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साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 17वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के दूसरे श्लोक के अंतिम सूत्र, एवं ग्रन्थ में प्रतिपादित 16वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "श्रुतिशिरो वाक्यं समाकर्ण्यतां" - अर्थात उन श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरुदेव के द्वारा आपके प्रश्न के उत्तर में वेदांत के महावाक्यों के रहस्य के प्रतिपादन को बहुत ही ध्यानपूर्वक सुनें। मूल रूप से महावाक्य - अखण्डता के अर्थ के बोधक होते हैं, अर्थात जीव और ईश्वर की एकता के प्रतिपादक। इसके अर्थ को जानने की प्रक्रिया में जीव को अपने जीवत्व का अभिमान के त्यागपूर्वक, ईश्वर के मूल तत्व को जानना होता है। इस दोनों के अधिष्ठान स्वरुप एक दिव्य सत्ता को ही परम सत्य बताया जाता है। इसको समाकर्ण्यताम - बहुत ध्यान पूर्वक सुने और इस पर चिंतन करें। यह ज्ञान ही मोक्ष दायक होता है।
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 16वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ में प्रतिपादित 15वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "ब्रह्मैकाक्षरं अर्थ्यतां" - अर्थात ब्रह्म, जो एक और अक्षर है, उसे जानने की जिज्ञासा प्रकट करो। जब हमें किसी ज्ञानी की सन्निधि की प्राप्ति का सौभाग्य मिलता है, तो हमें उनसे क्या पूछना चाहिए, यह इस सोपान में बताया जा रहा है। किसी विशेषज्ञ का उचित लाभ उसकी विशेषता के विषय का प्रश्न पूछने में होता है। इसलिए किसी ब्रह्म-ज्ञानी से संसार की समस्या, राजनीती, धन-दौलत, ज्योतिष आदि आदि के प्रश्न नहीं पूछने चाहिए, बल्कि केवल जीवन के शाश्वत तत्व के बारे में ही पूछना चाहिए। उचित प्रश्न जिज्ञासु के विवेक और प्राथमिकताओं का सूचक होता है। अतः ऐसा प्रश्न ही हमारी आगे की यात्रा की भूमिका बनता है।
पू स्वामिनी पूर्णानन्द जी से एक सुन्दर प्रेरक कहानी सुनें जिसका शीर्षक है - धर्मो रक्षति रक्षितः।
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 15वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ में प्रतिपादित 14वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "प्रतिदिनं तत्पादुका सेव्यतां" - अर्थात सदैव गुरुदेव की चरण पादुका की सेवा करें, अर्थात उनके मूल्य एवं रहन-सहन के अनुरूप उनकी और उनके आश्रम की यथा आवश्यक सेवा करें। सेवा के अनेकों प्रयोजन होते हैं। एक तो आप जिनके निकट जाते हैं उनको ज्यादा अच्छी तरह से पहचान पाते हैं, और इसी प्रक्रिया में उनकी रुचियों को महत्त्व देते हुए, अपनी रुचियों को गौण कर समाप्त कर दिया जाता है। यह ही पूजा आदि का भी प्रयोजन होता है। आप ईश्वर की रुचियों के अनुरूप ही उनकी पूज्जा करते हैं। जिस देवता को जो पसंद है वो ही अर्पण करते हैं। गुरु तो जीते-जागते साक्षात् भगवान् होते हैं। यह ही सब रिश्तों में भी होता है। एक महिला जब दूसरे घर में आती है, तो इसी प्रक्रिया से गुजरती है, और यह कदम अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। जीवन भर के रिश्ते के लिए आधार बन जाता है। इसलिए सीधे ज्ञान की प्राप्ति से पूर्व इस सोपान को आचार्य बताते हैं।
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 14वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ में प्रतिपादित 13वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "सद्विद्वान उपसर्पयतां" - अर्थात सद्विद्वान के निकट जाईये। किसी भी ज्ञान की प्राप्ति के लिए व्यक्ति को उस विषय के विद्वान, अर्थात विशेषज्ञ के पास जाना चाहिए। एक दीप से ही दूसरा दीप जलता है। बिना गुरु के ज्ञान नहीं मिलता है। अतः जीवन की अगली प्राथमिकता किसी विद्वान के निकट जाने की होती है। सद्विद्वान को हम लोग श्रोत्रिय कहते हैं। उन्हें ब्रह्मनिष्ठ भी होना उचित होता है। ऐसे लोग दुर्लभ होते हैं, लेकिन हर काल में होते जरूर हैं, और हीरे की तरह उनकी तलाश करनी पड़ती है। ये लोग न अपनी ख्याति बताते है न हमारे धन दौलत आदि की उन्हें रुचि होती है - वे अलग ही दुनिया के लोग होते हैं। उन्हें केवल हमारी सेवा, लगन और सच्चाई ही देखनी होती है, बाकी सब उपेक्षणीय होता है। ऐसे महात्मा को ढूढना और उनके निकट जा पाना निश्चित रूप से एक बहुत बड़ी बात होती है। निकट जाने का अर्थ उनके द्वारा स्वीकृत हो पाना। उनके स्नेह का पात्र बन पाना। यह ही १३वां सोपान है।
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 13वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ में प्रतिपादित १२वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "दृढतरं कर्माशु संत्यज्यतां" - अर्थात दृढ़ता से कर्म को शीघ्र त्याग दें। इसका अर्थ गहराई से समझने योग्य है। एक समय ये ही आचार्य और शास्त्र हम सबको कर्म को अच्छी तरह से करने की प्रेरणा देते हैं, और अब वे ही कर्म को छोड़ने की बात के रहे हैं। कर्म को छोड़ने का अर्थ है की कर्म की सीमाओं को पहचानना। जीवन के प्रारम्भ में लगता है की कर्म से सब कुछ मिल जायेगा, लेकिन कर्म से केवल अनित्य और नश्वर चीज़ें ही मिलती हैं। जो नित्य, शाश्वत और अनंत होता है वो कर्म से प्राप्ति का विषय नहीं होता है, वो तो कण-कण में पहले से ही विद्यमान होना चाहिए, उसे मात्र जानने की जरूरत है। अप्राप्त वास्तु की प्राप्ति के लिए कर्म होता है, सतत विद्यमान वस्तु में तो ज्ञान से मात्र जगा जाता है। जब तक हमारा कर्म में अभिनिवेश और आग्रह होता है तब तक हम केवल अनित्य और अप्राप्त वस्तुओं को ही महत्त्व देते हैं। इस लिए कर्म की मनोवृत्ति का दृढ़ता से अवश्य त्याग करना चाहिए।
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 12वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ में प्रतिपादित ११वें सोपान की भूमिका एवं सूत्र पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "शान्त्यादिः परिचियतां" - अर्थात शांति आदि गुणों का चयन कर उनके लिए अभ्यास करो। इससे पिछले सूत्र में ईश्वर भक्ति की प्राप्ति हेतु लक्ष्य बताया था, अब शांति आदि गुणों की प्राप्ति की बात कह रहे हैं। ऐसा इस लिए है क्यूंकि भगवत्स्मरण ज्यादातर सकाम ही होता है। सकाम भक्ति से बाहरी अनुकूलता तो हो सकती है लेकिन मन पराधीन होता जाता है, और पराधीन मन सतत अशांत ही रहता है, और वस्तुतः ऐसे भक्त अभी भगवत प्रेमी नहीं, जगत के विषयों के ही प्रेमी बने रहते हैं। सकाम भक्ति से अहम् का निषेध नहीं बल्कि अहम् की संतुष्टि होती है - इसलिए मन स्थायी रूप से मुक्त और शांत नहीं होता है। यहाँ आचार्य कहते है की भगवत भक्ति में शांति आदि गुणों को ही लक्ष्य बनाना चाहिए।
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के ११वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ में प्रतिपादित दसवें सोपान की भूमिका एवं चर्चा करी। इसमें भगवान् शंकराचार्यजी कहते हैं की "भगवतो भक्ति: दृढ़ाधीयताम" - अर्थात भगवान् के प्रति दृढ़ भक्ति उत्पन्न करनी चाहिए। सत्पुरुष लोगों के साथ का यह ही प्रसाद और आशीर्वाद होता है। उन्ही को सत्पुरुष कहते हैं जो सरल, संतुष्ट, भगवत सेवा और भक्ति से युक्त और लीन होते हैं। भजननंदी, प्रसन्न चित्त, सच्चे, संसारी चर्चा से रहित, दुनिया को भगवद इच्छा से चलते हुए देखना - इसलिए यद्यपि अपने कर्म अच्छी तरह से करते हैं, लेकिन बाकी दुनिया की चिंता और प्रपंच नहीं करते है - वे लोग ही सत्पुरुष होते हैं। ऐसे लोगों के पास जब भी बैठेंगें तब भगवद चर्चा ही होगी। ऐसे लोगों से प्रार्थना पूर्वक भक्ति की प्राप्ति के रहस्य ही जानने का निवेदन करें।
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के १०वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ में प्रतिपादित नवें सोपान की भूमिका एवं नवें सूत्र पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "संघ: सत्सु विधीयतां" - अर्थात सत्पुरुषों का साथ उत्पन्न करो। अपने घर की अनुकूलता के दायरे से निकल कर अब ऐसा साथ ढूढना ही अगला सोपान है। सत्पुरुष लोग यद्यपि सबके प्रति स्नेह रखते हैं लेकिन वे किसी स्वतः सत पथ पर चलने को ही अपनी प्राथमिकता समझते हैं। वे सच्चाई से जीते हैं और सच्चे भाव से सबके कल्याण के लिए कार्य करते हैं। उनकी संतुष्टि ईश्वर भजन, सरल जीवन एवं शास्त्र का अध्ययन करते हुए आत्म-ज्ञान के लिए सतत प्रयास करते रहने में होती है। दुनियां में सब प्रकार के लोग होते हैं, जैसा भी तलाश करना चाहेंगे वैसे लोग मिल जायेंगे। ज्यादातर लोग संसारी होते हैं और सत्पुरुष दुर्लभ, इसलिए इनकी तलाश करनी पड़ती है। जब मिले तो सब संकोच आदि त्याग कर, आगे बढ़कर इनसे निकटता उत्पन्न करें।
पू स्वामिनी पूर्णानन्द जी से एक सुन्दर प्रेरक कहानी सुनें जिसका शीर्षक है - सब हमारे हाथ में है।
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