" परी गई तो पत्ता पकड़ कर बुढ़िया ने उसे निकट बैठा लिया। नाम पूछा और कहा, "बैठ तुझे एक चीज़ दिखाती हूँ ....." यों कहकर उसने झोली से डिबिया निकाल कर पूछा,"बता क्या है ये?" डिबिया है ! परी ने सहज भाव से बताया। "लोहे की ऐसी चादर से बनी है, जिस पर जंग नहीं लगता ।" बुढ़िया बोली,"अब नहीं बनती ऐसी डिबियाएँ और।" फिर उसे खोलकर ऊपर वाले ढक्कन को उसकी ओर बढ़ाते हुए पूछा, "देख, ये क्या है?" "दर्पण है।" परी ने बताया। जितना चमकदार यह शादी के वक्त था, उतना ही आज भी है। खराब होने वाला नहीं है इसका मसाला। जब तेरी उम्र की थी,तब ससुराल से मिली थी यह दर्पण वाली डिबिया।" बुढ़िया ने अतीत में खोते हुए कहा, "मैं तब बहुत सुन्दर थी, एकदम तेरे जैसी।" "आप तो अब भी बहुत सुन्दर हो।" परी बोली, "एकदम मेरे जैसी।" इतना सुनना था कि बुढ़िया की हँसी छूट गई, जोर की हँसी। उसके साथ ही परी भी खिलखिला कर हँस पड़ी। दोनों ऐसा हँसी कि चारों दिशाओं से सिमटकर बादल बरगद के द्वारे आ खड़े हुए। हवाएँ शहनाई बजाने लगीं। पत्तियां झूम-झूमकर नाचने लगीं। समूचा पेड़ बारिश में भीगने लगा। "मुझे सालों से तेरा इंतज़ार था।" हँसी और बारिश के बीच डिबिया को परी के हाथों में थमाते हुए बुढ़िया बोली, "इसकी तू ही सही हकदार है, ले संभाल।" इतना कहकर वह कब , कहाँ चली गई , परी को पता ही नहीं चला! लोग मिट्टी को समेटने में लग गए ।
    5 min
  • सआदत हसन 'मंटो' : लेखन पर अन्यान्य साहित्यकारों का नज़रिया।
    वरिष्ठ साहित्यकारों क्रमशः सलीम अख़्तर, हाज़रा मसरूर, हनीफ़ रामे, आबिद अली आबिद, सरदार जाफ़री, उपेन्द्रनाथ अश्क व मुहम्मद हसन असकरी आदि के विचार ।
    12 min

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