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राम रसायन तुम्हरे पासा ।
राम हनुमान से पूछते हैं, तुझे क्या चाहिए? तब हनुमान उत्तर देते हैं, आपके उपर से प्रेम भक्ति कम न हो, तथा राम के अतिरिक्त अन्य भाव निर्माण न हो, मुझे यही चाहिए। उन्होने मुक्ति अथवा स्वर्ग नही मांगा । राम उनको वैकुण्ठ नहीं ले गये, यहीं छोड गये, परन्तु उनके दिल में राम ही है । जहाँ तक राम कथा है वहाँ तक हनुमान अमर है । रामकथा जहाँ चलेगी वहाँ मारुतिराय की कथा चलेगी ही ।
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अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता ।
अस बर दीन्ह जानकी माता ॥ 31 ॥
हनुमानजी अपने भक्तो को आठ प्रकार की सिद्धयाँ तथा नऊ प्रकार की निधियाँ प्रदान कर सकते हैं | ऐसा सीता माता ने उन्हे वरदान दिया । भगवान श्रीराम ने हनुमानजी को प्रसन्न होकर आलिंगन दिया और सीताजी ने उन्हे अष्ट सिद्ध नव निधि के दाता का वर प्रदान किया।सच्चे साधक की सेवा के लिए सिद्धियाँ अपने आप सदैव तैयार रहती है।
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चौपाई:- साधु संत के तुम रखवारे ।
आप साधु और सन्तों तथा सज्जनों की रक्षा करतें हैं तथा दुष्टों का सर्वनाश करतें हैं । तुलसीदासजी कहते हैं कि हनुमानजी साधु पुरुषों का रक्षण करते हैं और दुष्टोका नाश करते हैं । भगवान धरतीपर अवतार लेकर आते है वहीं काम हनुमानजी भी करते हैं प्रभु का वचन है कि धर्म तथा मानवता का हास् होगा तब उनके पुनरुत्थान के लिए मैं जन्म लूँगा ।
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चारों जुग प्रताप तुम्हारा ।
हनुमानजी का यश चारों युग में फेला हुआ है तथा उनकी कीर्ति से सारा संसार प्रकाशमान हुआ है । जो कहने योग्य हो उसे कीर्ति कहते हैं । कीर्ति एक शक्ति है। प्रतिष्ठा कौन देगा ? एक बात सच है, जिसे भगवान के हृदयमें प्रतिष्ठा मिली उसे विश्व में प्रतिष्ठा मिलती है। मन की विविध आवश्यकताएं हैं। उनकी पूर्ति भक्ति से होगी, भगवान से होगी।
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और मनोरथ जो कोई लावै ।
जिस पर आपकी कृपा हो, ऐसा जीव कोई भी अभिलाषा करे तो उसे तुरन्त फल मिल जाता है | जीव जिस फल के विषय में सोंच भी नहीं सकता वह फल मिल जाता है, अर्थात सारी कामनाएं पूरी हो जाती है।हम जो मनोरथ मन के संकल्प करते हैं भगवान उस अनुसार हमें जीवन में फल देते हैं । हमें भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि, भगवान मेरे मन के मनोरथ दिव्य और भव्य हो, संकल्प तेजस्वी हो ।
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सब पर राम तपस्वी राजा,
भगवान रामजी का चरित्र सर्वश्रेष्ठ है, रामचरित्र भावपूर्ण व ऐतिहासिक काव्य है। भारतीय संस्कृति को क्या बनना है यह रामचरित्र पढकर ध्यान में आता है।
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संकट ते हनुमान छुडावै
हमें भगवान की मूर्ति में चित एकाग्र करने के लिए कहते हैं। ऐसी भगवान की मूर्ति लो हमारे मन में स्थापित हो भगवान की भक्ति दो प्रकार से करनी चाहिए, अन्तर्भक्ति और बहिर्भक्ति।अन्तर्भक्ति भगवान का मन और बुद्धि दोनों से ध्यान करना और भगवान के चरणों में मन और बुद्धि को एकाग्र करना | बहिर्भक्ति यानी जिस भगवान पर प्रेम है, उसका काम करना
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नासै रोग हरै सब पीरा,
हनुमानजी का जप करने से रोग, भय विकार इत्यादि का नाश हो जाता है। रोग, भय विकार इन तीनों से जीवन त्रस्त बनता है, इसलिए इन तीनों से मुक्ति चाहिए।रोग मुक्ति यह शारीरिक मुक्ति का लक्षण है, भय और विकार मुक्ति मानसिक मुक्ति के लक्षण हैं। प्रत्येक व्यक्ति परेशान हैं, उसकी परेशानी कौन सी है दुख कुछ आये हुए है और कुछ आनेवाले है, उनकी विवंचना भ्रम यही व्यक्ति का दु:ख है।
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भूत पिसाच निकट नहिं आवैं,
हे पवनपुत्र, आपका महावीर हनुमानजी का नाम सुनकर भूत-पिसाच आदि दुष्ट आत्माएँ पास भी नहीं आ सकती। जो बाहर के शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है उसे वीर कहते हैं तथा जो अंतर्बाह्य शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है उसे महावीर कहते हैं। इंद्रजीत जैसे बाह्य शत्रुओं को तो हनुमान जी ने जीता ही था परन्तु मन के अन्दर रहे हुए काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर आदि असुरों पर भी उन्होने विजय प्राप्त की थी इसीलिए वे महावीर हैं।
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आपन तेज सम्हारो आपै,
आपके सिवाय आपके वेग को कोई नहीं रोक सकता, आपकी गर्जना से तीनों लोक कांप जाते हैं। तुलसीदासजी लिखते हैं कि हनूमानजी का जीवन गतिमान है, इसलिए उनमें तेज है तथा उनकी गति को कोई रोक नहीं सकता। तुलसीदासजी का अभिप्राय यह है कि मानव को अपनी गति, अपना आश्रय निचित करना चाहिए। मनुष्य को अपना सामथ्र्य निचित करना चाहिए, अपना मार्ग निश्चित करना चाहिए।
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