
Sign up to save your podcasts
Or


साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 26वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के चौथे श्लोक में प्रवेश करते हुए साधना पञ्चकं के 25वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "क्षुध व्याधिश्च चिकित्सितां"- अर्थात, भूख रुपी बीमारी का नियमित उपचार करें। मनुष्य शरीर की प्राप्ति ईश्वर का एक बहुत बड़ा आशीर्वाद होता है। शरीर अपने आप में न तो कोई समस्या है और न हो बंधन का कारण। समस्या तो हमारा अज्ञान और मोह होता है। इसी मनुष्य शरीर में रहते हुए ज्ञानी जीवन्मुक्त रहते हुए सबके लिए आशीर्वाद बन जाते हैं, और हमारे शरीरधारी गुरुदेव ने भी हमें ज्ञान दिया। इसलिए शरीर की विवेक से देख भाल करनी चाहिए। उसके लिए आचार्य हमें एक सूत्र दे रहे हैं - की भूख को एक रोग की तरह से देखो और जैसे हम किसी रोग का बिना किसी राग और द्वेष के उचित और नियमित उपचार करते हैं उसी तरह से भूख और शरीर की विवेक से देख-भाल करो।
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 25वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 24वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "बुधजनैः वादः परित्यज्यतां"- अर्थात, बुद्धिमान लोगों के साथ विवाद नहीं करना चाहिए। स्वामीजी ने बताया की निदिध्यासन की साधना में प्राथमिकता अपनी ब्रह्म-स्वरूपता के ज्ञान को सहज बनाना होता है। इसमें कुछ समय एकांत में रहकर समाधि का अभ्यास होता है, और फिर जगत के विविध लोगों के बीच में जाकर अपने ज्ञान की निष्ठा दृढ़ करनी होती है। इसके लिए अगर कोई अज्ञानी मिले तो उसके साथ अपने ज्ञान का गर्व नहीं आने देना चाहिए - ये बात पहले कही जा चुकी है। अब कह रहे हैं की जब ज्ञानियों और बुद्धिमानों की संगत मिले तो विनम्रता से उनसे कुछ ज्ञान प्राप्ति की मनोवृत्ति होनी चाहिए। उनसे वाद-विवाद के चक्कर में कभी नहीं पड़ना।
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 24वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 23वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "देहेहं मतिः रुझ्यतां"- अर्थात, अपने देह में अहम् की मति को समाप्त करो। ब्रह्म-ज्ञान में अपने को ब्रह्म जानने का लक्ष्य होता है, अतः आज तक जो हम सब अज्ञानवशात अपने को देह समझ रहे थे, उस मोह को शीघ्रातिशीघ्र समाप्त होना चाहिए। देह छोटा होता है, नश्वर होता है और इसके साथ तादात्म्य के कारण ही हम छोटे और जन्म-मरणवान हो गए हैं। ब्रह्म-ज्ञान में निष्ठा के लिए ये ही एक मात्र बाधक होता है। जैसे जब तक हम रस्सी को सांप समझते रहेंगे तब तक उसके यथार्थ के ज्ञान की भी संभावना नहीं होगी। अतः पूरे विवेक और मनोयोग से अपनी देहात्म-बुद्धि को समाप्त करना चाहिए।
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 23वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 22वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "अहरहः गर्वः परित्यज्यतां"- अर्थात, प्रतिक्षण अपने गर्व को सिर उठाने नहीं दें। गर्व खंड में होता है, परायों के साथ होता है, अपनों के साथ कोई गर्व नहीं करता है। जहाँ गर्व आया तो हम पुनः द्वैत में आ जाते हैं, और अपनी छोटी अस्मिता की कुछ विशष्टता में रमने लगते हैं। यह हमारी ब्रह्म-स्वरूपता को आच्छादित और बाधित कर देता है। या तो हम बड़े हैं या तो छोटे। गर्व सहज हो चुका है अतः इसको दूर करने के लिए विशेष सजगता की आवश्यकता होती है। इससे पूर्व महाराज श्री ने ब्रह्माकार वृत्ति के गूढ़ रहस्य बताये। ये सब आप ध्यान पूर्वक प्रवचन में सुनें।
पू स्वामिनी पूर्णानन्द जी से एक सुन्दर प्रेरक कहानी सुनें जिसका शीर्षक है - परोपकार।
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 22वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 21वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "ब्रह्मैवस्मि विभाव्यतां"- अर्थात, मैं ही ब्रह्म हूँ यह तीव्र भावना उत्पन्न करें। वेदान्त केवल ब्रह्म का ज्ञान ही नहीं देता है, बल्कि यह भी बताता है की हम सब मूल रूप से ब्रह्म ही हैं। हम सबका जो आज का व्यक्तित्व है वो जगत रुपी नाटक मंच पर हम सबका एक रोल मात्र होता है, एक्टर का वो मूल परिचय नहीं होता है। अज्ञानवशात हम किसी न किसी सांसारिक रोल को ही अपनी वास्तविकता समझ बैठते हैं और इसके कारण ही सब समस्याएं होती हैं, अतः अपनी वास्तविकता को जानकार उसे आत्मसात करने का भरसक प्रयास और साधना करनी चाहिए। सदैव अपनी ब्रह्म-स्वरूपता की भावना उत्पन्न करनी चाहिए।
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 21वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 20वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "श्रुतिमतः तर्कोनुसन्धीयतां"- अर्थात, श्रुति-सम्मत तर्क का अनुसन्धान-पूर्वक आश्रय लें। ये पूरा प्रसंग महावाक्य पर मनन करने का प्रसंग चल रहा है। इसी तरह से मनन करा जाता है। आज तक हम भेद बुद्धि में जी रहे थे - अब अगर अभेद और अखंडता में जगाना है तो इन समस्त बिंदुओं का बहुत अच्छी तरह से ध्यान रखना होगा। जब भी कोई संशय आये तो ध्यान रहे की अपनी धारणाओं की पुष्टि हेतु तर्क हमें भेद में ही बनाई रहेगा और श्रुति सम्मत तर्क हमें अभेद की दिशा में ले जायेगा - अतः श्रुति सम्मत तर्क का ही आश्रय लेना उचित होता है।
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 20वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 19वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "दुस्तर्कात सुविरम्यतां"- अर्थात, दुस्तर्क से दूर रहें। आचार्यश्री ने पिछले सोपान में हमें महावाक्य के अर्थ को समझने में शास्त्रोक्त पक्ष का ही आश्रय लेने का सुझाव दिया था। अब यहाँ पर कह रहे हैं की शास्त्र के सिद्धांत के विपरीत बात को कहने वालों लोगों के तर्कों से प्रभावित न हों। वेदान्त शास्त्र जो की हमें पूर्ण और दिव्य बता रहा है - इसका विश्वास सदैव बनाए रखें। दुस्तर्क को शास्त्रोक्त तर्क से बाधित करें। दुस्तर्क करने वालों से द्वेष न करें, बल्कि बुद्धि को बुद्धि से निपटें। इस प्रक्रिया में हमारी अपने ज्ञान में निष्ठा और दृढ़ हो जाती है। यह ही मनन होता है।
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 19वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ के 18वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "श्रुतिशिरः पक्षः समाश्रितां" - अर्थात महावाक्य के अर्थ को समझने में शास्त्रोक्त पक्ष का ही आश्रय लें। गुरुमुख से महावाक्य सुनने के बाद भी बहुत सारे लोग गलत अर्थ घटित करते हुए पुनः संसार में भटक जाते हैं। इसलिए आचार्य कहते हैं की महावाक्य के शब्दों और फिर पूरे वाक्य का अर्थ गहराई से समझने की प्रक्रिया में शस्त्रविरोधी पक्ष भी होते हैं, लेकिन उनके बच के रहना चाहिए और दृढ़ता पूर्वक अपनी वेदान्त शास्त्र के प्रति अपनी श्रद्धा बनाए रखते हुए अखंडता के अर्थ को घटित करने हेतु श्रुति के पक्ष का ही आश्रय लेना चाहिए।
साधना पञ्चकं ज्ञान यज्ञ के 18वें प्रवचन में पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ने ग्रन्थ तीसरे श्लोक में प्रवेश करते हुए उसमें प्रतिपादित 17वें सोपान की भूमिका एवं रहस्य पर प्रकाश डाला। इसमें शंकराचार्यजी कहते हैं की "वाक्यार्थश्च विचार्यतां" - अर्थात गुरुदेव द्वारा प्रतिपादित महावाक्य के 'अर्थ पर गहराई से विचार करो'। वाक्य का निर्माण शब्दों से होता है - यहाँ महावाक्यों में एक तरफ जीव प्रतिपादक शब्द है तो दूसरी तरफ़ ईश्वर वाला। ऊपर से देखें तो वाक्य सही में बहुत ही बड़ा है - अकल्पनीय। इन दोनों के ऊपर पहले गहराई से विचार करना चाहिए, तभी पूरे वाक्य का अर्थ समझ में आ सकता है। हम लोगों को ईश्वर से एक बताया जा रहा है। जो ठीक से विचार नहीं करते हैं वे एक भयंकर अभिमान से युक्त होने की संभावना से युक्त होते हैं। इसलिए आचार्य कह रहे हैं - वाक्य पर गहराई से विचार करना, अन्यथा अनर्थ हो जायेगा।
From the publisher's feed