Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ)

Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ)

By Vivek AgarwalArtsPerforming Arts
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Hindi Poems by Vivek (विवेक की हिंदी कवितायेँ) episodes

  • आओ पर्यावरण बचायें (Let us save environment)

    आओ पर्यावरण बचायें

    यह प्रकृति हम से नहीं, इस प्रकृति से हम हैं।

    प्रकृति सरंक्षण हेतु हम जितना भी करे कम है।

    पंच तत्व बन प्रकृति ही इस तन को निर्मित करती है।

    सौंदर्य सुधा की सुरभि से सबको आकर्षित करती है।

    जीवनदायी प्रकृति करती है सब का पालन पोषण।

    निज स्वार्थ में हम कर बैठे इस देवी का शोषण।

    भूमि हमको भोजन देती पर हम इसको विष देते।

    दूषित करते उन नदियों को जिनसे हम जल लेते।

    प्राणदायिनी वायु तक को भी हमने शुद्ध ना छोड़ा।

    जला कोयला-डीजल-कूड़ा धुआँ हर तरफ छोड़ा।

    जो वृक्ष हमें सौगात में देते फल-फूल और छाया।

    काट काट कर काया उनकी अपना संसार बनाया।

    ऊँचे हिमशिखर हों या फिर महासागर की गहराई।

    दुर्गम सुदूर स्थानों पर भी प्लास्टिक हमने पहुँचाई।

    एसी-फ्रिज-उपकरण हमारे ऐसी गैसें छोड़ रहे हैँ ।

    ओजोन परत जो हमें बचाती उसको ही तोड़ रहे हैँ।

    मानव जाति को ईश्वर ने दिया है बुद्धि का उपहार।

    सोचो ये प्रकृति ही है अपने पूरे जीवन का आधार।

    आओ मिल कर यह शपथ लें एक बदलाव लायेंगे।

    स्वयं भी जागरूक बनेंगे और औरों को भी जगायेंगे।

    स्वरचित और मौलिक

    विवेक अग्रवाल 'अवि'

    4 min
  • ग़ज़ल - कुछ और नहीं सोचा कुछ और नहीं माँगा (Ghazal)
    कुछ और नहीं सोचा कुछ और नहीं माँगा।

    हर वक्त तुझे चाहा कुछ और नहीं माँगा।

    दौलत से क्या होगा यदि दिल ही रहे खाली।

    बस साथ रहे तेरा कुछ और नहीं माँगा।

    मिलता है बड़ी किस्मत से यार यहाँ सच्चा।

    मिल जाये वही हीरा कुछ और नहीं माँगा।

    दीदार खुदा का हो यदि पाक नज़र अपनी।

    दिल साफ़ रहे अपना कुछ और नहीं माँगा।

    सब लोग बराबर हैं ना कोइ बड़ा छोटा।

    ना भेद रहे थोड़ा कुछ और नहीं माँगा।

    यूँ जंग नहीं होती जो प्यार यहाँ होता।

    मक़सद हो अमन सबका कुछ और नहीं माँगा।

    मैं तख़्त नहीं चाहूँ ना ताज मुझे भाता।

    दे नूर मुझे 'अवि' का कुछ और नहीं माँगा।


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    Lyrics - विवेक अग्रवाल 'अवि'

    Music - रानू जैन

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    7 min
  • Shiv Vandana - मैं बस शिवा हूँ (Mein Bas Shiva Hoon)
    न हूँ मैं मेधा, न बुद्धि ही मैं हूँ।
    अहंकार न हूँ न चित्त ही मैं हूँ।
    न नासिका में न नेत्रों में ही समाया।
    न जिव्हा में स्थित न कर्ण में सुनाया।
    न मैं गगन हूँ न ही धरा हूँ।
    न ही हूँ अग्नि न ही हवा हूँ।
    जो सर्वत्र सर्वस्व आनंद व्यापक।
    मैं बस शिवा हूँ उसी का संस्थापक।
    नहीं प्राण मैं हूँ न ही पंचवायु।
    नहीं पंचकोश और न ही सप्तधातु।
    वाणी कहाँ बांच मुझको सकी है।
    मेरी चाल कहाँ कभी भी रुकी है।
    किसी के हाथों में नहीं आच्छादित।
    न ही किसी और अंग से बाधित।
    जो सर्वत्र सर्वस्व आनंद व्यापक।
    मैं बस शिवा हूँ उसी का संस्थापक।
    नहीं गुण कोई ना ही कोई दोष मुझमें।
    न करूँ प्रेम किसी को न रोष मुझमें।
    लोभ मद ईर्ष्या मुझे कभी न छूते।
    धर्म अर्थ काम भी मुझसे अछूते।
    मैं स्वयं तो मोक्ष के भी परे हूँ।
    जो सब जहाँ है वो मैं ही धरे हूँ।
    जो सर्वत्र सर्वस्व आनंद व्यापक।
    मैं बस शिवा हूँ उसी का संस्थापक।
    न पुण्य की इच्छा न पाप का संशय।
    सुख हो या दुःख हो न मेरा ये विषय।
    मन्त्र तीर्थ वेद और यज्ञ इत्यादि।
    न मुझको बाँधे मैं अनंत अनादि।
    न भोग न भोगी मैं सभी से भिन्न।
    न ही हूँ पुलकित और न ही खिन्न।
    जो सर्वत्र सर्वस्व आनंद व्यापक।
    मैं बस शिवा हूँ उसी का संस्थापक।
    अजन्मा हूँ मेरा अस्तित्व है अक्षय।
    मुझे न होता कभी मृत्यु का भय।
    न मन में है शंका मैं हूँ अचर।
    जाति न मेरी न भेद का डर।
    न माता पिता न कोई भाई बंधु।
    न गुरु न शिष्य मैं अनंत सिंधु।
    जो सर्वत्र सर्वस्व आनंद व्यापक।
    मैं बस शिवा हूँ उसी का संस्थापक।
    न आकार मेरा विकल्प न तथापि।
    चेतना के रूप में मैं हूँ सर्वव्यापी।
    यूँ तो समस्त इन्द्रियों से हूँ हटके।
    पर सभी में मेरा प्रतिबिम्ब ही झलके।
    किसी वस्तु से मैं कहाँ बँध पाया।
    पर प्रत्येक वस्तु में मैं ही समाया।
    जो सर्वत्र सर्वस्व आनंद व्यापक।
    मैं बस शिवा हूँ उसी का संस्थापक।
    (आदिगुरु श्री शंकराचार्य जी की बाल्यावस्था में लिखी निर्वाण षट्कम का अपने अल्प ज्ञान और सीमित काव्य कला में सरल हिंदी में रूपांतर करने की एक तुच्छ चेष्टा।)
    गुरुदेव को नमन के साथ
    विवेक
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    6 min
  • श्रीकृष्ण स्तुति (Sri Krishna Stuti)

    श्रीकृष्ण मेरे इष्ट भगवन, नित्य करता ध्यान मैं।

    मुरली मनोहर श्याम सुन्दर, भक्तिरस का गान मैं॥


    कोमल बदन चन्दन सजा है, भव्य यह श्रृंगार है।

    कर में सजी वंशी सुनहरी, देखता संसार है॥


    सम्पूर्ण जग में आप ही हो, आप से ही सब बना।

    है आप पर सर्वस्व अर्पण, आप की आराधना॥


    मम मात तुम तुम तात हो तुम, बन्धु तुम ही हो सखा। 

    प्रियतम तुझे ही मानता मैं, तुम बिना क्या है रखा॥


    मनमोहना है छवि तिहारी, श्वास का आधार है।

    विश्वास है मेरा यही की, मुक्ति का तू द्वार है॥


    सविनय निवेदन आप से है, काज मेरे कीजिये।

    मेरा समय जब पूर्ण हो तो, मोक्ष मुझको दीजिये॥


    श्रद्धा सहित

    विवेक अग्रवाल

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    Singer - Dr. SC Rastogi

    Lyrics - Vivek Agarwal

    Background Music - KalRav Music

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    8 min
  • मैंने राम को देखा है

    कौन हैं राम कैसे थे राम,

    कब थे राम कहाँ है राम?

    अक्सर ऐसे प्रश्न उठाते,

    लोगों को मैंने देखा है।

    श्रद्धा-सूर्य पर संशय-बादल,

    मंडराते मैंने देखा है।

    है उनको बस इतना बतलाना,

    मैंने राम को देखा है ।

    पितृ वचन कहीं टूट ना जाये

    सौतेली माँ भी रूठ ना जाये

    राजसिंहासन को ठुकराकर

    परिजनों को भी बहलाकर

    एक क्षण में वैभव सारा छोड़

    रिश्ते नातों के बंधन तोड़

    कुल-देश-धर्म की मर्यादा पर

    सर्वस्व लुटाते देखा है

    हाँ मैंने त्याग में राम को देखा है।

    केवट को बाहों में भर लेना

    मित्रवत रीछ वानर की सेना

    शबरी के जूठे बेरों का प्यार

    गिद्धराज से पितृसम व्यवहार

    गिलहरी की पीठ हाथ फिराना

    समरसता का सुन्दर पाठ पढ़ाना

    निज आचरण का बना उदाहरण

    हर भेद मिटाते देखा है

    हाँ मैंने न्याय में राम को देखा है।

    श्री विष्णुरूप हैं मेरे रघुनंदन

    जो करें नित महादेव का वंदन

    विद्वानों के समक्ष शीश झुकाना

    रात्रि भर गुरु के चरण दबाना

    धनुष हाथ ले पहरा देना

    घर घर जाकर भिक्षा लेना

    तीनों लोकों के स्वामी होकर

    सेवा करते भी देखा है

    हाँ मैंने विनम्रता में राम को देखा है।

    यज्ञ भंग करते दैत्य विराट

    रामबाण ने दिये मस्तक काट

    प्रचंड शिव धनुष का तोड़ना

    जनक नंदिनी से नाता जोड़ना

    पापी रावण को दे उचित दंड

    की विभीषण पर कृपा अखंड

    शक्ति के समुचित सद उपयोग

    का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देखा है

    हाँ मैंने पराक्रम में राम को देखा है।

    विश्वामित्र का आना दशरथ द्वार

    माँ अहिल्या का होते उद्धार

    भरत लक्ष्मण का सर्वस्व अर्पण

    बजरंग बली का सम्पूर्ण समर्पण

    अंगद की अतुलित शक्ति

    विभीषण की अन्नय भक्ति

    रामेश्वरम के पावन तट पर

    पत्थरों को तैरते देखा है

    हाँ मैंने विश्वास में राम को देखा है।

    राम ही साकार है,

    और निराकार भी राम हैं।

    राम में सारे गुण भरे,

    हर सद्गुण में दिखते राम हैं।

    राम हैं हर मंदिर में,

    मनमंदिर में शोभित राम हैं।

    राम से ही सृष्टि सारी,

    हर कण में समाये राम हैं।

    राम पिता का पावन पुरुषार्थ,

    राम ही माँ की निश्छल ममता।

    राम सखा के स्नेहालिंगन में,

    गुरु कृपा में राम ही दिखता।

    वीरों के शौर्य में राम हैं,

    राम बसे हर ज्ञानी में।

    परमार्थ का हर कार्य राम का,

    मुझे दिखे राम हर दानी में।

    जीवन पथ हो जाये दुष्कर,

    तो अपने सहचर राम हैं।

    जितने प्रश्न भरे हैं अंदर,

    सबका उत्तर राम हैं।

    राम पर यदि ध्यान दिया,

    हर संशय तब मिट जायेगा।

    राम के गुण जो भी अपना ले,

    वही राम हो जायेगा।

    राम की इस दुनिया में ऐसा होते देखा है,

    मैंने राम को देखा है।

    मैंने राम को देखा है।

    श्रद्धा सहित - विवेक अग्रवाल

    7 min
  • सरस्वती वंदना - आशी (Saraswati Vandana - Music by Aashi)

    सरस्वती वंदना

    हरिगीतिका छंद (२८ मात्रिक १६,१२ पर यति)

    है हंस पर आरूढ़ माता, श्वेत वस्त्रों में सजी।

    वीणा रखी है कर तिहारे, दिव्य सी सरगम बजी॥

    मस्तक मुकुट चमके सुशोभित, हार पुष्पों से बना।

    फल फ़ूल अर्पण है चरण में, हम करें आराधना॥

    संगीत का आधार हो माँ, हर कला का श्रोत हो।

    जग में प्रकाशित हो रही जो, वेद की वह ज्योत हो॥

    वरदायिनी पद्मासिनि माँ, अब यही अभियान हो।

    हम सब चलें सत्मार्ग पर अब, ना हमें अभिमान हो॥

    देवी यही है कामना सब, लोग मिल आगे बढ़ें।

    अपने सभी अंतर भुलाकर, ज्ञान की सीढ़ी चढ़ें॥

    माँ शारदे ये वर हमें दे, बुद्धि का विस्तार हो।

    अपनी इसी पावन धरा पे, धर्म का संचार हो॥

    श्रद्धा सहित

    विवेक अग्रवाल

    (मौलिक और स्वलिखित)

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    7 min
  • प्रकृति का पाठ (Lessons from Nature)

    आओ बच्चों आज तुमको एक पाठ नया पढ़ाता हूँ।

    प्रकृति हमको क्या सिखलाती, ये तुमको बतलाता हूँ।

    देखो कैसे पत्थर खा के भी, पेड़ हमें फल देते हैं।

    क्षमा-दान से बड़ा कुछ नहीं, ये हम सबसे कहते हैं।

    पर्वत से सागर तक नदिया, लम्बा सफर है करती।

    निज लक्ष्य तक बढ़ो निरंतर, सीख यही है मिलती।

    सबका भार उठाये मस्तक पर, देखो धरती माता।

    सहनशीलता का अर्थ क्या, इससे समझ में आता।

    ज्वार-भाटा नित्य आता पर, सागर सीमा ना तोड़े।

    सुख-दुःख में धैर्य रखें हम, मर्यादा कभी ना छोड़ें।

    देखो कैसे रोज नियम से, सूरज है आता जाता।

    अनुशासन का पाठ हमको, अच्छे से सिखलाता।

    झंझावत कितने आयें परन्तु, पर्वत अडिग है रहता।

    कठिन समय में दृढ़ रहने की बात हमसे कहता।

    आसमान में स्थिर ध्रुव तारा, भटकों को राह दिखाता।

    अटल इरादे अगर हमारे, सब कुछ संभव हो जाता।

    सुन्दर सुरभित पुष्प यहाँ, सबको सुख पहुंचाते।

    हम भी यूँ खुशियां बरसायें, ये हमको समझाते।

    जैसा बीज खेत में डालो, वैसी फसल है उगती।

    ये देख हम सबको, अच्छे कर्म की प्रेरणा मिलती।

    भाषा गणित इतिहास कला, इन सबसे बढ़ता ज्ञान।

    पर अच्छे गुण पाकर ही, एक व्यक्ति बनता महान।

    प्रकृति के कण कण में भरा है, सीखों का भण्डार।

    इस ज्ञान से चलो सँवारे, मिल कर अपना संसार।

    स्वरचित

    विवेक अग्रवाल

    5 min
  • होली (Holi)

    आओ मिल कर खेलें होली

    सबसे न्यारी अपनी टोली

    सभी पुराने क्लेश भुलाकर

    सबसे बोलें मीठी बोली

    लाल हरे और पीले नीले

    देखो मेरे रंग चटकीले

    भर ली मैंने नयी पिचकारी

    रंग दूंगा मैं दुनिया सारी

    सुबह सवेरे सोनू जागा

    उसके पीछे मोनू भागा

    वो छिप गया लकी सयाना

    नहीं चलेगा कोई बहाना

    बंद करो ये आंखमिचौली

    आओ मिल कर खेलें होली

    रंग लगायें गुंझिया खाएं

    झूमे नाचें खुशी मनाएं

    खेल कूद कर घर को आये

    रगड़ रगड़ कर हम नहाये

    बड़े जोर की भूख लगी अब

    पूरी हलवा खायें मिल सब

    होली का त्यौहार है न्यारा

    बीत गया दिन कितना प्यारा

    हमें उदास देख माँ बोली

    फिर आएगी प्यारी होली

    3 min
  • ग़ज़ल - तू ही बता (Ghazal - Tu Hi Bata)

    ग़ज़ल - तू ही बता


    क्यों हर समय यादें तेरी आती हमें तू ही बता।

    सोता हूँ तो सपने तेरे मुझको दिखें तू ही बता।

    सीने में हैं तूफाँ बहुत दिल है मगर खाली मेरा।

    हाल-ए-जिगर जाने न तू कैसे कहें तू ही बता।

    है मतलबी सारा जहाँ सोचा कि तुम होगी जुदा।

    तू भी मगर खुदगर्ज है क्या हम करें तू ही बता।

    छोटी सी थी मेरी खता ये बात है तुझको पता।

    इतनी बड़ी दी है सजा कैसे सहें तू ही बता।

    चाहूँ नहीं अपने ग़मों को इस जहाँ से बाँटना।

    आँखों में हैं आँसू बहुत कैसे बहें तू ही बता।

    फ़िरदौस की ख्वाहिश नहीं तेरा अगर दीदार हो।

    दिल में सजे सपने तेरे कैसे हटें तू ही बता।

    बन के ग़ज़ल मेरेे लबों पे आज फिर हो सज गयी।

    तेरे सिवा कुछ और हम कैसे लिखें तू ही बता।


    - विवेक अग्रवाल 'अवि' (सर्व अधिकार सुरक्षित)

    स्वरचित व मौलिक

    5 min
  • ग़ज़ल - सपने तेरे (Ghazal - Sapne Tere)

    ग़ज़ल - सपने तेरे


    जो सब कहें सपने तेरे, मुश्किल बड़े तो क्या हुआ।

    तेरी रज़ा तेरा सफर, अड़चन पड़े तो क्या हुआ।

    पथ पर अगर पत्थर पड़े, ठोकर लगे काँटे चुभें।

    आगे बढ़ो हिम्मत करो, गिर भी गये तो क्या हुआ।

    जो धुन्ध में रस्ता कहीं, खोता लगे थमना नहीं।

    चलते चलो मंज़िल अगर, ना भी दिखे तो क्या हुआ।

    होते हैं सच सपने सभी, कोशिश करो जी जान से।

    थोड़े समय तुमने अगर, दुख भी सहे तो क्या हुआ।

    हर्फ़-ए-अना तुझको कभी, छू भी न पाये ध्यान रख।

    ऊँचाइयाँ तेरे कदम, छूती रहे तो क्या हुआ।

    डरना नहीं डिगना नहीं, दिल में रखो ये हौसला।

    जलते हुये दुनिया अगर, फब्ती कसे तो क्या हुआ।

    तेरे लिये मेरी दुआ तुझ पर रहे 'अवि' का करम।

    रोशन रहे जो तीरगी, तुझको मिले तो क्या हुआ।


    - विवेक अग्रवाल 'अवि' (सर्व अधिकार सुरक्षित)


    6 min

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