रामायण

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रामायण episodes

  • रामायण - EP 15 - श्रीराम-कौशल्या संवाद, वन गमन की तैयारी
    अपने वचनों से बंधे राजा दशरथ कैकेयी भवन में निढ़ाल पड़े हैं। उनका बुलावा पाकर राम वहा पहुँचते हैं। वे पिता को पीड़ा में देखकर माता कैकेयी से इसका कारण पूछते हैं। कैकयी कड़वे वचन बोलती है। वो कहती है कि उनके पिता ने उसे दो वर दिये थे। अब यह वर पूरे करने में उनका पुत्र मोह आड़े आ रहा है। लेकिन यदि वर पूरे नहीं करते हैं तो धर्म और सत्य पर कलंक लगता है। राम के पूछने पर कैकेयी भरत के राजतिलक और उनके वनागमन का वरदान माँगने की बात बताती है। राम दोनों वरदानों को अपने लिये शुभंकारी बताते हैं। राम कहते हैं कि भरत जैसे भाई को राजपाट देने में उन्हें कोई संकोच नहीं है और वनवास के दौरान तेजस्वी ऋषियों मुनियों के बीच रहना तो उनके लिये कल्याणकारी होगा। राम माता कौशल्या और सुमित्रा से वनागमन के लिये आज्ञा लेने हेतु कैकेयी भवन से प्रस्थान करते हैं। वे द्वार पर राजछत्र का त्याग कर संकेत देते हैं कि अब वे राजा नहीं बनने जा रहे हैं। राम माता कौशल्या को पिता के वचन के बारे में बताते हैं और वनागमन के लिये विदा करने को कहते हैं। कौशल्या को अपने कानों पर विश्वास नहीं होता। वे चक्कर खा जाती हैं। उनके हाथों से पूजा का थाल गिर जाता है। राम उन्हें सम्भालते हैं, रघुकुल की रीति का स्मरण कराते हैं। कैकेयी के वरदान का समाचार सीता तक भी पहुँचता है। वे माता कौशल्या के भवन में आती है और घोषणा करती हैं कि पत्नी धर्म निभाने के लिये वे भी वन जायेंगी। राम मना कर देते हैं। इस पर सीता अपनी चिता जलाने की बात कहकर उन्हें राजी कर लेती हैं। तभी लक्ष्मण हाथों में धनुष बाण लेकर वहाँ पहुचते हैं और कैकेयी के प्रति कटु वचन बोलते हैं। लक्ष्मण भरत को राज्य दिये जाने पर विद्रोह का ऐलान कर देते हैं। राम इससे नाराज होते हैं। वे लक्ष्मण को पिता दशरथ के धर्म संकट और माता कैकेयी की कुबुद्धि के पीछे प्रारब्ध के खेल को समझाते हैं। तब लक्ष्मण भी भैया राम के साथ वन जाने का हठ करते हैं। राम इनकार करते हैं लेकिन तभी छोटी माता सुमित्रा का वहाँ आगमन होता है और वे लक्ष्मण को आदेश देती हैं कि वो राम के साथ वन जायें और उनकी सेवा करें। अब राम ही उनके पिता हैं और सीता माता। लक्ष्मण अपनी माँ पर गर्व करते हैं। कौशल्या को इससे सांत्वना मिलती है। वे लक्ष्मण को सुमित्रा और उर्मिला की धरोहर बताती है और राम से लक्ष्मण की सकुशल वापसी का वचन लेती हैं।

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    39 min
  • रामायण - EP 14 - रानी कैकेयी का कोप भवन जाना। दशरथ के दो वरदान
    मंथरा के उकसाने पर रानी कैकेयी श्रृंगार त्याग कर कोप भवन में है। राजा दशरथ वहाँ आते हैं। कैकेयी उलाहना देते हुए दशरथ को दो वरदानों का स्मरण कराती है। दशरथ प्राण देकर भी अपने वचन पूरा करने का प्रण करते हैं। इसके लिये वे राम की सौगन्ध भी लेते हैं। उधर लक्ष्मण पत्नी उर्मिला के समक्ष भावी रामराज्य में अपने कर्तव्यों का बखान करते हैं। उर्मिला उन्हें पत्नी के प्रति होने वाले कर्तव्यों का स्मरण कराती हैं। रानी कैकेयी पूरे साज श्रृंगार के साथ दशरथ के समक्ष आती है। वो इठलाते हुए पहले वरदान में राम के स्थान पर अपने पुत्र भरत के लिये अयोध्या का राज माँगती है। दूसरे वरदान में वो राम को तपस्वी वेश में चौदह वर्ष का वनवास माँगती है। दशरथ रानी की इस माँग पर स्तब्ध होते हैं। वे कैकेयी को समझाने का भरपूर प्रयास करते हैं। कैकेयी उन्हें वचन तोड़ने का उलाहना देती है। दशरथ को पछतावा होता है कि उन्होने कैकेयी को पहचानने में भूल कर दी। उन्हें स्त्री की अनुचित माँग पूरी करने पर जगहँसाई होने का भी भय है। कैकेयी कहती है कि यदि राम का राज्याभिषेक हुआ तो वो मृत्यु का वरण कर लेगी। दशरथ भरत को राजा बनाने को तैयार होते हैं लेकिन वे कैकेयी से राम को वनवास भेजने की हठ त्यागने को कहते हैं। वे कैकेयी के पैरों पर गिरते हैं। तब कैकेयी दशरथ पर अपनी कठोर वाणी का अन्तिम बाण चलाते हुए उलाहने देती है। दशरथ मूर्च्छित होकर गिर पड़ते हैं। अगली सुबह उनकी मूर्छा प्रभात गीत से टूटती है। वे राम को पुकारते हैं। उधर राजमहल में राम के राज्याभिषेक की तैयारियाँ लगभग पूर्ण हैं लेकिन दशरथ के न पहुँचने और पुष्य नक्षत्र बीतते जाने से महर्षि वशिष्ठ चिन्तित हैं। मंत्री सुमन्त उनका सन्देश लेकर कैकेयी भवन में दशरथ के पास पहुँचते हैं। कैकेयी उन्हें पहले राम को बुला लाने का आदेश देती है। सुमन्त से सन्देश पाकर राम पिता से मिलने कैकेयी भवन की ओर प्रस्थान करते हैं।

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    36 min
  • रामायण - EP 13 - श्री राम के राज्याभिषेक की तैयारी। कैकेयी-मन्थरा संवाद
    राजमहल में सीता को राम के राज्याभिषेक की सूचना लक्ष्मण द्वारा मिलती है। राम भाईयों के साथ राजपाट चलाने की इच्छा रखते हैं किन्तु कुल परम्परानुसार उन्हें ही युवराज घोषित किया गया है। नगर में उनके राज्याभिषेक का ढिंढोरा बजता है। चारों ओर उत्सव सा महौल है। प्रजा गली चौक, खेत खलिहानों में बधाई गीत गाती दिखती है। पूरी अयोध्या नववधू की तरह सजायी जा रही है। यह दृश्य देखकर कैकेयी की कुबड़ी दासी मंथरा झुंझला जाती है। वो आपे से बाहर होकर उत्सव भंग करती है। वो रानी कैकेयी के महल में जाती है और उन्हें राम के राज्याभिषेक के विरूद्ध भड़काती है। वो कैकेयी के दिमाग में भर देती है कि राजा बनने के बाद राम का अपने भाईयों के प्रति प्रेम जाता रहेगा और वो उन्हें अपने मार्ग के कांटे की तरह साफ कर देगा। राजा राम की माँ कौशल्या अपनी सौत कैकेयी को दासी बनाकर रखेगी। मंथरा कैकेयी के अन्दर भरत को राजा बनाने का सपना दिखाती है और अपनी कुटिल बुद्धि से एक षडयन्त्र रचते हुए उन्हें राजा दशरथ के दिये दो वचनों का स्मरण कराती है। एक बार देवासुर संग्राम में राजा दशरथ असुरों के प्रहार से मूर्च्छित हो गये थे। उनकी सारथी बनी कैकेयी उन्हें रथ समेत सुरक्षित युद्धभूमि से बाहर ले गयी थी और उनके घाव भी ठीक किये थे। तब दशरथ ने उन्हें कभी भी दो वरदान माँग लेने का वचन दिया था। मंथरा कैकेयी से कहती है कि अब राजा दशरथ को उन दो वरदानों की याद दिला कर पहले से भरत के राजतिलक और दूसरे से राम को चौदह वर्ष के लिये वनवास भेजने के माँग करे। राम के वनवास को लेकर कैकेयी का मन दुविधा से भरता है लेकिन मंथरा उन्हें समझाती है कि भरत के निष्कंटक राज के लिये राम का अयोध्या से दूर रहना आवश्यक है। कैकेयी दम्भपूर्व स्वर में दासी को राजा दशरथ को बुलाने के लिये भेजती है। प्रहरी उसे दशरथ के कक्ष में नहीं जाने देता। तब मंथरा के सिखाने पर कैकेयी त्रिया चरित्र दिखाते हुए कोप भवन में चली जाती है। दशरथ कैकेयी के कोप भवन में जाने की सूचना पाकर परेशान होते हैं।

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    36 min
  • रामायण - EP 12 - भरत-शत्रुघ्न ननिहाल जाते हैं । दशरथ राम के राज्याभिषेक का निर्णय लेते हैं।
    भरत के विवाहोत्सव में शामिल होने के लिये उनके मामा युधाजित अयोध्या में हैं। कुछ दिन बाद रानी कैकेयी के पिता राजा अश्वपति का स्वास्थ्य खराब होने की सूचना आती है इसलिए कैकेयी भरत-शत्रुघ्न को अपने मामा के साथ कैकेय प्रदेश जाने के लिये कहती हैं। भरत शत्रुघ्न पितातुल्य अग्रज राम और भाभी सीता का आशीर्वाद लेते हैं। राम अपने भाई से दूर नहीं रहना चाहते इसलिये उनका मन भरत संग जाने का है लेकिन वे माता पिता की सेवा के लिये अयोध्या में ही रूकते हैं। ऋषि विश्वामित्र भी अब अयोध्या से विदा लेना चाहते हैं। राजा दशरथ उनसे रूकने का आग्रह करते हैं किन्तु विश्वामित्र जानते हैं कि यदि वे राजमहल की मोहमाया में फँसते हैं तो वे पुनः अपने कर्तव्य पथ से विमुख हो जायेंगे। ऋषि विश्वामित्र उन्हें अपनी कथा सुनाते हैं कि किस प्रकार इन्द्र ने मेनका को उनकी तपस्या भंग करने के लिये भेजा था। मेनका ने अपनी अदाओं से उनको मोहित किया था और उनकी तपस्या भंग कर दी थी। महर्षि वशिष्ठ भी दशरथ को समझाते हैं कि नदी और साधु का एक स्थान पर रूकना ठीक नहीं होता। विश्वामित्र जी के जाने के बाद भी उनके ये वचन राजा दशरथ के कानों में गूँजते रहते हैं कि सांसारिक कर्तव्य पूरे करने के बाद मनुष्य को अपने पारिवारिक बन्धन तोड़कर अध्यात्म की तरफ मुड़ जाना चाहिये। दशरथ महर्षि वशिष्ठ के आश्रम जाकर उनसे एकान्त में अपनी मन की बात कहते हैं कि वे राम को राजपाट सौंपना चाहते हैं। वशिष्ठ उनसे इसके लिये वंश परम्परानुसार राजसभा बुलाने का परामर्श देते हैं। राजसभा में सर्वसम्मति से राम के राज्याभिषेक का अनुमोदन होता है। राम को राजसभा में बुलाया जाता है। सभा में वशिष्ठ राम से राज्यभार सम्भालने को कहते हैं। राम अपने पिता का राज सिंहासन ग्रहण करने को अनुचित बताकर इस निर्णय को अस्वीकार कर देते हैं। दशरथ राम को पुत्र-धर्म का भान कराते हैं। वशिष्ठ भी राम को बताते हैं कि मोक्ष प्राप्ति के लिये दशरथ का वानप्रस्थ आवश्यक है। अन्ततः राम भारी मन से इस निर्णय को राजाज्ञा मानकर स्वीकार करते हैं। पूरे सभागृह में राजा रामचन्द्र की जय जयकार होती है। राम के राज्याभिषेक का समाचार राजमहल पहुँचता है। माता कौशल्या की प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं है। छोटी रानी सुमित्रा अपने पुत्र लक्ष्मण को राजा राम के आधीन करती हैं।

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    36 min
  • रामायण - EP 11 - राम बारात की विदाई। अयोध्या में सीता का स्वागत और राम का एक पत्नीव्रत।
    अयोध्या में तीनों रानियाँ बारात वापसी की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रही हैं। किन्तु राजा जनक व पूरी बारात लम्बी अवधि से मिथिला में अतिथि बनकर रूकी हुई है। मंझली रानी कैकेयी का मत है कि महाराज दशरथ वरपक्ष वाले हैं, वे अधिकारपूर्वक बारात विदा करने की बात राजा जनक से कह सकते हैं। उधर मिथिला में मंत्री सुमन्त का भी यही भाव है किन्तु दशरथ राजा जनक के इस दर्द को समझते हैं कि एक पिता के लिये अपनी बेटी को विदा करना कितना कठिन होता है। तब सुमन्त उन्हें राजधर्म का स्मरण कराते हैं। आखिरकार ऋषि विश्वामित्र और ऋषि शतानन्द द्वारा सांसारिक नियम समझाने पर राजा जनक चारों पुत्रियों को विदा करने पर सहमत होते हैं। रनिवास में रानी सुनयना चारों पुत्रियों को नारी धर्म की शिक्षा देती हैं। पति, सास और ससुर की सेवा करने और ससुराल का मान रखने की सीख भी देती हैं। राम अपने तीनों भाईयों के साथ विदाई कराने रनिवास पहुँचते हैं। राजा जनक भाव विहवल ढंग से अपनी बेटियाँ राजा दशरथ को सौंपते हुए उनकी किसी भी गलती पर क्षमा करने की गुहार करते हैं। राजा दशरथ विनय भाव से घोषणा करते हैं कि सीता आने वाले समय में अयोध्या की महारानी बनेंगी इसलिये उसका आदर सत्कार किसी रानी की भाँति होगा। अपनी दुलारी सीता को डोली में बैठाते समय जनक उसे ससुराल में मायके की कीर्ति को नष्ट न होने देने की सीख देते हैं। बारात वापसी का अयोध्या में भव्य स्वागत होता है। अयोध्या स्वयं को धन्य महसूस करती है। द्वारचार पश्चात गुरू वशिष्ठ कुल देवता सूर्य का पूजन सम्पन्न कराते हैं। रानियाँ अपने चारों पुत्रों व पुत्रवधुओं के बीच दूध भात खिलाने की रस्म अदा कराती हैं। राम दूध भरे पात्र से कंगन ढूँढने की रस्म में सीता को जीतने देते हैं। भाईयों के बीच खूब चुहल होती है। प्रथम मिलन की रात्रि राम सीता को एक अनूठा उपहार देते हैं। वे कहते हैं कि राजकुलों में बहुविवाह की परम्परा है किन्तु उन्होंने सीता को अर्धांगिनी बनाना स्वीकार कर एक पत्नीव्रत की प्रतिज्ञा की है। अन्त में रामानन्द सागर अपनी मीमांसा में बताते हैं कि रामायण में इस प्रसंग के साथ बालकाण्ड का समापन होता है।

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    36 min
  • रामायण - EP 10 - श्री राम सीता विवाह
    अयोध्या के राजमहल में शुभ समाचार पहुँचता है कि राम के साथ साथ भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का विवाह भी निश्चित हो गया है। तीनों रानियों की प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं है। यहाँ से मंथरा की कुटिल बुद्धि काम करना शुरू कर देती है। वो कैकेयी को भरत के स्वागत के लिये अलग से विशेष प्रबन्ध करने का परामर्श देती है। वो कैकेयी से अपने पिता व कैकेय देश के राजा अश्वपति को सन्देश भेजने को कहती है। उधर जनकपुरी में मंगल गीतों के बीच राम समेत चारों राजकुमार लग्न मण्डप में पहुँचते हैं। भगवान शिव, भगवान ब्रह्मा, देवी पार्वती व सरस्वती भी मनुष्य रूप धारण इस महान अवसर के साक्षी बनते हैं। राजा जनक राम के चरण पखार कर कन्यादान करते हैं। राम का सीता, भरत का माण्डवी, लक्ष्मण का उर्मिला और शत्रुघ्न का श्रुतकीर्ति के साथ पाणिग्रहण संस्कार सम्पन्न होता है। चारों नव जोड़े पिता दशरथ और गुरू वशिष्ठ से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। रानी सुनयना बेटी की विदाई की इस घड़ी पर अपनी वेदना व्यक्त करती हैं। राजा जनक में भी यही भाव है। वे राजा दशरथ के पास याची की भाँति पहुचते हैं और उनसे बेटी की विदाई को कुछ दिन टालने और बारात को मिथिला में रूकने का निवेदन करते हैं। दशरथ उनके मनचाहे दिवसों तक मिथिला में रहने का वचन देते हैं।

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    36 min
  • रामायण - EP 9 - राजा जनक का राजा दशरथ को सन्देश। राम बारात का मिथिला में आगमन।
    राजा जनक का सन्देश अयोध्या पहुँचता है। राजा दशरथ अपने महल में हैं। कौशल्या और कैकेयी के भी वहाँ आने पर भरत और शत्रुघ्न उन्हें भैया राम का विवाह तय होने का समाचार बड़ा ही कौतूहल जागृत करने के भाव से सुनाते हैं। इसके पश्चात दशरथ मिथिला के राजदूत देवव्रत से सभागृह में मिलते हैं। देवव्रत राम और सीता के विवाह हेतु राजा जनक का प्रस्ताव उनके सम्मुख रखते हैं और उन्हें बारात लाने का आमंत्रण देते हैं। दशरथ के आग्रह पर महर्षि वशिष्ठ इस निमन्त्रण को स्वीकृति प्रदान करते हैं। दशरथ राजदूत को राज्य की तरफ से उपहार भेंट करते हैं जिसे वो स्वयं को लड़की पक्ष का बताकर विनयपूर्वक अस्वीकार कर देते हैं। राजा दशरथ ऋषियों मुनियों, मंत्रियों तथा समस्त प्रजाजन को बारात में चलने का निमन्त्रण भरत और शत्रुघ्न के द्वारा भिजवाते हैं। कौशल्या आर्य सुमन्त को याचकों को राजकोष से दान देने का निर्देश देती हैं। दशरथ बारात लेकर मिथिला पहुँचते हैं। जनक बारात का स्वागत करते हैं। जनक के अन्दर कन्या का पिता होने का दास भाव है तो दशरथ भी स्वयं को याची बताकर अपनी विनयशीलता का परिचय देते हैं। लक्ष्मण बड़े भाई राम को पिता दशरथ के आने की सूचना देते हैं लेकिन राम में भी रघुकुल के संस्कार हैं। वे कहते हैं कि इस समय वे गुरू विश्वामित्र के आधीन हैं तो उनकी आज्ञा के बिना पिता से भेंट नहीं की जा सकती। तभी विश्वामित्र उन्हें ले चलने के लिये आते हैं। रात्रि में राम पिता की सेवा करते हैं। दशरथ को सुयोग्य पुत्र का पिता होने का गर्व होता है। उधर लक्ष्मण भैया राम और भाभी सीता के पुष्प वाटिका में हुए प्रथम साक्षात्कार की कहानी बहुत ही रस लेकर अपने भाईयों भरत और शत्रुघ्न को सुनाते हैं। मिथिला के सभागृह में दोनों राजन अपने अपने आचार्यों और परिवारीजनों के साथ मंत्रणा करते हैं। महर्षि वशिष्ठ राजा दशरथ की कुल परम्परा का बखान करते हुए राजा जनक से राम का विवाह सीता से और उनकी दूसरी पुत्री उर्मिला का विवाह लक्ष्मण संग करने का प्रस्ताव रखते हैं। जनक इसे सहर्ष स्वीकार करते हैं। ऋषि विश्वामित्र भी अपने मन की बात रखते हैं। वे राजा जनक के अनुज व सांकाश्या राज्य के शासक कुशध्वज की पुत्रियों माण्डवी और श्रुतकीर्ति के साथ भरत और शत्रुघ्न के विवाह का प्रस्ताव रखते हैं। जनक अपने भाई कुशध्वज की ओर से इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हैं। सखियाँ यह शुभ समाचार सीता और उनकी बहनों तक पहुँचाती हैं।

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    35 min
  • Ramayan EP 8 - श्री राम द्वारा धनुषभंग | जयमाला पहनाना

    In the eighth episode of Ramayan, Rama successfully strings the unlifted bow and breaks it, winning the Swayamvar competition and earning the right to marry Sita. The episode begins with a celebration of Rama's victory, as he is honored with a Jai Mala ceremony and garlanded by Janak and the other dignitaries.

    As preparations are made for Rama and Sita's wedding, Rama's father King Dasharath visits Janak's palace with his wives and retinue. However, his arrival is overshadowed by the news of a terrible omen: Dasharath has had a nightmare in which he sees Rama leaving Ayodhya and entering into the forest. The king is deeply disturbed by this vision and seeks counsel from his advisors, who warn him of an impending danger to Rama's life.

    Despite these ominous signs, Rama and Sita are formally engaged in a ceremony where they exchange garlands and are blessed by the assembled gods and sages. The episode ends on a cliffhanger, as a mysterious figure appears in the crowd and threatens to disrupt the wedding ceremony.

    As the eighth episode of the Ramayan TV show, this installment builds on the previous episode's dramatic events and sets the stage for even greater conflicts and challenges. It also highlights the depth of Rama and Sita's love and their commitment to each other, despite the obstacles they will soon face.


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    37 min
  • रामायण - EP 7 - सीता स्वयंवर। राजाओं से धनुष न उठना। जनक की निराशाजनक वाणी।

    आज सीता स्वयंवर का दिन है। जनकपुरी में चारों ओर उमंग का वातावरण है। राम लक्ष्मण स्वयंवर में जाने की तैयारी करते हैं। लक्ष्मण बड़े भाई राम को विश्वास दिलाते हैं कि स्वयंवर में वे ही विजयी होंगे। शहनाई, तुरही और शंख ध्वनि के साथ स्वयंवर प्रारम्भ होता है। कई राज्यों के राजा इस स्वयंवर में भाग लेने आये हैं। उनकी दम्भपूर्ण और ललकार भरी बातों से जनक कुछ परेशान से होते हैं। तभी विश्वामित्र राम व लक्ष्मण के साथ सभा में प्रवेश करते हैं। जनक का चेहरा खिल उठता है। वे आगे बढ़कर उनका स्वागत करते हैं। राजाओं के बीच कौतूहल उपजता है लेकिन वे आश्वस्त हैं कि सुकोमल दिखने वाले राम लक्ष्मण शिव धनुष को हिला भी न पायेंगे। सीता को स्वयंवर स्थल पर लाया जाता है। चारण और भाटों की एक टोली राजा जनक की प्रशंसा में एक गीत गाती है। एक चारण अपने गीत में वहाँ रखे शिव धनुष को इंगित कर राजा जनक का प्रण बताता है कि इस पर प्रत्यंचा चढ़ाने वाले पराक्रमी के साथ सीता का विवाह होगा।


    वहाँ उपस्थित राजा और क्षत्रिय अपना बल और पराक्रम दिखाने बारी-बारी से आते हैं लेकिन शिव धनुष को अपने स्थान से हिला तक नहीं पाते। राम और लक्ष्मण शान्त रहते हैं। लेकिन ये दृश्य देखकर सीता की माँ सुनयना चिन्तित हो जाती है। कई राजा एक साथ मिलकर धनुष उठाने को आगे आते हैं लेकिन जनक इसे अपमानपूर्ण मानकर रोक देते हैं।


    राजा जनक सभा को निराशाजनक स्वर में सम्बोधित करते हुए पछतावा करते हैं कि उन्होंने इस प्रण को ठानकर अपनी पुत्री के विवाह को कठिन बना दिया है। वे सवाल उठाते हैं कि क्या पृथ्वी वीरों से खाली हो चुकी है। जनक के यह वचन लक्ष्मण को तीर की तरह चुभते हैं। वे उठकर जनक को टोकते हुए कहते हैं कि उन्हें याद रखना चाहिये कि इस सभा में सूर्यवंशी रघुकुल के युवराज श्रीराम उपस्थित हैं। भगवान शेषनाग के अवतार लक्ष्मण चुनौती देते हैं कि यदि उन्हें अपने गुरु की आज्ञा मिल जाये तो वे पूरे ब्रह्माण्ड को गेंद की भाँति उछाल कर अपना पराक्रम दिखा सकते हैं। लेकिन विश्वामित्र लक्ष्मण को आसन पर वापस आने के लिये कहते हैं। विश्वामित्र सभा के मनोभाव को पढ़ते हैं और राम को राजा जनक की परेशानी दूर करने की आज्ञा देते हैं। गुरु की आज्ञा पर राम सहज भाव से शिव धनुष के पास जाते हैं। अन्य राजा उनका उपहास उड़़ाते हैं। तमाम शंकाओं से ग्रसित महारानी सुनयना भी राम के किशोरवय को देखकर परेशान हैं। उनका मन इस स्वयंवर को स्थगित करने का है किन्तु उनकी देवरानी आशान्वित दिखती हैं और वह स्वयंवर जारी रखने का परामर्श देती हty.


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    37 min
  • Ramayan EP 6 - राम-लक्ष्मण सहित विश्वामित्र जनकपुर प्रवेश

    In the sixth episode of Ramayan, Rama, Lakshmana, and Vishwamitra arrive at the city of Janakpur, the capital of Mithila. Janak, the king of Mithila, has announced a competition to find a suitable husband for his daughter, Sita, and many princes and kings have come to participate. Vishwamitra hopes that Rama will prove his strength and skills in the competition, and also wishes to see Sita and evaluate her qualities as a wife for Rama.

    As Rama and Lakshmana enter the city, they witness the grandeur and beauty of Mithila and are impressed by its people and customs. Janak receives them warmly and invites them to participate in the competition. As the episode progresses, we see Rama and Lakshmana showcasing their skills in archery, wrestling, and other activities, impressing the assembled audience and winning the admiration of Janak.

    Meanwhile, Sita also watches the competition from afar and is impressed by Rama's skill and character. She develops a deep admiration and respect for him, which will play a crucial role in their later interactions.

    As the sixth episode of the Ramayan TV show, this episode sets the stage for the upcoming events in the story, as Rama and Sita's fateful encounter draws nearer. It also highlights the themes of strength, skill, and merit, as the princes and kings compete to win Sita's hand, and the importance of virtue and character, as Rama and Lakshmana demonstrate their impeccable conduct and honourable intentions.


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    37 min

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