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अवसादों के गहन तमस में, सूर्य किरण की काया बनकर
शुष्क मरू से हृदय पटल पर, हरित तरु की छाया बनकर
कब मांगी थी मैंने तुझसे, जीवनपर्यन्त प्रतिबद्धता
बस एक क्षण वह मुझको दे दो, दिवास्वप्न की माया बनकर
- विवेक
(सर्व अधिकार सुरक्षित, All Rights Reserved)
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