Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ)

Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ)

By Vivek AgarwalArtsPerforming Arts
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Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ) episodes

  • ग़ज़ल – जिंदगी

    जिंदगी की रेत से, ख़ुशी के कंकड़ छान लेते हैं।

    ये जीना जीना तो नहीं, पर चलो मान लेते हैं।


    तू गयी जब, तो सोचा था अब मिलेगा सुकूं।

    तू नहीं तो तेरी, यादों के ख़ंजर जान लेते हैं।


    नहीं चाहिये अब, हमें तेरी नज़र-ए-'इनायत।

    ग़ुरूर आज भी है, हम नहीं अहसान लेते हैं।


    मत करना मेरे, लौट कर आने का इंतज़ार।

    पलटते नहीं कभी, एक बार जो ठान लेते हैं।


    नादाँ हैं वो, जो रखते हैं वफ़ा की कोई उम्मीद।

    यहाँ चंद सिक्कों में, लोग ख़रीद ईमान लेते हैं।


    यदि खुश रहना है, तो सब्र रखना है बेहद ज़रुरी।

    ज़िंदगी से बड़ी क़ीमत, कम्बख्त अरमान लेते हैं।


    ऐ दुनिया वालों, तुमसे मुझे कोई शिकवा नहीं।

    गिला अपनों से है, जान कहाँ अनजान लेते हैं।


    चैन से सोने दो, जागते हुए अब थक गया हूँ मैं।

    क्यूँ ये फ़रिश्ते भी, रोज़ नये इम्तिहान लेते हैं।


    मत सिखाओ हमें, इस जहान के रिवाज-ओ-रस्म।

    अपने खुद के 'विवेक' से, अब हम संज्ञान लेते हैं।


    ~ विवेक अग्रवाल

    (स्वरचित, मौलिक)

    5 min
  • स्वतंत्रता दिवस विशेष - कलम के जादूगर

    भारत एक विशाल राष्ट्र है और यहाँ के हर प्रान्त, शहर व ग्राम में अतुलनीय प्रतिभा के लोग निवास करते हैं पर अक्सर उनकी प्रतिभा एक उचित अवसर के अभाव में एक संकीर्ण दायरे में सिमट कर रह जाती है। हर एक व्यक्ति के पास साधन या पहुँच नहीं होती की वो एक बड़े मंच से अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकें।

    लेकिन ये नया भारत है जो हार मान कर चुप बैठने वालों में से नहीं। ये नए नए अवसर निकाल ही लेता है। पिछले कुछ वर्षों में स्मार्टफोनों की व्यापकता और टेलीकॉम डाटा की कीमतों में भारी गिरावट से देश के कोने कोने में इंटरनेट और सोशल मीडिया का विस्तार हुआ है और इससे इन प्रतिभाओं को भी अपनी कला को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के नए अवसर प्राप्त हुए हैं। पिछले दो महीने में मैं स्वयं कई अच्छे कवियों और कवियित्रों के संपर्क में आया जो छोटे नगरों या ग्रामों में रहने के बावजूद सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी श्रेष्ठ रचनाओं को पूरे देश के सामने प्रस्तुत कर प्रशंसा प्राप्त कर रहे हैं।

    आज स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में मैं आपका परिचय कुछ ऐसी ही प्रतिभाओं से कराऊंगा।

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    यदि आप भी कलम के जादूगर मंच से जुड़ना चाहते हैं तो आप इन माध्यमों का प्रयोग कर सकते  हैं

    फेसबुक - https://www.facebook.com/groups/3338318179617111/about

    यूट्यूब - https://www.youtube.com/channel/UCVhMqjaC0Z82_u606ywYJUg



    24 min
  • इश्क़ दोबारा

    एक किताब सा मैं जिसमें तू कविता सी समाई है,

    कुछ ऐसे ज्यूँ जिस्म में रुह रहा करती है।

    मेरी जीस्त के पन्ने पन्ने में तेरी ही रानाई है,

    कुछ ऐसे ज्यूँ रगों में ख़ून की धारा बहा करती है।


    एक मर्तबा पहले भी तूने थी ये किताब सजाई,

    लिखकर अपनी उल्फत की खूबसूरत नज़्म।

    नीश-ए-फ़िराक़ से घायल हुआ मेरा जिस्मोजां,

    तेरे तग़ाफ़ुल से जब उजड़ी थी ज़िंदगी की बज़्म।


    सूखी नहीं है अभी सुर्ख़ स्याही से लिखी ये इबारतें,

    कहीं फ़िर से मौसम-ए-बाराँ में धुल के बह ना जायें।

    ए'तिमाद-ए-हम-क़दमी की छतरी को थामे रखना,

    शक-ओ-शुबह के छींटे तक इस बार पड़ ना पायें।


    ~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)

    4 min
  • बातें बनाम कृत्य

    तुम्हें पता है,

    क्यूँ तुम्हारी किसी कड़वी बात का मैं बुरा नहीं मानता।

    क्यूंकि बातें अक्सर अस्थायी होती हैं।

    बदलती रहती हैं मनोदशा के साथ।

    सिर्फ बातों का कोई खास मूल्य भी नहीं होता,

    बातें करने वाले लाख मिल जायेंगे।

    क्यूंकि बातें करना आसान है,

    और उतना ही आसान है नकार जाना।

    बातें अक्सर हवा के झोंके सी आती हैं,

    और चली जाती हैं।

    बस छोड़ जाती हैं एक अहसास।

    जो मन को दे सकता है आह्लाद,

    या विषाद,

    या फिर क्रोध, ग्लानि, हताशा, चिंता, उल्लास।

    कुछ भी,

    पर क्षणिक।


    कृत्यों की कहानी भिन्न है।

    कृत्य प्रयास मांगते हैं,

    इसीलिए जीवन पर अधिक असर डालते हैं।

    कृत्यों का क्रय करोगे तो कीमत अधिक देनी होगी।

    कृत्य हवा का झोंका नहीं,

    अपितु समुद्र है।

    जिसकी लहरें आती रहेंगी,

    तुम्हें छूने बार बार।

    कृत्यों का प्रभाव रहता है,

    घटित हो जाने के काफी समय बाद भी।

    कृत्य मात्र मन को नहीं प्रभावित करते,

    अपितु छू जाते हैं जिंदगी को।

    और कभी कभी अस्तित्व को।

    तो मैं तुम्हारी बातें सुनता अवश्य हूँ,

    थोड़ा प्रभावित भी होता हूँ,

    पर मेरा ध्यान कृत्यों पर होता है।


    और क्यूंकि कृत्यों का परिणाम हृदय है जानता,

    अतः किसी कड़वी बात का बुरा नहीं मानता।


    ~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)

    4 min
  • माँ तू मुझे सिखा दे, आसमान में उड़ना

    माँ तू मुझे सिखा दे, आसमान में उड़ना


    ओ माँ तू मुझे सिखा दे,

    आसमान में उड़ना।

    पंखों में भर जोश मुझे भी,

    तेज हवा से लड़ना।

    हर सुबह तू छोड़ के मुझको,

    दाना लेने जाती है।

    सर्दी गर्मी में श्रम करके,

    तू सदैव मुस्काती है।

    बारिश के मौसम में जब,

    नीड़ हमारा रिसता है।

    वन में तू घूम अकेले,

    तिनका तिनका लाती है।

    तेरी प्रेरणा से मैं भी चाहूँ,

    नित ऊँचाई पे चढ़ना।

    ओ माँ तू मुझे सिखा दे,

    आसमान में उड़ना


    कभी सोचता था मैं मन में,

    प्रभु ने अपना घर क्यों तोडा।

    भाग्य चक्र को अपने क्यों,

    विपरीत दिशा में मोड़ा।

    गत जीवन के कृत्य थे,

    या इस जीवन की गलती।

    भरे पूरे इस सुन्दर वन में,

    हमको जो एकाकी छोड़ा।

    सोच सिहर जाता क्या होगा,

    जो पड़ा हमें बिछुड़ना।

    ओ माँ तू मुझे सिखा दे,

    आसमान में उड़ना।


    ऊपर वाली शाख के बच्चे,

    दिन भर शोर मचाते हैं।

    देख निलय में मुझे अकेला,

    मिल कर खूब चिढ़ाते हैं।

    अपना क्या दोष हैं इसमें,

    जो अपना परिवार अधूरा।

    फिर क्यों कटु शब्दों के बाण,

    हम पर वो चलाते हैं।

    अब तू ही मुझे बता कैसे,

    उद्विग्नता में न पड़ना।

    ओ माँ तू मुझे सिखा दे,

    आसमान में उड़ना।


    वसंतऋतू के स्वागत में जब,

    सुरभित बयार है बहती।

    नूतन किसलय कोपल कलियाँ,

    कोने कोने में महकती।

    हर्षोल्लास से उत्सव को,

    सब मिल जुल कर मनाते हैं।

    मुझे प्रसन्न करने हेतु तू,

    कृत्रिम स्मित से चहकती।

    तुझे अकेला देख स्वाभाविक,

    दृग में नीर उमड़ना।

    ओ माँ तू मुझे सिखा दे,

    आसमान में उड़ना।


    नीचे बैठा व्याध जाल ले,

    बाज ऊपर मंडराता है।

    इन खतरों को देख मेरा मन,

    शंका से भर जाता है।

    हर दिन तेरे साहस की,

    एक नयी परीक्षा होती है।

    पर तेरा संकल्प देख दॄढ,

    संकट भी सहमा जाता है।

    तुझे अकम्पित देख मैं सीखा,

    पीछे कभी न मुड़ना।

    ओ माँ तू मुझे सिखा दे,

    आसमान में उड़ना।


    ~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)

    4 min
  • हिमशिला

    ।। हिमशिला  ।।


    एक निर्मल निर्झरणी थी तू,

    कैसे बन गयी हिमशिला ।

    किधर गयी स्नेह की गर्मी,

    ये पाषाण हृदय था कहाँ मिला।


    वर्षों पहले जब देखा था,

    तू चंचल, कल कल बहती थी।

    जोश भरी, मतवाली होकर,

    लाखों बातें कहती थी।


    ऐसा वेग प्रचंड था तेरा,

    कोई बाधा रोक न पाती थी।

    तेरी जिजीविषा के सम्मुख,

    पर्वत चोटी झुक जाती थी।


    निकट तेरे आकर तो मैं भी,

    जड़ से चेतन हो जाता था।

    तेरी लहरों के गुंजन से,

    पूरा अरण्य गुनगुनाता था।


    औचक हुआ दिशा परिवर्तन,

    तू बह चली किसी और नगर।

    कुछ दिन तो राह तकी थी मैंने,

    फिर पकड़ी एक नयी डगर।


    स्मृतियाँ थीं जो शेष रही,

    अलग अलग जो पाँव मुड़े ।

    चक्र समय का घूमा और,

    जीवन में नव अध्याय जुड़े।


    क्या हुआ इस अंतराल में,

    जो ऊष्मा हिय की लुप्त हुई।

    जीवन का पर्याय कभी थी,

    अब जीने की इच्छा सुप्त हुई।


    अब देख तेरा ये रूप मेरे

    टीस हृदय में उठती है।

    स्वच्छंद, सजीव, सतेज वो धारा,

    निर्जीव, निस्तेज यूँ घुटती है।


    एक समय मेरे शब्दों से,

    अंतर्मन था तेरा पिघलता।

    आज मेरी कविताओं से भी,

    मिलती नहीं मुझे सफलता।


    तूने ही तो दिया था मुझको,

    अनंत वेदना का उपहार।

    कहीं ये ज्वाला ही तो नहीं थी,

    तेरे अस्तित्व का मुख्य आधार।


    तेरी दी अग्नि को मैं अब भी,

    निज हृदय बसाये रखता हूँ।

    उसी पावक के साथ आज मैं,

    आलिंगनबद्ध तुझे करता हूँ।


    आज संतप्त हृदय अनल

    ये हिमशिला पिघलायेगी।

    या तेरे तुषार तमस तले,

    मेरी ज्योति बुझ जायेगी।

    ~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)

    4 min
  • कालिदास - बाबा नागार्जुन
    कालिदास! सच-सच बतलाना
    इन्दुमती के मृत्युशोक से
    अज रोया या तुम रोये थे?
    कालिदास! सच-सच बतलाना!
    शिवजी की तीसरी आँख से
    निकली हुई महाज्वाला में
    घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम
    कामदेव जब भस्म हो गया
    रति का क्रंदन सुन आँसू से
    तुमने ही तो दृग धोये थे
    कालिदास! सच-सच बतलाना
    रति रोयी या तुम रोये थे?
    वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका
    प्रथम दिवस आषाढ़ मास का
    देख गगन में श्याम घन-घटा
    विधुर यक्ष का मन जब उचटा
    खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर
    चित्रकूट से सुभग शिखर पर
    उस बेचारे ने भेजा था
    जिनके ही द्वारा संदेशा
    उन पुष्करावर्त मेघों का
    साथी बनकर उड़ने वाले
    कालिदास! सच-सच बतलाना
    पर पीड़ा से पूर-पूर हो
    थक-थककर औ' चूर-चूर हो
    अमल-धवल गिरि के शिखरों पर
    प्रियवर! तुम कब तक सोये थे?
    रोया यक्ष कि तुम रोये थे!
    कालिदास! सच-सच बतलाना!
    साभार - कवि नागार्जुन
    4 min
  • विवान और अवनि की प्रथम कविता

    आज मैं आपके सामने न तो कोई अपनी कविता लाया हूँ और न ही किसी प्रसिद्ध कवि की। पर ये कवितायेँ मुझे अति प्रिय हैं क्यूंकि ये कवितायें मेरी आँखों के दो तारों के पहली कवितायें हैं जो उन्होने कुछ दिन पहले लिखी और अपनी आवाज़ में रिकॉर्ड कीं।  

    आपका आशीर्वाद और प्रोत्साहन इन्हें और आगे बढ़ने की प्रेरणा देगा। 

    4 min
  • कविता मेरी विवशता है

    ।। कविता मेरी विवशता है ।।


    कविता मेरा शौक नहीं,

    कविता मेरी विवशता है।

    जीवन के दिये जो अवसर त्यागे

    उनका खेद खटकता है।

    कविता मेरी विवशता है।


    जीवन पथ तो चलता जाये,

    तरह तरह के मोड़ भी आये।

    कुछ राहें तो स्वयं चुनी थीं,

    कुछ रस्ते किस्मत से पाये।

    राहें जो यूँ ही छूट गयीं,

    उनका प्रतिबिम्ब झलकता है।

    कविता मेरी विवशता है।


    जीवन हमको सबक सिखाये,

    नित नूतन एक पाठ पढ़ाये।

    कुछ सीखों को मान गये हम,

    कुछ सीखों को जान ना पाये।

    जिन सीखों को भूल गये अब,

    उनका परिणाम पनपता है।

    कविता मेरी विवशता है।


    जीवन ने कई लोग मिलाये,

    कुछ अपने कुछ हुये पराये।

    कुछ लोगों ने हमें संभाला,

    कुछ ने बस रोड़े अटकाये।

    व्यक्ति जो यूँ ही चले गये,

    उनका अभाव अब खलता है।

    कविता मेरी विवशता है।


    जीवन ने कई गीत सुनाये,

    कुछ भावुक कुछ जोश जगाये।

    कुछ को तो बस सुना था हमने,

    कुछ गीत हमने भी गाये।

    गीत जो हमने सुने नहीं,

    उनका संगीत ही बजता है।

    कविता मेरी विवशता है।


    जीवन सुख दुःख दोनों लाये,

    कभी हँसाये कभी रुलाये।

    कभी हर्ष से नृत्य किया तो,

    कभी दर्द से आँसू आये।

    क्रंदन जो अंदर रोक लिया,

    उसका सैलाब उमड़ता है।

    कविता मेरी विवशता है।


    जीवन ने कई प्रश्न दिखाये,

    कुछ सुगम कुछ दुष्कर पाये।

    कुछ प्रश्नों में सिफर मिला तो,

    कुछ में अव्वल नंबर आये।

    प्रश्न जो यूँ ही छोड़ दिये,

    उनका जवाब अब दिखता है।

    कविता मेरी विवशता है।


    जीवन ने बहुत मंच सजाये,

    हमको भी कई पात्र सुझाये।

    कुछ नाटकों के नायक हम थे,

    कुछ में छोटा रोल निभाये।

    भूमिकायें जो हमने की ही नहीं,

    अब उनका अक्स उभरता है।

    कविता मेरी विवशता है।


    जीवन आगे बढ़ता जाये,

    नये नये सम्बन्ध दिखाये।

    कुछ रिश्ते तो पहले से थे,

    कुछ नाते थे स्वयं बनाये।

    रिश्ते जो यूँ ही टूट गये,

    अब उनका दर्द कसकता है।

    कविता मेरी विवशता है।


    काफी कुछ किसी कारण से,

    कभी मैं कह ना पाया।

    और हृदय की गागर में वो,

    भरता सब कुछ आया।

    भरने के पश्चात घट वही,

    छलक छलक छलकता है।

    कविता मेरी विवशता है।


    कविता मेरा शौक नहीं,

    कविता मेरी विवशता है।


    ~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)

    5 min
  • वो काश कुछ कहकर जाती

    वो काश कुछ कहकर जाती


    वो काश कुछ कहकर जाती

    जो मन में था होठों पर लाती

    वो काश कुछ कहकर जाती


    अंतर्मन में आशंका थी

    या कोई मजबूरी

    आखिर क्या हुआ उन दिनों

    जो बढ़ गयी इतनी दूरी

    जो भी था, जैसा भी था

    मुझको तो बतलाती

    वो काश कुछ कह कर जाती


    कहने को तो कई दिनों की

    थी अपनी पहचान

    फिर भी एक दूजे से हम थे

    काफी कुछ अनजान

    थोड़ा और साथ चलते तो

    समझ और हो आती

    वो काश कुछ कह कर जाती


    विस्मृत नहीं हुआ आज तक

    वो दिन जब लम्बी राह तकी

    आखिर क्या हुआ था जो वो

    कहके भी आ न सकी

    आने में संकोच अगर था

    चिट्ठी तो भिजवाती

    वो काश कुछ कह कर जाती


    अनुत्तरित प्रश्नों की चुभन

    दिल में है आज भी रहती

    अक्सर सोचा करता हूँ मैं

    उस दिन वो क्या कहती

    जरा देर की बात थी आखिर

    एक बार मिल जाती

    वो काश कुछ कह कर जाती

    वो काश कुछ कह कर जाती


    ~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)

    3 min

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