https://youtu.be/lAEVnccHfj0 अजीब बात थी, ख़ुद कमरे में होते हुए भी बाशी को कमरा ख़ाली लग रहा था.
उसे काफ़ी देर हो गई थी कमरे में आए–या शायद उतनी देर नहीं हुई थी जितनी कि उसे लग रही थी. वक़्त उसके लिए दो तरह से बीत रहा था–जल्दी भी और आहिस्ता भी…उसे दरअसल, वक़्त का ठीक अहसास नहीं हो रहा था.
कमरे में कुछ एक कुर्सियां थीं–लकड़ी की. वैसी ही जैसी सब पुलिस स्टेशनों पर होती हैं. कुर्सियों के बीचोंबीच एक मेज़नुमा तिपाई थी जो कि कुहनी ऊपर रखते ही झूलने लगती थी. आठ फ़ुट और आठ फ़ुट का वह कमरा इनसे पूरा घिरा था. टूटे पलस्तर की दीवारें कुर्सियों से लगभग सटी जान पड़ती थीं. शुक्र था कि कमरे में दरवाज़े के अलावा एक खिड़की भी थी.
बाहर अहाते में बार-बार चरमराते जूतों की आवाज़ सुनाई देती थी–यही वह सब-इन्स्पेक्टर था जो उसे कमरे के अन्दर छोड़ गया था. उस आदमी का चेहरा आंखों से दूर होते ही भूल जाता था, पर सामने आने पर फिर एकाएक याद हो आता था. कल से आज तक वह कम-से-कम बीस बार उसे भूल चुका था.
उसने सुलगाने के लिए एक सिगरेट जेब से निकाली, पर यह देखकर कि उसके पैरों के पास पहले ही काफ़ी टुकड़े जमा हो चुके हैं, उसे वापस जेब में रख लिया. कमरे में एक ऐश-ट्रे का न होना उसे शुरू से ही अखर रहा था. इस वजह से वह एक भी सिगरेट आराम से नहीं पी सका था. पहला सिगरेट पीते हुए उसने सोचा था कि पीकर टुकड़ा खिड़की से बाहर फेंक देगा. पर उधर जाकर देखा कि खिड़की के ठीक नीचे एक चारपाई बिछी है, जिस पर लेटे या बैठे हुए दो-एक कान्स्टेबल अपना आराम का वक़्त बिता रहे हैं. उसके बाद फिर दूसरी बार खिड़की के पास नहीं गया.
अकेले कमरे में वक़्त काटने के लिए सिगरेट पीने के अलावा भी जो कुछ किया जा सकता था, वह कर चुका था. जितनी कुर्सियां थीं, उनमें से हर एक पर एक-एक बार बैठ चुका था. उनके गिर्द चहलकदमी कर चुका था. दीवारों के पलस्तर दो-एक जगह से उखाड़ चुका था. मेज़ पर एक बार पेंसिल से और न जाने कितनी बार उंगली से अपना नाम लिख चुका था. एक ही काम था जो उसने नहीं किया था–वह था, दीवार पर लगी क्वीन विक्टोरिया की तस्वीर को थोड़ा तिरछा कर देना. बाहर अहाते से लगातार जूते की चरमर सुनाई न दे रही होती, तो अब तक उसने यह भी कर दिया होता.
उसने अपनी नब्ज़ पर हाथ रखकर देखा कि बहुत तेज़ तो नहीं चल रही. फिर हाथ हटा लिया, कि कोई उसे ऐसा करते देख न ले.
उसे लग रहा था कि वह थक गया है और उसे नींद आ रही है. रात को ठीक से नींद नहीं आई थी. ठीक से क्या, शायद बिलकुल नहीं आई थी. या शायद नींद में भी उसे लगता रहा था कि वह जाग रहा है. उसने बहुत कोशिश की थी कि जागने की बात भूलकर किसी तरह सो सके–पर इस कोशिश में ही पूरी रात निकल गई थी.
उसने जेब से पेंसिल निकाल ली और बाएं हाथ पर अपना नाम लिखने लगा–बाशी, बाशी, बाशी. सुभाष, सुभाष, सुभाष!
आज सुबह यह नाम प्रायः सभी अख़बारों में छपा था. रोज़ के अख़बार के अलावा उसने तीन-चार अख़बार और ख़रीदे थे. किसी में दो इंच में ख़बर दी गई थी, किसी में दो कालम में. जिसने दो कालम में ख़बर दी थी वह रिपोर्टर उसका परिचित था. वह गर उसका परिचित न होता, तो शायद…
वह अब अपनी हथेली पर दूसरा नाम लिखने लगा–वह नाम जो उसके नाम के साथ-साथ अख़बारों में छपा था–नत्थासिंह, नत्थासिंह, नत्थासिंह!
यह नाम लिखते हुए उसकी हथेली पर पसीना आ गया. उसने पेंसिल रखकर हथेली को मेज़ से पोंछ लिया.
जूते की चरमर दरवाज़े के पास आ गई. सब-इन्स्पेक्टर ने एक बार अन्दर झांककर पूछ लिया,’’आपको किसी चीज़ की ज़रूरत तो नही?’’
‘‘नहीं.’’ उसने सिर हिला दिया. उसे तब ऐश-ट्रे का ध्यान नहीं आया.
‘‘पानी-वानी की ज़रूरत हो, तो मांग लीजिएगा.’’
उसने फिर सिर हिला दिया कि ज़रूरत होगी तो मांग लेगा. साथ पूछ लिया,’’अभी और कितनी देर लगेगी?’’
‘‘अब ज़्यादा देर नहीं लगेगी.’’ सब-इन्स्पेक्टर ने दरवाज़े के पास से हटते हुए कहा,’’पन्द्रह-बीस मिनट में ही उसे ले आएंगे.’’
इतना ही वक़्त उसे तब बताया गया था जब उसे उस कमरे में छोड़ा गया था. तब से अब तक क्या कुछ भी वक़्त नहीं बीता था.
जूते के अन्दर, दाएं पैर के तलवे में खुजली हो रही थी. जूता खोलकर एक बार अच्छी तरह खुजला लेने की बात वह कितनी बार सोच चुका था. पर हाथ दो-एक बार नीचे झुकाकर भी उससे तस्मा खोलते नहीं बना था. उस पैर को दूसरे पैर से दबाए, वह जूते को रगड़कर रह गया.
हाथ की पेंसिल फिर चल रही थी. उसने अपनी हथेली को देखा. दोनों नामों के ऊपर उसने बड़े-बड़े अक्षरों में लिख दिया था–अगर…
अगर…।।