Suno Kahaniyan

Suno Kahaniyan

By PoonamArtsBooks
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Suno Kahaniyan episodes

  • Bibiya Mahadevi Verma
    https://youtu.be/YbOgZq2M35E सुडोल गठीले शरीर वाली बिबिया को धोबिन समझना कठिन था , पर थी वह धोबिनों में भी सबसे अभागी धोबिन । ऐसी आकृति के साथ जिस आलस्य या सुकुमारता की कल्पना की जाती है, उसका बिबिया में सर्वथा अभाव था । वस्तुत: उसके सामान परिश्रमी खोजना कठिन होगा । अपना ही नहीं , वह दूसरों का काम करके भी आनंद का अनुभव करती थी । ऐसी थी बीवियां ...
    40 min
  • Mandir story by Munshi Premchand
    https://youtu.be/eWfHBU-EBsI एक दुखिया मां की कहानी जो अपने बच्चे के स्वास्थ के लिए मंदिर जाना चाहती है लेकिन वह अछूत होने के कारण पूरा नहीं हो सका ..
    21 min
  • Kshamadam story written by Leo Tolstoy
    https://youtu.be/0aleDKUmzmQ kshamadam क्षमादान लियो टॉलस्टॉय की लिखी कहानी दिल्ली नगर में भागीरथ नाम का युवक सौदागर रहता था। वहां उसकी अपनी दो दुकानें और एक रहने का मकान था। वह सुन्दर था। उसके बाल कोमल, चमकीले और घुंघराले थे। वह हंसोड़ और गाने का बड़ा परेमी था। युवावस्था में उसे मद्य पीने की बान पड़ गई थी। अधिक पी जाने पर कभीकभी हल्ला भी मचाया करता था, परन्तु विवाह कर लेने पर मद्य पीना छोड़ दिया था।
    गरमी में एक समय वह कुम्भ पर गंगा जाने को तैयार हो, अपने बच्चों और स्त्री से विदा मांगने आया।
    18 min
  • Ek Thi Gaura story written by Amarkant
    https://youtu.be/VdcJ8Hfp2lg आशू कुछ देर तक उसके मुखमंडल को देखता रहा क्यों।... जानने के लिए सुने कहानी। एक थी गौरा अमरकांत की लिखी कहानी।
    7 min
  • मछली अब नहीं उड़ती : मनोहर चमोली 'मनु' Machhli Ab Nahin Udti : Manohar Chamoli Manu
    https://youtu.be/WEQVFT8XYkc मछली अब नहीं उड़ती : मनोहर चमोली 'मनु'
    Machhli Ab Nahin 'Udti : Manohar Chamoli ' Manu
    ' बहुत पुरानी बात है। मछली का मन करता तो वह दूर आसमान में जा उड़ती। तैरने का मन करता तो नदी के अंदर चली जाती। एक दिन बगुले का जोड़ा कहीं जाने लगा। बगुला मछली से बोला-"हमारे अंडों का ध्यान रखना। हम दाना चुग कर आते हैं।" वे जब लौट कर आए तो मछली आसमान में उड़ गई। दोपहर हुई तो मोर ने मछली से कहा-"मोरनी न जाने कहाँ चली गई। उसे खोजने जाना होगा। हमारे अंडों का ध्यान रखना।" उनके लौटने तक मछली ने अंडों की रखवाली की। शाम हुई तो चूहिया ने मछली को पुकारा-"मैं टहलने जा रही हूँ। मेरे बच्चे अकेले हैं।" मछली पहरा देने लगी। चूहिया रात को लौटी। मछली जाने को हुई तो गिलहरी ने आवाज़ लगाई-"अमरूद पक गए होंगे तो मुझे बताना।" मछल उड़ी और अमरूद के पेड़ के फल देख आई। मछली ने गिलहरी को बताया-"अमरूद पक चुके हैं।" मछली उड़ी तो उसे एक सांप ने रोक लिया। पूछा-"कहाँ जा रही हो?"
    मछली ने जवाब दिया-"थक गई हूँ। जल में तैरने जा रही हूँ।" सांप ने हंसते हुए कहा-"आज की थकान तो दूर हो जाएगी। मगर कल क्या होगा?" मछली ने चैंकते हुए पूछा-"मतलब?" सांप ने जवाब दिया-"मतलब ये कि हर कोई तुम पर रौब जमाता है। मोर, बगुले, चूहे, गिलहरी तक तुम से अपना काम करा लेते हैं। क्यों?" मछली सोच में पड़ गई।
    सुबह हुई। बगुला का जोड़ा मछली के पास आया और वही बात कहकर उड़ चला। मछली को सांप की बात याद थी। उसने मुंह बनाया-"हुंअ। मैं नदी में तैरने जा रही हूँ। शाम तक बाहर न आऊंगी।" बस फिर क्या था। सांप को इसी पल का इंतज़ार था। बगुलों के लौटने से पहले वह अंडे खा चुका था। दोपहर हुई तो मोर ने मछली से कहा-"मोरनी न जाने फिर कहाँ चली गई। मैं उसे खोजने जा रहा हूँ। अंडों का ध्यान रखना।" मछली ने मोर की बात को अनसुना कर दिया। वह घने पेड़ के पत्तों के पीछे आराम करने लगी। सांप ने मोरनी के अंडों को चट कर डाला। शाम हुई तो चूहिया ने मछली को पुकारा। रोज़ाना की तरह वह टहलने चली गई। मछली उड़ी और आसमान में गायब हो गई। सांप चूहिया के बच्चों को निगल गया। रात हुई तो गिलहरी ने मछली से कहा-"अमरूद पक गए हैं। मैं भी कुछ अमरूद खा आती हूँ। मेरे बच्चों का ध्यान रखना।" गिलहरी के जाते ही मछली ने नदी में गोता लगाया। वह तैरती हुई नदी के दूसरे तट पर जा पहुँची। सांप ने गिलहरी के बच्चों को भी अपना निवाला बना लिया।.......
    5 min
  • Kaidi story written by O. Henry
    https://youtu.be/-rL-PSgA400 जीवन के सुख-दुख का प्रतिबिंब मनुष्य के मुखड़े पर सदैव तैरता रहता है, लेकिन उसे ढूँढ़ निकालने की दृष्टि केवल चित्रकार के पास होती है। वह भी एक चित्रकार था। भावना और वास्वविकता का एक अद्भुत सामंजस्य होता था उसके बनाए चित्रों में।
    एक बार उसके मन में आया कि ईसा मसीह का चित्र बनाया जाए। सोचते-सोचते एक नया प्रसंग उभर आया। उसके मस्तिष्क में छोटे-से ईसा को एक शैतान हंटर से मार रहा है, लेकिन न जाने क्यों ईसा का चित्र बन ही नहीं रहा था। चित्रकार की आँखों में ईसा की जो मूर्ति बनी थी, उसका मानव रूप में दर्शन दुर्लभ ही था। बहुत खोजा, मगर वैसा तेजस्वी मुखड़ा उसे कहीं नहीं मिला।....
    4 min
  • Sati Story Written By Sarat Chandra chattopadhyay
    https://youtu.be/5EHXNrk6Cpw Sati : Sarat Chandra Chattopadhyay (Bangla Story)
    सती : शरतचंद्र चट्टोपाध्याय (बांग्ला कहानी)
    एक
    हरीश पबना एक संभ्रांत, भला वकील है, केवल वकालत के हिसाब से ही नहीं, मनुष्यता के हिसाब से भी। अपने देश के सब प्रकार के शुभ अनुष्ठानों के साथ वह थोड़ा-बहुत संबंधित रहता है। शहर का कोई भी काम उसे अलग रखकर नहीं होता। सबेरे 'दुर्नीति-दमन-समिति' की कार्यकारिणी सभा का एक विशेष अधिवेशन था, काम समाप्तकर घर लौटते हुए थोड़ा विलंब हो गया था। अब किसी तरह थोड़ा सा खा-पीकर अदालत पहुँचना आवश्यक है। विधवा छोटी बहन उमा पास बैठी हुई देखभाल कर रही थी कि कहीं समय की कमी से खाने-पीने में कमी न रह जाए।
    पत्नी निर्मला धीरे-धीरे समीप जाकर बैठ गई, बोली, 'कल के अखबार में देखा है, हमारी लावण्यप्रभा यहाँ लड़कियों के स्कूल की इंस्पेक्ट्रेस होकर आ रही है।'
    यह साधारण-सी बात कुछ संकेतों में बहुत गंभीर थी।
    उमा चकित होकर बोली, 'सचमुच क्या? उस लावण्य का नाम यहाँ तक कैसे आ पहुँचा भाभी!”
    निर्मला बोली, 'आ ही गया! इन्हें पूछती हूँ।'
    हरीश मुँह उठाकर सहसा कड़वे स्वर से बोल उठा, 'मैं कैसे जानूँगा, सुनूँ तो? गवर्नमेंट क्या मुझसे पूछकर लोगों को बहाल करती है?'
    स्त्री ने स्निग्ध स्वर से उत्तर दिया, 'अहा, नाराज क्यों होते हो, नाराजी की बात तो मैंने कही नहीं, तुम्हारी तदबीर-तकाजे से यदि किसी का उपकार हो तो वह प्रसन्‍नता की ही बात है! ' कहकर जैसी आई थी, वैसी ही मंथर-मृदु चाल से बाहर चली गई।
    उमा घबरा उठी, 'मेरे सिर की शपथ है दादा, उठो मत, उठो मत!'
    हरीश विद्युत-वेग से आसन छोड़कर उठ बैठा, “नहीं, शांतिपूर्वक एक कौर खाया भी नहीं जा सकता। आत्मघात किए बिना और...।” कहते-कहते शीघ्रतापूर्वक बाहर निकल गया। जाते समय राह में स्त्री का कोमल स्वर कान में पड़ा, 'तुम किस दुःख से आत्मघात करोगे? जो करेगा, उसे एक दिन दुनिया देख लेगी! '...
    यहाँ हरीश का कुछ पूर्व-वृत्तांत कह देना आवश्यक है। इस समय उसकी आयु चालीस से कम नहीं है, परंतु जब सचमुच कम थी, उस छात्र-जीवन का एक इतिहास है। पिता राममोहन उस समय बारीसाल के सब- जज थे, हरीश एम.ए, परीक्षा की तैयारी करने के लिए कलकत्ता का मैस छोड़कर बारीसाल आ गया था। पड़ोसी थे हरकुमार मजूमदार--स्कूल इंस्पेक्टर। वे बड़े निरीह, निरभिमानी एवं अगाध विद्वान्‌ थे। सरकारी काम से फुरसत पाकर एवं बैठे रहकर, कभी-कभी आकर सदर आला बहादुर की बैठक में बैठते थे। गंजे मुंसिफ, दाढ़ी मुँडे डिप्टी, बहुत मोटे सरकारी वकील, शहर के अन्य गण्यमान व्यक्तियों के दल में से संध्या के पश्चात्‌ कोई भी प्रायः अनुपस्थित नहीं रहता। उसका कारण था--सदर स्वयं थे निष्ठावान हिंदू। अतएव आलाप-आलोचना का अधिकांश भाग होता था धर्म के संबंध में और जैसा सब जगह होता है, यहाँ भी वैसे ही अध्यात्म तत्त्व-कथा की शास्त्रीय मीमांसा का समाधान होता, खंड-युद्ध की समाप्ति में। उस दिन ऐसी ही एक लड़ाई के बीच, हरकुमार अपनी बाँस की छड़ी हाथ में लिये धीरे-धीरे आ उपस्थित हुए। इस सब युद्ध- विग्रह व्यापार में, वे किसी भी दिन कोई अंश ग्रहण नहीं करते थे। स्वयं को ब्राह्म-समाज के अंतर्गत समझने से हो अथवा शांत-मौन प्रकृति के मनुष्य होने के कारण हो, चुप रहकर सुनने के अतिरिक्त, गले पड़कर अपन मत प्रकट करने की चंचलता उनमें एक दिन भी नहीं देखी गई, परंतु आज दूसरी ही बात हुई। उनके कमरे में घुसते ही गंजे मुंसिफ बाबू उन्हीं को मध्यस्थ मान बैठे। इसका कारण यह था कि इस बार छुट्टी में कलकत्ता जाकर वे कहीं से इन महोदय के भारतीय-दर्शन के संबंध में गंभीर ज्ञान का एक जनरव सुन आए थे। हरकुमार मुसकराते हुए सहमत हो गए। थोड़ी ही देर में पता चल गया कि शास्त्रों के बंगला अनुवाद मात्र का सहारा लिए ही उनके साथ तर्क नहीं चल सकता। सब लोग प्रसन्‍न हुए, न हुए तो केवल सब-जज बहादुर स्वयं ही अर्थात्‌ जो व्यक्ति जाति खो बैठा है, उसका फिर शास्त्र-ज्ञान किसलिए? और कहा भी ठीक यही! सबके उठ जाने पर, उनके परमप्रिय सरकारी वकील-बाबू आँखों का इशारा कर हँसते हुए बोले, 'सुना तो छोटे साहब, भूत के मुँह से राम-नाम और क्या!'
    डिप्टी साहब ठीक सम्मति नहीं दे सके, कहा, 'कुछ भी हो, परंतु जानते खूब हैं। सब जैसे कंठस्थ है! पहले मास्टरी करते थे या नहीं।...'
    हाकिम प्रसन्न नहीं हुए। बोले, “उसकी जानकारी के मुँह में आग! यही लोग होते हैं ज्ञान-पापी, इनकी कभी मुक्ति नहीं होती ।”
    हरीश उस दिन चुपचाप एक ओर बैठा था। इस स्वल्पभाषी प्रौढ़ व्यक्ति के ज्ञान और पांडित्य को देखकर वह मुग्ध हो गया था। अस्तु, पिता का अभिमत चाहे जो हो, पुत्र ने अपने आगामी परीक्षा-समुद्र से मुक्ति पाने का भरोसा लिये हुए, उन्हें जाकर पकड़ लिया, सहायता करनी ही होगी। हरकुमार तैयार हो गए। यहीं उनकी कन्य
    41 min

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