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घरों के साथ जीवन भी सजाते हैं दिवाली पर।
नयी उम्मीद के दीपक जलाते हैं दिवाली पर।
चमकते हैं ये घर आँगन ज़रा झाड़ू लगा अंदर,
ये जाले बदगुमानी के हटाते हैं दिवाली पर।
जुबां मीठी बने सबकी न कड़वे बोल हम बोलें,
बना ऐसी मिठाई इक खिलाते हैं दिवाली पर।
प्रकाशित मन करे ऐसा जलाओ दीप हर घर में,
दिलों से आज अँधियारा मिटाते हैं दिवाली पर।
लबों पर मुस्कुराहट ला भुला दे सब ग़मों को जो,
चलो सब फुलझड़ी ऐसी चलाते हैं दिवाली पर।
ख़ुशी-ग़म धूप छाया हैं कभी हँसना कभी रोना,
मायूसी छोड़ गाते-गुनगुनाते हैं दिवाली पर।
हमें इक जिंदगी मिलती मोहब्बत में ये कट जाए,
गिले-शिकवे सभी अपने भुलाते हैं दिवाली पर।
न जाने कब यहाँ जीवन की अपनी शाम हो जाए,
सभी मतभेद तज मिलते-मिलाते हैं दिवाली पर।
बड़ी मुश्किल से मिलते हैं यहाँ पर यार कुछ सच्चे,
जो अपने रूठ कर बिछड़े मनाते हैं दिवाली पर।
नहीं सोना नहीं चांदी नहीं हीरा नहीं मोती,
गरीबों की दुआ थोड़ी कमाते हैं दिवाली पर।
बड़े छोटे बहुत रिश्ते हमारी ज़िन्दगी में हैं,
चलो इंसानियत को भी निभाते हैं दिवाली पर।
ज़रा सोचो यहाँ दुनिया में सब खुश हों तो कैसा हो,
किसी की ज़िन्दगी से ग़म चुराते हैं दिवाली पर।
ये जीवन एक उत्सव है बड़ी किस्मत से मिलता है,
खुदा का क़र्ज़ थोड़ा तो चुकाते हैं दिवाली पर।
- विवेक अग्रवाल 'अवि'
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ग़ज़ल - इश्क़ भी तुम ने किया बस यूँ ही आते जाते
इश्क़ भी तुम ने किया बस यूँ ही आते जाते।
दर्द कितना है दिया हम को यूँ जाते जाते।
दोस्ती ख़ूब निभाई थी बड़े दिन हमसे,
फ़र्ज़ दुश्मन का भी बनता है निभाते जाते।
मेरे बस में तो नहीं है कि जला दूँ इनको,
ख़त जो तुमने थे लिखे उन को जलाते जाते।
मुस्कुराहट है लबों पर जो सजाई झूठी,
रोक कर हैं जो रखे अश्क़ बहाते जाते।
कैसे काटेंगे सफ़र ज़िंदगी का बिन तेरे,
आख़िरी वस्ल की यादें तो सजाते जाते।
शायर - विवेक अग्रवाल 'अवि'
सुर और संगीत - रानू जैन
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Instagram - hindipoemsby_vivek
बड़ी पुरानी है ये कहानी, मेरी मुहब्बत नयी नहीं है।
जो फाँस बन के गड़ी हुयी है, जिगर में हसरत नयी नहीं है।
कभी लिखे थे दिलों पे अपने, जो नाम इक दूसरे के हमने,
नहीं धुलेंगे वो आंसुओं से, छपी इबारत नयी नहीं है।
न तू ये जाने जगह जो मैंने, तेरे लिये थी कभी बनायी,
सजा के दिल में तुझे है पूजा, मेरी इबादत नयी नहीं है।
दवा नहीं मिल रही है इसकी, बुख़ार हमको जो हो गया है,
है आग सीने में इक पुरानी, मेरी हरारत नयी नहीं है।
जो बात उसको बता न पाये, सुना रहे हैं यहाँ सभी को,
ग़ज़ल लिखी आज फिर से 'अवि' ने, खुदा की रहमत नयी नहीं है।
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Vocal - Dr. SC Rastogi
Music & Harmonium - Mrs. Sadhna Rastogi
Tabla - Amol
Lyrics - Vivek Agarwal 'Avi'
You can reach us at [email protected]
कभी कभी जीवन से निराश हो चुके व्यक्ति आत्महत्या तक के बारे में सोचने लगते हैं जबकि यह किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। अभी कुछ दिनों पहले विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस के अवसर पर मैंने एक ग़ज़ल के माध्यम से ऐसे व्यक्तियों को नकारात्मक सोच से निकल सकारात्मकता की ओर जाने का सन्देश देने का प्रयास किया गया है।
साथ ही यह भी चेष्टा रही है कि शुद्ध हिंदी के शब्दों का प्रयोग कर एक सम्पूर्ण ग़ज़ल लिखी जाए जिस से हिंदी कवि भी इस विधा की ओर आकर्षित हों। आशा करता हूँ की श्रोताओं को पसंद आएगी
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अजेय सैनिकों चलो, लिये तिरंग हाथ में।
समक्ष शत्रु क्या टिके, समस्त हिन्द साथ में॥
ललाट गर्व से उठा, स्वदेश भक्ति साथ है।
अशीष मात का मिला, असीम शक्ति हाथ है॥
चले चलो बढ़े चलो, कि देश है पुकारता।
सवाल आज आन का, कि आस से निहारता॥
सदैव शौर्य जीतता, कि शक्ति ही महान है।
कि वीर की वसुंधरा, यही सदा विधान है॥
चढ़ा लहू कटार से, यहाँ उतार आरती।
भले तू खंड-खंड हो, रहे अखंड भारती॥
महान मातृभूमि का, चुका सकें न ऋण कभी।
यहीं जियें यहीं मरें, सपूत मात के सभी॥
खड़े रहें डटे रहें, थकान भूख प्यास में।
स्वदेश प्रेम आपकी, बसा प्रत्येक श्वास में॥
हिमाद्रि मार्ग में खड़ा, उतंग तुंग तोड़ दो।
प्रवाहिनी जहाँ दिखे, नदी प्रवाह मोड़ दो॥
असंख्य शत्रु सामने, गिरे न स्वेद भाल से।
स्वदेश के लिए लड़ो, महा कराल काल से॥
अतीव कष्ट भी मिले, न शीश ये कभी झुके।
न लोभ मोह में फँसे, जवान ये नहीं रुके॥
अदम्य साहसी सभी, नहीं करें अधीरता।
न अस्त्र से न शस्त्र से, जयी सदैव वीरता॥
अनन्य देश प्रेम है, सदैव वो रहे डटे।
समस्त विश्व साक्ष्य है, न युद्ध से कभी हटे॥
अराति हिन्द पे चढ़ा, प्रचंड वार के लिए।
भुजा सशक्त है दिखा, उठा प्रहार के लिए॥
अक्षम्य कृत्य दुष्ट का, इसे क्षमा नहीं करो।
कि काट शीश शत्रु के, समुद्र रक्त से भरो॥
अजेय शूर वीर तू, उठा धनुष कृपाण को।
कि भेद लक्ष्य व्योम में, चला अचूक बाण को॥
समाप्त शत्रु आज हो, समस्त दम्भ को हरो।
उठा सके न शीश फिर, समूल नाश तुम करो॥
न मौत अंत वीर का, कथा समस्त जग कहे।
समान सूर्य चंद्र के, सदैव विश्व में रहे॥
न तू न मैं न ये बड़ा, बड़ा स्वदेश है सदा।
सदैव स्वाभिमान हो, स्वतंत्र राष्ट्र सर्वदा॥
प्रयाण गीत गा रहे, स्वदेश भक्ति काम है।
जवान को प्रणाम है, प्रणाम है प्रणाम है॥
स्वरचित - विवेक अग्रवाल 'अवि'
(भारतीय सेना और श्री जय शंकर प्रसाद जी को समर्पित)
हरिगीतिका छंद (२८ मात्रिक १६,१२ पर यति)
प्रथम सर्ग - श्रीकृष्ण बाल कथा
श्रीकृष्ण की सुन लो कथा तुम, आज पूरे ध्यान से।
भवसागरों से मुक्ति देती, यह कथा सम्मान से॥
झंझावतों की रात थी जब, आगमन जग में हुआ।
प्रारब्ध में जो था लिखा तय, कंस का जाना हुआ॥
गोकुल मुझे तुम ले चलो अब, हो प्रकट बोले हरी।
माया वहाँ मेरी है जन्मी, तेज से है वो भरी॥
ज्यूँ कृष्ण का आना हुआ त्यूँ, बेड़ियाँ सब खुल गयीं।
ताले लगे थे द्वार पर जो, चाभियाँ खुद लग गयीं॥
प्रहरी थे कारागार के सब, नींद में सोये हुये।
जैसे किसी माया में पड़ कर, स्वप्न में खोये हुये॥
इक टोकरी में डाल बाबा, नन्द घर को चल पड़े।
वर्षा प्रबल यूँ हो रही थी, तात चिंता में बड़े॥
कैसे करें हम पार नदिया, बाढ़ इसमें आ गयी।
जब छू लिये चरणन तिहारे, शांति यमुना पा गयी॥
फन वासुकी छतरी बना कर, वृष्टि से रक्षा किये।
उस पार बाबा आ गये तब, टोकरी सर पर लिये॥
अपने लला को साथ ले कर, नन्द बाबा से मिले।
पूरी कथा उनको सुना कर, आस की किरणें खिले॥
बाबा कहे जो भाग्य में है, अब वही होगा घटित।
है ले लिया अवतार प्रभु ने, देवताओं के सहित॥
थीं नन्द के घर माँ यशोदा, योगमाया साथ में।
दोनों खुशी से सो रही थीं, हाथ डाले हाथ में॥
वसुदेव ने सौंपा हरी को, योगमाया साथ ले।
लाला निहारे तात को जब, छोड़ कर बाबा चले॥
फिर कंस कारागार आया, योगमाया छीन ली।
पर दिव्य देवी मुस्कुराती, खिलखिलाती उड़ चली॥
बोली कि तेरा काल दुष्टे, आ गया है अब निकट।
जल्दी हरी आकर हरेंगे, विश्व के संकट विकट॥
माँ देवकी वसुदेव बाबा, जेल में ही रह गये।
पर आपके सम्बल सहारे, कष्ट सारे सह गये॥
बचपन बिताया माँ यशोदा, संग क्रीड़ा कर कई।
गोकुल निवासी धन्य होते, देख लीला नित नई॥
यूँ बालपन में ही किया था, दानवों का सामना।
संहार कर फिर कंस का की, पूर्ण सबकी कामना॥
विष-सर्प से दूषित भयी जब, जल किसी ने न पिया।
यमुना नदी में कूद कर तब, कालिया मर्दन किया॥
गिरिराज को अंगुल उठाकर, सात दिन धारण किया।
अभिमान सारा इन्द्र का यूँ, एक पल में हर लिया॥
सम्मान नारी का करें सब, सीख सबने ये लिया।
गीता सुनाकर पार्थ का भी, मार्गदर्शन कर दिया॥
अवतार ले जग को सुधारा, कम हुआ जब धर्म है।
है आपने ही ये सिखाया, श्रेष्ठ सबसे कर्म है॥
(इति-प्रथम सर्ग)
श्रद्धा सहित
विवेक अग्रवाल
(मौलिक और स्वलिखित)
लुटाते जान सैनिक ही हमारी जान थोड़े है।
बचाते अजनबी को भी कोई पहचान थोड़े है।
नहीं अहसान मानो तो समझ इक बार हम जायें,
मगर मारो जो तुम पत्थर वहाँ ईमान थोड़े है।
ख़िलाफ-ए-'मुल्क साजिश कर जो दुश्मन की ज़बाँ बोले,
नहीं फ़ख़्र-ए-वतन उसका ये हिंदुस्तान थोड़े है।
कहे भारत के टुकड़े जो वो अपना हो नहीं सकता,
पढ़ा है तीस सालों तक अभी नादान थोड़े है।
चलो मिल कर बनाते हैं वतन खुशहाल ये अपना,
सभी का घर यहाँ पर है कोई मेहमान थोड़े है।
बढे ताकत बने अव्वल हमारा मुल्क दुनिया में,
सभी की है यही मंजिल फ़क़त अरमान थोड़े है।
Lyrics - Vivek Agarwal
Music & Singer - Ranu Jain
बचपन से खूब सुनी हैं, दादी नानी से कहानी।
जादुई परियों के किस्से, और सुन्दर राजा रानी।
कथा मैं उनकी सुनाता, जो देश के हैं बलिदानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
आज़ाद हवा में साँसे, खुल कर हम सब ले पाये।
क्यूँकि कुछ लोग थे ऐसे, जो अपनी जान लुटाये।
उन सब की बात करूँ मैं, नहीं जिनका बना है सानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
सन सत्तावन में देखी, आज़ादी की पहली लड़ाई।
सबसे आगे जो निकली, नाम था लक्ष्मीबाई।
नारी नहीं थी अबला, वो थी झांसी की रानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
संख्या में बहुत बड़ी पर, गोरों की पलटन भागी।
नेताजी की सेना ने, गोली पर गोली दागी।
आज़ाद हिन्द सेना से, बुनियाद हिली बिरतानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
आज़ाद लड़े आखिर तक, जब दिशा घिर गयीं सारी।
जब अंतिम गोली बची तब, खुद के मस्तक में मारी।
प्रयागराज में अब भी, उनकी है सजी निशानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
लाला लाजपत जी ने, लाठी खायी थी सर पर।
माटी का जो कर्ज़ा था, सारा वो चुकाया मर कर।
सबसे आगे वो खड़े थे, सुन लो मेरी बयानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
वीर भगत बचपन से, आज़ादी के दीवाने।
फाँसी का फंदा चूमा, गये हँसते मस्ताने।
सोचो उनके बारे में, तो होती है हैरानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
जलियाँ बाग़ में कितने, लोगों ने गोली खायी।
जब लाखों घर उजड़े तब, हमने आज़ादी पायी।
कभी न पड़ने पाये, उनकी ये याद पुरानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
सावरकर के लेखों से, अंग्रेज़ थे इतना डरते।
बात बात पर उनको, गिरफ्तार वो करते।
जब रुका नहीं मतवाला, भेजा फिर काले पानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
कोमाराम ने कहा था, जल जंगल जमीं हमारा।
कितनों को उसने जगाया, देकर जोशीला नारा।
लड़ते लड़ते जां तज दी, फिर उसने भरी जवानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
गांधी नेहरू तो सुने हैं, पर खुदीराम को भूले।
ऐसे कितने ही बहादुर, यौवन में फाँसी झूले।
अंग्रेज़ों को है भगाना, ये दिल में सबने थी ठानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
ये दिन है बड़ा मुक़द्दस, चलो मिल कर गीत ये गाएँ।
भूले बिसरे वीरों को, श्रद्धा से सीस नवाएँ।
है 'अवि' की कामना छोटी, सबको ये कथा सुनानी।
ना उनको आज भुलाओ, ज़रा याद करो कुर्बानी।
स्वरचित
विवेक अग्रवाल 'अवि'
(आदरणीय कवि प्रदीप जी और लता जी की प्रेरणा से लिखी यह कविता लाखों अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धा सुमन अर्पित करने का एक प्रयास है)
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हर वक़्त यूँ तड़पा के सताया न करो तुम।
दिन भर तो मुझे नींद नहीं होती मयस्सर,
आ ख्वाब में हर रात जगाया न करो तुम।
इक वक़्त था मुस्कान हमेशा थी लबों पर,
वो वक़्त मुझे याद दिलाया न करो तुम।
लगता है तेरे दिल में कहीं कुछ तो बचा है,
जो भी है दिल में वो छुपाया न करो तुम।
इस वक़्त से बढ़कर है नहीं कुछ भी यहाँ पर,
बेकार की बातों में गँवाया न करो तुम।
माना कि तेरे दिल में नहीं इश्क़ मेरा अब,
अपना जो कभी था वो पराया न करो तुम।
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लेखन - विवेक अग्रवाल 'अवि'
संगीत और सुर - रानू जैन
शारदा स्तुति
हरिगीतिका छंद (२८ मात्रिक १६,१२ पर यति)
है हंस पर आरूढ़ माता, श्वेत वस्त्रों में सजी।
वीणा रखी है कर तिहारे, दिव्य सी सरगम बजी॥
मस्तक मुकुट चमके सुशोभित, हार पुष्पों से बना।
फल फ़ूल अर्पण है चरण में, हम करें आराधना॥
संगीत का आधार हो माँ, हर कला का श्रोत हो।
जग में प्रकाशित हो रही जो, वेद की वह ज्योत हो॥
वरदायिनी पद्मासिनि माँ, अब यही अभियान हो।
हम सब चलें सत्मार्ग पर अब, ना हमें अभिमान हो॥
माँ शारदे ये वर हमें दे, बुद्धि का विस्तार हो।
अपनी इसी पावन धरा पे, धर्म का संचार हो॥
श्रद्धा सहित
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सुर - डॉ सुभाष चंद्र रस्तोगी
लेखन - विवेक
संगीत - अमोल
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