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यदि आप पढ़ने के शौकीन हैं तो आप मेरी यह कहानी जुलाई माह की " सखी " पत्रिका में पढ़ सकते हैं।
कहानी से -----सुनयना अपने कमरे में बिस्तर पर औंधी लेटी आँसू बहाते हुए सोच रही थी कि क्या हर रिश्ते को नाम देना जरूरी है ? क्या दो अलग-अलग उम्र व लिंग के लोग मित्र नहीं हो सकते ?सुनयना अपने अंतर्द्वंद्व में उलझी थी कि अचानक अपने सामने शशांक को पाकर घबरा गई। शशांक ने बड़े अधिकार से कहा
[email protected] पर आपकी राय की प्रतीक्षा रहेगी ।
प्रेम की, प्यार की, त्याग की, समर्पण की कोई भाषा नहीं होती, होता है सिर्फ जुड़ाव, ऐसा जुड़ाव कि एक पल के लिए अलग होते ही एक दूसरे की कमीं खलने लगती है चाहे यह जुड़ाव खून का हो या फिर मन का।
किसी ने क्या खूब कहा है-प्रेम होता,तो कोई भेदभाव न होता,न कोई किसी से अलग होता,न ही कोई भूखा सोता।।न हम रोते, न वो रोता।। प्रेम होता तो तो कोई भेदभाव न होता।
मेरी कहानी के प्रति आपके क्या विचार हैं कृपया shradha.pdy@mail पर मुझे बताने का कष्ट कीजिए । आपके प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में -------
कितने ही लोग शहर इस उम्मीद से आते हैं कि शहर में पैसा कमाकर वापस घर चले जाएँगे शहर की सड़क कभी गाँव की तरफ नहीं मुड़ती इसलिए शायद ही कोई लौट पाया है। शहरी मायाजाल में फँसा आदमी तड़पता तो रहता है पर निकल नहीं पाता। जो निकल जाता है या निकल जाने का प्रयास करता है वह सच्चे अर्थों में जी जाता है वरना कोल्हू के बैल की तरह निरंतर गोल-गोल घूमता जीवन के अंतिम पड़ाव पर अपने खाली हाथों को देख सिर्फ पछताता रहता है।
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दुनिया चाँद सितारों पर क्यों न पहुँच जाए पर भारत में आज भी लड़कों की चाह में न जाने कितनी लड़कियाँ जन्म से पहले मार दी जाती हैं। माना कि यह एक कहानी है पर सत्यता के धरातल पर लिखी गई है अन्यथा कूड़े के ढेर में नवजात लड़कियां फेंकी न मिलतीं ।
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एक पक्ष के पश्चात फिर मिलेंगे एक नई कहानी के साथ मैं श्रद्धा आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में
ओजस गुनगुनी धूप में बैठे अख़बार पढ़ रहे थे। पास ही बैठी उनकी पत्नी मटर छील रही थीं। ओजस का परिवार आधुनिक समाज में उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है जहाँ तीन-तीन पीढ़ियाँ बड़े प्रेम व सौहार्द से रह रही थीं। परिवार टूटते ही क्यों है? आज तक न ओजस को इस प्रश्न का उत्तर मिला न ही हम सबको। परिवार के टूटने व जुड़े रहने की गुत्थी को सुलझाने में कितने ही समाज शास्त्रियों ने कितना समय लगा दिया पर आज तक इस गुत्थी को न वे सुलझा पाएए न ये ओजस जी के वश की बात है। हम कहीं इस विषय में और न उलझ जाएँ अतः चलिए उस सुहानी धूप में जहाँ ओजस अपने परिवार के साथ सीनियर सिटिज़न का आनन्द उठा रहे थे। [email protected]
सत्या की व्यथा व लाचारी ने उसे चुप रहने पर मजबूर कर दिया है या उसके पिता की बीमारी या फिर हवेली की मालकिन चाची ने, जो सब कुछ जान कर भी अनजान थीं, या चाचा जो दाँव पर दाँव खेल रहा था या फिर उसकी अपनी माँ ---- जो सब कुछ जानती तो थी लेकिन उसे सामाजिक व्यवस्था व गरीबी ने आवाज उठाने की हिम्मत नहीं थी। यदि मेरी कहानी आपके दिल को छूने में सफल हुई तो अपने विचार Shradha.pdy @Gmail.com पर मुझ तक पहुंचाइए।
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अत्यंत मार्मिक कहानी, फरवरी माह की ई. कल्पना मैगज़ीन में प्रकाशित कहानी। यदि आप पढ़ना चाहते हैं तो लिंक दिया है
https://www.ekalpana.net/post/shradhapandeystoryfeb2021
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