https://youtu.be/5EHXNrk6Cpw Sati : Sarat Chandra Chattopadhyay (Bangla Story)
सती : शरतचंद्र चट्टोपाध्याय (बांग्ला कहानी)
एक
हरीश पबना एक संभ्रांत, भला वकील है, केवल वकालत के हिसाब से ही नहीं, मनुष्यता के हिसाब से भी। अपने देश के सब प्रकार के शुभ अनुष्ठानों के साथ वह थोड़ा-बहुत संबंधित रहता है। शहर का कोई भी काम उसे अलग रखकर नहीं होता। सबेरे 'दुर्नीति-दमन-समिति' की कार्यकारिणी सभा का एक विशेष अधिवेशन था, काम समाप्तकर घर लौटते हुए थोड़ा विलंब हो गया था। अब किसी तरह थोड़ा सा खा-पीकर अदालत पहुँचना आवश्यक है। विधवा छोटी बहन उमा पास बैठी हुई देखभाल कर रही थी कि कहीं समय की कमी से खाने-पीने में कमी न रह जाए।
पत्नी निर्मला धीरे-धीरे समीप जाकर बैठ गई, बोली, 'कल के अखबार में देखा है, हमारी लावण्यप्रभा यहाँ लड़कियों के स्कूल की इंस्पेक्ट्रेस होकर आ रही है।'
यह साधारण-सी बात कुछ संकेतों में बहुत गंभीर थी।
उमा चकित होकर बोली, 'सचमुच क्या? उस लावण्य का नाम यहाँ तक कैसे आ पहुँचा भाभी!”
निर्मला बोली, 'आ ही गया! इन्हें पूछती हूँ।'
हरीश मुँह उठाकर सहसा कड़वे स्वर से बोल उठा, 'मैं कैसे जानूँगा, सुनूँ तो? गवर्नमेंट क्या मुझसे पूछकर लोगों को बहाल करती है?'
स्त्री ने स्निग्ध स्वर से उत्तर दिया, 'अहा, नाराज क्यों होते हो, नाराजी की बात तो मैंने कही नहीं, तुम्हारी तदबीर-तकाजे से यदि किसी का उपकार हो तो वह प्रसन्नता की ही बात है! ' कहकर जैसी आई थी, वैसी ही मंथर-मृदु चाल से बाहर चली गई।
उमा घबरा उठी, 'मेरे सिर की शपथ है दादा, उठो मत, उठो मत!'
हरीश विद्युत-वेग से आसन छोड़कर उठ बैठा, “नहीं, शांतिपूर्वक एक कौर खाया भी नहीं जा सकता। आत्मघात किए बिना और...।” कहते-कहते शीघ्रतापूर्वक बाहर निकल गया। जाते समय राह में स्त्री का कोमल स्वर कान में पड़ा, 'तुम किस दुःख से आत्मघात करोगे? जो करेगा, उसे एक दिन दुनिया देख लेगी! '...
यहाँ हरीश का कुछ पूर्व-वृत्तांत कह देना आवश्यक है। इस समय उसकी आयु चालीस से कम नहीं है, परंतु जब सचमुच कम थी, उस छात्र-जीवन का एक इतिहास है। पिता राममोहन उस समय बारीसाल के सब- जज थे, हरीश एम.ए, परीक्षा की तैयारी करने के लिए कलकत्ता का मैस छोड़कर बारीसाल आ गया था। पड़ोसी थे हरकुमार मजूमदार--स्कूल इंस्पेक्टर। वे बड़े निरीह, निरभिमानी एवं अगाध विद्वान् थे। सरकारी काम से फुरसत पाकर एवं बैठे रहकर, कभी-कभी आकर सदर आला बहादुर की बैठक में बैठते थे। गंजे मुंसिफ, दाढ़ी मुँडे डिप्टी, बहुत मोटे सरकारी वकील, शहर के अन्य गण्यमान व्यक्तियों के दल में से संध्या के पश्चात् कोई भी प्रायः अनुपस्थित नहीं रहता। उसका कारण था--सदर स्वयं थे निष्ठावान हिंदू। अतएव आलाप-आलोचना का अधिकांश भाग होता था धर्म के संबंध में और जैसा सब जगह होता है, यहाँ भी वैसे ही अध्यात्म तत्त्व-कथा की शास्त्रीय मीमांसा का समाधान होता, खंड-युद्ध की समाप्ति में। उस दिन ऐसी ही एक लड़ाई के बीच, हरकुमार अपनी बाँस की छड़ी हाथ में लिये धीरे-धीरे आ उपस्थित हुए। इस सब युद्ध- विग्रह व्यापार में, वे किसी भी दिन कोई अंश ग्रहण नहीं करते थे। स्वयं को ब्राह्म-समाज के अंतर्गत समझने से हो अथवा शांत-मौन प्रकृति के मनुष्य होने के कारण हो, चुप रहकर सुनने के अतिरिक्त, गले पड़कर अपन मत प्रकट करने की चंचलता उनमें एक दिन भी नहीं देखी गई, परंतु आज दूसरी ही बात हुई। उनके कमरे में घुसते ही गंजे मुंसिफ बाबू उन्हीं को मध्यस्थ मान बैठे। इसका कारण यह था कि इस बार छुट्टी में कलकत्ता जाकर वे कहीं से इन महोदय के भारतीय-दर्शन के संबंध में गंभीर ज्ञान का एक जनरव सुन आए थे। हरकुमार मुसकराते हुए सहमत हो गए। थोड़ी ही देर में पता चल गया कि शास्त्रों के बंगला अनुवाद मात्र का सहारा लिए ही उनके साथ तर्क नहीं चल सकता। सब लोग प्रसन्न हुए, न हुए तो केवल सब-जज बहादुर स्वयं ही अर्थात् जो व्यक्ति जाति खो बैठा है, उसका फिर शास्त्र-ज्ञान किसलिए? और कहा भी ठीक यही! सबके उठ जाने पर, उनके परमप्रिय सरकारी वकील-बाबू आँखों का इशारा कर हँसते हुए बोले, 'सुना तो छोटे साहब, भूत के मुँह से राम-नाम और क्या!'
डिप्टी साहब ठीक सम्मति नहीं दे सके, कहा, 'कुछ भी हो, परंतु जानते खूब हैं। सब जैसे कंठस्थ है! पहले मास्टरी करते थे या नहीं।...'
हाकिम प्रसन्न नहीं हुए। बोले, “उसकी जानकारी के मुँह में आग! यही लोग होते हैं ज्ञान-पापी, इनकी कभी मुक्ति नहीं होती ।”
हरीश उस दिन चुपचाप एक ओर बैठा था। इस स्वल्पभाषी प्रौढ़ व्यक्ति के ज्ञान और पांडित्य को देखकर वह मुग्ध हो गया था। अस्तु, पिता का अभिमत चाहे जो हो, पुत्र ने अपने आगामी परीक्षा-समुद्र से मुक्ति पाने का भरोसा लिये हुए, उन्हें जाकर पकड़ लिया, सहायता करनी ही होगी। हरकुमार तैयार हो गए। यहीं उनकी कन्य