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सब कहते हैं हम अब स्वतंत्र हैं
पर सच कहूँ तो लगता नहीं
निज भाषा का तिरस्कार देखता हूँ
स्वदेशी पोशाकों को होटल, क्लब से
निष्काषित होते देखता हूँ
सर्वोच्च न्यायालय में अंग्रेजी में
मी लार्ड को टाई न पहनने के ऊपर
फटकार लगाते देखता हूँ
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आओ बच्चों आज तुमको, एक पाठ नया पढ़ाता हूँ।
प्रकृति हमको क्या सिखलाती, ये तुमको बतलाता हूँ।
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कलम की कोख से जन्मी, मेरे मन की तू दुहिता है।
बड़ी निर्मल बड़ी निश्छल, बड़ी चंचल सी सरिता है॥
मेरे मन की व्यथा समझे, अकेलेपन की साथी है।
मेरा अस्तित्व है तुझसे, नहीं केवल तू कविता है॥
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नहीं घबरा के तुम हटना ये मंज़िल मिल ही जाएगी।
डटे रहना निरंतर तुम सफलता हाथ आएगी।
परीक्षाएं बहुत होती हैं दृढ़ निश्चय परखने को,
लगन सच्ची लगी तुमको तो मेहनत रंग लाएगी।
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अगर हँसता ज़माना है तो चिंता तुम नहीं करना,
अभी हँसती है जो दुनिया वही सर पर बिठाएगी।
विवेक अग्रवाल 'अवि'
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कड़ी मेहनत बड़ी मुद्दत लगे पैसा कमाने में।
नहीं लगता ज़रा सा वक़्त पैसे को गँवाने में।
बड़ा आसान है कहना कि पैसा ही नहीं सब कुछ,
बिना पैसे नहीं मिलता यहाँ कुछ भी ज़माने में।
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बड़ी ताकत है पैसे में सभी पर ये पड़े भारी,
अदालत में चले पैसा यही चलता है थाने में।
अमीरी के सभी साथी गरीबी बस अकेली है,
भरी जेबें ज़रूरी है सभी रिश्ते निभाने में।
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आज सुनाता कथा पुरानी, जब सोने की चिड़िया भारत था।
सुख समृद्धि से सज्जित, स्वर्ण-भूमि में सबका स्वागत था।
अमरावती से सुन्दर नगरी, जहाँ महाकाल का धाम था।
समस्त विश्व का केंद्र थी, उज्जयिनी जिसका नाम था।
इंद्र से भी वैभवशाली, चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य सम्राट थे।
चहुँ ओर फैला था कीर्ति सौरभ, गौरव से उन्नत ललाट थे।
स्वर्ण रजत मोती माणिक, धन धान्य से भरे थे राजकोष।
पर वो अनमोल रतन कौन थे, जो देते सच्चा परितोष।
जौहरी राजन को पहचान थी, की धन से बड़ा है ज्ञान।
सभा में उनकी नवरत्न थे, सब एक से बढ़ एक महान।
महाराज विक्रमादित्य के नव रत्नों के गुणों के बारे में जानने के लिए यह कविता अवश्य सुनें
To know about the specialties of each of the nine jewels, listen to this poem.
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घर में सजते चाँद सितारे, बस क़िस्से और कहानी में।
सोने चाँदी के गुब्बारे, बस क़िस्से और कहानी में।
रोज़ बिखरते ख़्वाब यहाँ पर, टूटे दिल भी हमने देखे,
सच होते हैं सपने सारे, बस क़िस्से और कहानी में।
नफ़रत झूठ फ़रेब दिखा है, इस ज़ालिम दुनिया में अपनी,
सभी लोग सच्चे और प्यारे, बस क़िस्से और कहानी में।
ज़ुल्म सितम दहशत है फैली, नेकी कोने में बैठी है,
जीते अच्छा बुरा ही हारे, बस क़िस्से और कहानी में।
शुक्रगुज़ारी भूल गए सब, ख़ुद-ग़रज़ी फ़ितरत है सबकी,
अपने सारे क़र्ज़ उतारे, बस क़िस्से और कहानी में।
- विवेक अग्रवाल 'अवि'
(बहर-ए-मीर)
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एक ग़ज़ल लिखी है चन्दा पर,
छत पर आके पढ़ लेना।
है तेरी याद में गाया नगमा,
जब हवा बहे तो सुन लेना।
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बड़ी पुत्री है संस्कृत की सरल भाषा तथा बोली।
निरंतर सीखती रहती सभी से बन के हमजोली॥
अनेकों रूप लेकर भी बड़ी मीठी है अलबेली।
भले अवधी या ब्रजभाषा खड़ी बोली या बुन्देली॥
ये जयशंकर महादेवी निराला जी की कविता है।
मधुर मोहक सरस सुन्दर चपल चंचल सी सरिता है॥
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हमें सर्वोच्च दुनिया में अगर भारत बनाना है।
तो सोतों को जगाना है व हिंदी को बढ़ाना है॥
चलो हिंदी दिवस पर सब प्रतिज्ञा आज करते हैं।
कि भारत देश उपवन में छटा हिंदी की भरते हैं॥
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#Hindi #HindiDiwas #WorldHindiDay #VishvHindiDiwas
This is the video version of my latest Ghazal, specially made for Spotify audiences.
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