Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ)

Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ)

By Vivek AgarwalArtsPerforming Arts
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Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ) episodes

  • शिव स्तुति (Shiv Stuti)

    शिव स्तुति

    स्वभाव से हैं जो सरल, त्रिनेत्र में रखें अनल।

    जटाओं में भागीरथी, कण्ठ में धरें गरल॥

    सोम सज्ज भाल है, वज्र वक्ष विशाल है।

    जिनका नाम मात्र ही, काल का भी काल है॥

    दिव्य जिनका रूप है, सौभाग्य का स्वरूप है।

    कपूर कान्ति वर्ण पर, भस्म और भभूत है॥

    आसन व्याघ्र चर्म है, धर्म का जो मर्म है।

    जिनकी इच्छा मात्र से, घटित प्रत्येक कर्म है॥

    औघड़ आदिनाथ हैँ, भूत प्रेत साथ हैँ।

    क्या मनुज क्या पशु, वो तो विश्वनाथ हैँ॥

    ज्ञान की जो ज्योत हैँ, कला का भी स्त्रोत हैँ।

    जिनकी कृपा से देव, शक्ति से ओत प्रोत हैँ॥

    सूर्य में आलोक हैँ, वेदों में जो श्लोक हैँ।

    व्याप्त जो हर जीव में, जिनसे तीनों लोक हैँ॥

    ज्योति का स्तम्भ हैं, सृष्टि का प्रारम्भ हैं।

    अन्त का भी अन्त जो, आरम्भ का आरम्भ हैं॥

    अचल अटल अमर अखंड, रौद्र रूप है प्रचंड।

    भेद भाव छुआ नहीं, देवों को भी दें जो दंड॥

    जो देवों में विशेष हैं, करे नमन सुरेश हैं।

    स्वर्ग धरा पाताल में, एक वही अशेष हैं॥

    गूँजता है ये गगन, भक्त हैं सभी मगन।

    जो देवों के भी देव हैं, उन्हीं को है मेरा नमन॥


    श्रद्धा सहित

    विवेक अग्रवाल

    (मौलिक और स्वलिखित)

    4 min
  • मैं प्रलय हूँ (Main Pralay Hoon)

    मैं प्रलय हूँ

    मैं प्रलय हूँ।

    अरि-मस्तकों को काट काट;

    शोणित-सुशोभित उन्नत ललाट,

    सर्व व्याप्त विश्व रूप विराट।

    रणचण्डी का उन्मुक्त अट्टहास;

    रिपुह्रदय में कर भय का निवास,

    अग्नि उगले मेरी हर एक श्वास।

    करता सुनिश्चित निज जय हूँ,

    मैं प्रलय हूँ।

    अविरल मेरी गति निरंतर,

    पग थमे नहीं तूफानों से।

    मैं थका नहीं मैं डिगा नहीं,

    पथ में पड़ती चट्टानों से।

    मैं भगीरथ मैं ध्रुव;

    मैं अचल अटल निश्चय हूँ,

    मैं प्रलय हूँ।

    मिट गये मुझे मिटाने वाले,

    मैं विद्यमान यहाँ अनन्त काल से।

    मैं रुका नहीं मैं झुका नहीं,

    ना तिलक मिटा कभी मेरे भाल से।

    मैं विंध्य मैं नगपति;

    मैं सुदृढ़ सबलता परिचय हूँ,

    मैं प्रलय हूँ।

    मैं उद्गम लोहित नदियों का,

    मैं ही रक्त का महासागर।

    धर्म मार्ग पर हर त्याग गौण है,

    मैं करता यह सत्य उजागर।

    मैं ऋषि दधीचि मैं शिवि नरेश;

    मैं देता दान अभय हूँ,

    मैं प्रलय हूँ।

    राष्ट्र धर्म के पावन तप में,

    सहर्ष भस्म हो वो आहुति मैं।

    मातृभूमि के चिर वंदन में,

    श्रद्धा से समर्पित स्तुति मैं।

    संकट गहन तिमिर चीरता;

    निजअग्नि में प्रज्जवलित सूर्योदय हूँ,

    मैं प्रलय हूँ।

    मैं विस्तृत अवनि से अम्बर तक,

    अंतरिक्ष का मैं वक्ष चीरता।

    आरम्भ तू मेरा अंत भी तेरा।

    सब साक्ष्य बन देखें मेरी वीरता।

    मैं महाविनाश में निहित सृजन;

    मैं महाकाल मृत्यंजय हूँ,

    मैं प्रलय हूँ।


    स्वरचित और मौलिक

    विवेक अग्रवाल

    5 min
  • एहसास-ए-मोहब्बत (Ehsas-A-Mohabbat)

    एहसास-ए- मोहब्बत हर रोंया गुदगुदाता है।

    तन्हाई में भी मुस्कान के मोती सजाता है।

    चंद तारीखों में न सीमित कर मोहब्बत को।

    ये जज़्बा हर लम्हे में पैबस्त हुआ जाता है।

    इश्क़ फैले तो पूरी कायनात में न समाये।

    और चाहे तो छोटे से दिल में सिमट आता है।

    जिसने की; करामात-ए-मोहब्बत वही जाने।

    की कैसे ये एक साथ हँसाता और रुलाता है।

    न रहे बाकी कोई और ख्वाहिश इस दिल में।

    दौलत-ए-इश्क़ हो तो न कुछ और लुभाता है।

    महक उठता है चमन खिल उठती हैं फ़िज़ायें।

    महबूब हो साथ तो समाँ संग संग गुनगुनाता है।

    दुआ करो की कभी कोई आशिक न बिछड़े।

    जुदाई का सिर्फ ख्याल ही कितना तड़पाता है।

    कामयाब हो या न हो तू एक बार करके देख।

    मोहब्बत का तजुर्बा भी बहुत कुछ सिखाता है।

    पाकीज़ा है वो दिल जिसमें मोहब्बत होती है।

    यूँ ही नहीं इश्क़ खुदा का साया कहलाता है।


    स्वरचित और मौलिक

    विवेक अग्रवाल

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    5 min
  • ग़ज़ल - इतनी मेरी कहानी (Ghazal - Itni Meri Kahani)

    नखरे तिरे उठाये, तिरि बात हम ने मानी।

    तिरा इंतज़ार करते, मिरि खो गयी जवानी।


    तुम दूर हम से हो तो, कमतर है जिंदगानी।

    दिन भी नहीं है अच्छा, न ही रात है सुहानी।


    तुम आज हो ये कहते, कहीं और दिल लगा लूँ।

    अब यूँ किसे मैं चाहूँ, न तिरा बना है सानी।


    अहसान कर दे इतना, कि न याद हम को करना।

    यदि कोइ रह गयी है, मिरि फेंक दे निशानी।


    शुरुआत भी तुझी से, अनजाम तुम हो मेरा।

    कुछ और ना है शामिल, इतनी मेरी कहानी।


    ~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)

    स्वरचित व मौलिक

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    8 min
  • अपना बीता साल (Apna Beeta Saal)

    अपना बीता साल

    क्या बतायें कैसा गुजरा,

    अपना बीता साल।

    हर्ष के लमहे भी देखे,

    और देखा दुःख का काल।

    क्या बतायें कैसा गुजरा,

    अपना बीता साल।

    आरम्भ था वो साल का,

    कहूँ क्या अपने हाल का।

    निष्क्रिय निर्जीव था,

    न होश समय की चाल का।

    एक गीत बन के आयी थी,

    उमंग साथ लायी थी।

    मुझे सोते से जगा दिया,

    दिल पे वो ही छायी थी।

    सच कहें तो यूँ लगा,

    आया कोई भूचाल।

    क्या बतायें कैसा गुजरा,

    अपना बीता साल।

    दीप में ज्यूँ घृत पड़ा,

    उठ के मैं हुआ खड़ा।

    हार मान चुका था जो,

    वो शक्ति से पूरी लड़ा।

    भावों को एकत्र किया,

    शब्दों में पिरो लिया।

    घिसट रहा था पहले जो,

    अब वही जीवन जिया।

    बस यही समझ लो,

    कि हो गया कमाल,

    क्या बतायें कैसा गुजरा,

    अपना बीता साल।

    पुष्प कहीं खिलने लगे,

    हिंडोले से हिलने लगे।

    मुस्कान लौट आयी थी,

    मित्र नये मिलने लगे।

    नयनों में नूतन स्वप्न सजे,

    कानों में नये राग बजे।

    हर्ष का सूर्य निकल आया,

    विषाद की छाया तजे।

    लगा जोर का धक्का और,

    बदली समय की चाल।

    क्या बतायें कैसा गुजरा,

    अपना बीता साल।

    पर बात कुछ जमी नहीं,

    ख़ुशी की बेला थमी नहीं।

    ना जाने किसकी लगी नज़र,

    जलने वालों की कमी नहीं।

    हमें अकेला छोड़ के,

    दिल हमारा तोड़ के।

    बस यूँ ही वो चली गयी,

    क़दमों को अपने मोड़ के।

    साथ सब चला गया,

    बस रह गए सवाल।

    क्या बतायें कैसा गुजरा,

    अपना बीता साल।

    आज तक इस बात का,

    दिल में है मलाल।

    क्या बतायें कैसा गुजरा,

    अपना बीता साल।

    नभ की ऊँचाई देखी,

    फिर देखा पाताल।

    बहुत कुछ दिखा गया,

    अपना बीता साल।

    क्या बतायें कैसा गुजरा,

    अपना बीता साल।


    स्वरचित और मौलिक

    विवेक अग्रवाल

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    5 min
  • हिन्द की सेना (Indian Army)

    हिमालय की बर्फीली ऊँचाइयों से, हिन्द महासागर की अथाह गहराइयों तक।

    पूर्वोत्तर के प्रचंड झंझावतों व सघन वर्षा वनों से, थार की गर्म शुष्क हवाओं तक।

    हिंदुस्तान के कोने कोने में आलोकित है, इनके स्वेद और शोणित की चमक।

    और अनंत काल तक गूँजेगी, सेना-ए-हिन्द की जोशीली ललकारो की खनक।


    माँ भारती की सीमा-औ-सम्मान-सुरक्षा पर, ये सदैव शीश अर्पण को तत्पर।

    कभी मुड़े ना कभी रुके ना कभी डरे ना, जब जब आया बलिदान का अवसर।

    आशंकित हृदय से करते हैं प्रतीक्षा, इनके घर पर भी इनके प्यारे परिजन। 

    पर विशाल वज्र वक्ष विस्तृत है इतना की, हर भारतवासी है इनका स्वजन। 


    पर क्यों कर इनके बलिदान के किस्से, हम याद करते हैं बस एक दो दिन।

    देश प्रेम एक निरंतर बहती नदिया है, यदि ये भूले तो आजादी जायेगी छिन।

    मेरी प्रार्थना पर गौर करो मेरे देशवासियों, अगर चाहते हो सच्ची श्रद्धांजलि देना।

    तो निज कर्तव्य की करो पूर्ति निष्ठा से यूँ, कि नाज हम पे करे ये हिन्द की सेना। 


    ~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)

    स्वरचित व मौलिक

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    4 min
  • बातें दिल की (Baaten Dil Ki)

    एक ग़ज़ल लिखी है चन्दा पे,

    छत पर आके पढ़ लेना।

    है तेरी याद में गाया नगमा,

    जब हवा बहे तो सुन लेना।


    अपने सागर में उगते सूरज को,

    नयन घटों से अर्घ्‍य दिया है।

    तेरे सागर में जब सूरज डूबे,

    अश्कों के मोती चुन लेना।


    जितनी भी हैं मेरी यादें,

    दो हिस्सों में कर लेना।

    बुरी लगें जो उन्हें भुलाकर,

    ठीक लगें वो रख लेना।


    जो दुनिया वाले पूछें तुझसे,

    किसने की थी बेवफ़ायी।

    तुमको है ये कसम हमारी,

    नाम मेरा तुम कह लेना।


    अपने जीवन से रंग चुराकर,

    इंद्रधनुष ये खींच दिया है।

    लेकर धागे आसमान से,

    ख्वाब नये तुम बुन लेना।


    नये साल की ये अभिलाषा,

    एक आखरी सौदा हो जाये।

    अपने सारे ग़म मुझे देकर,

    खुशियाँ मेरी तुम ले लेना।


    स्वरचित और मौलिक

    विवेक अग्रवाल

    5 min
  • जन जन को जगाते हैं
    चलो इस जनवरी जन जन को जगाते हैं।
    बैर और नफरत की दीवार को,
    मिलकर मिटटी में मिलाते हैं।
    चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं।
    व्यर्थ का यह वाद विवाद,
    इसका प्रत्युत्तर उसका प्रतिवाद,
    पूर्वाग्रहों को मन से हटा,
    सब लोग करें सार्थक संवाद।
    तुम अपनी कहो, हम अपनी सुनाते हैं।
    चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं।
    व्यक्ति को है जब गुस्सा आता।
    विवेक कहीं है तब खो जाता।
    अपशब्द अनर्गल प्रलाप करे वो,
    मगर बाद में वो है पछताता।
    क्रोध में कहा सुना, साथ मिलकर भुलाते हैं।
    चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं।
    चाहे दिन हो या हो रातें,
    सुनने में आतीं कड़वी बातें,
    क्या करना कटुता से हमको,
    गिनती की जब हैं मुलाकातें।
    क्यूँ ना वाणी में गुड़ की, मिठास मिलाते हैं।
    चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं।
    वही चैन की नींद है सोता,
    जो मोती रिश्तों के पिरोता,
    तर्क जीतना बहुत सरल है,
    दिल जीतना मुश्किल होता।
    अपने आहत मित्रों को प्रेम से मनाते हैं।
    चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं।
    प्रभु सत्य मार्ग हमको दिखलाना,
    सबक सही सबको सिखलाना,
    याद रहे कभी भूल न पायें,
    बात खरी मन में लिखलाना।
    आँखों पर चढ़ा, शक़ का चश्मा हटाते हैं।
    चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं।
    आसान बहुत है मार्ग बताना,
    कठिन मगर स्वयं चल पाना,
    जैसा चाहो व्यवहार सभी से,
    वैसे पहले खुद करके जाना।
    दूसरों से पहले, आज स्वयं को समझाते हैं।
    चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं।
    हो बलवान या हो कमजोर,
    नरम हृदय हों न बनें कठोर,
    टूटी नहीं पर उलझ गयी है,
    सबको जोड़े जो नेह की डोर।
    दिल के उलझे धागों को फिर से सुलझाते हैं।
    चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं।
    भारत देश है गौरव अपना,
    क्यूँ न हो ये सबका सपना,
    भूख रहे न रोग रहे यहाँ,
    किसी को कभी न पड़े तड़पना।
    मिल कर संवेदना का, मरहम लगाते हैं।
    चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं।
    इस भूमि का इतिहास महान,
    राम कृष्ण का कर ले ध्यान,
    वीरों के शोणित से सिंचित है,
    मातृभूमि पर हो हमको अभिमान।
    गौरवपूर्ण गाथाओं को, पुनः याद दिलाते हैं।
    चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं।
    ये जीवन है बस एक बसेरा,
    सब उसका न तेरा न मेरा,
    सोचने वाली बात है आखिर,
    छोड़ रोशनी क्यों चुने अँधेरा।
    स्नेहघृत व विश्वास-बाती से, सत्य-दीप जलाते हैं।
    चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं।
    है शाश्वत सत्य सनातन धर्म,
    आज समझ लो इसका मर्म,
    अपनी पीड़ा तो सबको दुःख देती,
    पर पीड़ा हरना ही सर्वोत्तम कर्म।
    गीता हो या ग्रन्थ गुरु का, सब यही बतलाते हैं।
    चलो इस जनवरी, जन जन को जगाते हैं।
    स्वरचित और मौलिक
    विवेक अग्रवाल
    6 min
  • मेरी तन्हाई (Meri Tanhai)

    मेरी तन्हाई वाकिफ है मेरे हर एक राज से।

    आखिर मेरी सबसे वफादार हमराह है ये।


    खुशियों की बज़्म में भले ही न हो शामिल।

    गम में बहे हर एक अश्क की गवाह है ये।


    छोड़ देती है मेरा साथ जब तू पास होती है।

    पर जुदाई में गुलशुदा दिल की पनाह है ये।


    हमसफ़र बदल लेते हैं अपनी राहें अक्सर।

    जब और रास्ते बंद हों तो अकेली राह है ये।


    अफ़सुर्दा दिल जब महव-ए-यास रहता है।

    तस्सवुर में तेरे तबस्सुम से भरी चाह है ये।


    लोग साथ छोड़ देते हैं यूँ छोटी सी बात पर।

    नाशाद जीस्त को सुकूँ देती आरामगाह है ये।


    नाकाम इश्क़ पे दुनिया अक्सर हँसा करती है।

    आशिक के ग़मों से इख़लास रखती आह है ये।


    दिल तोड़ने से बड़ा गुनाह तो कुछ और नहीं।

    गुनहगारों की दुनिया में अकेली बेगुनाह है ये।


    मेरी तन्हाई के अल्ताफ़ का हिसाब ही नहीं।

    असली इश्क़ करती बे-ग़रज़ बे-पनाह है ये।


    ~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)

    स्वरचित व मौलिक

    5 min
  • परोपकार (Paropkar)

    क्या वृक्षों को तुमने देखा है,

    निज फलों का स्वयं संचय करते।

    वाटिका में पल्लवित पुष्प भला,

    क्या मात्र अपने लिये महकते।


    जनकल्याण को आतुर अम्बुद,

    क्यों अपना अस्तित्व मिटाता।

    सूर्य देव के सप्त अश्वों को,

    दिन भर क्यों कर अरुण चलाता।


    नभ में टिमटिमा के ध्रुव तारा,

    पथिकों को है दिशा दिखाता।

    अपने कद को काँटछाँट कर,

    चन्दा है सबको तिथि बताता।


    आखिर अपना क्या प्रयोजन,

    जो अवनि भोजन सबको देती।

    जग में श्वासों का संचार करके,

    वायु क्या प्रतिदान है लेती।


    स्व-सदन त्याग निकल पड़ी,

    सोचो ये सरिता किसके लिये।

    स्वयं जल कर भी प्रकाश बाँटते,

    किसको ये छोटे से दिये।


    उर-पीड़ा निर्मित मोती से,

    सीपी कब करती निज श्रृंगार।

    बहुमूल्य रत्नों पर रत्नगर्भा ने,

    कब माँगा कोई अधिकार।


    कुहुकिनी के कंठ की कूकेँ,

    किसको अपने गीत सुनाती।

    निश दिन श्रम कर मधुमक्षिका,

    मधु किसके लिये बनाती।


    निज प्राण सहर्ष त्याग दधीचि ने,

    अस्थि वज्र प्रदान किया।

    शरणागत धर्म निभाने शिवि ने,

    शरीर श्येन को दान दिया।


    समुद्र-मंथन से निकले विष को,

    क्यों महादेव ने पी डाला।

    सात दिनों तक कनिष्ठा पर,

    क्यों गोवर्धन उठाये गोपाला।


    परोपकार के कार्य हैं ये सारे,

    किसी का किंचित स्वार्थ नहीं।

    वो जीवन भी कोई जीवन है,

    जिसमें तनिक भी परमार्थ नहीं।


    प्रकृति हमको नित्य दिखलाती,

    बिना स्वार्थ के करो कर्म।

    महापुरुष भी यही सिखाते,

    परोपकार ही है सर्वोत्तम धर्म।


    ~ विवेक (सर्व अधिकार सुरक्षित)

    स्वरचित व मौलिक

    4 min

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