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हनुमान चालीसा की बारहवीं चौपाई का हिंदी अर्थ | हनुमान कथा - केले का पता
रघुपति कीन्ही बहुत बडाई।तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥ 12 ॥
तुलसीदासजी लिखते हैं कि हनुमान जी की प्रशंसा करते हुए भगवान कहते हैं कि तुम मेरे भरत जैसे प्यारे भाई हो यानी तुम मेरे हो यह भगवान अपने मुख से भक्त के लिये कहना यह भक्ति का अन्तिम फल है। हनुमान जी भगवान का कार्य करने को हमेशा आतुर रहते हैं।भगवान, मै तुम्हारा हूँ इस स्थिति पर पहुँचना हो तो उसके लिये साधना कौन सी है?
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हनुमान चालीसा की ग्यारहवीं चौपाई का हिंदी अर्थ हनुमान कथा - राम नाम
लाय सजीवन लखन जिवाये।
हे हनुमानजी आपने संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी को जीवित कर दिया | जिससे श्री रघुवीर ने हर्षित होकर आपको अपने हृदय से लगा लिया। जिस प्रकार मनुष्य के साथ उसकी छाया का होना निश्चित है, उसी प्रकार रामजी के आते ही लक्ष्मण जी और का आना हनुमान जी का आना अनिवार्य ही है।
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हनुमान चालीसा की दसवीं चौपाई का हिंदी अर्थ | हनुमान कथा अमृत बूटी
भीम रुप धरि असुर संहारे।
आपने विकराल रुप धारण करके राक्षसों को मारा और श्री रामचन्द्र जी के उद्धेश्यों को सफल बनाने में सहयोग दिया। यहाँ पर तुलसीदासजी का लिखने का अभिप्राय यह है कि हनुमानजी भगवान का कार्य करते थे, तथा कार्य करते समय उसमें आसुरी वृत्ति के लोग बाधा उत्पन्न करते थे तो उनका उन्होने संहार किया।
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तुलसीदास जी लिखते है हनुमान जी ने सीता माता को अपना छोटा रुप दिखाया इसका तात्पर्य यह है कि जीव कितना ही बडा क्यों न हो परन्तु माता के सामने उसे छोटा ही होना चाहिए।तथा उन्होने आगे लिखा है बिकट रुप धरि लंक जरावा अर्थात जीव भले ही सूक्ष्म हो परंतु उसमें अपार शक्ति होती है तथा उस शक्ति का उपयोग भगवान का साधन बनकर बडे से बडा काम कर सकता है।
सूक्ष्म रुप धरि सियहिं देखावा।
बिकट रुप धरि लंक जरावा ॥ 9 ॥
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प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया ॥ 8 ॥
आप श्रीराम के चरित्र सुनने में आनन्द रस लेते हैं तथा श्रीराम सीता और लक्ष्मण आपके हृदय में बसते हैं। भगवान की कथा में प्रेम होना भक्ति का एक लक्षण है।हनुमानजी का श्री राम कथा नुराग पराकाष्ठा को प्राप्त है जिस की कोई सीमा नहीं है । सच तो यह है कि श्री हनुमानजी ने श्रीराम कथा को जीवन धारा ही बना लिया हैं।
हनुमान चालीसा की सातवीं चौपाई का हिंदी अर्थ | हनुमान कथा विद्या प्राप्ति
विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर ॥ 07॥
हे शंकर के अवतार, हे केशरी नन्दन, आपके पराक्रम और महान यश की संसार भर में वन्दना होती है। श्री हनुमानजी के शंकर सुवन, रुद्रावतार या रुद के अंश से उत्पन्न होने के सम्बंध में अनेक कथाएँ मिलती है। एक बार शिवजी ने श्री रामचन्द्रजी की स्तुति की और यह वर मांगा कि हे प्रभो, मैं दास के भाव से आपकी सेवा करना चाहता हूँ , इसलिए कृप्या मेरे इस मनोरथ को पूर्ण किजिए।
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हनुमान चालीसा की छठी चौपाई का हिंदी अर्थ | हनुमान कथा हनुमद रामायण
शंकर सुवन केसरी नंदन।
हे शंकर के अवतार, हे केशरी नन्दन, आपके पराक्रम और महान यश की संसार भर में वन्दना होती है। श्री हनुमानजी के शंकर सुवन, रुद्रावतार या रुद के अंश से उत्पन्न होने के सम्बंध में अनेक कथाएँ मिलती है। एक बार शिवजी ने श्री रामचन्द्रजी की स्तुति की और यह वर मांगा कि हे प्रभो, मैं दास के भाव से आपकी सेवा करना चाहता हूँ , इसलिए कृप्या मेरे इस मनोरथ को पूर्ण किजिए।
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हनुमान चालीसा की पांचवी चौपाई का हिंदी अर्थ | हनुमान कथा उपनयन संस्कार |
हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजै।
कांधे मूंज जनेउ साजै ॥5॥
आपके हाथ में बज्र और ध्वजा हैं तथा कांधे पर मूंज जनेऊ की शोभा है। तुलसीदासजी यहाँ हनुमानजी के स्वरुप का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि श्री हनुमानजी का हाथ वज्र के समान है तथा उनके हाथ में रामनाम की ध्वजा है। इसका संकेत यह है कि हमें भी हनुमानजी की तरह प्रभु कार्य के लिए वचनबद्ध प्रण लेकर प्रभु नाम और काम की ध्वजा हाथ मे लेनी चाहिए।
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हनुमान चालीसा की चौथी चौपाई का हिंदी अर्थ |
हनुमान कथा हनुमान जी को क्यों पसंद हैं सिंदूर
कंचन बरन बिराज सुवेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥ ॥4॥
तुलसीदासजी जैसे संत जब भगवान का ध्यान करते है, समाधी लगाते है | तब वे समाधी मे तल्लीन हो जाते है तथा उनको भगवान का शरीर, आभूषण, कुण्डल, केस इत्यादि सब सुन्दर लगते है। हमारे जैसे सामान्य इन्सान भी जब प्रेम करते है, उस वक़्त हमें भी उसकी आँख, नाक, कान, सुन्दर लगते हैं। यहाँ तुलसीदासजी वर्णन करते है कि हनुमान जी का शरीर सोने की तरह चमक रहा है |कानों मे कुण्डल शेभायमान है, तथा बल घुंघराले हैं। जिसका जीवन सरल और सुन्दर होता है | हो कुछ भी धारण करे वह सुन्दर ही लगता है।
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी ॥3॥
तुलसीदासजी लिखते हैं हनुमानजी कैसे हैं महावीर बिक्रम बजरंगी हनुमानजी वीरता की साक्षात् प्रतीमा एवं शक्ति तथा बल पराक्रम की जीवंत मूर्ति है। भारतीय मल्लविद्या के ये ही परम इष्ट है, आप कभी अखाडों मे जायँ तो वहाँ आपको महावीर की प्रतीमा अवश्य मिलेगी। उनके चरणों का स्पर्श करके ही पहलवान अपना कार्य प्रारंभ करते है। जिसमें पांच प्रकार की वीरता हो उसे वीर कहते हैं
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