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निर्झरिणी
निर्मल निश्छल निर्झरिणी तू, पर्वत पर प्रपात बन बहती।
मनमोहक मधुर मंद ध्वनि में, मेरे कानों में क्या कहती।
स्वच्छंद सजीव तू चले निरंतर, थमना है तेरा काम नहीं।
पथ पर पड़ते पाषाण परन्तु, प्रीती सदैव हृदय में रहती। (१)
अंजन आँखों से तेरी चुराकर, श्यामघटा है नभ में छाती।
तेरी तरंगों से क्रीड़ा करने, नित्य सूर्य की किरणें आती।
उमड़ घुमड़ तेरा नृत्य देखके, पशु-पक्षी हैं साथ थिरकते।
प्रमुदित प्रफुल्लित प्रकृति भी, गीत तेरे स्वागत में गाती। (२)
सुरभित साँसों से सौरभ ले, हैं कानन की कलियाँ महकीं।
कल-कल कलरव तेरा सुनके, चपल चंचल चिड़ियाँ चहकीं।
दमक दृष्टि-दीप्ति से तेरी ही, ये खद्योत अरण्य के पाते हैं।
स्वच्छ सलिल की मदिरा पीके, मदहोश मधुलिकायें बहकीं। (३)
अवदात अम्बु के दर्पण में, प्रतिबिम्ब देखके मृग मुस्काते।
सानिध्य तेरा पाने को, उत्तंग शिखर-गज झुक-झुक जाते।
धन्य हुआ है जीवन मेरा, मुझको जो अविरल साथ मिला।
हृदय में उठतीं प्रेम-तरंगे, मीलित नेत्र नित्य स्वप्न सजाते। (४)
स्नेह सदैव संचित रखना, जीवन को इससे आधार मिला।
कभी कुम्हलाये नहीं हिय का, जो पावन प्रेम-पुष्प खिला।
आरोह-अवरोह आयेंगे जीवन में, नेह कभी न मिटने पाये।
अनुराग-अनल जो बुझी कभी तो, बन जायेगी हिमशिला। (५)
स्वरचित और मौलिक
तुम्हें उदास-सा पाता हूँ मैं कई दिन से
मेरी उम्मीद अगर मिट गयी तो मिटने दो
- साहिर लुधियानवी
प्रथम सर्ग
काँप रही थी पृथ्वी, स्वर्ग भी था भयभीत।
महिषासुर ने लिया, तीनों लोकों को जीत।
त्राहि माम के गुंजन से, सृष्टि भर गयी सारी।
जग में आतंक मचा रहा, वो क्रूर अत्याचारी।
उसकी शक्ति के सम्मुख, देव भी थे लाचार।
ब्रह्मदेव के वर स्वरुप, निष्फल हुये प्रहार।
वज्र व्यर्थ बाण बेकार, सुदर्शन सफल नहीं।
देवता घूम रहे चहुँ ओर, मिले न चैन कहीं।
थक हार कर सब पहुँचे, महादेव के पास।
निराश हृदय में लेकर, एक छोटी सी आस।
त्रिलोक नाश का सामर्थ्य, रखते हैं त्रिपुरारी।
महिषासुर के सम्मुख, उनकी शक्ति भी हारी।
देख दृश्य दुष्कर, सबका क्रोध उमड़ आया।
कौंधी बिजली ऐसे, काँप उठी अवनि काया।
देवों के मस्तक से तब, तेज पुंज प्रकट हुआ।
कोटि कण अग्नि मिल, वडवानल प्रचंड हुआ।
सहस्त्र सूर्यों का प्रकाश, समस्त विश्व में छाया।
प्रकाशपुंज मध्य में स्थित, तेज भरी एक काया।
दिव्य दर्शन देवी के ऐसे, नेत्र नहीं टिक पाते।
शक्ति का अनुभव ऐसा, हाथ स्वयं जुड़ जाते।
श्रीविष्णु बोले यह, साकार रूप है शक्ति का।
समझो जैसे उत्तर है, निज संकट व भक्ति का।
सुन प्रभु की ऐसी वाणी, ऊर्जा का संचार हुआ।
शिथिल शरीरों में, नवशक्ति का विस्तार हुआ।
सब देवों ने देवी को, किये अस्त्र शस्त्र प्रदान।
देवी ने उग्र हुंकार भरी, ले जग पीड़ा संज्ञान।
माँ मुक्ति दो अत्याचार से, करो उद्धार हमारा।
भक्तों की व्यथा सुन माँ ने, दैत्य को ललकारा।
दहले दानव दल देख, कात्यायनी का रौद्ररूप।
महिषासुर भी भयभीत हुआ, देख शक्ति स्वरुप।
भीषण युद्ध छिड़ गया, दोनों ने किये प्रहार।
अंततः माता ने कर दिया, महिषासुर संहार।
ऋषियों ने माँ वंदन को, सुन्दर श्लोक बनाये।
गृहस्थों ने माता सम्मुख, स्वादिष्ट भोग चढ़ाये।
हर्षित हुये देव व मानव, स्वतंत्र हुआ जग सारा।
भक्ति में सब डूब लगाते, माँ का जयजयकारा।
द्वितीय सर्ग
इस तरह जगराते में हुयी, माँ की कथा समाप्त।
अच्छाई की जीत देख, हुआ हिय को हर्ष प्राप्त।
अपना उद्धार कब होगा, यही सोचता घर आया।
जग पर अब भी मंडराता, महिषासुर का साया।
दुर्बल-निर्धन आज भी सहते, अगणित अत्याचार।
कौन करेगा अपराधियों का, फिर समूल संहार।
इनके पास भी है कवच, ऊपर से वरदानों का।
इसीलिए होता निरर्थक, हर अस्त्र कानूनों का।
माँ मेरी विनती तुमसे, कुछ तो राह दिखाओ।
कैसे न्याय करें स्थापित, कोई उपाय बताओ।
रक्तबीज सदृश इनकी, संख्या बढ़ती जाती।
दीन दुखी दुनिया बचाने, क्यों नहीं तू आती।
यही प्रार्थना हृदय बसाये, जाने कब सो गया।
स्वप्न में माता प्रकट हुईं, ऐसी मुझपे की दया।
मंद मंद मुस्काते, ममता से मस्तक सहलाया।
बोलीं कथा से मेरी, क्या इतना समझ न आया।
शक्ति का मूल क्या है, क्या है सत्य स्वरुप।
किस श्रोत से प्रकट है होती, शक्ति ये अनूप।
क्या कभी सोचा तुमने, क्यों ऐसा हाल तुम्हारा।
क्यूँ मुट्ठी भर लोगों से, आतंकित ये जग सारा।
याद कर मेरे रूप का, श्रोत था सबका क्रोध।
मैं तुम सबमें सन्निहित, कर लो इसका बोध।
न्याय तुम्हें मिल जायेगा, जब तुम ये जानोगे।
स्वयं में स्थित शक्ति को, स्वयं ही पहचानोगे।
अनाद्यनन्त है प्रकृति मेरी, न निज एक स्थान।
सामूहिक शक्ति हूँ मैं, करो मिल के आव्हान।
जो जग में परिवर्तन चाहो, करो स्वयं शुरुआत।
मर्म मेरी कथा का जानो, इतनी छोटी सी बात।
माता वचनों को सुनके, दूर हुआ सब संशय।
एकता में शक्ति इतनी, निश्चित है अपनी जय।
सन्देश यही फैलाना है, प्रण लेता हूँ मैं आज।
अपनी शक्ति से ही सार्थक, अपने सारे काज।
हे देवी तुझे नमन जो, स्थित है शक्ति रूप में।
सर्वव्यापी कालजयी, वर्तमान भविष्य भूत में।
हे देवी तुझे नमन जो, स्थित है बुद्धि रूप में।
मन मानस में मेरे बसती, ज्ञान के स्वरुप में।
- विवेक
(स्वरचित और मौलिक)
शीर्षक: क्राँति का नया अर्थ
२६ जनवरी की सर्द सुबह को, गर्म चाय की चुस्कियां लेते हुये।
गर्वित अनुभव कर रहा था, टीवी पर सेना की परेड देखते हुये।
की अचानक एक आवाज आयी, और लुप्त हो गयी पिक्चर सारी।
तथा स्क्रीन पर आ गए भगत, सुभाष और अन्य वीर क्रांतिकारी।
चेहरे पर स्वतंत्रता मिलने का हर्ष नहीं, अपितु था एक विचित्र विषाद।
रक्तिम नेत्रों में निराशा-नीर, व आक्रोश-अग्नि का मिश्रित उन्माद।
विस्मय और भय के बीच डोलता हुआ, एक पुतले सा था मैं स्तब्ध।
तभी गूँज उठे मेरे पूरे घर में, उन वीरों के रोष भरे ओजस्वी शब्द।
लाल किले पर निज ध्वज लहराये, हमने था जीवन उद्देश्य बनाया।
उसी किले पर अपने ध्वज का फिर, कैसे क्यों तुमने सम्मान घटाया।
इस भारत की आजादी हेतु हमने, प्राणों को भी था दाँव पर लगाया।
उसी आज़ादी का ऐसा दुरूपयोग देख, आज लज्जा से सर झुकाया।
जब देखो तब हड़तालें करके, इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते हो।
भारतवासियों के खून पसीने से बनी, राष्ट्र सम्पति को सरेआम जलाते हो।
विश्वविद्यालयों में एकत्र हो कर, भारत तेरे टुकड़े होंगे, ऐसा चिल्लाते हो।
और तद्पश्चात ऐसे घृणित नारों को अभिव्यक्ति की आजादी बताते हो।
मूर्खों वो समय कुछ और था, अब समय की है और पुकार।
स्वतंत्र राष्ट्र है लोकतंत्र है, सबको है मत का पूरा अधिकार।
अब जनता ही जनार्दन है, चुनती है स्वयं वो अपनी सरकार।
स्वतंत्रता का अर्थ निरंकुशता नहीं, सत्य करो तुम ये स्वीकार।
उस समय थी बस एक चुनौती, भारत को कैसे स्वतंत्र करायें।
इस वक़्त में है अब नये लक्ष्य, निज राष्ट्र को कैसे और बढ़ायें।
क्राँति का अर्थ है बदल गया, अब हिंसा का नहीं यहाँ स्थान।
नए युग के नए मोर्चे हैं अब, जैसे शिक्षा, उद्योग, और विज्ञान।
सुनकर उन सबकी ऐसी बातें, नयनों में नीर छलक आया।
दृगजल से प्रक्षालित मन में, ज्ञान का एक नव दीप जलाया।
प्यारे देश वासियों सुन लो, वीर क्रांतिकारियों का ये सन्देश।
बंद कर दो ये व्यर्थ तमाशा, ख़त्म करो कटु कलह कलेश।
कभी इनके बलिदानों से न, ऋणमुक्त हम सब हो पायेंगे।
कोटि कोटि कृतज्ञ कंठ यहाँ, गीत भला कितने ही गायेंगे।
नहीं होगी पर्याप्त हम सबकी, भावुक शब्दों की पुष्पांजलि।
हम भी जब देश निर्माण करें, तभी पूर्ण होगी ये श्रद्धांजलि।
स्वरचित व मौलिक
~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)
Write 2 me on [email protected]
कोपल की कहानी
कोमल कोपल के कोने से,
ढुलक पड़ी बूँदें ओस की।
सकुचाई सिमटी सी वो पत्ती,
कर अर्पित निधि कोष की।
अंशुमाली क्या स्वीकार करेंगे,
सप्रेम समर्पित स्नेह अर्घ्य यह।
धरा ने जिसे धरा सहेज कर,
कहीं किधर न जाये बह।
अवनि आखिर जननी है,
पादप, पत्ती पुष्पों की।
कैसे जाने दे व्यर्थ भला,
प्रेम-भेंट निज पुत्री की।
बहुत हुआ ये तिरस्कार,
मन ही मन वसुधा ने ठाना।
क्या अपराध किया कोपल ने,
होगा सूर्य को आज बताना।
पूछा प्रश्न भूमि ने भानु से,
क्यूँ किरणें कोपल से कतराती।
स्नेह-रहित क्यूँ दुहिता उसकी,
प्रिय प्रेम से वंचित रह जाती।
उत्तर दिया सूर्य ने सकुचाते,
मैं तो प्रतिदिन यहाँ आता हूँ।
विशाल वटवृक्ष के साये में,
कोपल को सोते पाता हूँ।
कैसे किरणें कोपल को चूमें,
जब मध्य हमारे वट की काया।
सम्पूर्ण समर्पण से संभव है,
हट जाये ये काली छाया।
सन्देश उसे तुम दे दो मेरा,
परिपक्व उसे बनना होगा।
मेरे स्नेह की किरणों को पाने,
अस्तित्व स्वतंत्र करना होगा।
मेरे स्वभाव में भेद नहीं है,
मुझे पक्षपात न आता है।
जिसने जितना जतन किया,
उतना स्नेह वो पाता है।
बिसरी बातों में खोने से,
नव निर्माण नहीं होता।
वही नया फल पाता है,
जो प्रयास-बीज बोता।
प्रभु प्रदत्त वर है ये जीवन,
इसको न ऐसे व्यर्थ करो।
नया उद्देश्य बना कर अपना,
आगे ही आगे कदम धरो।
~ विवेक अग्रवाल
(स्वरचित, मौलिक)
अपना ये रिश्ता
न अपनों वाली आत्मीयता है और,
न अजनबियों वाली औपचारिकता।
असहज हो जाती हो मेरी मौजूदगी में,
आखिर कैसा है अपना ये रिश्ता। आखिर …
न कभी अनुराग से मनुहार किया और,
न ही कभी नम्रता से परिपूर्ण निवेदन।
चंद लफ़्ज़ों में कर लेती हो जरुरत की बात,
आखिर कहाँ सीखी ये व्यवहार कुशलता। आखिर …
न दिखी कभी स्नेहमयी सहज संवेदना और,
न ही कभी शिष्टाचार की कृत्रिम कृतज्ञता।
फिर भी रोज होती हैं अपनी बातें दो चार,
आखिर क्या है इस संवाद की विवशता। आखिर …
न कभी देखता हूँ बेबाक बिंदास ठहाके और,
न ही लिपस्टिक सी चिपकी नकली मुस्कान।
बस शून्य में कुछ ढूंढता एक भावहीन चेहरा,
आखिर क्यों लुप्त हो जाती है चपलता। आखिर …
न कभी मेरे कंधे पर सिर रख रोती हो, और
न ही गम छिपा कहती हो की सब ठीक है।
झिझकती हो जब आँसू पोंछने हाथ बढ़ाता हूँ,
आखिर कौन दुःख है जो दिल में कसकता। आखिर …
न कभी मुझसे मन की बात कहती हो, और
न ही कभी कुछ अनर्गल बोल छिपाती हो।
कैसे जानूँ मैं जो वाकई तेरे दिल में है,
आखिर इंसान हूँ मैं न की कोई फरिश्ता। आखिर …
बहुत देखा है अपनों को अजनबी बनते।
और अजनबियों से बनते नाता अपना।
पर ये जो है ना अपना और ना बेगाना।
आखिर कैसा है अपना ये रिश्ता। आखिर …
स्वरचित व मौलिक
~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)
सन्देश
साँवरे सुन सन्देश हृदय का, मोहे मोह माया से उबार दे।
अपने चरणों की पावन रज पै, थोड़ा सा तो अधिकार दे।
मन मोरा मैला मलिन जान के, न छोड़ना मेरा साथ मुरारी।
मेरी भक्ति को अपनी शक्ति का, अवलंब और आधार दे।
बांके बिहारी बसि बसि जावे, छवि तिहारी मोरे नैनन में।
देखूँ हर पल तोरी मोहिनी मूरत, पूरा कर मोरा मनुहार दे।
जागत सोवत बस नाम तिहारा, निकले मेरी हर श्वास से।
और कछु-कौऊ ध्यान ना आबै, हिय में अइसन प्यार दे।
काम क्रोध लोभ मोह मद मेरा, प्रभु इनका तुम नाश करो।
ज्ञान 'विवेक' भक्ति का हो बसेरा, ऐसे मुझको संस्कार दे।
- विवेक अग्रवाल (स्वरचित, मौलिक)
(जन्माष्टमी उत्सव पर मेरे इष्ट देव श्री बांके बिहारी जू के चरणों में मेरा विनती भरा सन्देश)
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