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केवल किताब पढ़ भर लेने से कोई विद्वान नहीं कहलाया जाता| उसके लिए कुछ गुण भी चाहिए होते हैं| वे कौन से गुण हैं, इनका उपदेश इस मंत्र में ईश्वर की प्रेरणा से हुआ है|
इस मंत्र में बताया गया प्राण शरीर में कौन से कार्य कर इसकी रक्षा करता है|
मूर्खों, दुष्टों तथा कुसंग सेवन करने वालों को ईश्वर प्राप्त नहीं होते किन्तु जो लोग वेद की आज्ञाओं का पालन करते हैं, केवल उन्हें ही ईश्वर मिलते हैं|
वे कौन से ऐसे कर्म हैं? उन्हीं का प्रकाश इस मंत्र में किया गया है|
संसार के संसाधनों को इस प्रकार उपयोग करो जिससे सुख उत्पन्न हो, दुखों की अपेक्षा|
परमात्मा ने पिता की तरह इस संसार की रचना की है| सूर्य को बनाया जो पुनः संसार की पिता के सामान रक्षा करता है| सूर्य ईश्वर के पिता स्वरूप होने का प्रतीक है| यह हमें ईश्वर की दया के प्रत्यक्ष दर्शन कराता है|
अग्नि तथा जल मिलकर प्रेशर उत्पन्न करते हैं जिनसे कई कार्य सिद्ध होते हैं| ऐसे अग्नि तथा जल के उपयोग का प्रकाश इस मन्त्र में किया गया है|
अग्नि तथा जल, ये दोनों शरीर को पोषण देते हैं| इस मन्त्र में इस ज्ञान का प्रकाश किया गया है|
1.2.8 सूर्य तथा वायु watercycle चलाए रखकर पृथ्वी का निरंतर पोषण करते रहते हैं|
सूर्य (पिछले मंत्र के अनुसार सूर्य) तथा वायु (प्राण या वरुण) संसार को चलाए रखते हैं|
1.2.9 आत्मा और प्राण मिलकर जीव के कर्म संस्कारों को धारण करते हैं|
आत्मा तथा प्राण में जीव के कर्मों के संस्कार मिले रहते हैं| इस कारण उसे पुनर्जन्म लेना पड़ता है|
जैसे मैं बाहर सूर्य से उपकार ग्रहण करता हूँ ठीक वैसे ही मुझे भीतर वायु की प्राण विद्या को जानकर अपनी उन्नति करनी चाहिए|
सूर्य जल को सोखता है और वृष्टि करवाता है| इस वृष्टि से अन्न पैदा होता है और अन्न से रस पैदा होता है| इसी रस से जीव जगत की वृद्धि होती है|
ठीक इसी प्रकार शरीर में यदि आत्मा न हो तो प्राणों को ऊर्जा न मिलने से वे निष्क्रिय रहेंगे| अर्थात शरीर के विभिन्न कार्य जैसे पाचन, खून का बहन आदि कर्म नहीं हो सकेंगे|
1.2.2 विद्वान वेद मंत्रों का क्या करते हैं?
इस मंत्र में वेद मंत्रों का वह प्रयोग बताया है जिसका लाभ विद्वान लोग लेते हैं| ऐसा ही सब मनुष्यों को भी करना उचित है|
1.2.3 वेद मंत्र टॉर्च की तरह कैसे काम करते हैं?
जैसे टॉर्च वस्तुओं को प्रकाशित कर हमें ज्ञान देती है उस पदार्थ के बारे में, ठीक वैसे ही वेद ज्ञान भी संसार के वस्तुओं का ज्ञान कराते हैं|
1.2.4 यह वेद मंत्र copernicus तथा न्यूटन से पहले ही उनके बताए सिद्धांत बता चुका था|
पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर चक्कर काटना तथा गुरुत्वाकर्षण बल का ज्ञान यह वेद मंत्र दे रहा है|
1.2.5 सूर्य और पवन का निर्माण ईश्वर ने क्यों किया?
वेद मंत्रों में ईश्वर के द्वारा रचे हुए पदार्थों के गुणों का बार बार वर्णन है| इस मंत्र में यह बताया जा रहा है कि ईश्वर के रचे सूर्य तथा वायु हम लोगों का क्या उपकार करते हैं|
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