Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ)

Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ)

By Vivek AgarwalArtsPerforming Arts
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Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ) episodes

  • अपने सपने
    अपने सपने
    ऐ मुन्ने तू मुझे बता, तेरे क्या क्या सपने हैं
    कौन से हैं औरों ने चुने, और कौन से तेरे अपने हैं।
    कदम कदम पर लोग कहेंगे, क्या करना है क्या नहीं।
    इधर उधर की राह पकड़कर, भटक न जाना तू कहीं।
    बाकी सबकी बातें छोड़, बात तू अपने दिल की सुन।
    तेरी मंज़िल जो रस्ता जाये, राह वही तू खुद से चुन।
    मछली को तुमने देखा है, क्या कभी पेड़ पर चढ़ते।
    या किसी बाज को तुमने पाया, कभी ऊँचाई से डरते।
    सबके अपने गुण दोष हैं, अपनी अपनी है शक्ति।
    प्रभु ने सबको कुछ ख़ास दिया, भिन्न है हर व्यक्ति।
    ना कर किसी से तुलना तू, मार्ग तेरा व गति भी तेरी।
    आशादीप जलाके रखना, मिले अगर कोई गली अँधेरी।
    बाधायें तो आयेंगी लेकिन, मन में होगा पूरा संतोष।
    स्वयं चुना था मार्ग अपना, नहीं किसी का कोई दोष।
    अगर पकड़ के राह दूसरी, है मंजिल मिल भी जाती।
    एक खालीपन रह जाता है, ना खुशी है सच्ची आती।
    एक जिंदगी मिलती सबको, क्यों इसको बर्बाद करें।
    अपने अनुसार जी लें इसको, व्यर्थ का क्यूँ विवाद करें।
    जिंदगी अगर एक चित्र है, तो तुझे ही इसे बनाना है।
    रंग जो लगते तुझको प्यारे, उनसे ही इसे सजाना है।
    ~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)
    स्वरचित व मौलिक
    4 min
  • निर्झरिणी

    निर्झरिणी


    निर्मल निश्छल निर्झरिणी तू, पर्वत पर प्रपात बन बहती।

    मनमोहक मधुर मंद ध्वनि में, मेरे कानों में क्या कहती।

    स्वच्छंद सजीव तू चले निरंतर, थमना है तेरा काम नहीं।

    पथ पर पड़ते पाषाण परन्तु, प्रीती सदैव हृदय में रहती। (१)


    अंजन आँखों से तेरी चुराकर, श्यामघटा है नभ में छाती।

    तेरी तरंगों से क्रीड़ा करने, नित्य सूर्य की किरणें आती।

    उमड़ घुमड़ तेरा नृत्य देखके, पशु-पक्षी हैं साथ थिरकते।

    प्रमुदित प्रफुल्लित प्रकृति भी, गीत तेरे स्वागत में गाती। (२)


    सुरभित साँसों से सौरभ ले, हैं कानन की कलियाँ महकीं।

    कल-कल कलरव तेरा सुनके, चपल चंचल चिड़ियाँ चहकीं।

    दमक दृष्टि-दीप्ति से तेरी ही, ये खद्योत अरण्य के पाते हैं।

    स्वच्छ सलिल की मदिरा पीके, मदहोश मधुलिकायें बहकीं। (३)


    अवदात अम्बु के दर्पण में, प्रतिबिम्ब देखके मृग मुस्काते।

    सानिध्य तेरा पाने को, उत्तंग शिखर-गज झुक-झुक जाते।

    धन्य हुआ है जीवन मेरा, मुझको जो अविरल साथ मिला।

    हृदय में उठतीं प्रेम-तरंगे, मीलित नेत्र नित्य स्वप्न सजाते। (४)


    स्नेह सदैव संचित रखना, जीवन को इससे आधार मिला।

    कभी कुम्हलाये नहीं हिय का, जो पावन प्रेम-पुष्प खिला।

    आरोह-अवरोह आयेंगे जीवन में, नेह कभी न मिटने पाये।

    अनुराग-अनल जो बुझी कभी तो, बन जायेगी हिमशिला। (५)


    स्वरचित और मौलिक

    विवेक अग्रवाल

    4 min
  • ग़ज़ल-लहजा (Ghazal - Lehja)
    ग़ज़ल-लहजा

    मतलब निकल गया तो, लहजा बदल गया।
    चलो इस बहाने हमें दिख, चेहरा असल गया।
    कल की बात है वो, दर आये  मुस्कुराते।
    देख कर भोली सूरत दिल, अपना मचल गया। 
    ऐसा नहीं हमें ना था, तग़ाफ़ुल का अंदेशा। 
    कुछ ऐसे वो बोले कि, जादू सा चल गया। 
    कतराते हैं वो ऐसे की मेरा, साया तक ना दिखे। 
    जिनकी फ़रमाइश पे कुर्बां, मेरा कल गया। 
    उसके लबों पे है हँसीं, पा के मेरी नियामत। 
    अपने लबों पे बस रह, एक ग़ज़ल गया।

    लेखन - विवेक अग्रवाल संगीत और गायकी - रणधीर सिंह
    6 min
  • तुम्हें उदास-सा पाता हूँ मैं कई दिन से - साहिर लुधियानवी

    तुम्हें उदास-सा पाता हूँ मैं कई दिन से

    न जाने कौन से सदमे उठा रही हो तुम
    वो शोख़ियाँ, वो तबस्सुम, वो क़हक़हे न रहे
    हर एक चीज़ को हसरत से देखती हो तुम
    छुपा-छुपा के ख़मोशी में अपनी बेचैनी
    ख़ुद अपने राज़ की तशहीर बन गयी हो तुम

    मेरी उम्मीद अगर मिट गयी तो मिटने दो

    उम्मीद क्या है बस एक पेशो-ओ-पश है कुछ भी नहीं
    मेरी हयात की ग़मग़ीनियों का ग़म न करो
    ग़म हयात-ए-ग़म यक नक़्स है कुछ भी नहीं
    तुम अपने हुस्न की रानाईयों पर रहम करो
    वफ़ा फ़रेब तुल हवस है कुछ भी नहीं

    मुझे तुम्हारे तग़ाफ़ुल से क्यूँ शिकायत हो
    मेरी फ़ना मेरे एहसास का तक़ाज़ा है
    मैं न जानता हूँ के दुनिया का ख़ौफ़ है तुमको
    मुझे ख़बर है ये दुनिया अजीब दुनिया है
    यहाँ हयात के पर्दे में मौत चलती है
    शिकस्त साज़ की आवाज़ में रू नग़्मा है

    मुझे तुम्हारी जुदाई का कोई रंज नहीं
    मेरे ख़याल की दुनिया में मेरे पास हो तुम
    ये तुमने ठीक कहा है तुम्हें मिला न करूँ
    मगर मुझे बता दो कि क्यूँ उदास हो तुम
    खफ़ा न हो मेरी जुर्रत-ए-तख़्तब पर
    तुम्हें ख़बर है मेरी ज़िंदगी की आस हो तुम

    मेरा तो कुछ भी नहीं है मैं रो के जी लूँगा
    मगर ख़ुदा के लिये तुम असीर-ए-ग़म न रहो
    हुआ ही क्या जो ज़माने ने तुम को छीन लिया
    यहाँ पर कौन हुआ है किसी का सोचो तो
    मुझे क़सम है मेरी दुख भरी जवानी की
    मैं ख़ुश हूँ मेरी मोहब्बत के फूल ठुकरा दो

    मैं अपनी रूह की हर एक ख़ुशी मिटा लूँगा
    मगर तुम्हारी मसर्रत मिटा नहीं सकता
    मैं ख़ूद को मौत के हाथों में सौँप सकता हूँ
    मगर ये बर-ए-मुसाइब उठा नहीं सकता
    तुम्हारे ग़म के सिवा और भी तो ग़म हैं मुझे
    निजात जिनसे मैं एक लहज़ पा नहीं सकता

    ये ऊँचे ऊँचे मकानों की देवड़ीयों के तले
    हर काम पे भूके भिकारीयों की सदा
    हर एक घर में अफ़्लास और भूक का शोर
    हर एक सिम्त ये इन्सानियत की आह-ओ-बुका
    ये करख़ानों में लोहे का शोर-ओ-गुल जिसमें
    है दफ़्न लाखों ग़रीबों की रूह का नग़्मा

    ये शरहों पे रंगीन साड़िओं की झलक
    ये झोँपड़ियों में ग़रीबों के बे-कफ़न लाशें
    ये माल रोड पे कारों की रैल पैल का शोर
    ये पटरियों पे ग़रीबों के ज़र्दरू बच्चे
    गली गली में बिकते हुए जवाँ चेहरे
    हसीन आँखों में अफ़्सुर्दगी सी छायी हुई

    ये जंग और ये मेरे वतन के शोख़ जवाँ
    खरीदी जाती हैं उठती जवानियाँ जिनकी
    ये बात बात पे कानून और ज़ब्ते की गिरफ़्त
    ये ज़ीस्क़ ये ग़ुलामी ये दौर-ए-मजबूरी
    ये ग़म हैं बहोत मेरी ज़िंदगी मिटाने को
    उदास रह के मेरे दिल को और रंज न दो

    - साहिर लुधियानवी

    5 min
  • शक्ति-स्वरुप

    प्रथम सर्ग

    काँप रही थी पृथ्वी, स्वर्ग भी था भयभीत।

    महिषासुर ने लिया, तीनों लोकों को जीत।

    त्राहि माम के गुंजन से, सृष्टि भर गयी सारी।

    जग में आतंक मचा रहा, वो क्रूर अत्याचारी।

    उसकी शक्ति के सम्मुख, देव भी थे लाचार।

    ब्रह्मदेव के वर स्वरुप, निष्फल हुये प्रहार।

    वज्र व्यर्थ बाण बेकार, सुदर्शन सफल नहीं।

    देवता घूम रहे चहुँ ओर, मिले न चैन कहीं।

    थक हार कर सब पहुँचे, महादेव के पास।

    निराश हृदय में लेकर, एक छोटी सी आस।

    त्रिलोक नाश का सामर्थ्य, रखते हैं त्रिपुरारी।

    महिषासुर के सम्मुख, उनकी शक्ति भी हारी।

    देख दृश्य दुष्कर, सबका क्रोध उमड़ आया।

    कौंधी बिजली ऐसे, काँप उठी अवनि काया।

    देवों के मस्तक से तब, तेज पुंज प्रकट हुआ।

    कोटि कण अग्नि मिल, वडवानल प्रचंड हुआ।

    सहस्त्र सूर्यों का प्रकाश, समस्त विश्व में छाया।

    प्रकाशपुंज मध्य में स्थित, तेज भरी एक काया।

    दिव्य दर्शन देवी के ऐसे, नेत्र नहीं टिक पाते।

    शक्ति का अनुभव ऐसा, हाथ स्वयं जुड़ जाते।

    श्रीविष्णु बोले यह, साकार रूप है शक्ति का।

    समझो जैसे उत्तर है, निज संकट व भक्ति का।

    सुन प्रभु की ऐसी वाणी, ऊर्जा का संचार हुआ।

    शिथिल शरीरों में, नवशक्ति का विस्तार हुआ।

    सब देवों ने देवी को, किये अस्त्र शस्त्र प्रदान।

    देवी ने उग्र हुंकार भरी, ले जग पीड़ा संज्ञान।

    माँ मुक्ति दो अत्याचार से, करो उद्धार हमारा।

    भक्तों की व्यथा सुन माँ ने, दैत्य को ललकारा।

    दहले दानव दल देख, कात्यायनी का रौद्ररूप।

    महिषासुर भी भयभीत हुआ, देख शक्ति स्वरुप।

    भीषण युद्ध छिड़ गया, दोनों ने किये प्रहार।

    अंततः माता ने कर दिया, महिषासुर संहार।

    ऋषियों ने माँ वंदन को, सुन्दर श्लोक बनाये।

    गृहस्थों ने माता सम्मुख, स्वादिष्ट भोग चढ़ाये।

    हर्षित हुये देव व मानव, स्वतंत्र हुआ जग सारा।

    भक्ति में सब डूब लगाते, माँ का जयजयकारा।


    द्वितीय सर्ग

    इस तरह जगराते में हुयी, माँ की कथा समाप्त।

    अच्छाई की जीत देख, हुआ हिय को हर्ष प्राप्त।

    अपना उद्धार कब होगा, यही सोचता घर आया।

    जग पर अब भी मंडराता, महिषासुर का साया।

    दुर्बल-निर्धन आज भी सहते, अगणित अत्याचार।

    कौन करेगा अपराधियों का, फिर समूल संहार।

    इनके पास भी है कवच, ऊपर से वरदानों का।

    इसीलिए होता निरर्थक, हर अस्त्र कानूनों का।

    माँ मेरी विनती तुमसे, कुछ तो राह दिखाओ।

    कैसे न्याय करें स्थापित, कोई उपाय बताओ।

    रक्तबीज सदृश इनकी, संख्या बढ़ती जाती।

    दीन दुखी दुनिया बचाने, क्यों नहीं तू आती।

    यही प्रार्थना हृदय बसाये, जाने कब सो गया।

    स्वप्न में माता प्रकट हुईं, ऐसी मुझपे की दया।

    मंद मंद मुस्काते, ममता से मस्तक सहलाया।

    बोलीं कथा से मेरी, क्या इतना समझ न आया।

    शक्ति का मूल क्या है, क्या है सत्य स्वरुप।

    किस श्रोत से प्रकट है होती, शक्ति ये अनूप।

    क्या कभी सोचा तुमने, क्यों ऐसा हाल तुम्हारा।

    क्यूँ मुट्ठी भर लोगों से, आतंकित ये जग सारा।

    याद कर मेरे रूप का, श्रोत था सबका क्रोध।

    मैं तुम सबमें सन्निहित, कर लो इसका बोध।

    न्याय तुम्हें मिल जायेगा, जब तुम ये जानोगे।

    स्वयं में स्थित शक्ति को, स्वयं ही पहचानोगे।

    अनाद्यनन्त है प्रकृति मेरी, न निज एक स्थान।

    सामूहिक शक्ति हूँ मैं, करो मिल के आव्हान।

    जो जग में परिवर्तन चाहो, करो स्वयं शुरुआत।

    मर्म मेरी कथा का जानो, इतनी छोटी सी बात।

    माता वचनों को सुनके, दूर हुआ सब संशय।

    एकता में शक्ति इतनी, निश्चित है अपनी जय।

    सन्देश यही फैलाना है, प्रण लेता हूँ मैं आज।

    अपनी शक्ति से ही सार्थक, अपने सारे काज।

    हे देवी तुझे नमन जो, स्थित है शक्ति रूप में।

    सर्वव्यापी कालजयी, वर्तमान भविष्य भूत में।

    हे देवी तुझे नमन जो, स्थित है बुद्धि रूप में।

    मन मानस में मेरे बसती, ज्ञान के स्वरुप में।


    - विवेक

    (स्वरचित और मौलिक)

    8 min
  • क्राँति का नया अर्थ

    शीर्षक: क्राँति का नया अर्थ


    २६ जनवरी की सर्द सुबह को, गर्म चाय की चुस्कियां लेते हुये।

    गर्वित अनुभव कर रहा था, टीवी पर सेना की परेड देखते हुये।

    की अचानक एक आवाज आयी, और लुप्त हो गयी पिक्चर सारी।

    तथा स्क्रीन पर आ गए भगत, सुभाष और अन्य वीर क्रांतिकारी।


    चेहरे पर स्वतंत्रता मिलने का हर्ष नहीं, अपितु था एक विचित्र विषाद।

    रक्तिम नेत्रों में निराशा-नीर, व आक्रोश-अग्नि का मिश्रित उन्माद।

    विस्मय और भय के बीच डोलता हुआ, एक पुतले सा था मैं स्तब्ध।

    तभी गूँज उठे मेरे पूरे घर में, उन वीरों के रोष भरे ओजस्वी शब्द।


    लाल किले पर निज ध्वज लहराये, हमने था जीवन उद्देश्य बनाया।

    उसी किले पर अपने ध्वज का फिर, कैसे क्यों तुमने सम्मान घटाया।

    इस भारत की आजादी हेतु हमने, प्राणों को भी था दाँव पर लगाया।

    उसी आज़ादी का ऐसा दुरूपयोग देख, आज लज्जा से सर झुकाया।


    जब देखो तब हड़तालें करके, इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते हो।

    भारतवासियों के खून पसीने से बनी, राष्ट्र सम्पति को सरेआम जलाते हो।

    विश्वविद्यालयों में एकत्र हो कर, भारत तेरे टुकड़े होंगे, ऐसा चिल्लाते हो।

    और तद्पश्चात ऐसे घृणित नारों को अभिव्यक्ति की आजादी बताते हो।


    मूर्खों वो समय कुछ और था, अब समय की है और पुकार।

    स्वतंत्र राष्ट्र है लोकतंत्र है, सबको है मत का पूरा अधिकार।

    अब जनता ही जनार्दन है, चुनती है स्वयं वो अपनी सरकार।

    स्वतंत्रता का अर्थ निरंकुशता नहीं, सत्य करो तुम ये स्वीकार।


    उस समय थी बस एक चुनौती, भारत को कैसे स्वतंत्र करायें।

    इस वक़्त में है अब नये लक्ष्य, निज राष्ट्र को कैसे और बढ़ायें।

    क्राँति का अर्थ है बदल गया, अब हिंसा का नहीं यहाँ स्थान।

    नए युग के नए मोर्चे हैं अब, जैसे शिक्षा, उद्योग, और विज्ञान।


    सुनकर उन सबकी ऐसी बातें, नयनों में नीर छलक आया।

    दृगजल से प्रक्षालित मन में, ज्ञान का एक नव दीप जलाया।

    प्यारे देश वासियों सुन लो, वीर क्रांतिकारियों का ये सन्देश।

    बंद कर दो ये व्यर्थ तमाशा, ख़त्म करो कटु कलह कलेश।


    कभी इनके बलिदानों से न, ऋणमुक्त हम सब हो पायेंगे।

    कोटि कोटि कृतज्ञ कंठ यहाँ, गीत भला कितने ही गायेंगे।

    नहीं होगी पर्याप्त हम सबकी, भावुक शब्दों की पुष्पांजलि।

    हम भी जब देश निर्माण करें, तभी पूर्ण होगी ये श्रद्धांजलि।


    स्वरचित व मौलिक

    ~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)

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    6 min
  • कोपल की कहानी

    कोपल की कहानी

    कोमल कोपल के कोने से,

    ढुलक पड़ी बूँदें ओस की।

    सकुचाई सिमटी सी वो पत्ती,

    कर अर्पित निधि कोष की।

    अंशुमाली क्या स्वीकार करेंगे,

    सप्रेम समर्पित स्नेह अर्घ्य यह।

    धरा ने जिसे धरा सहेज कर,

    कहीं किधर न जाये बह।

    अवनि आखिर जननी है,

    पादप, पत्ती पुष्पों की।

    कैसे जाने दे व्यर्थ भला,

    प्रेम-भेंट निज पुत्री की।

    बहुत हुआ ये तिरस्कार,

    मन ही मन वसुधा ने ठाना।

    क्या अपराध किया कोपल ने,

    होगा सूर्य को आज बताना।

    पूछा प्रश्न भूमि ने भानु से,

    क्यूँ किरणें कोपल से कतराती।

    स्नेह-रहित क्यूँ दुहिता उसकी,

    प्रिय प्रेम से वंचित रह जाती।

    उत्तर दिया सूर्य ने सकुचाते,

    मैं तो प्रतिदिन यहाँ आता हूँ।

    विशाल वटवृक्ष के साये में,

    कोपल को सोते पाता हूँ।

    कैसे किरणें कोपल को चूमें,

    जब मध्य हमारे वट की काया।

    सम्पूर्ण समर्पण से संभव है,

    हट जाये ये काली छाया।

    सन्देश उसे तुम दे दो मेरा,

    परिपक्व उसे बनना होगा।

    मेरे स्नेह की किरणों को पाने,

    अस्तित्व स्वतंत्र करना होगा।

    मेरे स्वभाव में भेद नहीं है,

    मुझे पक्षपात न आता है।

    जिसने जितना जतन किया,

    उतना स्नेह वो पाता है।

    बिसरी बातों में खोने से,

    नव निर्माण नहीं होता।

    वही नया फल पाता है,

    जो प्रयास-बीज बोता।

    प्रभु प्रदत्त वर है ये जीवन,

    इसको न ऐसे व्यर्थ करो।

    नया उद्देश्य बना कर अपना,

    आगे ही आगे कदम धरो।

    ~ विवेक अग्रवाल

    (स्वरचित, मौलिक)

    5 min
  • अपना ये रिश्ता

    अपना ये रिश्ता


    न अपनों वाली आत्मीयता है और,

    न अजनबियों वाली औपचारिकता।

    असहज हो जाती हो मेरी मौजूदगी में,

    आखिर कैसा है अपना ये रिश्ता। आखिर …


    न कभी अनुराग से मनुहार किया और,

    न ही कभी नम्रता से परिपूर्ण निवेदन।

    चंद लफ़्ज़ों में कर लेती हो जरुरत की बात,

    आखिर कहाँ सीखी ये व्यवहार कुशलता। आखिर …


    न दिखी कभी स्नेहमयी सहज संवेदना और,

    न ही कभी शिष्टाचार की कृत्रिम कृतज्ञता।

    फिर भी रोज होती हैं अपनी बातें दो चार,

    आखिर क्या है इस संवाद की विवशता। आखिर …


    न कभी देखता हूँ बेबाक बिंदास ठहाके और,

    न ही लिपस्टिक सी चिपकी नकली मुस्कान।

    बस शून्य में कुछ ढूंढता एक भावहीन चेहरा,

    आखिर क्यों लुप्त हो जाती है चपलता। आखिर …


    न कभी मेरे कंधे पर सिर रख रोती हो, और

    न ही गम छिपा कहती हो की सब ठीक है।

    झिझकती हो जब आँसू पोंछने हाथ बढ़ाता हूँ,

    आखिर कौन दुःख है जो दिल में कसकता। आखिर …


    न कभी मुझसे मन की बात कहती हो, और

    न ही कभी कुछ अनर्गल बोल छिपाती हो।

    कैसे जानूँ मैं जो वाकई तेरे दिल में है,

    आखिर इंसान हूँ मैं न की कोई फरिश्ता। आखिर …


    बहुत देखा है अपनों को अजनबी बनते।

    और अजनबियों से बनते नाता अपना।

    पर ये जो है ना अपना और ना बेगाना।

    आखिर कैसा है अपना ये रिश्ता। आखिर …


    स्वरचित व मौलिक

    ~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)

    4 min
  • साढ़े नौ किलोमीटर (Nine and a half Kilometers)
    साढ़े नौ किलोमीटर
    "साढ़े नौ किलोमीटर"
    कलाई पर बँधी स्मार्टवॉच ने दिखाया।
    जैसे ही घर का द्वार निकट आया।
    रोज ही की तरह मॉर्निंग वॉक से वापस आ रहा था।
    स्वयं से किया नये साल का वादा निभा रहा था।
    अपनी जानी पहचानी गलियों को मापते हुये।
    पास वाले गार्डन और बीचफ़्रंट की लम्बाई नापते हुये।
    तक़रीबन डेढ़ घंटा हो गया था चलते हुये।
    और अपनी प्रिय प्लेलिस्ट को सुनते हुये।
    ऑफिस  के पेंडिंग काम याद आने लगे थे।
    और सिर्फ घंटा भर पहले सोचे,
    कविता के खूबसूरत आइडियाज  दिमाग से जाने लगे थे।
    साढ़े नौ किलोमीटर,
    ये बात नहीं थी नयी या विशेष।
    अक्सर घर आ जाता था,
    जब दस किलोमीटर में होते थे कुछ मीटर शेष।
    ऐसे में मैं थोड़ा और आगे चला जाता था।
    और यू टर्न  ले कर वापस घर आता था।
    अपने दस किलोमीटर पूरा करने का संतोष पाने।
    और फिर स्क्रीनशॉट को फेसबुक पर डाल सबको बताने।
    ऐसे विषम, अजीब आंकड़े पर भला कौन इतिश्री करेगा।
    और न ही कुछ मिनट और चल लेने से कुछ बिगड़ेगा।
    कई बार तो समय के अभाव में ऐसा भी था किया।
    कि कूल डाउन मोड छोड़ कर एक स्प्रिंट मार दिया।
    "साढ़े नौ किलोमीटर"
    एक बार फिर स्मार्टवॉच की रीडिंग  को देखा।
    और एक गहरी साँस ले पार कर ली गृहरेखा।
    समय था, स्टैमिना  भी था फिर भी आगे न कदम बढ़ाये।
    बिना दस किलोमीटर पूरे किये, वापस घर के अंदर आये।
    सोचा क्या फर्क पड़ता है यदि आधा किलोमीटर कम चला।
    ये राउंड नंबर की मृगतृष्णा एक मोह ही तो है जिसे छोड़ना भला।
    मुख्य बात है नित्य सुबह उठ, अपनी वॉक पे जाना।
    खुली हवा में साँसे ले गहरी, आगे कदम बढ़ाना।
    अभी कुछ ही दिन पहले “गीता इन 18 डेज” नाम की पुस्तक पढ़ी थी।
    और लेखकजी से प्रेरणा ले कर,
    निष्काम कर्म की थोड़ी धुन तो चढ़ी थी।
    साढ़े नौ किलोमीटर
    आज की इस वॉक ने सबसे जरुरी लाइफ लैसन  पुनः याद दिला दिया।
    और मेरे अंदर का मैं जो कहीं खो सा गया था आज मुझसे फिर मिला दिया।
    अब निगाह घडी घडी स्मार्टवॉच पर टाइम, डिस्टेंस, पेस, देखने ना जायेगी।
    पत्तों पुष्पों से ढुलकती ओस की बूंदों को नयन घट में ले उगते सूर्य को अर्घ्य चढ़ायेगी।
    अब कानों पर हैडफ़ोन लगा, उच्च स्वर में तीव्र गति का संगीत सुन स्वयं को पृथक ना करूँगा।
    सिंधु की मचलती लहरों, चिड़ियों के कलरव और लाफ्टर क्लबके बिंदास ठहाकों को सुनूँगा।
    बस बहुत हुआ निन्यानवे का फेर, अब ना किसी रैट रेस में भागूँगा।
    कर्म करूंगा पूरे प्रयास से पर, रिजल्ट को प्रभु प्रसाद ही मानूँगा।
    यूँ तो कई बार मैंने हाफ मैराथन का डिस्टेंस भी तय किया था।
    पर आज अधूरी अपूर्ण मॉर्निंग वॉक ने मुझे सम्पूर्ण कर दिया था।
    जो खोज रहा था पूरी दुनिया में मिल गया अपने ही भीतर।
    थैंक यू,
    साढ़े नौ किलोमीटर।
    ~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)
    5 min
  • सन्देश (Message)

    सन्देश


    साँवरे सुन सन्देश हृदय का, मोहे मोह माया से उबार दे।

    अपने चरणों की पावन रज पै, थोड़ा सा तो अधिकार दे।

    मन मोरा मैला मलिन जान के, न छोड़ना मेरा साथ मुरारी।

    मेरी भक्ति को अपनी शक्ति का, अवलंब और आधार दे।

    बांके बिहारी बसि बसि जावे, छवि तिहारी मोरे नैनन में।

    देखूँ हर पल तोरी मोहिनी मूरत, पूरा कर मोरा मनुहार दे।

    जागत सोवत बस नाम तिहारा, निकले मेरी हर श्वास से।

    और कछु-कौऊ ध्यान ना आबै, हिय में अइसन प्यार दे।

    काम क्रोध लोभ मोह मद मेरा, प्रभु इनका तुम नाश करो।

    ज्ञान 'विवेक' भक्ति का हो बसेरा, ऐसे मुझको संस्कार दे।


    - विवेक अग्रवाल (स्वरचित, मौलिक)

    (जन्माष्टमी उत्सव पर मेरे इष्ट देव श्री बांके बिहारी जू के चरणों में मेरा विनती भरा सन्देश)

    6 min

About Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ)

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