Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ)

Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ)

By Vivek AgarwalArtsPerforming Arts
Download on the App Store

Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ) episodes

  • परिवार का चूल्हा (Pariwar Ka Chulha)
    परिवार का चूल्हा
    परिवार का चूल्हा,
    मात्र प्रेम की अग्नि से नहीं चलता,
    ईंधन भी माँगता है।
    कर्तव्य की लकड़ियाँ आवश्यक हैं,
    चूल्हे के जलते रहने के लिए।
    कभी कभी त्याग का घी-तेल,
    भी डालना होता है,
    और व्यवहारिकता की फुँकनी से,
    समझौते की हवा भी फूँकनी होती है।
    असुविधाओं का धुँआ सहन करते हुए।
    Full poem is available for listening
    Write to me at [email protected]
    5 min
  • ब्रह्म-ज्ञान (Brahm-Gyaan)

    इस कविता में आत्मा के अजर अमर स्वरुप का वर्णन कर उसका अंतिम लक्ष्य ब्रह्म प्राप्ति बता कर उसके तीन अलग अलग मार्गों की परिचर्चा की गयी है। यही जीवन का सबसे बड़ा रहस्य है और यही सबसे बड़ा ज्ञान है। इसीलिए इसे ब्रह्मज्ञान भी कहा गया है


    आओ चलो एक गहरा राज तुम सबको बतलाता हूँ।

    जीवन का ये सत्य शाश्वत आज तुम्हें समझाता हूँ।

    पञ्च तत्व से बनी ये काया तन अपना ये नश्वर है।

    तो क्यूँ इससे मोह करें जब क्षणभंगुर ये नाता है।

    Full Poem in Audio Format ....


    Write to me at [email protected]


    7 min
  • समर्पण (Samarpann)

    मुझे मोक्ष मत देना मोहन,

    मत करना मुक्ति मार्ग प्रशस्त।

    संध्या की जब बेला आये,

    और हो जीवन का सूर्य अस्त॥

    नहीं कामना वैकुण्ठ की मुझको,

    न चाहूँ इंद्र का सिंहासन।

    सम्पूर्ण सृष्टि में नहीं बना कुछ,

    मेरी भारत भूमि सा पावन॥

    श्वेत किरीट शोभित मस्तक पर,

    करे पयोधि पद-प्रक्षालन।

    सप्तसिंधु से सिंचित ये भूमि,

    सर्वोच्च सदा से रही सनातन॥

    इस पुण्य भूमि में क्रीड़ा करने,

    ईश्वर स्वयं मनुज बन आते।

    सौभाग्य यहाँ आने का पाकर,

    यक्ष देव किन्नर इठलाते॥

    बार बार लूँ जन्म यहीं पर,

    बार बार यहीं मर-मिट जाऊँ।

    समिधा बन इस पवित्र यज्ञ में,

    हर जीवन सार्थक कर पाऊँ॥

    मुझे लोभ नहीं मुझे मोह नहीं,

    ये भक्ति और समर्पण है।

    मातृभूमि के पावन चरणों में,

    अपना सब कुछ अर्पण है॥

    स्वरचित

    विवेक अग्रवाल 'अवि'

    3 min
  • मेरे अल्फ़ाज़ और मित्रों की आवाज़ (My words & Friends' voice)

    आज की इस विशेष प्रस्तुति में मेरी कविताओं को आवाज़ दी है मेरे दो अज़ीज़ साथियों नरेश कुमार नरूला जी और वाचस्पति पांडेय जी ने।

    कवितायेँ हैं

    १ - मृगतृष्णा

    २ - मैं प्रलय हूँ 

    --------------------

    You can write to me on [email protected]

    6 min
  • ग़ज़ल - वो जो ज़िन्दगी थी मेरी कभी (Ghazal - Wo Jo Zindagi Thi Meri Kabhi)

    वो जो ज़िन्दगी थी मेरी कभी; वो जो पहला पहला ख़ुमार था।

    मुझे ज़िन्दगी में नहीं मिला; मेरी ज़िन्दगी का जो प्यार था।

    ये जो अश्क़ अपने ही पी रहा; ये जो क़िस्त क़िस्त में जी रहा,

    मैं चुका रहा हूँ वो आज भी; जो तेरा पुराना उधार था।

    मेरी ज़िन्दगी का उसूल है; जो तुझे ख़ुशी दे क़ुबूल है,

    क्यूँ शिकायतें मेरे दिल में हों; न कभी भी कोई क़रार था।

    जो नसीब में है लिखा नहीं; मुझे ख्वाब कोई दिखा नहीं,

    मैं अभी भी चैन से जी रहा; मैं तभी भी शुक्र-गुज़ार था।

    मेरी ज़ीस्त में जो ख़ुशी दिखी; वो भी नाम तेरे ही कर लिखी,

    तू भी ग़म तेरे मुझे दे ज़रा; मैं हिसाब में हुशियार था।

    --------------

    Lyrics - Vivek Agarwal 'Avi'

    Music and Vocals - Ranu Jain

    7 min
  • ट्रिक और ट्रीट? (Trick or Treat)

    ट्रिक और ट्रीट?

    मैं मूक स्तब्ध दरवाजे पर खड़ा था,

    सामने बच्चों का एक झुण्ड अड़ा था।

    कोई भूत कोई चुड़ैल कोई सुपर हीरो बना हुआ,

    पूरे आत्मविश्वास के साथ द्वार पर तना हुआ।

    एक एक कर मैंने सबके चेहरों को निहारा,

    कोई पापा की परी कोई माँ का राजदुलारा।

    कोई ड्रैकुला बना लाल दाँत दिखा रहा था,

    तो कोई हैरीपॉटर बन स्पेल्स सिखा रहा था।

    ऊँचा नुकीला हैट पहने एक कन्या विच बनी थी,

    और इलास्टी गर्ल की आयरन मैन से ठनी थी।

    ट्रिक और ट्रीट?

    मुझे मूक निष्क्रिय देख बच्चों ने फ़िर दोहराया,

    और जोरों से हाथ में थामे डब्बे को खनकाया।

    मैं भी अपनी सम्मोहनावस्था से बाहर आया,

    और सब बच्चों को देख थोड़ा मुस्कुराया।

    अरे ये सब क्या है, क्या सोसाइटी में कोई आयोजन है,

    और क्या इस फैंसी ड्रेस कम्पटीशन के बाद भोजन है?

    मुझे मूढ़ मति मान बच्चे मिल कर खिलखिलाये,

    इट इस हैलोवीन अंकल सब साथ मुझे समझाये।

    आज के दिन इसी तरह के कॉसट्युम पहनते हैं,

    और घर घर जा कर कैंडी चॉकलेट इकठ्ठा करते हैं।

    ट्रिक और ट्रीट?

    यकायक बचपन की एक मीठी याद मन में उभर आई,

    रामलीला में कितनी ही बार मैंने अंगद की भूमिका निभाई।

    मुँह लाल कर गदा हाथ ले जब पाँव जोर से धरता था,

    जय श्री राम के उच्च नाद से पूरा हॉल धमकता था।

    गली गली हर नुक्कड़ पर सुन्दर झाँकी सजती थी,

    जय गोविंदा जय गोपाला की मीठी धुन भी बजती थी।

    घर घर सबसे चंदा लेने होली पर हम भी जाते थे,

    हफ़्तों पहले से रंग गुलाल की आँधी खूब उड़ाते थे।

    संक्रांत पर कितनी रंग बिरंगी पतंग उड़ाया करते थे,

    हर तीज को आँगन के झूलों पर पींगे ऊंची भरते थे।

    ट्रिक और ट्रीट?

    एक बार फिर बच्चों ने किया ये उद्घोष मेरे द्वार,

    क्यूँकि मुझे पुनः खींच ले गया था यादों का संसार।

    सोचा कि ट्रिक बोल दूँ और देखूँ ये क्या करते हैं,

    फिर सोचा कोई अच्छी ट्रीट दे सबको खुश रखते हैं।

    हम तो चंदा न देनों वालों को अच्छा पाठ पढ़ाते थे,

    कुछ न कुछ घर से उठा कर होली में डाल जलाते थे।

    चॉकलेट का पूरा डिब्बा बच्चों के बैग में हमने डाला।

    बाय बोल के सब बच्चों को बंद किया फिर घर का ताला।

    मन ही मन मैं सोच रहा था कैसे उत्सव बदल गए हैं,

    उमंग ढूँढ़ते अपने बच्चे कुछ नयी राहों पर निकल गए हैं।

    ट्रिक और ट्रीट?

    आखिर अपने समाज के लिए क्या हैं ये नए त्यौहार,

    बगिया महकाते नए फूल या मूल फसल को खाती खरपतवार?

    किसी भी त्यौहार पर हँसते मुस्कुराते बच्चे अच्छे लगते हैं,

    पर क्या ये नए त्यौहार हमारे समाज में सच्चे लगते हैं?

    त्यौहार वो कड़ी हैं जो बच्चों को स्वयं की सभ्यता से जोड़ते हैं,

    उल्लास और उमंग से नवीन को पुरातन की दिशा में मोड़ते हैं।

    आज त्यौहार बदलेंगे तो कल आदर्श विश्वास और मूल्य भी बदलेंगे,

    और अगर मूलभूत सिद्धांत ही बदल जायेंगे तो क्या हम हम रहेंगे?

    किसी दूसरे पर आक्षेप नहीं मात्र अपना सहेजने की अपेक्षा है,

    क्यूँकि ये तो सच है कि आज भारत में भारत की ही उपेक्षा है।

    अब आप ही निर्धारित करें कि हैलोवीन सावर है या स्वीट,

    ट्रिक और ट्रीट?

    स्वरचित

    विवेक अग्रवाल 'अवि'

    6 min
  • दीपदान (DeepDaan)

    देवालय में बैठा बैठा मैं मन में करता ध्यान।

    शुभ दिन आया मैं करूँ दीप कौन सा दान।

    मिटटी के दीपक क्षणभंगुर और छोटी सी ज्योति।

    बड़ी क्षीण सी रौशनी बस पल दो पल की होती।

    मन में इच्छा बड़ी प्रबल दुर्लभ हो मेरा दान।

    सारे व्यक्ति देख करें बस मेरा ही गुण गान।

    इस नगर में हर व्यक्ति के मुख पर हो मेरा नाम।

    इसी सोच में डूबा बैठा आखिर क्या करूँ मैं काम।

    सोचा चाँदी की चौकी पर सोने का एक दीप सजाऊँ।

    साथ में माणिक मोती माला प्रतिमा पर चढ़वाऊँ।

    दीपदान के उत्सव पर क्यों ना छप्पन भोग लगाऊँ।

    बाँट प्रसाद निर्धन लोगों में मन ही मन इतराऊँ।

    इसी विचार में डूबा था बस बैठे बैठे आँख लगी।

    एक प्रकाश सा हुआ अचानक जैसे कोई जोत जगी।

    मेरे मन-मानस मंदिर में गूँज उठा एक दिव्य नाद।

    सुन अलौकिक ध्वनि को मिटने लगे मेरे सभी विषाद।

    स्वर्णदीप का क्या करे वो जिसने स्वर्ण-लंका ठुकराई।

    चाँदी-चौकी पर वो क्या बैठे जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि समाई।

    विश्वनाथ की क्षुधा न मांगे छप्पन भोग से सज्जित थाल।

    श्रद्धा प्रेम से जो भी अर्पण भेंट वही सुन्दर विशाल।

    चक्षु मेरे भी खुल गए सुन सुन्दर सार्थक सु-उपदेश।

    ज्यूँ तिमिर में डूबे नभ में हो सूर्य का औचक प्रवेश।

    अब सोच रहा मैं क्या दूँ ऐसा जो सबका उद्धार हो।

    मेरा मन भी जो शुद्ध बने शेष न कोई विकार हो।

    बहुत सोच निष्कर्ष निकाला आज दीप मैं दूँगा पाँच।

    जो आज तक रखे जलाये देकर मन की घृत और आँच।

    पञ्च-दीप ये अब तक मेरे मन मानस में जलते आये।

    मार्गद्रष्टा बन कर मुझको निज जीवन का पथ दिखलाये।

    प्रथम दीप है लोभ का जो मेरे मन में जलता है।

    चाहे जितना मैं पा जाऊँ मुझको कम ही लगता है।

    स्वीकार करो प्रभु प्रथम दीप मुझको अपना सेवक मान।

    अब से जो भी प्राप्त करूँगा मानूँगा तेरा वरदान।

    क्रोध जगत में ऐसी ज्वाला जो अपनों को अधिक जलाती है।

    सबका जीवन करती दुष्कर स्वयं को भी बहुत सताती है।

    क्रोध दीप है अगला जिसको आज मैं अर्पण करता हूँ।

    शांत चित्त हो यही कामना मैं तुझे समर्पण करता हूँ।

    अपने सुख की छोड़ कामना दूजे के सुख से जलता हूँ।

    औरों का वैभव देख देख क्यों मैं दुःख में गलता हूँ।

    ईर्ष्या जिस भी हृदय में रहती चैन कभी न आता है।

    स्वीकार करो ये दीप तीसरा इससे न मेरा अब नाता है।

    मेधा ज्ञान शक्ति वैभव आप ही हैं इस सबके दाता।

    हर प्राणी इस जग में सब कुछ प्रभु आप ही से पाता।

    मैं अज्ञानी अहंकार में स्वयं को समझा इनका कारण।

    सौंप आज ये चौथा दीपक मैं करता निज गर्व-निवारण।

    मात पिता पत्नी संतानें सम्बन्ध हमारे कितने होते।

    विरह-विषाद में जीवन कटता जब हम किसी को खोते।

    सबसे कठिन है तजना इसको प्रभु मुझे चाहिए शक्ति।

    तज कर आज ये मोह का दीपक मैं माँगू तेरी भक्ति।

    पाँच दीप मैं अर्पण करता तेरे चरणों का करके ध्यान।

    कृपा करो मुझ पर तुम इतनी स्वीकार करो ये दीपदान।

    अब जीवन को राह दिखलायें संतोष श्रद्धा भक्ति ज्ञान।

    नव दीपक आलोकित हों मन में ऐसा मुझको दो वरदान।

    स्वरचित

    विवेक अग्रवाल 'अवि'

    7 min
  • ग़ज़ल - नियामतें जो मिली (Ghazal - Niyamaten Jo Mili)

    नियामतें जो मिली शुक्र सुब्ह शाम करें।

    कि ख़्वाहिशों को कभी भी न बे-लगाम करें।

    वो मुस्कुरा के हैं पूछे कि हाल कैसा है,

    सजा के झूठ लबों पर दुआ सलाम करें।

    सजा रखे थे जो अरमां लुटा दिए तुम पर,

    बचे हुए हैं ये सपने कहो तमाम करें।

    ख़ता नहीं थी हमारी पता नहीं तुझको,

    तुझे यकीं जो दिलाये वो कैसा काम करें।

    बिकी हुई है अदालत जो ठीक दो कीमत,

    चलो कहीं से गवाहों का इंतिज़ाम करें।

    ----

    सुर और संगीत - साधना रस्तोगी

    शायरी - विवेक अग्रवाल 'अवि'

    Write2Us at [email protected]

    9 min
  • अपना भारत - एक बाल गीत (Apna Bharat - A Children Song)

    भारत माता के हम बच्चे,

    सबसे प्यारा अपना भारत।

    दूर दूर तक देखा जग में,

    सबसे न्यारा अपना भारत॥

    भिन्न भिन्न भोजन हैं अपने,

    भिन्न भिन्न है अपनी बोली।

    भिन्न भिन्न उत्सव हैं अपने,

    ओणम बीहू पोंगल होली॥

    भिन्न भिन्न इन त्योहारों ने,

    खूब सँवारा अपना भारत।

    दूर दूर तक देखा जग में,

    सबसे न्यारा अपना भारत॥

    भारत माता के हम बच्चे,

    सबसे प्यारा अपना भारत।

    दूर दूर तक देखा जग में,

    सबसे न्यारा अपना भारत॥

    भिन्न भिन्न पोशाकें अपनी,

    भिन्न भिन्न हैं मौसम अपने।

    भिन्न भिन्न परिवेश है अपना,

    भिन्न भिन्न हैं अपने सपने॥

    जब जब विपदा आन पड़ी तब,

    बना सहारा अपना भारत।

    दूर दूर तक देखा जग में,

    सबसे न्यारा अपना भारत॥

    भारत माता के हम बच्चे,

    सबसे प्यारा अपना भारत।

    दूर दूर तक देखा जग में,

    सबसे न्यारा अपना भारत॥

    अपना देश है प्यारी बगिया,

    भिन्न भिन्न से वृक्ष सजे हैं।

    भिन्न भिन्न से पक्षी चहकें,

    कितने मीठे राग बजे हैं॥

    भिन्न भिन्न सुन्दर फूलों ने,

    खूब निखारा अपना भारत।

    दूर दूर तक देखा जग में,

    सबसे न्यारा अपना भारत॥

    भारत माता के हम बच्चे,

    सबसे प्यारा अपना भारत।

    दूर दूर तक देखा जग में,

    सबसे न्यारा अपना भारत॥

    स्वरचित

    विवेक अग्रवाल 'अवि'

    विधा - १६ मात्रिक गीत

    4 min
  • रास लीला - रूपमाला छंद

    प्रथम सर्ग

    रास लीला की कथा को, मैं सुनाता आज।

    ध्यान से सुन लो मनोहर, गूढ़ है ये राज॥

    पुण्य वृन्दावन हमारा, प्रेम पावन धाम।

    रात को निधि-वन पधारें, रोज श्यामा श्याम॥

    दिव्य दर्शन दें प्रभु हर, पूर्णिमा की रात।

    मान लो मेरा कहा ये, सत्य है यह बात॥

    पेड़-पौधे पुष्प-पत्ते, झूमते मनमीत।

    मोर कोयल मिल सुनाते, प्रेम रस के गीत॥

    जीव-जंतु भी करे हैँ, हर्ष से गुण-गान।

    तितलियाँ मदहोश होतीं, प्रेम रस कर पान॥

    मुस्कुराता चाँद नभ में, चाँदनी हर ओर।

    हैं सुगन्धित सब दिशायें, हर्ष का ना छोर॥

    प्रेयसी राधा पुकारे, प्रेम से जब नाम।

    कृष्ण को आना पड़ेगा, छोड़ सारे काम॥

    कृष्ण-राधा का करें मिल, सब सखी श्रृंगार।

    ज्ञान किसको चाहिए जब, प्यार ही आधार॥

    पीत वस्त्रों में सुशोभित, मोर पंखी माथ।

    हैं कमल से नेत्र सुन्दर, बाँसुरी है हाथ॥

    सुंदरी राधा सजी हैं, लाल नीले वस्त्र।

    हैं कटीले नैन उनके, शक्तिशाली शस्त्र॥

    रूप अद्भुत है दमकता, स्वर्ण सा हर अंग।

    रास लीला सुख उठायें, श्याम श्यामा संग॥

    गीत मंगल गा रहे सब, गोप गोपी साथ।

    झूम कर नाचें सभी ले, हाथ ले कर हाथ॥

    पुण्य लाखों जो किये थे, तो मिली ये शाम।

    गोपिका राधा लगे है, गोप में हैं श्याम॥

    हैं अचंभित देवता सब, देख अध्भुत खेल।

    हैं हजारों श्याम गोपी, दिव्य है यह मेल॥

    रातरानी है महकती, मस्त मादक गंध।

    जन्म-जन्मों तक रहेगा, आज का गठ-बंध॥

    बाजती पायल छमाछम, बाजते करताल।

    नृत्य करती गोपियाँ सब, नाचते गोपाल॥

    रख अधर वंशी बजायी, छेड़ मीठी तान।

    लोक लज्जा छोड़ राधा, नृत्य करती गान॥

    रूठती राधा मनाते, कृष्ण बारम्बार।

    खिलखिलाती गोपियाँ भी, देख ये मनुहार॥

    हार कर भी जीत जायें, प्रेम का यह खेल।

    तन भले दो एक मन पर, है अनूठा मेल॥

    रात बीती भोर आयी, जागते गोपाल।

    रात भर क्रीड़ा चली है, नैन लगते लाल॥

    रास लीला की कहानी, रूपमाला छंद।

    सुन रहे सब मुग्ध-मोहित, छा गया आनंद॥

    द्वितीय सर्ग

    गौर से सोचो नहीं ये, रास लीला मात्र।

    रास है संसार सारा, हम सभी हैं पात्र॥

    बन वियोगी राह देखें, कब मिलन का योग।

    भूख दर्शन की हृदय में, प्रेम का यह रोग॥

    हम अभी बिछड़े हुए हैं, दूर हमसे श्याम।

    बात मेरी मान लो तुम, बस करो यह काम॥

    है बड़ा भगवान से भी, दिव्य उनका नाम।

    नाम जप लो नित्य उनका, आ मिलेंगे श्याम॥

    मोह-माया जग है सारा, मात्र सच्चा नाम।

    नाम उसका जो पुकारा, सिद्ध सारे काम॥

    राम कह लो या कहो तुम, कृष्ण उसका नाम।

    तुम मधूसूदन पुकारो, या कहो घनश्याम॥

    देवकी नंदन वही तो, है यशोदा लाल।

    नाम माखनचोर भी है, और है गोपाल॥

    कंस हन्ता भी वही है, नंदलाला श्याम।

    वासुदेवा कृष्ण पावन, दिव्य सारे नाम॥

    नाम गज ने जब पुकारा, आ गए भगवान।

    नाम मन में तू बसा ले, कर हरी का ध्यान॥

    कल्पना से मात्र जिसने, है रचा संसार।

    है जगत स्वामी वही है, सर्व पालनहार॥

    मंझधारा में पड़े हम, वो कराता पार।

    बस वही सर्वोच्च शाश्वत, सत्य का आधार॥

    याद गीता पाठ हो तो, कर्म पर दो ध्यान।

    सुख मिले या दुख मिले है, जिंदगी आसान॥

    कर समर्पित बस उसी को, हम करें हर कर्म।

    ना निराशा दम्भ हो तब, ज्ञान गीता मर्म॥

    हम रहें निष्काम तो फिर, द्वेष ना अनुराग।

    वाहवाही ना कमायी, ना कमाया दाग॥

    जब सभी उसका जगत में, गर्व की क्या बात।

    हर समय बस ध्यान उसका, भोर हो या रात॥

    मन-वचन-धन-तन हमारा, सब समर्पित आज।

    भक्तवत्सल आप रखना, अब हमारी लाज॥

    मार्गदर्शन आपका बस, हो हमारे साथ।

    जब कभी जाएँ भटक तो, थाम लेना हाथ॥

    मन बसे बांके बिहारी, श्वास में बस श्याम।

    और कुछ ना चाहिए अब, मिल गया विश्राम॥

    जानता कुछ भी नहीं मैं, मैं नहीं विद्वान।

    हूँ पड़ा चरणों में आ के, कर कृपा भगवान॥

    है भरोसा श्याम पर अब, है मिलन की आस।

    मन अगर निश्छल हमारा, कृष्ण करते वास॥

    प्रेम की ही भूख उसको, प्रेम की ही प्यास।

    प्रेम की अभिव्यक्ति है, दिव्य क्रीड़ा रास॥

    श्रद्धा सहित समर्पित

    विवेक अग्रवाल

    (बोलो बांके बिहारी लाल की जय)

    9 min

About Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ)

From the publisher's feed

This podcast presents Hindi poetry, Ghazals, songs, and Bhajans written by me.