Suno Kahaniyan

Suno Kahaniyan

By PoonamArtsBooks
Download on the App Store

Suno Kahaniyan episodes

  • Kaidi story written by Munshi Premchand
    https://youtu.be/aShwxCkY-s4 Kaidi Munshi Premchand
    कैदी मुंशी प्रेम चंद
    चौदह साल तक निरन्तर मानसिक वेदना और शारीरिक यातना भोगने के बाद आइवन ओखोटस्क जेल से निकला; पर उस पक्षी की भाँति नहीं, जो शिकारी के पिंजरे से पंखहीन होकर निकला हो बल्कि उस सिंह की भाँति, जिसे कठघरे की दीवारों ने और भी भयंकर तथा और भी रक्त-लोलुप बना दिया हो। उसके अन्तस्तल में एक द्रव ज्वाला उमड़ रही थी, जिसने अपने ताप से उसके बलिष्ठ शरीर, सुडौल अंग-प्रत्यंग और लहराती हुई अभिलाषाओं को झुलस डाला था और आज उसके अस्तित्व का एक-एक अणु एक-एक चिनगारी बना हुआ था क्षुधित, चंचल और विद्रोहमय। जेलर ने उसे तौला। प्रवेश के समय दो मन तीस सेर था, आज केवल
    एक मन पाँच सेर। जेलर ने सहानुभूति दिखाकर कहा, तुम बहुत दुर्बल हो गये हो, आइवन। अगर जरा भी पथ्य हुआ, तो बुरा होगा। आइवन ने अपने हड्डियों के ढॉचे को विजय-भाव से देखा और अपने अन्दर एक अग्निमय प्रवाह का अनुभव करता हुआ बोला, 'क़ौन कहता है कि मैं दुर्बल हो गया हूँ ?'
    'तुम खुद देख रहे होगे।'
    'दिल की आग जब तक नहीं बुझेगी, आइवन नहीं मरेगा, मि. जेलर,
    सौ वर्ष तक नहीं, विश्वास रखिए।'
    आइवन इसी प्रकार बहकी-बहकी बातें किया करता था, इसलिए जेलर ने ज्यादा परवाह न की। सब उसे अर्ध्द-विक्षिप्त समझते थे। कुछ लिखा-पढ़ी हो जाने के बाद उसके कपड़े और पुस्तकें मँगवायी गयीं; पर वे सारे सूट
    अब उसे उतारे हुए-से लगते थे। कोटों की जेबों में कई नोट निकले, कई नगद रूबेल। उसने सबकुछ वहीं जेल के वार्डरों और निम्न कर्मचारियों को दे दिया मानो उसे कोई राज्य मिल गया हो। जेलर ने कहा, 'यह नहीं हो सकता, आइवन ! तुम सरकारी आदमियों को रिश्वत नहीं दे सकते।' आइवन साधु-भाव से हँसा, 'यह रिश्वत नहीं है, मि. जेलर ! इन्हें रिश्वत देकर अब मुझे इनसे क्या लेना-देना है ? अब ये अप्रसन्न होकर मेरा क्या बिगाड़ लेंगे और प्रसन्न होकर मुझे क्या देंगे ? यह उन कृपाओं का धन्यवाद है जिनके बिना चौदह साल तो क्या, मेरा यहाँ चौदह घंटे रहना असह्य हो जाता।'
    जब वह जेल के फाटक से निकला, तो जेलर और सारे अन्य कर्मचारी उसके पीछे उसे मोटर तक पहुँचाने चले। पन्द्रह साल पहले आइवन मास्को के सम्पन्न और सम्भ्रान्त कुल का दीपक था। उसने विद्यालय में ऊँची शिक्षा पायी थी, खेल में अभ्यस्त था, निर्भीक था। उदार और सह्रदय था। दिल आईने की भाँति निर्मल, शील का पुतला, दुर्बलों की रक्षा के लिए जान पर खेलनेवाला, जिसकी हिम्मत संकट के सामने नंगी तलवार हो जाती । उसके साथ हेलेन नाम की एक युवती पढ़ती थी, जिस पर विद्यालय के सारे युवक प्राण देते थे। वह जितनी रूपवती थी, उतनी ही तेज थी, बड़ी कल्पनाशील; पर अपने मनोभावों को ताले में बन्द रखनेवाली। आइवन में क्या देखकर वह उसकी ओर आकर्षित हो गयी, यह कहना कठिन है। दोनों में लेशमात्रा भी सामंजस्य न था। आइवन सैर और शराब का प्रेमी था, हेलेन कविता एवं संगीत और नृत्य पर जान देती थी।....
    28 min
  • एक ठहरा हुआ चाकू: मोहन राकेश की कहानी
    https://youtu.be/lAEVnccHfj0 अजीब बात थी, ख़ुद कमरे में होते हुए भी बाशी को कमरा ख़ाली लग रहा था.
    उसे काफ़ी देर हो गई थी कमरे में आए–या शायद उतनी देर नहीं हुई थी जितनी कि उसे लग रही थी. वक़्त उसके लिए दो तरह से बीत रहा था–जल्दी भी और आहिस्ता भी…उसे दरअसल, वक़्त का ठीक अहसास नहीं हो रहा था.
    कमरे में कुछ एक कुर्सियां थीं–लकड़ी की. वैसी ही जैसी सब पुलिस स्टेशनों पर होती हैं. कुर्सियों के बीचोंबीच एक मेज़नुमा तिपाई थी जो कि कुहनी ऊपर रखते ही झूलने लगती थी. आठ फ़ुट और आठ फ़ुट का वह कमरा इनसे पूरा घिरा था. टूटे पलस्तर की दीवारें कुर्सियों से लगभग सटी जान पड़ती थीं. शुक्र था कि कमरे में दरवाज़े के अलावा एक खिड़की भी थी.
    बाहर अहाते में बार-बार चरमराते जूतों की आवाज़ सुनाई देती थी–यही वह सब-इन्स्पेक्टर था जो उसे कमरे के अन्दर छोड़ गया था. उस आदमी का चेहरा आंखों से दूर होते ही भूल जाता था, पर सामने आने पर फिर एकाएक याद हो आता था. कल से आज तक वह कम-से-कम बीस बार उसे भूल चुका था.
    उसने सुलगाने के लिए एक सिगरेट जेब से निकाली, पर यह देखकर कि उसके पैरों के पास पहले ही काफ़ी टुकड़े जमा हो चुके हैं, उसे वापस जेब में रख लिया. कमरे में एक ऐश-ट्रे का न होना उसे शुरू से ही अखर रहा था. इस वजह से वह एक भी सिगरेट आराम से नहीं पी सका था. पहला सिगरेट पीते हुए उसने सोचा था कि पीकर टुकड़ा खिड़की से बाहर फेंक देगा. पर उधर जाकर देखा कि खिड़की के ठीक नीचे एक चारपाई बिछी है, जिस पर लेटे या बैठे हुए दो-एक कान्स्टेबल अपना आराम का वक़्त बिता रहे हैं. उसके बाद फिर दूसरी बार खिड़की के पास नहीं गया.
    अकेले कमरे में वक़्त काटने के लिए सिगरेट पीने के अलावा भी जो कुछ किया जा सकता था, वह कर चुका था. जितनी कुर्सियां थीं, उनमें से हर एक पर एक-एक बार बैठ चुका था. उनके गिर्द चहलकदमी कर चुका था. दीवारों के पलस्तर दो-एक जगह से उखाड़ चुका था. मेज़ पर एक बार पेंसिल से और न जाने कितनी बार उंगली से अपना नाम लिख चुका था. एक ही काम था जो उसने नहीं किया था–वह था, दीवार पर लगी क्वीन विक्टोरिया की तस्वीर को थोड़ा तिरछा कर देना. बाहर अहाते से लगातार जूते की चरमर सुनाई न दे रही होती, तो अब तक उसने यह भी कर दिया होता.
    उसने अपनी नब्ज़ पर हाथ रखकर देखा कि बहुत तेज़ तो नहीं चल रही. फिर हाथ हटा लिया, कि कोई उसे ऐसा करते देख न ले.
    उसे लग रहा था कि वह थक गया है और उसे नींद आ रही है. रात को ठीक से नींद नहीं आई थी. ठीक से क्या, शायद बिलकुल नहीं आई थी. या शायद नींद में भी उसे लगता रहा था कि वह जाग रहा है. उसने बहुत कोशिश की थी कि जागने की बात भूलकर किसी तरह सो सके–पर इस कोशिश में ही पूरी रात निकल गई थी.
    उसने जेब से पेंसिल निकाल ली और बाएं हाथ पर अपना नाम लिखने लगा–बाशी, बाशी, बाशी. सुभाष, सुभाष, सुभाष!
    आज सुबह यह नाम प्रायः सभी अख़बारों में छपा था. रोज़ के अख़बार के अलावा उसने तीन-चार अख़बार और ख़रीदे थे. किसी में दो इंच में ख़बर दी गई थी, किसी में दो कालम में. जिसने दो कालम में ख़बर दी थी वह रिपोर्टर उसका परिचित था. वह गर उसका परिचित न होता, तो शायद…
    वह अब अपनी हथेली पर दूसरा नाम लिखने लगा–वह नाम जो उसके नाम के साथ-साथ अख़बारों में छपा था–नत्थासिंह, नत्थासिंह, नत्थासिंह!
    यह नाम लिखते हुए उसकी हथेली पर पसीना आ गया. उसने पेंसिल रखकर हथेली को मेज़ से पोंछ लिया.
    जूते की चरमर दरवाज़े के पास आ गई. सब-इन्स्पेक्टर ने एक बार अन्दर झांककर पूछ लिया,’’आपको किसी चीज़ की ज़रूरत तो नही?’’
    ‘‘नहीं.’’ उसने सिर हिला दिया. उसे तब ऐश-ट्रे का ध्यान नहीं आया.
    ‘‘पानी-वानी की ज़रूरत हो, तो मांग लीजिएगा.’’
    उसने फिर सिर हिला दिया कि ज़रूरत होगी तो मांग लेगा. साथ पूछ लिया,’’अभी और कितनी देर लगेगी?’’
    ‘‘अब ज़्यादा देर नहीं लगेगी.’’ सब-इन्स्पेक्टर ने दरवाज़े के पास से हटते हुए कहा,’’पन्द्रह-बीस मिनट में ही उसे ले आएंगे.’’
    इतना ही वक़्त उसे तब बताया गया था जब उसे उस कमरे में छोड़ा गया था. तब से अब तक क्या कुछ भी वक़्त नहीं बीता था.
    जूते के अन्दर, दाएं पैर के तलवे में खुजली हो रही थी. जूता खोलकर एक बार अच्छी तरह खुजला लेने की बात वह कितनी बार सोच चुका था. पर हाथ दो-एक बार नीचे झुकाकर भी उससे तस्मा खोलते नहीं बना था. उस पैर को दूसरे पैर से दबाए, वह जूते को रगड़कर रह गया.
    हाथ की पेंसिल फिर चल रही थी. उसने अपनी हथेली को देखा. दोनों नामों के ऊपर उसने बड़े-बड़े अक्षरों में लिख दिया था–अगर…
    अगर…।।
    38 min
  • After Twenty Years story written by O. Henry
    https://youtu.be/2vVhAPoMxA4 बीस साल बाद
    एक पुलिस अधिकारी बड़ी फुरती से सड़क पर गश्त लगा रहा था। रात के अभी मुशकिल से 10 बजे थे, लेकिन हलकी-हलकी बारिश तथा ठंडी हवा के कारण सड़क पर बहुत कम आदमी नजर आ रहे थे।
    सड़क के एक छोर पर एक गोदाम था। जब पुलिस अधिकारी उस गोदाम के करीब पहुंचा तो उसके दरवाजे के पास उसने एक आदमी को देखा। वह आदमी मुंह में बिना जला हुआ सिगार दबाए झुक कर खड़ा था।
    6 min
  • Ek Tha Chitrakaar , Ek Tha Raja story by Ved Rahi
    https://youtu.be/BeYfvWjelC0 एक चित्रकार के एक तरफा प्रेम की अनूठी कहानी ।। Ek Tha Chitrakar, Ek Tha Raja (Story) Ved Rahi
    एक था चित्रकार, एक था राजा (कहानी) वेद राही
    तवी नदी में बाढ़ आई हुई थी। नैनसुख एक ऊँचे पत्थर पर खड़ा होकर बिफरती हुई लहरों की तरफ एकटक देख रहा था। आपस में भिड़तीं, टकरातीं, फिर एक-दूसरे में डूबतीं, तैरतीं लहरों में उसे अपने मन की तसवीर नजर आ रही थी। उसके मन में भी ऐसा ही उफान था। वह सोच रहा था, जब बारिश पहाड़ों पर बरसती है तो बाढ़ शहरों-नगरों में आती है। इसी तरह जिस गूजर लड़की ने उसके मन में तृफान मचा रखा है, वह तवी के पार कहीं आराम से बैठी है और इस पार नैनसुख बाढ़ को चीरकर पार जाने की ठान रहा है।
    जिस पत्थर पर वह खड़ा था, उसके नीचे नजर गई तो देखा, थोड़ी देर पहले जो जगह सूखी थीं, अब वहाँ पानी उफन रहा था। वह समझ गया, सोचने-सोचने में जितनी देर होगी, पानी और भी बढ़ता जाएगा। वह उछलकर अगले पत्थर पर चला गया। अब आगे कोई और पत्थर नहीं था। पीछे से आवाज आई, “ओ....नैनूss”
    उसने पीछे मुड़कर देखा। उसका छोटा भाई मानक उसे पुकार रहा था, “पानी बढ़ रहा है, आगे कहाँ जा रहे हो?”
    “मैं पार जा रहा हूँ।”
    “तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हुआ?” कहते हुए मानक उसकी तरफ बढ़ा, “इस बाढ़ में कोई पार जा सकता है?”
    “मुझे जाना है।”
    अब मानक उसके पीछे वाले पत्थर पर आ खड़ा हुआ था; बोला, “मैं जानता हूँ, तुम्हें पार जाने की बेसब्री क्‍यों है, पहले बाढ़ उतरने दो। शाम तक पानी कम हो जाएगा।” नैनसुख वैसे ही खड़ा रहा। मानक ने फिर कहा, “राजा साहब जसरोटे से यहाँ पहुँचने वाले हैं।”
    नैनसुख ने जवाब दिया, “उनके आने तक मैं वापस आ जाऊँगा।” और यह कहकर उसने पानी में छलाँग लगा दी। मानक का दिल धक्‌ से रह गया। उसके देखते-देखते नैनसुख लहरों में यूँ गुम हो गया, जैसे कोई तिनका बाढ़ में समा जाता है।
    नैनसुख लहरों से लड़ते-लड़ते निढाल हो गया। उसे लगा कि अब वह बच नहीं पाएगा। उसने अपने आपको ढीला छोड़ दिया। पानी उसके अंदर जा रहा था। उसे इस बात का होश भी नहीं रहा था कि उसको पार जहाँ पहुँचना है, वह जगह बहुत पीछे छूट गई है। मुरदे की तरह बहते- बहते अचानक उसे एक झटका-सा लगा। ऐसे महसूस हुआ कि वह कहीं आ गया है। आँखें खोलकर देखने की शक्ति भी नहीं थी। काफी देर बाद चेतना लौटी। उसने जाना कि वह पानी में ही है, मगर बह नहीं रहा। उसने सिर उठाने का यत्न किया, पर उठाया नहीं गया। थोड़ी देर बाद फिर उठने की कोशिश की; देखा तो पाँव पर कुछ साँप जैसा चल रहा था। टाँग झटककर उसे दूर फँका और तुरंत उठकर बैठ गया। खड़ा होना चाहा तो चक्कर-सा आ गया। अंदर से मुँह के रास्ते कुछ पानी भी निकल गया। उसने देखा, वह पार आ लगा है। इतना शिथिल होते हुए भी वह मुसकराया। खड़े होकर उसने चारों तरफ नजर दौड़ाई। उसने अंदाजा लगा लिया कि वह शहर से कोस भर दूर आ पहुँचा है। धीरे-धीरे वह ऊपर की ओर चल पड़ा। वहाँ पहुँचना जरूरी था, जहाँ पहुँचने के लिए उसने इन भयानक लहरों को ललकारा था। उसके पाँव यूँ उठ रहे थे, जैसे मनों भारी हो गए हों!
    31 min

About Suno Kahaniyan

From the publisher's feed

https://youtube.com/channel/UCoDc0x0zXDhO1toAzIHWrUg

More shows like Suno Kahaniyan

Kahani Jaani Anjaani - Weekly Hindi Stories by Piyush Agarwal

Kahani Jaani Anjaani - Weekly Hindi Stories

33 Listeners

Kahani Suno | कहानी सुनो (कहानियों व उपन्यासों का संसार) by Sameer Goswami

Kahani Suno | कहानी सुनो (कहानियों व उपन्यासों का संसार)

30 Listeners