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रानी बिना खाए सो गई। उसके खाने या न खाने की चिंता करने वाला कोई नहीं था। रात के गहरे सन्नाटे में वह सोच रही थी-क्यों लोग बच्चों के बड़े होने का आशीर्वाद देते हैं? छोटे रहते हैं तो कहना मानते हैं, हम जैसों के लिए तो बड़े काम के साबित होते है। दुनिया तभी तक दया दिखाती है जब तक छोटे बच्चे गोद में हों वरना ----
स्नेहलता जी द्वारा लिखित आज़ादी का अमृत महोत्सव बहुत ही सुन्दर कहानी है। बड़े ही कम शब्दों में स्नेहलता जी ने पूरी कहानी को समेटकर बाल मन की जिज्ञासा को शांत करने का सुंदर प्रयास किया है। #KahaniByShradha #AzadiKaAmritMahotsav
अफसर की माता जी एक व्यंगात्मक कहानी है जो आप सभी को जरूर अच्छी लगेगी। #KahaniByShradha
प्रायः आपको अपने आस-पास ऐसी स्त्रियाँ मिल जाएँगी जो परिवार के हित के लिए सब कुछ स्वाहा करके भी खाली हाथ रह जाती हैं। यदि आवाज़ उठाती हैं तो न जाने कितने विशेषणों से परिभाषित की जाती हैं और चुपचाप सहती जाती हैं तो स्वयं कुंठा का शिकार होती रहती हैं। आवश्यकता है तो संतुलन की। इस संतुलन को बनाए रखने में सभी का योगदान होना चाहिए न कि केवल और केवल स्त्री का।
मेरी टीेस कहानी ने आपको भी टीस का अहसास कराया हो तो अपने कहानी सुनने के शौकीन मित्रों के साथ सांझा जरूर कीजिएगा तथा अपने विचार [email protected] पर लिखने का कष्ट कीजिएगा। जल्द ही मिलेंगे अपनी लिखी एक और कहानी के साथ
तब तक आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में---
जब आँसुओं ने सारे बंधन तोड़ दिया तो एक सुनसान स्थान पर गाड़ी रोक कर फूट-फूट कर रोने लगी। थोड़ा मन हल्का हुआ तो कार स्र्टाट की और चल पड़ी अपनी वीरान दुनिया में जहाँ धोखे का सन्नाटा पसरा था। पूरे रास्ते सोचती रही कि सचमुच मुझसे तो वह विधवा भाग्यशाली है जिसके प्यार का कोई नाम था, जिसके नाम को वह गर्व से ले सकती है।
प्रतिक्रिया हेतु [email protected] पर संपर्क कीजिए --
मासूम बच्चे और बच्चों के मासूम से सवाल-जवाब। उनकी दुनिया में हर चीज निराली होती है। कई बार वे अपने कारनामों से सभी को अनुत्तरित कर देते हैं। मैंने बच्चों के मन को जानने की कोशिश की है। इस कोशिश में कहाँ तक सफल हो पाई हूँ यह निर्णय आप श्रोताओं पर छोड़ती हूँ ।
इंटरनेट के समय में पत्र लगभग समाप्त हो गए जबकि पत्र की मिठास वही समझ सकता है जिसने इसका स्वाद चखा हो। मैंने कहानी के द्वारा उस अनुभव को आप सभी लोगों के सामने लाना चाहती हूँ। इस कहानी को सुनिए और कहानी की दुनिया में खो जाइए ---
ये कहानी मेरे पिता रमाशंकर की ही नहीं बल्कि मध्यमवर्गीय परिवार के हर उस लड़के की है, जो आँखों में हसीन रंगों के सपने सजाए अपनी जिंदगी की शुरुआत करता है। आसमान को मुट्ठी में भरने की ताकत रखने वाले हर युवक की कहानी अपनों की जरूरत से शुरू होकर इन्हीं जरूरतों को पूरा करते-करते यहीं कहीं खो जाती है। #KahaniByShradka
स्कूल में जब बच्चे छोटे होते हैं तब उनके लिए जाति-पाति, ऊँच-नीच में कोई भेद-भाव नहीं होता। फिर अचानक क्या हो जाता है कि सारी चीज़े जाति-पाति, ऊँच-नीच पर आकर ठहर जाती हैं? एक सच्ची कहानी ----
जिस माला को अपनी माँ से बेहद नफरत थी उसी माला को आज माँ से प्यार हो गया था। एक समय था जब माँ की शेरनी जैसी आँखें हर-क्षण, हर-पल उसकी निगरानी किया करती थी। माँ की छत्र-छाया में निर्बाध घूमती-फिरती उसने कब बचपन की दहलीज पार करती जवानी मे कदम रख दिया, पता ही नहीं चला। समझदारी-नासमझी के बीच, बचपन व यौवन के बीच उससे ऐसा अपराध हो गया जिसे वह समझ ही नहीं पाई। अपने ही हाथों अपने पिता का वध करके वह ऐसे खड़ी थी मानों उसने कुछ किया ही नहीं हो।
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