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यस्य॑ सं॒स्थे न वृ॒ण्वते॒ हरी॑ स॒मत्सु॒ शत्र॑वः। तस्मा॒ इन्द्रा॑य गायत॥
युद्ध दो प्रकार के होते हैं - आंतरिक तथा बाह्य| भीतर के युद्ध के लिए ज्ञान, मानसिक बल चाहिए| बाह्य युद्ध के लिए ज्ञान, मानसिक तथा शारीरिक बल चाहिए| इस मंत्र में ईश्वर ने हमें सूर्य से उसके तेज, प्रकाश, दृढ़ता तथा बंधनकारी गुणों को युद्ध जीतने हेतु ग्रहण करने के लिए प्रेरित किया है| अर्थात किसी भी प्रकार का युद्ध जीतने हेतु मनुष्य को ईश्वर से जीत की प्रार्थना कर, सूर्य के समान तेजस्वी पुरुषार्थ करना चाहिए|
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स घा॑ नो॒ योग॒ अ भु॑व॒त्स रा॒ये स पुरं॑ध्याम्। गम॒द्वाजे॑भि॒रा स नः॑॥
जिस प्रकार हर ताले की अपनी एक चाबी होती है, ठीक उसी प्रकार हर कार्य को उत्तमता के साथ करने के लिए विशेष ज्ञान या mindset चाहिए होता है| इस मंत्र में ऐसी ही प्रार्थना की जा रही है परमेश्वर से|
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पु॒रू॒तमं॑ पुरू॒णामीशा॑नं॒ वार्या॑णाम्। इन्द्रं॒ सोमे॒ सचा॑ सु॒ते॥
ईश्वर जीव को आयु, जाति (योनि) तथा भोग (सुख-दुख) द्वारा उनके कर्मों का फल देते हैं| इसमें प्राण एक tool की भांति कार्य करता है|
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जो लोग धार्मिक होकर अपने पुरुषार्थ द्वारा वेद विद्या के रहस्यों का पता लगाते हैं, उनसे ईश्वर कहते हैं कि वे अपनी दिव्य विद्या दूसरे साधारण मनुष्यों के साथ भी बांटें|
यह मंत्र आपको बताएगा कि आपमें ऐसे कौन से गुण होने चाहिए जिससे ईश्वर आपके धन की रक्षा करें|
यह मंत्र बताता है कि जो व्यक्ति ईश्वर को ठीक से जाने बिना अन्य वस्तुओं या मनुष्यों को ईश्वर मान कर पूजता है, वह पूर्ण पुरुषार्थ के बाद भी दुष्ट शत्रुओं को जीत नहीं पाता|
कपटी, लोभी तथा असत्य को धर्म मानकर संसार का अपकार करने वाले मनुष्य दुष्टों की श्रेणी में आते हैं| ऐसे व्यक्ति अपने लाभ के लिए किसी की भी हानि करने से नहीं चूकते| इस मंत्र में ईश्वर सभ्य धार्मिक योद्धाओं को प्रेरणा दे रहे हैं कि वे संगठित होकर ऐसे दुष्टों का सफाया करें तथा विश्व को अभय दान दें जिससे सुख ही सुख चारों ओर फैल सके|
इस मंत्र में ईश्वर पुरुषार्थ करने की प्रेरणा दे रहे हैं अर्थात इसका उलट करेंगे तो हमें दुख मिलेगा ही| यह मंत्र स्पष्ट बता रहा है कि shortcut से कुछ नहीं मिलता| व्यक्ति को आलसी तथा प्रमाद को बलपूर्वक मन द्वारा मार डालना चाहिए| ऐसे लगातार किन्तु कुछ प्रयास भी व्यक्ति के आलस्य को सदा के लिए दूर कर सकते हैं|
अज्ञान से किये हुए कर्मों का परिणाम दुख है| दुख किसी को भी प्रिय नहीं| इस मंत्र में ईश्वर से प्रार्थना है कि वे हमें ऐसा ज्ञान दें जिससे हम लोग वेद आज्ञा का पालन करने में प्रवृत्त हों तथा दुखों से सदा बचे रहें|
विद्वान बनने का जो ढोंग करते हैं उनसे बचने के उपाय का यह मंत्र उपदेश कर रहा है|
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