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दिनकर जी ने कहा था एक नहीं दो दो मात्राएँ नर से भारी नारी। जयशंकर प्रसाद दम कहा-नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास रजत नभ पग तल में , पीयूष स़़्त्रोत सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में। हमारा हिंदी साहित्य भरा पड़ा है ऐसे अनेक सूक्तियों सूत्रों कविताओं व लेखों से पर क्या नारी को उसका वह स्थान मिल पाया है जिसकी वह हकदार है? कुछ मेरे मित्र हाँ भी कह सकते है पर बहुत ऐसे मिलेंगे जो हाँ कहने में थोड़ा हकलाएँगे। आखिर क्यों? कई बार मेरा मन अपने आप से प्रश्न भी करता है कि आखिर क्या कारण है कि महिला को अपने अस्तित्व को बरकरार रखने के लिए महिला दिवस मनाने की जरूरत पड़ रही है? शायद इसका कारण स्वयं नारी ही है। आप मुझसे सहमत हो तो यह कहानी आपके लिए और असहमत हों तब तो यह कहानी आपके लिए ही है।अपने विचार मुझे [email protected] पर भेजिए।
लोगों से मिली प्रसंशा की झलकियां
Awesome story and Kudos to your unique style of narration. I felt as if the whole story is being picturised in front of my eyes and all the characters are playing live in front of me. Truly amazing ma'am 👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻
👌👌👌Wow Lovely share . Just heard the first story today . It was marvellous ! After such a long time I have heard a lovely story
2010 कश्मीर में बाढ़ की त्रासदी को मैंने महसूस किया वहां के लोगों की पीड़ा को बड़े करीब से अनुभव किया और तबाही में जिंदगी ढूंढने के लिए मेरी कलम चलने लगी. भावनाओं से भरी यह कहानी आप सभी को जरूर पसंद आएगी।
2010 कश्मीर में बाढ़ की त्रासदी को मैंने महसूस किया वहां के लोगों की पीड़ा को बड़े करीब से अनुभव किया और तबाही में जिंदगी ढूंढने के लिए मेरी कलम चलने लगी
कहानी का एक छोटा सा अंश आप सभी के लिए
कहानियों की दुनिया बड़ी निराली होती है। शब्द कब चित्र बन जाते , पता ही नहीं चलता इसलिए चलिए कहानियों की दुनिया में और दोस्ती करते हैं उन चरित्रों से उनके किरदारों से जो चुपचाप कहानी से निकलकर हमसे दोस्ती का हाथ बढ़ाने लगते हैं--- तो प्रस्तुत है कहानी अभी देर नहीं हुई
और जोड़ते हैं इस कड़ी में एक और कड़ी कहानी संख्या 11 पुस्तक का नाम समय की रेत परऔर मिलते हैं 16 फरवरी को एक नई कहानी के साथ – अभी देर नहीं हुई ।
sapno ke se din is a autobiography of Gurudayal Singh where he has described about his childhood
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