"उसकी हँसी" चौराहे पर उत्तर और पूर्व की ओर जाने वाली सड़कों के बीच ईशान में काफ़ी पीछे बरगद का घना पेड़ था। कहीं से आकर एक बुढ़िया कई सालों से उसके नीचे रहने लगी थी। उसी पेड़ के नीचे कुलचे-छोले का ठीया लगाने वाले शंकर का एक नियम था, सुबह को सबसे पहला और शाम को घर लौटने से पहले आखिरी पत्ता वह बुढ़िया के लिए बनाता था। आसपास के सभी खोमचे वाले देखा करते कि खाली समय में बुढ़िया फटी सी अपनी झोली से एक गोल डिबिया निकालती थी, धीमे से उसे खोलती और अपलक ऊपर वाले ढक्कन को निहारती। कभी शरमाती, कभी मुस्कराती और कभी खिलखिला कर हँस पड़ती। वह हँसती तो जैसे सारा आसपास हँस उठता । पेड़ पर बैठी गौरैयाँ चहक उठतीं । चीलें चौकन्नी हो जाती, कौए डरकर इधर-उधर ताकने लगते। उस दिन शंकर की दस वर्षीय बेटी साथ आ गई थी। शंकर ने कुलचे छोले का पत्ता उसके हाथ में थमाकर कहा ," परी, पेड़ के नीचे बैठी उस दादी को दे आ।" परी गई तो पत्ता पकड़ कर बुढ़िया ने उसे निकट बैठा लिया। नाम पूछा और कहा, "बैठ तुझे एक चीज़ दिखाती हूँ ....." यों कहकर उसने झोली से डिबिया निकाल कर पूछा,"बता क्या है ये?" डिबिया है ! परी ने सहज भाव से बताया। "लोहे की ऐसी चादर से बनी है, जिस पर जंग नहीं लगता ।" बुढ़िया बोली,"अब नहीं बनती ऐसी डिबियाएँ और।" फिर उसे खोलकर ऊपर वाले ढक्कन को उसकी ओर बढ़ाते हुए पूछा, "देख, ये क्या है?" "दर्पण है।" परी ने बताया। जितना चमकदार यह शादी के वक्त था, उतना ही आज भी है। खराब होने वाला नहीं है इसका मसाला। जब तेरी उम्र की थी,तब ससुराल से मिली थी यह दर्पण वाली डिबिया।" बुढ़िया ने अतीत में खोते हुए कहा, "मैं तब बहुत सुन्दर थी, एकदम तेरे जैसी।" "आप तो अब भी बहुत सुन्दर हो।" परी बोली, "एकदम मेरे जैसी।" इतना सुनना था कि बुढ़िया की हँसी छूट गई, जोर की हँसी। उसके साथ ही परी भी खिलखिला कर हँस पड़ी। दोनों ऐसा हँसी कि चारों दिशाओं से सिमटकर बादल बरगद के द्वारे आ खड़े हुए। हवाएँ शहनाई बजाने लगीं। पत्तियां झूम-झूमकर नाचने लगीं। समूचा पेड़ बारिश में भीगने लगा। "मुझे सालों से तेरा इंतज़ार था।" हँसी और बारिश के बीच डिबिया को परी के हाथों में थमाते हुए बुढ़िया बोली, "इसकी तू ही सही हकदार है, ले संभाल।" इतना कहकर वह कब , कहाँ चली गई , परी को पता ही नहीं चला! लोग मिट्टी को समेटने में लग गए ।