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साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 35वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने 34वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें भगवान् शंकराचार्यजी कहते हैं की "परतरे चेतः समाधीयताम" - अर्थात, जो सबसे परे है उसमे अपने चित्त को समाहित करो। इस प्रवचन में पू गुरूजी ने एकान्त शब्द के विविध अर्थ बताए और उसके बाद 'पर' शब्द का भी आशय बताया। जो सबको व्याप्त करते हुए सबको आत्मवान करता है लेकिन फिर भी सबके विकारों से अछूता रहता है, वो ही सबसे 'परे' है। जैसे लहरों में पानी - पानी ही लहार को आत्मवान करता है, लहर के कण-कण को व्याप्त करता है, लेकिन लहर के जन्म, वृद्धि, क्षय एवं मरण से अछूता रहता है - अतः जल, लहर से परे होता है। उसी तरह से जो तत्त्व हमारी अस्मिता को व्याप्त करता है, उसे आत्मवान करता है, लेकिन फिर भी हमारी अस्मिता के वृद्धि और क्षय आदि विकारों से अछूता रहता है वो ही 'पर' तत्त्व होता है। उसमे चित्त को समाहित करना ही समाधी में जाने का हेतु होता है।
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 34वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के अंतिम श्लोक में प्रवेश करते हुए 33वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें भगवान् शंकराचार्यजी कहते हैं की "एकान्ते सुखमास्यतां" - अर्थात, एकान्त में सुख पूर्वक बैठें। आत्मा को ब्रह्म जानने की साधना के अगले सोपान में इस ब्रह्म-ज्ञान के साधक को अब बताया जा रहा है की अब उसे समाधी का अभ्यास करना चाहिए। इसके लिए किसी एकान्त स्थान में सुख पूर्वक बैठना सीखना चाहिए। इस सन्दर्भ में पूज्य गुरूजी ने एकान्त और अकेलेपन का भेद बताया। जब किसी अन्य के साथ की अपेक्षा हो लेकिन वो नहीं हो तब अकेलापन होता है, और जब केवल अपने साथ किसी चिंतन, ध्यान, जप आदि के लिए बैठे हों और किसी अन्य की अपेक्षा न हो तब एकान्त होता है। एकान्त में सुख पूर्वक बैठना आना चाहिए।
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 33वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के चौथे श्लोक में प्रतिपादित अंतिम सूत्र एवं ग्रन्थ के 32वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें भगवान् शंकराचार्यजी कहते हैं की "जनकृपा नैष्ठुर्यम उत्सृज्यतां" - अर्थात, किसी व्यक्ति की ऐहसान के भाव से दी गई सेवा को कठोरता से अस्वीकार देना चाहिए। जिस व्यक्ति ने अपने जीवन में जो कुछ भी प्राप्त किया है अगर वो यह सोचता है की यह ईश्वर की कृपा नहीं बल्कि उसकी अपनी ही मेहनत थी, ऐसे लोग ही सबके ऊपर ऐहसान दिखाते रहते हैं। ऐसे लोगों के द्वारा दी गयी सेवा को निष्ठुरता से अस्वीकार देना चाहिए। ईश्वर के भक्त तो सतत ईश्वर की कृपा देखते हैं और ईश्वर को ही अर्पण करते रहते हैं। उनके लिए एक सन्यासी ईश्वर का ही रूप होता है।
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 32वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 31वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें भगवान् शंकराचार्यजी कहते हैं की "औदासिन्यम अभीप्स्यतां" - अर्थात, सैदव तटस्थता बनाए रखें। व्यावहारिक जगत में प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी समझ से जीता है और अनेकानेक प्रयोग करता रहता है। इनसे व्यक्ति की जरुरतें पूरी होती रहतीं हैं और साथ साथ ये शिक्षा भी प्राप्त होती रहती है की किसे कितना महत्त्व देना चाहिए। यह ही सब की जीवन यात्रा होती है। एक सन्यासी को सब देखते हुए तब तक तटस्थ ही रहना चाइये जब तक कोई अपनी तरफ से न पूछे। सबके प्रति आत्मीयता एवं अपनापन लेकिन अपनी धारणाएं किसी पर आरोपित न करें। एक न्यायाधीश की तरह तटस्थ रहना चाहिए, और उचित समय अपनी राय दें वो भी निरपेक्षता से। किसी का भी पक्ष लेने से अपना मन चिन्तित होगा और अपनी साधना भंग होगी, इसलिए उदासीन रहना सीखें।
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 31वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 30वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें भगवान् शंकराचार्यजी कहते हैं की "न तु वृथा वाक्यं समुच्चार्यतां" - अर्थात, निष्प्रयोजन वाक्य कभी मत बोलो। हम लोगों की वाणी बहुत शक्तिशाली होती है, उसको सदैव सोच-समझ के ही प्रयोग करना चाहिए। जब हमारे वचन की सही में आवश्यकता हो तभी नाप-तौल के और प्रेम से अपने वचन बोलने का अभ्यास करना चाहिए। हम जब अपने वचनों की खुद इज्जत करेंगें तभी सुनने वाला भी हमारी वाणी की इज्जत करेगा। इसलिए बोलने से पहले अच्छी तरह से विचार करके, कम से कम शब्दों में प्रामाणिक बात कहने का अभ्यास करना चाहिए। दुनियाँ में अनेकों समस्याएं होती हैं, लेकिन समस्याएँ वस्तुतः व्यक्ति को कुछ न कुछ सिखाती हैं, तो सब को अपने आप सीखने दो, और अगर कोई रास्ता न मिलने पर विशेष निवेदन करे तब ही कम से कम शब्दों में बताएं।
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 30वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 29वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "शीतोष्णादि विषह्यतां"- अर्थात, सर्दी और गर्मी आदि को सहना सीखो। अगर हमें दुनियां में जीना है तो हमें दुनिया को यथावत स्वीकारते हुए उसमे रहना आना चाहिए। दुनियाँ में जो विविधता है उसमे स्वाभाविक अतियाँ हैं - बहुत सर्दी, बहुत गर्मी आदि। इन्हें द्वन्द कहा जाता है। इन्हीं के बीच ही दुनिया होती है जिसमे हमें और आप सब को इसमें जीना होता है। अब या तो हम अपने आप को मजबूत बनाए अथवा बाहरी परिवर्तन करते रहें। ज्यादा उचित अपने आप को मजबूत बनाना होता है - द्वंदों को संतुलन से सहने का सामर्थ्य को तितिक्षा कहते हैं। इसे एक दैवी गुण की तरह से देखा जाता है। एक सन्यासी के लिए यह बहुत अच्छा गुण होता है। यह ही आचार्यश्री यहाँ बता रहे हैं।
पू स्वामिनी पूर्णानन्द जी से एक सुन्दर प्रेरक कहानी सुनें जिसका शीर्षक है - दान, धर्म और धैर्य की परिक्षा।
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 29वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 28वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "विधिवशात प्राप्तेन सन्तुष्यतां"- अर्थात, ईश्वर इच्छा से जो भी प्राप्त हो जाये उसमे संतुष्ट रहो। हिन्दू धर्म अर्थात सनातन वैदिक धर्म में ईश्वर का बहुत महत्त्व होता है। उनसे हमारा व्यावहारिक जीवन अत्यंत घनिष्ठता से जुड़ा रहता है। हमारा शरीर, सामर्थ्य, हमारी प्रकृति, संसाधन, रिश्ते-नाते सब ईश्वर कृपा से प्राप्त होते हैं। प्रत्येक कर्म में उन्हें ही कर्मफलदाता की तरह से देखा जाता है। ऐसे धर्म में जब किसी महात्मा ने ईश्वरीय तत्व के साथ अपने एकता देख ली है, तो भी व्यवहार में यह ही देखा जाता है, की जब हम भिक्षा मांगते हैं तब भी वे ईश्वर ही दाता के रूप में आकर हमें भिक्षा देते हैं। अतः ईश्वर प्रदत्त भोजन में संतुष्ट ही होना चाहिए। अपने पूर्व राग-द्वेष को कभी आड़े नहीं आने देना चाहिए।
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 28वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 27वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "स्वादुन्नं न तु याच्यतां"- अर्थात, स्वादिष्ट अन्न की याचना नहीं करना चाहिए। ब्रह्म-ज्ञान में निष्ठा उत्पन्न करने वाले साधकों को आचार्यश्री सुझाव दे रहे हैं की जब तुम भिक्षा माँगो तब ध्यान रहे तुम किसी से भी स्वादिष्ट अन्न की याचना नहीं करना। स्वादिष्ट अन्न केवल व्यक्तिगत राग-द्वेष की अपेक्षा ही हुआ करता है और उसमे यह धारणा निहित होती है की आनन्द बाहर से आता है। यद्यपि हमारी अनुभूति यह ही दिखती है, लेकिन यथार्थ कुछ और ही होता है। आनंद का मूल स्रोत आत्मा ही होती है और अपने राग और द्वेष के कारण सुख और दुःख का स्रोत बाहर प्रतीत होने लगता है। अतः उन पुरानी आदतों को छोड़ना चाहिए और कभी भी अपनी पुरानी धारणाओं के अधीन नहीं जाना चाहिए।
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 27वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 26वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "प्रतिदिनं भिक्षौषधं भुज्यतां"- अर्थात, प्रतिदिन अपनी क्षुधा रुपी रोग के निवारण के लिए भिक्षा से प्राप्त भोजन रुपी औषधि ग्रहण करो। मनुष्य शरीर बहुत महत्वपूर्ण और विशिष्ट होता है अतः इसकी उचित देख-भल एक सन्यासी को भी करनी चाहिए। इसके लिए भूख रुपी रोग के निवारण के लिए आचार्य एक विलक्षण औषधि बता रहे हैं - वो है, भिक्षा से प्राप्त भोजन। भिक्षा एक ऐसी व्यवस्स्था है जिससे लेने और देने वाला दोनों धन्य होते हैं। लेने वाले के अंदर सबके प्रति अपनापन जगता है, सब अपना परिवार दिखने लगता है, जो भी ईश्वर इच्छा से प्राप्त होता है उसे बिना राग और द्वेष के ग्रहण करता है; और देने वाले समाज में सद-ज्ञान का संरक्षण कर उसका वर्धन करते हैं। इसीसे एक अच्छे समाज का निर्माण होता है।
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