Suno Kahaniyan

Suno Kahaniyan

By PoonamArtsBooks
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Suno Kahaniyan episodes

  • Ginni story by Rabindranath Tagore
    https://youtu.be/uvipo9130ao Ginni Rabindranath Tagore
    गिन्‍नी रबीन्द्रनाथ टैगोर
    हमारे पंडित शिवनाथ छात्रवृत्ति कक्षा से दो-तीन क्लास नीचे के अध्यापक थे। उनके दाढ़ी-मूँछ नहीं थी, बाल छँटे हुए थे और चोटी छोटी-सी थी। उन्हें देखते ही बच्चों की अन्तरात्मा सूख जाती थी।
    प्राणियों में देखा जाता है कि जिनके दंश होता है उनके दाँत नहीं होते। हमारे पंडित महाशय के दोनों एक साथ थे। एक तरफ से चाँटे, थप्पड़, मुक्के ऐसे बरसाते जैसे छोटे पौधों पर ओले बरसते हैं, दूसरी तरफ से तीखे वाक्यों की आग से प्राण बाहर आने को हो जाते।
    इनका आक्षेप था कि अब पुराने ज़माने की तरह गुरु-शिष्य सम्बन्ध नहीं रहा; अब छात्र गुरुओं की देवता के समान भक्ति नहीं करते; यह कहकर अपनी उपेक्षित महिमा बच्चों के दिमाग में बलपूर्वक भरते थे; और बीच-बीच में हुंकार उठते थे, पर उसमें इतनी छोटी बातें मिली रहती थीं कि उन्हें देवता की गर्जना मानने का भ्रम कोई नहीं कर सकता था। अगर वज्रनाद की तरह गर्जना से बाप को गाली दी जाए, तो उसके पीछे छिपी बंगाली की क्षुद्रता फौरन पकड़ में आ जाएगी।
    जो भी हो, हमारे स्कूल के इस तीसरी कक्षा के दूसरे विभाग के देवता को कोई इन्द्र चन्द्र वरुण या कार्तिक मानने का भ्रम नहीं कर सकता; सिर्फ एक देवता के साथ उनका सादृश्य माना जा सकता है, और उनका नाम है यम; और इतने दिन बाद स्वीकार करने में न डर है न दोष, कि हम मन-ही-मन यह कामना करते थे कि उपरोक्त देवता के यहाँ जाने में उन्हें और देर न हो।
    पर यह अच्छी तरह समझ में आ गया था कि नरदेवता जैसा दुष्ट कुछ नहीं है। स्वर्ग में रहनेवाले देवता कोई उपद्रव नहीं करते। पेड़ पर से एक फूल तोड़कर दे दो तो खुश हो जाते हैं, न दो तो तकाज़ा करने नहीं आते। हमारे नरदेवता गण बहुत ज्यादा चाहते हैं, और हमारी तिलभर भूल होते ही दोनों आँखें खून के से लाल रंग को करके डाँटने आते, तब वे किसी तरह देवता जैसे नहीं दिखते।
    बच्चों को तंग करने के लिए हमारे शिवनाथ पंडित के पास एक अस्त्र था, वह सुनने में जितना मामूली लगता था, उतना ही भयानक था। वे लड़कों के नये नाम रखते थे। नाम चीज़ तो सिर्फ शब्द है और कुछ नहीं किन्तु अधिकतर लोग अपने से ज्यादा अपने नाम को प्यार करते हैं; अपने नाम के प्रचार के लिए लोग क्या-क्या कष्ट नहीं सहते, यहाँ तक कि नाम को बचाने के लिए लोग अपने आप मरने में भी नहीं झिझकते।
    ऐसे नाम के प्रेमी मनुष्य के नाम को विकृत कर देने से उसके प्राणों से प्रिय स्थान पर आघात पहुँचाना होता है। यहाँ तक कि जिसका नाम भूतनाथ है उसे अगर नलिनीकान्त बुलाओ तो भी उसे असहा लगता है।
    इससे यह पता चलता है कि मनुष्य वस्तु से अवस्तु को ज्यादा मूल्यवान समझता है, सोने से ज्यादा वाणी, प्राणों से अधिक मान और अपने से ज्यादा अपने नाम को बड़ा समझता है।
    मानव-स्वभाव में छिपे इन सब गृढ़ नियमों को जानने वाले पंडित महाशय ने जब शशिशेखर को भेटकी (एक प्रकार की मछली) नाम दिया तब वह बहुत दुखी हो उठा। ख़ासकर उस नामकरण में उसके चेहरे की तरह खास इशारा है जानकर उसकी आन्तरिक पीड़ा दुगुनी हो उठी, फिर भी शान्त भाव से सब कुछ सहकर चुप रहकर बैठना पड़ा।
    आशु का नाम था गिन्‍नी, पर उसके साथ थोड़ा इतिहास जुड़ा था।
    आशु बेचारा पूरी क्लास में सबसे शरीफ था। किसी से कुछ नहीं कहता था, बहुत शरमीला था; लगता है उम्र में भी सबसे छोटा था, सब बातों में सिर्फ धीरे- धीरे मुस्कराता रहता था; अच्छी तरह पढ़ता था; स्कूल के बहुत-से लड़के उससे दोस्ती करने को तैयार रहते थे पर वह किसी लड़के के साथ नहीं खेलता था, और छुट्टी होते ही पलभर की देरी किए बिना घर चला जाता था।
    पत्ते के दोने में दो-एक मिठाई और काँसे के छोटे-से लोटे में पानी लेकर ठीक एक बजे घर से दासी आती थी। आशु को इससे बहुत शर्म आती थी; दासी के लौटने पर उसकी जान में जान आती थी। वह स्कूल का छात्र होने के अलावा भी कुछ है, यह स्कूल के लड़कों के सामने व्यक्त करना उसे अच्छा नहीं लगता था। वह घर का कुछ है, माँ-बाप का बेटा है, भाई-बहनों का भाई है, यह जैसे गुप्त बात है, यह वह साथियों को बताना नहीं चाहता था, उसकी यही कोशिश रहती थी।
    पढ़ाई-लिखाई के बारे में उसमें कोई कमी नहीं थी, सिर्फ कभी-कभी क्लास में आने में देर हो जाती थी, और शिवनाथ पंडित जब इसका कारण पूछते तो वह कोई ठीक जवाब नहीं दे पाता था। इसलिए बीच-बीच में उसकी बहुत भर्त्सना की जाती थी। पंडित उसे घुटनों पर हाथ रखकर पीठ नीची करके बरामदे में सीढ़ियों के पास खड़ा कर देते थे; चारों क्लासों के लड़के उस शरमीले अभागे बच्चे को इस स्थिति में देखते थे।
    एक दिन ग्रहण की छुट्टी थी। उससे अगले दिन स्कूल आकर पंडितजी महाराज चौकी पर बैठे और दरवाज़े की तरफ देखा,
    10 min
  • Sampadak story by Rabindranath Tagore
    https://youtu.be/M7-xxEjcm9Y Sampadak Rabindranath Tagore
    संपादक रबीन्द्रनाथ टैगोर
    अपनी पत्नी के जीवनकाल में मुझे प्रभा की कोई चिन्ता नहीं थी। तब प्रभा की अपेक्षा उसकी माँ को लेकर ज्यादा व्यस्त रहता था।
    उन दिनों सिर्फ प्रभा का खेल, उसकी हँसी देखकर, उसकी टूटी-फूटी बातें सुनकर और प्यार करके तृप्त हो जाता था; जब तक मन करता हिलाता-डुलाता, पर रोना शुरू होते ही उसकी माँ को गोद में सौंपकर उस झमेले से छूट जाता। यह बात कभी मेरे मन में भी नहीं आई थी कि उसे बड़ा करने में बड़ी मेहनत और चिन्ता करनी पड़ेगी।
    असमय में मेरी पत्नी की मृत्यु होने पर बेटी माँ की गोद से मेरी गोद में आ पड़ी। मैंने उसे छाती से लगा लिया।
    पर मैं ठीक से समझ नहीं पा रहा था कि मैं मातृहीना बेटी को दुगने स्नेह से पालने को अपना कर्तव्य मानकर उसके बारे में ज्यादा सोचता था या वह पत्नीहीन पिता को सँभालने के अपने कर्तव्य के बारे में ज्यादा सोचती थी। छह साल की होते न होते उसने मालकिन का भाव दिखाना शुरू कर दिया। साफ दिखता था कि इतनी- सी लड़की अपने पिता की एकमात्र अभिभावक होने की कोशिश करती थी।
    मैंने मन-ही-मन हँसकर उसके हाथों में आत्मसमर्पण कर दिया। देखा, मैं जितना अकर्मण्य और असहाय होता हूँ उसे उतना ही अच्छा लगता है; अगर मैं अपनी धोती तह करके और छाता बन्द करके रख दूँ तो उसके चेहरे का भाव ऐसा हो जाता है जैसे उसके अधिकार में हस्तक्षेप किया जा रहा है। पिता जैसी बड़ी गुड़िया उसे इससे पहले कभी नहीं मिली थी, इसीलिए उन्हें खिला पिलाकर बिस्तर पर सुलाकर वह सारा दिन बहुत खुश रहती थी। केवल हिसाब और साहित्य पढ़ाते समय मेरे पितृत्व को थोड़ा सजग होना पड़ता था।
    पर बीच-बीच में यह चिन्ता होने लगती थी कि लड़की को सत्पात्र से ब्याहते समय बहुत पैसों की ज़रूरत होगी--मेरे पास इतना रुपया कहाँ है। लड़की को अपनी सामर्थ्य के अनुसार पढ़ा-लिखा तो दिया, पर अगर एक पूरे बेवकूफ के हाथ में देनी पड़ी तो उसकी क्‍या दशा होगी।
    कमाने की तरफ ध्यान देने लगा। सरकारी दफ्तर में नौकरी की उम्र निकल गई थी, दूसरे ऑफिस में जाने की क्षमता नहीं है। बहुत सोचने के बाद एक किताब लिखने का निश्चय किया।
    बाँस की नली में छेद करके तेल या पानी नहीं रखा जा सकता, क्योंकि उसमें कुछ रोक सकने को ताकत ही नहीं रहती; उससे कोई काम नहीं लिया जा सकता, पर फूँक मारते ही बिना किसी ख़र्च के बाँसुरी अच्छी बजती है। मैं अच्छी तरह जान गया था कि जिस हतभागे की दुनिया के किसी काम में अकल नहीं चलती, वह अच्छी किताब जरूर लिख लेगा। इसी हिम्मत पर मैंने एक प्रहसन लिखा, जो लोगों ने अच्छा कहा और रंगभूमि पर अभिनय भी हुआ।
    अचानक यश का स्वाद पाकर ऐसी मुश्किल हो गई कि किसी तरह प्रहसन लिखने का मोह नहीं छोड़ पाता था। पूरा दिन व्याकुल चिन्तित मुख से प्रहसन लिखने की चेष्टा करता रहता था। प्रभा आकर बड़े प्यार से स्नेहपूर्ण हँसी के साथ पूछने लगी, 'बाबा, नहाने नहीं जाओगे ?' मैं खीझकर बोला, 'अभी जा, जा, अभी तंग मत कर ।'
    बच्ची का चेहरा फूँक से बुझाये गए दीपक की तरह काला हो गया होगा; कब वह अभिमान से भरी छाती लिए चुपचाप कमरे से बाहर चली गई मुझे पता भी नहीं चला।
    दासी को भगा देता हूँ, नौकर को मारने को उठता हूँ, भिखारी गाता-गाता भीख माँगने आता है तो लाठी दिखाकर भगाता हूँ। मेरा घर सड़क के किनारे पर है इसलिए अगर कोई बेचारा पथिक खिड़की के बाहर से मुझसे रास्ता पूछे तो उसे जहन्नुम में जाने को कहता हूँ। हाय, कोई नहीं समझता था कि मैं एक बहुत मज़ेदार प्रहसन लिख रहा था।
    पर लिखने में जितना मज़ा आ रहा था और जितना यश मिल रहा था उतने पैसे नहीं मिल रहे थे। तब पैसों की बात मन में भी नहीं आ रही थी। इधर प्रभा के योग्य बर दूसरे शरीफ लोगों को उनकी कन्या के दायित्व से मुक्त करने के लिए समृद्ध परिवारों की तरफ बढ़ने लगे, इस तरफ मेरा ध्यान भी नहीं गया।
    पेट में आग लगे बिना होश नहीं रहता था, पर इन्हीं दिनों एक अच्छा मौका मिला । जाहिर गाँव के जमींदार ने एक अखबार निकाला और मुझसे उसका वेतनभोगी संपादक बनने का अनुरोध किया। मैंने काम ले लिया और कुछ इतने जोश से लिखने लगा कि सड़क पर चलता था तो लोग उँगली से इशारा कर मुझे दिखाते थे और मैं अपने को मध्याह्न की तपन के समान तीव्र समझने लगा जिसे दूसरे देखने में असमर्थ थे।
    जाहिर गाँव के पास ही आहिर गाँव था। दोनों गाँवों के जमींदारों में बहुत होड़ा- होड़ी थी। पहले बात-बात पर लाठी चलती थी। अब दोनों पक्षों ने मजिस्ट्रेट को मुचलका देकर लाठी बंद कर दी और मुझ बेचारे भगवान के जीव को खूनी लठैतों की जगह नियुक्त कर दिया। सभी कहने लगे कि मैंने अपनी पदमर्यादा की रक्षा की।
    मेरे लिखने से परेशान आहिर गाँव सिर नहीं उठा पा रहा था। मैंने उनके जाति
    12 min
  • Yeh Swatantra Story by Rabindranath Tagore
    Yeh Swatantra Story by Rabindranath Tagore पाठक चक्रवर्ती अपने मुहल्ले के लड़कों का नेता था। सब उसकी आज्ञा मानते थे। यदि कोई उसके विरुध्द जाता तो उस पर आफत आ जाती, सब मुहल्ले के लड़के उसको मारते थे। आखिरकार बेचारे को विवश होकर पाठक से क्षमा मांगनी पड़ती। एक बार पाठक ने एक नया खेल सोचा। नदी के किनारे एक लकड़ी का बड़ा लट्ठा पड़ा था, जिसकी नौका बनाई जाने वाली थी। पाठक ने कहा- ''हम सब मिलकर उस लट्ठे को लुढ़काएं, लट्टे का स्वामी हम पर क्रुध्द होगा और हम सब उसका मजाक उड़ाकर खूब हंसेंगे।'' सब लड़कों ने उसका अनुमोदन किया।
    जब खेल आरम्भ होने वाला था तो पाठक का छोटा भाई मक्खन बिना किसी से एक भी शब्द कहे उस लट्ठे पर बैठ गया। लड़के रुके और एक क्षण तक मौन रहे। फिर एक लड़के ने उसको धक्का दिया, परन्तु वह न उठा। यह देखकर पाठक को क्रोध आया। उसने कहा- ''मक्खन, यदि तू न उठेगा तो इसका बुरा परिणाम होगा।'' किन्तु मक्खन यह सुनकर और आराम से बैठ गया। अब यदि पाठक कुछ हल्का पड़ता, तो उसकी बात जाती रहती। बस, उसने आज्ञा दी कि लट्ठा लुढ़का दिया जाये।
    लड़के की आज्ञा पाते ही एक-दो-तीन कहकर लट्ठे की ओर दौड़े और सबने जोर लगाकर लट्ठे को धकेल दिया। लट्ठे को फिसलता और मक्खन को गिरता देखकर लड़के बहुत प्रसन्न हुए किन्तु पाठक कुछ भयभीत हुआ। क्योंकि वह जानता था कि इसका परिणाम क्या होगा।
    मक्खन पृथ्वी पर से उठा और पाठक को लातें और घूंसे मारकर घर की ओर रोता हुआ चल दिया।
    पाठक को लड़कों के सामने इस अपमान से बहुत खेद हुआ। वह नदी-किनारे मुंह-हाथ धोकर बैठ गया और घास तोड़-तोड़कर चबाने लगा। इतने में एक नौका वहां पर आई जिसमें एक अधेड़ आयु वाला व्यक्ति बैठा था। उस व्यक्ति ने पाठक के समीप आकर मालूम किया- ''पाठक चक्रवर्ती कहां रहता है?''
    पाठक ने उपेक्षा भाव से बिना किसी ओर संकेत किए हुए कहा- ''वहां,'' और फिर घास चबाने लगा।
    उस व्यक्ति ने पूछा- ''कहां?''
    पाठक ने अपने पांव फैलाते हुए उपेक्षा से उत्तर दिया- ''मुझे नहीं मालूम।''
    इतने में उसके घर का नौकर आया और उसने उससे कहा- ''पाठक, तुम्हारी मां तुम्हें बुला रही है।''
    पाठक ने जाने से इन्कार किया, किन्तु नौकर चूंकि मालकिन की ओर से आया था, इस वजह से वह उसको जबर्दस्ती मारता हुआ ले गया?
    पाठक जब घर आया तो उसकी मां ने क्रोध में आकर पूछा- ''तूने मक्खन को फिर मारा?''
    पाठक ने उत्तर दिया- ''नहीं तो, तुमसे किसने कहा?''
    मां ने कहा- 'झूठ मत बोल, तूने मारा है।''
    पाठक ने फिर उत्तर दिया- ''नहीं यह बिल्कुल असत्य है, तुम मक्खन से पूछो।''
    मक्खन चूंकि कह चुका था कि मुझे मारा है इसलिए उसने अपने शब्द कायम रखे और दोबारा फिर कहा- ''हां-हां तुमने मारा है।''
    यह सुनकर पाठक को क्रोध आया और मक्खन के समीप आकर उसे मारना आरम्भ कर दिया। उसकी मां ने उसे तुरन्त बचाया और पाठक को मारने लगी। उसने अपनी मां को धक्का दे दिया। धक्के से फिसलते हुए उसकी मां ने कहा- ''अच्छा, तू अपनी मां को भी मारना चाहता है।''
    ठीक उसी समय वह अधेड़ आयु का व्यक्ति घर में आया और कहने लगा- ''क्या किस्सा है?''
    पाठक की मां ने पीछे हटकर आने वाले को देखा और तुरन्त ही उसका क्रोध आश्चर्य में परिवर्तित हो गया। क्योंकि उसने अपने भाई को पहचाना और कहा- ''क्यों दादा, तुम यहां? कैसे आये?'' फिर उसने नीचे को झुकते हुए उसके चरण छुए।
    उसका भाई विशम्भर उसके विवाह के पश्चात् बम्बई चला गया था, वह व्यापार करता था। अब कलकत्ता अपनी बहन से मिलने आया, क्योंकि बहन के पति की मृत्यु हो गई थी।
    कुछ दिन तो बड़ी प्रसन्नता के साथ बीते। एक दिन विशम्भर ने दोनों लड़कों की पढ़ाई के विषय में पूछा।
    उसकी बहन ने कहा- ''पाठक हमेशा दु:ख देता रहता है और बहुत चंचल है, किन्तु मक्खन पढ़ने का बहुत इच्छुक है।''
    यह सुनकर उसने कहा- ''मैं पाठक को बम्बई ले जाकर पढ़ाऊंगा।''
    पाठक भी चलने के लिए सहमत हो गया। मां के लिए यह बहुत हर्ष की बात थी, क्योंकि वह सर्वदा डरा करती थी कि कहीं किसी दिन पाठक मक्खन को नदी में न डूबो दे या उसे जान से न मार डाले।
    पाठक प्रतिदिन मामा से पूछता था कि तुम किस दिन चलोगे। आखिर को चलने का दिन आ गया। उस रात पाठक से सोया भी न गया, सारा दिन जाने की खुशी में इधर-उधर फिरता रहा। उसने अपनी मछली पकड़ने की हत्थी, पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े और बड़ी पतंग भी मक्खन को दे दी, क्योंकि उसे जाते समय मक्खन से सहानुभूति-सी हो गई थी।
    2
    बम्बई पहुंचकर पाठक अपनी मामी से पहली बार मिला। वह उसके आने से कुछ प्रसन्न न हुई; क्योंकि उसके तीन बच्चे ही काफी थे एक और चंचल लड़के का आ जाना उसके लिए आपत्ति थी।
    ऐसे लड़के के लिए उसका अपना घर ही स्वर्ग होता है, उसके लिए एक नए घर में नए लोगों के साथ रहना बहुत कठिन हो गया।.....
    11 min
  • Sankat trin ka story by Rabindranath Tagore
    https://youtu.be/zRyCEaIPOYI sankat trin ka story by Rabindranath Tagoreजमींदार के नायब गिरीश बसु के घर में प्यारी नाम की एक नौकरानी काम पर नई-नई लगी। कमसिन प्यारी अपने नाम के अनुरूप रुप और स्वभाव में भी थी। वह दूर पराए गांव से काम करने आई थी। कुछ ही दिन हुए थे उसे इस स्थान पर काम करते हुए कि एक दिन वह अपनी मालकिन के पास आकर रोने लगी। वृद्ध नायब की वासना दृष्टि उसे हलाकान कर रही थी। मालकिन ने उसे दिलासा दिया, बोली – ‘बेटी, तू अन्यत्र चली जा। तू भले विचारों वाली है, यहाँ तुझे परेशानी होगी।’ मालकिन ने उसे कुछ पैसे चुपचाप देकर उसे विदा कर दिया।
    प्यारी के लिए उस गांव से भाग जाना आसान नहीं था। हाथ में पैसे भी थोड़े से ही थे। अतएव प्यारी ने गांव के ही एक भद्र पुरुष हरिहर भट्टाचार्य के घर पर आश्रय मांगा। उसके समझदार पुत्रों ने समझाना चाहा, ‘बाबूजी, फजूल किसलिए विपत्ति मोल ले रहे हैं?’ हरिहर सिद्धांतवादी थे – ‘स्वयं विपत्ति भी अगर आकर मुझसे आश्रय मांगे तो मैं उसे लौटा नहीं सकता।।।’
    गिरीश बसु को प्यारी के पनाह की बात पता चली तो वह हरिहर भट्टाचार्य के पास पहुँचे, साष्टांग दंडवत किया और कहा, ‘भट्टाचार्य महोदय, आपने मेरी नौकरानी किसलिए फुसला ली? घर में काम की बहुत असुविधा हो रही है।’ प्रत्युत्तर में हरिहर भट्टाचार्य ने चंद खरी बातें कड़े स्वर में कह दीं। हरिहर सम्मानित, साफ व्यक्ति थे, किसी बात को लाग-लपेट में कहने के बजाए सीधे कहते थे। नायब गिरीश बसु को यह बात अत्यधिक अपमानजनक लगी। परंतु बड़े आडम्बर से हरिहर की चरण-धूलि लेकर वह बिदा हुआ।
    इस घटना के कुछ दिनों के बाद ही हरिहर भट्टाचार्य के घर पुलिस का छापा पड़ गया। शयनकक्ष में तकिए के नीचे से नायब की पत्नी के कानों का एक जोड़ झुमका मिला जो कुछ समय पूर्व चोरी हो गया था। नौकरानी प्यारी को चोर प्रमाणित किया जाकर जेल भेज दिया गया। हरिहर भट्टाचार्य महाशय को अपनी प्रतिष्ठा के कारण ले-देकर चोर एवं चोरी के माल के संरक्षण के अभियोग से मुक्ति मिल सकी। नायब ने भट्टाचार्य की इस संकट-घड़ी में मिलकर संवेदना प्रकट की और चरण-धूलि ली। भट्टाचार्य ने जान लिया कि उनके द्वारा एक अभागिन को नायब की इच्छा के विरुद्ध आश्रय देने के कारण ही प्यारी पर यह घोर संकट आया। उनके मन में कांटा चुभ गया। हरिहर के पुत्रों ने फिर समझाने की कोशिश की- ‘जमीन जायदाद बेचकर कलकत्ता चलें, यहाँ तो बड़ी समस्या नजर आ रही है।’ हरिहर दृढ़ प्रतिज्ञ थे - ‘पैतृक घर मुझसे छोड़ा नहीं जाएगा, विपत्ति अगर भाग्य में बदी है तो वह कहीं भी रहो, आएगी ही।’
    इस बीच, नायब ने गांव में अत्यधिक कर वृद्धि कर दी। जिसके कारण जनता विद्रोही हो उठी। हरिहर की जमीन माफ़ी की थी, जमींदार के क्षेत्र में नहीं आती थी और कोई कर नहीं देना होता था। नायब ने जमींदार को भड़काया – हरिहर भट्टाचार्य ने ही जनता को कर नहीं देने हेतु बरगलाया है। जमींदार से आदेश मिला- ‘जैसे भी हो भट्टाचार्य को ठीक करो।’
    नायब गिरीश बसु ने हरिहर भट्टाचार्य की चरण-धूलि लेकर जमींदार का आदेश सुनाया - ‘आपकी सामने की वह जमीन परगना की सीमा में है, अब उसे छोड़ना होगा।’ हरिहर ने प्रतिवाद किया - ‘यह क्या कह रहे हो? वह तो मेरी बहुत दिनों से दान स्वरूप प्राप्त जमीन है।’
    परंतु हरिहर के आँगन से लगी उस जमीन को जमींदार के परगने में शामिल बताकर नालिश दायर कर दी गई। हरिहर ने अपने पुत्रों से कहा- ‘अब तो इस जमीन को छोड़ना पड़ेगा। मैं बुढ़ापे में अदालतों के चक्कर नहीं काट सकता।’ सदा की तरह विद्रोही स्वरों वाले पुत्रों ने कहा - ‘घर से लगी पैतृक जमीन ही यदि छोड़नी पड़ जाए तो फिर इस घर में रहने का क्या अर्थ?’
    वृद्ध हरिहर पैतृक सम्पत्ति को प्राण से भी अधिक चाहते थे। उसे बचाने के मोह में अदालत में हाजिर हुए। मुंसिफ़ नवगोपाल बाबू ने जो हरिहर की प्रतिबद्धताओं को जानते थे, उनकी गवाही को ही साक्षी मान मुकदमा खारिज कर दिया। गांव में भट्टाचार्य के प्रशंसकों ने इस बात को लेकर धूमधाम से उत्सव मनाना चाहा, परंतु हरिहर ने उन्हें रोका। नायब हरिहर से मिले, उन्हें बधाईयाँ दीं और विशेष आडम्बर के साथ उनकी चरण-धूलि ली, उसे सारी देह और सिर-माथे लगाई। और नायब ने अगले दिन ही इस निर्णय के खिलाफ अपील दायर कर दी।
    न्यायालय के वकील सिद्धान्तवादी, ब्राह्मण हरिहर से पैसा नहीं लेते थे। वे ब्राह्मण को बारंबार आश्वासन देते, इस मुकदमें में कोई दम नहीं है- हारने की कोई संभावना नहीं है। दिन क्या कभी रात हो सकती है? ऐसी बातें सुनकर हरिहर निश्चिंत-से बैठे रहे।
    एक दिन जमींदार के घर में ढोल बज उठे। भैंस की बलि के साथ नायब के मकान में काली मैया की पूजा होने की खबर मिली। भट्टाचार्य को खबर मिली की इस आयोजन का कारण – अपील में हुई उनकी हार है.....
    8 min
  • Kanchan story by Rabindranath Tagore
    https://youtu.be/Bh-rhNeaQ0k Kanchan story by Rabindranath Tagore
    मैं विदेश लौटकर छोटा नागपुर के एक चन्द्रवंशीय राजा के दरबार में नौकरी करने लगा। उन्हीं दिनों मेरी देशव्यापी कीर्ति की पटल पर अचानक एक छोटी-सी कहानी खिल उठी। उन दिनों गगन टेसू की रक्तिमाभा से विभोर था। शाल वृक्ष की टहनियों पर मंजरियां झूल रही थीं। मधुमक्खियों के समूह मंडराते फिर रहे थे। व्यापारी लोगों का लाख संग्रह का समय आ गया था। बेर और शहतूत के पत्तों से रेशम के कीड़े इकट्ठे किए जा रहे थे। संथाल जाति महुए बीनती हुई फिर रही थी। नूपुर की झंकार के समान गूंजती हुई नदी वहीं पर बही जा रही थी। मैंने स्नेह से उस नदी का नाम रखा था- 'तनिका'।
    उस समय का वातावरण अनोखे आवेश से परिपूर्ण था। उसका मेरे मन पर भी अधिकार हो गया था। जिससे कार्य की गति मंथर पड़ गई थी। तब मैं अपने पर ही खीझ उठा था।
    दिन ढल रहा था। एक स्थान पर दोआबा बनाती हुई नदी दो शाखाओं में विभक्त होकर चली गई है। उसी बालू के टीले पर बगुलों की पंक्ति शान्त बैठी थी। अपनी झोली में रंग-बिरंगे पत्थरों को भरे मैं कोठी को लौट रहा था। यह सोचकर कि अपनी विज्ञान-शाला में इनकी परीक्षा करूंगा। निर्जन वन में अकेले आदमी का समय काटना कठिन-सा हो जाता है अत: मैंने संध्या के बाद का समय प्रयोग के लिए नियत कर लिया है। डायनुमा द्वारा बिजली की रोशनी कर बैठ जाता हूं। नाना प्रकार के रासायनिक द्रव्य, माइक्रोस्कोप और तराजू लेकर। इसी प्रकार बैठे-बैठे कभी-कभी आधी रात हो जाती है। मुझे आज विशेष खोज के बाद 'मेगनीज' के चिद्दों का आभास मिला था। इसलिए मेरी वापसी आज विशेष उत्साह के साथ हो रही थी। उस वातावरण में कौए कांव-कांव करते हुए सिर पर से अपने-अपने नीड़ों की ओर बढ़े जा रहे थे।
    इसी समय मेरे सम्मुख आकर एक बाधा खड़ी हो गई। उस निर्जन पथ के एक टीले पर पांच शाल वृक्षों का एक ब्यू ह जैसा खड़ा था। उसके झुरमुट में बैठे हुए व्यक्ति को केवल एक ही ओर संधि से देखा जा सकता था। उस समय मेघों के अन्तराल से एक आश्चर्यमयी दीप्ति फूटकर निकल रही थी। उस छायामय वातावरण के भीतर गगन की लालिमा मानो किसी दिवंगना के खुले आंचल से गिरने वाले स्वर्ग की तरह छितरा रही थी। उसी विशेष ज्योति के पथ पर वह कोमलांगी बैठी थी। उस पेड़ के तने से टिककर दोनों पैरों की छाती के समीप समेटे वह मन लगाकर कुछ लिखे जा रही थी।
    मैं वृक्ष की आड़ में खड़ा-खड़ा केवल उसकी ओर ताकता भर रहा। हृदय के आगारों में एक अनोखी छवि अंकित होने लगी। अपनी विशद् जानकारी के पथ पर मेरा हृदय कितने ही चक्कर काटकर प्रवेश-द्वार तक आ पहुंचा था; किन्तु मैं सदैव ही उससे खिसक जाता था। लेकिन आज ऐसा जान पड़ा, मानो जीवन के किसी चरम संघर्ष में आ गया हूं। यह कैसे हो गया? उसका मुझे पता नहीं। मैं तो सदैव से अपने को पर्वत की तरह नीरस समझता आया था। अनायास ही भीतर से एक झरना फूट पड़ा।
    उस बाला को भी मेरे खड़े होने का कुछ आभास-सा हो गया। उसने लिखना बन्द कर दिया; किन्तु उठ न सकी। मैंने सोचा कि कहूं- ''क्षमा कीजिए! किन्तु कैसी क्षमा? मैंने ऐसा कौन-सा दण्डनीय कार्य किया था?''
    यही सोचता हुआ मैं अपनी कोठी की ओर बढ़ा चला आ रहा था तभी मेरी दृष्टि नीचे पड़े दो टुकड़ों में फाड़े हुए किसी पत्र के लिफाफे पर जा पड़ी। मैंने उठाकर देखा-नाम, भवतोष मजूमदार, आई.सी.एस., मुकाम छपरा; हाथ की लिखावट लड़कियों जैसी। टिकट लगा हुआ है, लेकिन उस पर डाकखाने की मोहर नहीं। मेरी अक्ल ने झट समझ लिया कि फटे पत्र के लिफाफे पर किसी दुखान्त नाटक का क्षत चिन्ह विद्यमान है और मैंने उस लिफाफे के रहस्य को जानने का भी संकल्प कर लिया।
    जियोलॉजी के अध्ययन अभ्यास के साथ भीतर-ही-भीतर इस रहस्योद्धाटन का काम भी चल रहा था। जिस समय मैं रेडियम का कण पाने की आशा लेकर अनुसंधान में डूबा हुआ था। उस समय मैंने कुसुमित शाल वृक्षों की छाया और प्रकाश के बन्धन में कंचन को देखा था। इसमें कोई शक नहीं कि इससे पूर्व भी बंगाली बाला को निहारा था; किन्तु इस स्वतंत्र और एकांत वातावरण में देखने का अवसर कभी नहीं मिला। यहां उसकी सलोनी देह की कोमलता के साथ वन के फूल ने अपनी भाषा का स्वर मिला दिया। विदेशी कोमलांगियों के दर्शन तो बहुत किये थे, सम्भवत: वे भली भी लगी थीं; किन्तु बंगाली बाला को पहली बार ही इस प्रकार से देखा कि उसकी समग्रता को उपलब्ध किया जा सके। उसे देखकर यह प्रतीत नहीं होता कि उसका सम्बन्ध किताबों से छूटा या नहीं...।
    बहुत दिन पहले, बाल्यावस्था में किन्हीं बसु महाशय का जो गीत मैंने सुना था और जिसे सुनकर भी भुला दिया था, न जाने क्यों ऐसा जान पड़ा कि उस राग की सहज संगिनी में इसी बंगाली लड़की के रूप की जो भूमिका व्यंजित है, वह आज मेरी आंखों के समक्ष साकार हो उठी है।
    जियोलॉजी शास्त्र में पढ़ा था कि पृथ्वी के नीचे..
    15 min
  • Kabuliwala story by Rabindranath Tagore
    https://youtu.be/faeOycvXSrM Kabuliwala story by Rabindranath Tagore मेरी पांच वर्ष की छोटी लड़की मिनी से पल भर भी बात किए बिना नहीं रहा जाता। दुनिया में आने के बाद भाषा सीखने में उसने सिर्फ एक ही वर्ष लगाया होगा। उसके बाद से जितनी देर तक सो नहीं पाती है, उस समय का एक पल भी वह चुप्पी में नहीं खोती। उसकी माता बहुधा डांट-फटकारकर उसकी चलती हुई जबान बन्द कर देती है; किन्तु मुझसे ऐसा नहीं होता, मिनी का मौन मुझे ऐसा अस्वाभाविक-सा प्रतीत होता है, कि मुझसे वह अधिक देर तक सहा नहीं जाता और यही कारण है कि मेरे साथ उसके भावों का आदान-प्रदान कुछ अधिक उत्साह के साथ होता रहता है।
    सवेरे मैंने अपने उपन्यास के सत्रहवें अध्‍याय में हाथ लगाया ही था कि इतने में मिनी ने आकर कहना आरम्भ कर दिया-''बाबूजी! रामदयाल दरबान कल 'काक' को कौआ कहता था। वह कुछ जानता ही नहीं, न बाबूजी?''
    विश्व की भाषाओं की विभिन्नता के विषय में मेरे कुछ बताने से पहले ही उसने दूसरा प्रसंग छेड़ दिया- ''बाबूजी! भोला कहता था आकाश मुंह से पानी फेंकता है, इसी से बरसा होती है। अच्छा बाबूजी, भोला झूठ-मूठ कहता है न? खाली बक-बक किया करता है, दिन-रात बकता रहता है।''
    इस विषय में मेरी राय की तनिक भी राह न देख करके, चट से धीमे स्वर में एक जटिल प्रश्न कर बैठी, बाबूजी, मां तुम्हारी कौन लगती है?''
    मन-ही-मन में मैंने कहा साली और फिर बोला- ''मिनी, तू जा, भोला के साथ खेल, मुझे अभी काम है, अच्छा।''
    तब उसने मेरी मेज के पार्श्व में पैरों के पास बैठकर अपने दोनों घुटने और हाथों को हिला-हिलाकर बड़ी शीघ्रता से मुंह चलाकर 'अटकन-बटकन दही चटाके' कहना आरम्भ कर दिया। जबकि मेरे उपन्यास के अध्‍याय में प्रतापसिंह उस समय कंचनमाला को लेकर रात्रि के प्रगाढ़ अन्धकार में बन्दीगृह के ऊंचे झरोखे से नीचे कलकल करती हुई सरिता में कूद रहे थे।
    मेरा घर सड़क के किनारे पर था, सहसा मिनी अपने अटकन-बटकन को छोड़कर कमरे की खिड़की के पास दौड़ गई, और जोर-जोर से चिल्लाने लगी, ''काबुल वाला, ओ काबुल वाला।''
    मैले-कुचैले ढीले कपड़े पहने, सिर पर कुल्ला रखे, उस पर साफा बांधे कन्धे पर सूखे फलों की मैली झोली लटकाये, हाथ में चमन के अंगूरों की कुछ पिटारियां लिये, एक लम्बा-तगड़ा-सा काबुली मन्द चाल से सड़क पर जा रहा था। उसे देखकर मेरी छोटी बेटी के हृदय में कैसे भाव उदय हुए वह बताना असम्भव है। उसने जोरों से पुकारना शुरू किया। मैंने सोचा, अभी झोली कन्धे पर डाले, सर पर एक मुसीबत आ खड़ी होगी और मेरा सत्रहवां अध्‍याय आज अधूरा रह जायेगा।
    किन्तु मिनी के चिल्लाने पर ज्योंही काबुली ने हंसते हुए उसकी ओर मुंह फेरा और घर की ओर बढ़ने लगा; त्योंही मिनी भय खाकर भीतर भाग गई। फिर उसका पता ही नहीं लगा कि कहां छिप गई? उसके छोटे से मन में वह अन्धविश्वास बैठ गया था कि उस मैली-कुचैली झोली के अन्दर ढूंढ़ने पर उस जैसी और भी जीती-जागती बच्ची निकल सकती हैं।
    इधर काबुली ने आकर मुस्कराते हुए मुझे हाथ उठाकर अभिवादन किया और खड़ा हो गया। मैंने सोचा, वास्तव में प्रतापसिंह और कंचनमाला की दशा अत्यन्त संकटापन्न है, फिर भी घर में बुलाकर इससे कुछ न खरीदना अच्छा न होगा।
    कुछ सौदा खरीदा गया। उसके बाद मैं उससे इधर-उधर की बातें करने लगा। रहमत, रूस, अंग्रेज, सीमान्त रक्षा के बारे में गप-शप होने लगी।
    अन्त में उठकर जाते हुए उसने अपनी मिली-जुली भाषा में पूछा- ''बाबूजी, आपकी बच्ची कहां गई?''
    मैंने मिनी के मन से व्यर्थ का भय दूर करने के अभिप्राय से उसे भीतर से बुलवा लिया। वह मुझसे बिल्कुल लगकर काबुली के मुख और झोली की ओर सन्देहात्मक दृष्टि डालती हुई खड़ी रही। काबुली ने झोली में से किसमिस और खुबानी निकालकर देनी चाहीं, पर उसने न लीं, और दुगुने सन्देह के साथ मेरे घुटनों से लिपट गई। उसका पहला परिचय इस प्रकार हुआ।
    इस घटना के कुछ दिन बाद एक दिन सवेरे मैं किसी आवश्यक कार्यवश बाहर जा रहा था? देखूं तो मेरी बिटिया दरवाजे के पास बैंच पर बैठी हुई काबुली से हंस-हंसकर बातें कर रही है और काबुली उसके पैरों के समीप बैठा-बैठा मुस्कराता हुआ, उन्हें ध्यान से सुन रहा है और बीच-बीच में अपनी राय मिली-जुली भाषा में व्यक्त करता जाता है। मिनी को अपने पांच वर्ष के जीवन में, बाबूजी के सिवा, ऐसा धैर्य वाला श्रोता शायद ही कभी मिला हो। देखा तो, उसका फिराक का अग्रभाग बादाम-किसमिस से भरा हुआ है। मैंने काबुली से कहा- ''इसे यह सब क्यों दे दिया? अब कभी मत देना?'' कहकर कुर्ते की जेब में से एक अठन्नी निकालकर उसे दी। उसने बिना किसी हिचक के अठन्नी लेकर अपनी झोली में रख ली?
    कुछ देर बाद, घर लौटकर देखता हूं तो उस अठन्नी ने बड़ा भारी उपद्रव खड़ा कर दिया है।
    24 min
  • Khoya hua moti story by Rabindranath Tagore
    https://youtu.be/IgNv8cBjHTg khoya hua moti : Rabindranath Tagoreमेरी नौका ने स्नान-घाट की टूटी-फूटी सीढ़ियों के समीप लंगर डाला। सूर्यास्त हो चुका था। नाविक नौका के तख्ते पर ही मगरिब (सूर्यास्त) की नमाज अदा करने लगा। प्रत्येक सजदे के पश्चात् उसकी काली छाया सिंदूरी आकाश के नीचे एक चमक के समान खिंच जाती।
    नदी के किनारे एक जीर्ण-शीर्ण इमारत खड़ी थी, जिसका छज्जा इस प्रकार झुका हुआ था कि उसके गिर पड़ने की हर घड़ी भारी शंका रहती थी। उसके द्वारों और खिड़कियों के किवाड़ बहुत पुराने और ढीले हो चुके थे। चहुं ओर शून्यता छाई हुई थी। उस शून्य वातावरण में सहसा एक मनुष्य की आवाज मेरे कानों में सुनाई पड़ी और मैं कांप उठा।
    ''आप कहां से आ रहे हैं?''
    मैंने गर्दन घुमाकर देखा तो एक पीले, लम्बे और वृध्द मनुष्य की शक्ल दिखाई पड़ी जिसकी हड्डि‍यां निकली हुई थीं, दुर्भाग्य के लक्षण सिर से पैर तक प्रकट हो रहे थे। वह मुझसे दो-चार सीढ़ियां ऊपर खड़ा था। सिल्क का मैला कोट और उसके नीचे एक मैली-सी धोती बांधे हुए। उसका निर्बल शरीर, उतरा हुआ मुख और लड़खड़ाते हुए कदम बता रहे थे कि उस क्षुधा-पीड़ित मनुष्य को शुध्द वायु से अधिक भोजन की आवश्यकता है।
    ''मैं रांची से आ रहा हूं।'
    यह सुनकर वह मेरे बराबर उसी सीढ़ी पर आ बैठा।
    ''और आपका काम?''
    ''व्यापार करता हूं।''
    ''काहे का?''
    ''इमारती लकड़ी, रेशम और त्रिफला का।''
    ''आपका नाम क्या है?''
    एक क्षण सोने के बाद मैंने उसे अपना एक बनावटी नाम बता दिया। किन्तु वह अब मुझे एक-टक देख रहा था।
    'परन्तु आपका यहां आना कैसे हुआ? केवल मनोरंजन के लिए या वायु-परिवर्तन के लिए?''
    मैंने कहा-''वायु-परिवर्तन के लिए।'
    ''यह भी खूब कही। मैं लगभग छ: वर्ष से प्रतिदिन यहां की ताजी वायु पेट भरकर खा रहा हूं और साथ ही पन्द्रह ग्रेन कुनैन भी; परन्तु अन्तर कुछ नहीं हुआ। कोई लाभ दिखाई नहीं देता।''
    ''किन्तु रांची और यहां के जलवायु में तो पृथ्वी और आकाश का अन्तर है।''
    ''इसमें सन्देह नहीं, किन्तु आप यहां ठहरे किस स्थान पर हैं? क्या इसी मकान में?''
    सम्भवत: उस व्यक्ति को संदेह हो गया था कि मुझे उसके किसी गड़े हुए धन का कहीं से सुराग मिल गया है और मैं उस स्थान पर ठहरने के लिए नहीं; बल्कि उसके गड़े हुए धन पर अपना अधिकार जमाने आया हूं। मकान की भलाई-बुराई के सम्बन्ध में एक शब्द तक कहे बिना उसने अपने उस मकान के स्वामी की पन्द्रह साल पूर्व की एक कथा सुनानी आरम्भ कर दी-
    ''उसकी गंजी खोपड़ी में गहरी और चमकदार काली आंखें मुझे कॉलरिज के पुराने नाविक का स्मरण करा रही थीं। वह एक स्थानीय स्कूल में अध्यापक था।
    ''नाविक ने समाज से निवृत्त होकर रोटी बनानी आरम्भ कर दी। सूर्यास्त होने के समय आकाश के सिंदूरी रंग पर अधिकार जमाने वाली अंधेरी में वह खण्डहर- भवन एक विचित्र-सा भयावह दृश्य प्रदर्शित कर रहा था।
    ''मेरे पास सीढ़ी पर बैठे हुए उस दुबले और लम्बे स्कूल मास्टर ने कहा- ''मेरे इस गांव में आने से लगभग दस साल पूर्व एक व्यक्ति फणीभूषण सहाय इस मकान में रहता था। उसका चाचा दुर्गामोहन बिना अपने किसी उत्तराधिकारी के मर गया। जिसकी सम्पूर्ण संपत्ति और विस्तृत व्यापार का अकेला वही अधिकारी था।
    ''पाश्चात्य शिक्षा और नई सभ्यता का भूत फणीभूषण पर सवार था। कॉलेज में कई वर्षों तक शिक्षा प्राप्त कर चुका था। वह अंग्रेजों की भांति कोठी में जूता पहने फिरा करता था, यह कहने की आवश्यकता नहीं कि ये लोग उनके साथ कोई व्यापारिक रियायत देने के रवादार न थे। वे भली-भांति जानते थे कि फणीभूषण आखिर को नए बंगाल की वायु में सांस ले रहा है।
    ''इसके अतिरिक्त एक और बला उसके सिर पर सवार थी। अर्थात् उसकी पत्नी परम सुन्दरी थी। यह सुन्दर बला और पाश्चात्य शिक्षा दोनों उसके पीछे ऐसी पड़ी थीं कि तोबा भली! खर्च सीमा से बाहर। तनिक शरीर गर्म हुआ और झट सरकारी डॉक्टर खट-खट करते आ पहुँचे।
    ''विवाह सम्भवत: आपका भी हो चुका है। आपको भी वास्तव में यह अनुभव हो गया है कि स्त्री कठोर स्वभाव वाले पति को सर्वदा पसन्द करती है। वह अभागा व्यक्ति जो अपनी पत्नी के प्रेम से वंचित हो, यह न समझ बैठे कि वह इस संपत्ति से माला-माल नहीं या सौन्दर्य से वंचित है। विश्वास कीजिये वह अपनी सीमा से अधिक कोमल प्रकृति और प्रेम के कारण इसी दुर्भाग्य में फंसा हुआ है। मैंने इस विषय में खूब सोचा है और इस तथ्य पर पहुंचा हूं और यह है भी ठीक। पूछिये क्यों? लीजिये इस प्रश्न का संक्षिप्त और विस्तृत उत्तर इस प्रकार है।
    ''यह तो आप अवश्य मानेंगे कि कोई भी व्यक्ति उस समय तक वास्तविक प्रसन्नता प्राप्त नहीं कर सकता, जब तक कि उसे अपने जन्मजात विचार और स्वाभाविक योग्यताओं के प्रकट करने के लिए एक विस्तृत क्षेत्र प्राप्त न हो। हरिण को आपने देखा है वह अपने सींगों को वृक्ष से रगड़कर आनन्द प्राप्त करता है,
    41 min
  • Postmaster story of Rabindranath Tagore
    https://youtu.be/ft_aILKaHzo पोस्टमास्टर , रबीन्द्रनाथ टैगोर
    काम शुरू करते ही पहले पहल पोस्टमास्टर को उलापुर गांव आना पड़ा। गांव बहुत साधारण था। गांव के पास ही एक नील-कोठी थी। इसीलिए कोठी के स्वामी ने बहुत कोशिश करके यह नया पोस्टऑफिस खुलवाया था।
    हमारे पोस्टमास्टर कलकत्ता के थे। पानी से निकलकर सूखे में डाल देने से मछली की जो दशा होती है वही दशा इस बड़े गांव में आकर इन पोस्टमास्टर की हुई। एक अंधेरी आठचाला में उनका ऑफिस था, पास ही काई से घिरा एक तालाब था, जिसके चारों ओर जंगल था। कोठी में गुमाश्ते वगैरह जितने भी कर्मचारी थे उन्हें अक्सर फुर्सत नहीं रहती थी, न वे शिष्टजनों से मिलने-जुलने के योग्य ही थे।
    खासतौर से कलकत्ता के बाबू ठीक तरह से मिलना-जुलना नहीं जानते। नई जगह में पहुंचकर वे या तो उद्धत हो जाते हैं या अप्रतिभ। इसलिए स्थानीय लोगों से उनका मेल-जोल नहीं हो पाता। इधर काम भी ज्यादा नहीं था। कभी-कभी एकाध कविता लिखने की कोशिश करते। उनमें इस प्रकार के भाव व्यक्त करते-दिनभर तरु-पल्लवों का कम्पन और आकाश के बादल देखते-देखते जीवन बड़े सुख से कट जाता है। लेकिन अन्तर्यामी जानते हैं कि यदि अलिफलैला का कोई दैत्य आकर एक ही रात में तरु-पल्लव समेत इन सारे पेड़-पौधों को काटकर पक्का रास्ता तैयार कर देता और पंक्तिबद्ध अट्टालिकाओं द्वारा बादलों को दृष्टि से ओझल कर देता तो यह मृतप्राय भद्र वंशधर नवीन जीवन-लाभ कर लेता।
    पोस्टमास्टर को बहुत कम तनख्वाह मिलती थी। अपने हाथों बनाकर खाना पड़ता और गांव की एक मातृ-पितृ-हीन अनाथ बालिका इनका काम-काज कर देती थी। उसको थोड़ा-बहुत खाना मिल जाता। लड़की का नाम था रतन। उम्र बारह-तेरह। उसके विवाह की कोई विशेष सम्भावना नहीं दिखाई देती थी।
    शाम को जब गांव की गोशाला से कुंडलाकार धुआं उठता, झाड़ियों में झींगुर बोलते दूर के गांव में पियक्कड़ बाउलों का दल ढोल-करताल बजाकर ऊंचे स्वर में गीत छेड़ देता-जब अन्दर बरामदे में अकेले बैठे-बैठे वृक्षों का कम्पन देखकर कवि-हृदय में भी ईषत् हृत्कंप होने लगता तब कमरे के कोने में एक टिमटिमाता हुआ दिया जलाकर पोस्टमास्टर आवाज लगाते-‘रतन’।
    रतन दरवाजे पर बैठी इस आवाज की प्रतीक्षा करती रहती। लेकिन पहली आवाज पर ही अन्दर न आती। वहीं से कहती, ‘‘क्या है बाबू, किसलिए बुला रहे हो ?’’
    पोस्टमास्टर, ‘‘तू क्या कर रही है ?’’
    रतन, ‘‘बस चूल्हा जलाने ही जा रही हूं, रसोईघर में।’’
    पोस्टमास्टर, ‘‘तेरा रसोई का काम पीछे हो जायेगा। पहले हुक्का भर ला !’’
    थोड़ी देर में अपने गाल फुलाए चिलम में फूंक मारती-मारती रतन भीतर आती। उसके हाथ से हुक्का लेकर पोस्टमास्टर चट से पूछ बैठते, ‘‘अच्छा रतन, तुझे अपनी मां की याद है ?’’
    बड़ी लम्बी बातें हैं, बहुत-सी याद हैं, बहुत-सी याद भी नहीं। माँ की अपेक्षा पिता उसको अधिक प्यार करते थे। पिता की उसे थोड़ी-थोड़ी याद है। दिन भर मेहनत करके उसके पिता शाम को घर लौटते। भाग्य से उन्हीं में से दो-एक शामों की याद उसके मन में चित्र के समान अंकित है। उन्हीं की बात करते-करते धीरे-धीरे रतन पोस्टमास्टर के पास ही जमीन पर बैठ जाती। उसे ध्यान आता, उसका एक भाई था। बहुत दिन पहले बरसात में एक दिन तालाब के किनारे दोनों ने मिलकर पेड़ की टूटी हुई टहनी की बंसी बनाकर झूठ-मूठ मछली पकड़ने का खेल खेला था। अनेक महत्त्वपूर्ण घटनाओं की अपेक्षा इसी बात की याद उसे अधिक आती। इस तरह बातें करते-करते कभी-कभी काफी रात हो जाती। तब आलस के मारे पोस्टमास्टर को खाना बनाने की इच्छा न होती। सबेरे की बासी तरकारी रहती और रतन झटपट चूल्हा जलाकर कुछ रोटियां सेक लेती। उन्हीं से दोनों के रात्रि-भोजन का काम चल जाता।
    कभी-कभी शाम को उस बृहत् आठचाला के एक कोने में ऑफिस की काठ की कुर्सी पर बैठे-बैठे पोस्टमास्टर भी अपने घर की बात चलाते-छोटे-भाई की बात, मां और दीदी की बात, प्रवास में एकान्त कमरे में बैठकर जिन लोगों के लिए हृदय कातर हो उठता उनकी बात। जो बातें उनके मन में बार-बार उदय होती रहतीं, पर जो नील-कोठी के गुमाश्तों के सामने किसी भी तरह नहीं उठाई
    18 min
  • Pinjar story by Rabindranath Tagore
    https://youtu.be/JWyBEtxNjgs
    जब मैं पढ़ाई की पुस्तकें समाप्त कर चुका तो मेरे पिता ने मुझे वैद्यक सिखानी चाही और इस काम के लिए एक जगत के अनुभवी गुरु को नियुक्त कर दिया। मेरा नवीन गुरु केवल देशी वैद्यक में ही चतुर न था, बल्कि डॉक्टरी भी जानता था। उसने मनुष्य के शरीर की बनावट समझाने के आशय से मेरे लिए एक मनुष्य का ढांचा अर्थात् हड्डियों का पिंजर मंगवा दिया था। जो उस कमरे में रखा गया, जहां मैं पढ़ता था। साधारण व्यक्ति जानते हैं कि मुर्दा विशेषत: हड्डियों के पिंजर से, कम आयु वाले बच्चों को, जब वे अकेले हों, कितना अधिक भय लगता है। स्वभावत: मुझको भी डर लगता था और आरम्भ में मैं कभी उस कमरे में अकेला न जाता था। यदि कभी किसी आवश्यकतावश जाना भी पड़ता तो उसकी ओर आंख उठाकर न देखता था। एक और विद्यार्थी भी मेरा सहपाठी था। जो बहुत निर्भय था। वह कभी उस पिंजर से भयभीत न होता था और कहा करता था कि इस पिंजर की सामर्थ्य ही क्या है? जिससे किसी जीवित व्यक्ति को हानि पहुंच सके। अभी हड्डि‍यां हैं, कुछ दिनों पश्चात् मिट्टी हो जायेंगी। किन्तु मैं इस विषय में उससे कभी सहमत न हुआ और सर्वदा यही कहता रहा कि यह मैंने माना कि आत्मा इन हड्डियों से विलग हो गयी है, तब भी जब तक यह विद्यमान है वह समय-असमय पर आकर अपने पुराने मकान को देख जाया करती है। मेरा यह विचार प्रकट में अनोखा या असम्भव प्रतीत होता था और कभी किसी ने यह नहीं देखा होगा कि आत्मा फिर अपनी हड्डियों में वापस आयी हो। किन्तु यह एक अमर घटना है कि मेरा विचार सत्य था और सत्य निकला।
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    कुछ दिनों पहले की घटना है कि एक रात को गार्हस्थ आवश्यकताओं के कारण मुझे उस कमरे में सोना पड़ा। मेरे लिए यह नई बात थी। अत: नींद न आई और मैं काफी समय तक करवटें बदलता रहा। यहां तक कि समीप के गिरजाघर ने बारह बजाये। जो लैम्प मेरे कमरे में प्रकाश दे रहा था, वह मध्दम होकर धीरे-धीरे बुझ गया। उस समय मुझे उस प्रकाश के सम्बन्ध में विचार आया कि क्षण-भर पहले वह विद्यमान था किन्तु अब सर्वदा के लिए अंधेरे में परिवर्तित हो गया। संसार में मनुष्य-जीवन की भी यही दशा है। जो कभी दिन और कभी रात के अनन्त में जा मिलता है।
    धीरे-धीरे मेरे विचार पिंजर की ओर परिवर्तित होने आरम्भ हुए। मैं हृदय में सोच रहा था कि भगवान जाने ये हड्डि‍यां अपने जीवन में क्या कुछ न होंगी। सहसा मुझे ऐसा ज्ञात हुआ जैसे कोई अनोखी वस्तु मेरे पलंग के चारों ओर अन्धेरे में फिर रही है। फिर लम्बी सांसों की ध्वनि, जैसे कोई दुखित व्यक्ति सांस लेता है, मेरे कानों में आई और पांवों की आहट भी सुनाई दी। मैंने सोचा यह मेरा भ्रम है, और बुरे स्वप्नों के कारण काल्पनिक आवाजें आ रही हैं, किन्तु पांव की आहट फिर सुनाई दी। इस पर मैंने भ्रम-निवारण हेतु उच्च स्वर से पूछा-''कौन है?'' यह सुनकर वह अपरिचित शक्ल मेरे समीप आई और बोली- ''मैं हूं, मैं अपने पिंजर को दिखने आई हूं।''
    मैंने विचार किया मेरा कोई परिचित मुझसे हंसी कर रहा है। इसलिए मैंने कहा-''यह कौन-सा समय पिंजर देखने का है। वास्तव में तुम्हारा अभिप्राय क्या है?''
    ध्वनि आई- ''मुझे असमय से क्या अभिप्राय? मेरी वस्तु है, मैं जिस समय चाहूं इसे देख सकती हूं। आह! क्या तुम नहीं देखते वे मेरी पसलियां हैं, जिनमें वर्षों मेरा हृदय रहा है। मैं पूरे छब्बीस वर्ष इस घोंसले में बन्द रही, जिसको अब तुम पिंजर कहते हो। यदि मैं अपने पुराने घर को देखने चली आई तो इसमें तुम्हें क्या बाधा हुई?''.,..................
    21 min
  • Icchapuran/ Icchapurti story by Rabindranath Tagore
    https://youtu.be/Z8fTQO6caoA Icchapuran/Icchapurti Rabindranath Tagore
    इच्छापूर्ण रबीन्द्रनाथ टैगोर
    सुबलचन्द्र के बेटे का नाम सुशीलचन्द्र है. लेकिन हमेशा नाम के अनुरूप व्यक्ति भी हो ऐसा कतई ज़रूरी नहीं. तभी तो सुबलचन्द्र दुर्बल थे और उनका बेटा सुशीलचन्द्र बिलकुल भी शांत नही बल्कि बहुत चंचल था.
    उनका बेटा सुशील पुरे मोहल्ले को परेशान कर रखता था इसलिए कभी-कभी पिता, पुत्र को नियंत्रण में रखने के लिए भाग कर आते लेकिन पिता के पैर में गठिया का दर्द और बेटा भागता था हिरन जैसा. नतीजा थप्पड़, लात, मार कुटाई कुछ भी सही जगह पर नहीं पड़ता था. लेकिन सुशीलचन्द्र जिस दिन पकड़ में आता उस दिन उसके पिता के हाथों से बचा पाना किसी के सामर्थ्य में नहीं रहता.
    आज शनिवार के दिन स्कूल में दो बजे ही छुट्टी हो जाती है लेकिन आज सुशील का किसी भी तरह स्कूल जाने का मन नही हो रहा था. इसके बहुत सारे कारण थे. पहले तो आज स्कूल में भूगोल की परीक्षा है दूसरे, मोहल्ले के बोस निवास में आज पटाखे फोड़ने का कार्यक्रम तय है. सुबह से ही वहाँ धूमधाम चल रही है. सुशील की इच्छा है आज सारा दिन वहीँ बिताये.
    बहुत सोचने के बाद सुशील स्कूल जाने के समय अपने बिस्तर पर जा कर लेट गया. उसके पिता ने आकर पूछा- ‘क्या रे, इस समय बिस्तर पर पड़ा है, आज स्कूल नही जाना क्या?’
    सुशील बोला, ‘मेरे पेट में मरोड़ उठ रहे है, आज मैं स्कूल नहीं जा पाऊंगा.’
    पिता सुबल उसके झूठ को समझ गये, मन-ही-मन बोले, ‘रुक! आज तेरा कुछ उपाय करना ही होगा.’ सुशील से बोले, ‘पेट में मरोड़ उठ रहे है?’ फिर तो आज कहीं जाने की ज़रूरत नहीं. बोस निवास में पटाखे देखने हरि को अकेले ही भेज देता हूँ, तुम यहाँ चुपचाप पड़े रहो मैं अभी तुम्हारे लिए पाचक तैयार कर के लाता हूँ.’
    सुशील के कमरे से निकल कर बाहर सांकल लगा दिया और बहुत कड़वा सा एक पाचक तैयार करने चले गये. सुशील तो अब भारी मुश्किल में पड़ गया. लेमनचूस खाना उसे जितना ही अच्छा लगता था उतना ही बुरा पाचक खाने में लगता था उसे तो अब मुसीबत नजर आने लगी थी. उधर बोस निवास जाने के लिए तो कल रात से ही उसका मन छटपटा रहा था, लेकिन....
    सुबलचन्द्र जब एक बड़े से कटोरे में कड़वा पाचक ले कर कमरे में आये तो सुशील तुरंत बिस्तर से उतर गया और बोला, ‘मेरा पेट दर्द एकदम ठीक हो गया है. मैं आज स्कूल जाऊंगा.’
    पिता बोलें, ‘न ना! आज जाने की ज़रूरत नहीं.तुम पाचक खा कर चुपचाप सोये रहो.’ ये बोल कर सुबलचन्द्र जबरदस्ती सुशील को पाचक खिला कर बाहर से कमरे में ताला लगा कर चले गये.
    सुशील बिस्तर पर पड़े रोते-रोते सारा दिन केवल मन-ही-मन यही कहता रहा, ‘काश, मैं अगर बाबा के जितनी उम्र का होता तो कितना अच्छा होता जो मेरे इच्छा होती वही करता और कोई मुझे ऐसे कमरे में बंद कर के नहीं जा पाता.’
    उसके पिता सुबल चन्द्र बाहर अकेले बठे बैठे सोच रहे थे, ‘मेरे माता पिता मुझे बहुत ज्यादा ही प्यार दुलार देते थे इसलिए मैं अच्छी तरह पढाई लिखाई कुछ भी नहीं कर पाया. काश, यदि फिर से बचपन मिल जाता तो फिर कुछ भी हो जाए पहले की तरह समय बर्बाद नही कर के , मन लगा कर पढाई करता.’
    इच्छापूरण देव उस समय उनके घर के सामने से जा रहे थे. वो पिता और पुत्र के मन की इच्छा जान कर सोचने लगे. ‘अच्छा कुछ दिन इन लोगों की इच्छा पूरी कर के देखा जाये.’
    ये सोच कर वो पिता से बोले, ‘तुम्हारी इच्छा पूरी होगी. कल होते ही तुम तुम्हारे बेटे की उम्र प्राप्त करोगे.’ बेटे से जा कर बोले, ‘कल होते ही तुम तुम्हरे पिता के उम्र के हो जाओगे.’ सुन कर दोनों ही बहुत खुश हो गए.
    वृद्ध सुबलचन्द्र रात में ठीक से सो नहीं पाते थे भोर के वक्त थोड़ी नींद आ जाती थी. लेकिन आज पता नहीं क्या हुआ उन्हें भोर होते ही एकदम कूद कर बिस्तर से नीचे उतर आये . उन्होंने देखा कि वो बहुत छोटे हो गये है. उनके दांत जो गिर गये थे सब अपनी जगह पर आ गये हैं, दाढ़ी मूंछ सब गायब. रात में जो धोती और कुरता पहन कर सोये थे वो इतना बड़ा हो गया है की उसकी आस्तीन झूल कर ज़मीन छू रही थी. कुरते का गला छाती तक उठ आया है और धोती इतनी बड़ी की ज़मीन पर ठीक से पाँव रख कर चल भी नहीं पा रहे.
    हमारे सुशील बाबू रोज उठते ही दुरात्मा की तरह दौड़ते फिरते है, लेकिन आज उनकी नींद ही नहीं टूट रही; जब अपने पिता सुबल चन्द्र के चिल्लाने की आवाज़ से उसकी नींद खुली तो देखा उसके पहने हुए कपड़े इस तरह छोटे हो कर चिपक गये हैं की उसके चीथड़े हो कर शरीर से अलग हो जायेंगे. पूरा शरीर बढ़ गया है, काले सफ़ेद दाढ़ी-मूंछ के कारण आधा चेहरा दिखाई ही नहीं देता; उसके सर पर कितने बाल थे लेकिन आज हाथ फेर कर देख रहा सामने से गंजा हो गया जो की दिन के उजाले में चमक रहा है. आज सुशील चन्द्र कई बार उठने के प्रयास में इस तरफ उस तरफ करते हुए बार बार सो जा रहा है लेकिन अंत में अपने पिता के इत
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