Suno Kahaniyan

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By PoonamArtsBooks
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Suno Kahaniyan episodes

  • Antervyatha (Neeche ki Kapde)#अंतर्व्यथा (नीचे के कपड़े): अमृता प्रीतम
    नीचे के कपड़े: अमृता प्रीतम की कहानी
    कहानी -
    जिसके मन की पीड़ा को लेकर मैंने कहानी लिखी थी ‘नीचे के कपड़े’ उसका नाम भूल गई हूं. कहानी में सही नाम लिखना नहीं था, और उससे एक बार ही मुलाक़ात हुई थी, इसलिए नाम भी याद से उतर गया है...
    जब वह मिलने आई थी, बीमार थी. ख़ूबसूरत थी, पर रंग और मन उतरा हुआ था. वह एक ही विश्वास को लेकर आई थी कि मैं उसके हालात पर एक कहानी लिख दूं...
    मैंने पूछा-इससे क्या होगा?
    कहने लगी-जहां वह चिट्ठियां पड़ी हैं जो मैं अपने हाथों से नहीं फाड़ सकती, उन्हीं चिट्ठियों में वह कहानी रख दूंगी...मुझे लगता है, मैं बहुत दिन ज़िंदा नहीं रहूंगी, और बाद में जब उन चिट्ठियों से कोई कुछ जान पाएगा, तो मुझे वह नहीं समझेगा जो मैं हूं. आप कहानी लिखेंगी तो वहीं रख दूंगी. हो सकता है, उसकी मदद से कोई मुझे समझ ले मेरी पीड़ा को संभाल ले. मुझे और किसी का कुछ फ़िक्र नहीं है, पर मेरा एक बेटा है, अभी वह छोटा है, वह बड़ा होगा तो मैं सोचती हूं कि बस वह मुझे ग़लत न समझे...
    उसकी ज़िंदगी के हालात सचमुच बहुत उलझे हुए थे और मेरी पकड़ में नहीं आ रहा था कि मैं उन्हें कैसे समेट पाऊंगी. लिखने का वादा तो नहीं किया पर कहा कि कोशिश करूंगी…
    मैं बहुत दिन वह कहानी नहीं लिख पाई. सिर्फ़ एक अहसास सा बना रहा कि उसका बच्चा मेरे जेहन में बड़ा हो रहा है, इतना बड़ा कि अब बहुत सी चीज़ें उसके हाथ लगती हैं, तो वह हैरान उन्हें देखे जा रहा है…
    कहानी प्रकाशित हुई और बहुत दिन गुज़र गए. मैं जान नहीं पाई कि उसके हाथों तक पहुंची या नहीं. सब वक़्त के सहारे छोड़ दिया. उसका कोई अता-पता मेरे पास नहीं था...
    एक अरसा गुज़र गया था, जब एक दिन फ़ोन आया, दिल्ली से नहीं था, कहीं बाहर से था. आवाज़ थी,‘आपका बहुत शुक्रिया! मैंने कहानी वहीं रख दी है जहां चाहती थी...’
    इतने भर लफ़्ज़ों से कुछ पकड़ में नहीं आया था, इसलिए पूछा,‘आप कौन बोल रही हैं? कौन सी कहानी?’ जवाब में बस इतनी आवाज़ थी,‘बहुत दूर से बोल रही हूं, वही जिसकी कहानी आपने लिखी है-नीचे के कपड़े...’ और फ़ोन कट गया...
    ‘नीचे के कपड़े?’
    15 min
  • Brihaspativar Ka Vrat#बृहस्पतिवार का व्रत: अमृता प्रीतम_कहानी
    बृहस्पतिवार का व्रत...’
    बृहस्पतिवार का व्रत’ कहानी उस ज़मीन पर खड़ी है, जिससे मैं वाकिफ नहीं थी। एक बार एक अजनबी लड़की ने आकर मिन्नत-सी की कि मैं उसकी कहानी लिख दूँ। और एक ही साँस में उसने कह दिया—‘मैं कॉलगर्ल हूँ।’ उसी से, तन-बदन बेचने वाली लड़कियों के रोज़गार का कुछ अता-पता लिया, और उसके अंतर में पलती हुई उस पीड़ा को जाना, जो घर का एक स्वप्न लिए हुए, मन्नत-मुराद माँगती हैं किसी आने वाले जन्म के लिए....
    आज बृहस्पतिवार था, इसलिए पूजा को आज काम पर नहीं जाना था... बच्चे के जागने की आवाज़ से पूजा जल्दी से चारपाई से उठी और उसने बच्चे को पालने में से उठाकर अपनी अलसाई-सी छाती से लगा लिया, ‘‘मन्नू देवता ! आज रोना नहीं, आज हम दोनों सारा दिन बहुत-सी बातें करेंगे...सारा दिन....’’ यह सारा दिन पूजा को हफ्ते में एक बार नसीब होता था। इस दिन वह मन्नू को अपने हाथों से नहलाती थी, सजाती थी, खिलाती थी और उसे कन्धे पर बिठाकर आसपास के बगीचे में ले जाती थी। यह दिन आया का नहीं, माँ का दिन होता था... आज भी पूजा ने बच्चे को नहला-धुलाकर और दूध पिलाकर जब चाबी वाले खिलौने उसके सामने रख दिए, तो बच्चे की किलकारियों से उसका रोम-रोम पुलकित हो गया..... चैत्र मास के प्रारम्भिक दिन थे। हवा में एक स्वाभाविक खुशबू थी, और आज पूजा की आत्मा में भी एक स्वाभाविक ममता छलक रही थी। बच्चा खेलते-खेलते थककर उसकी टाँगों पर सिर रखकर ऊँघने लगा, तो उसे उठाकर गोदी में डालते हुए वह लोरियों जैसी बातें करने लगी—‘मेरे मन्नू देवता को फिर नींद आ गई...मेरा नन्हा-सा देवता...बस थोड़ा-सा भोग लगाया, और फिर सो गया...’’
    पूजा ने ममता से विभोर होकर मन्नू का सिर भी चूम लिया, आँखें भी, गाल भी, गरदन भी—और जब उसे उठाकर चारपाई पर सुलाने लगी तो मन्नू कच्ची नींद के कारण रोने लगा। पूजा ने उसे उठाकर फिर कन्धे से लगा लिया और दुलारने लगी, ‘‘मैं कहीं नहीं जा रही, मन्नू ! आज मैं कहीं नहीं जाऊँगी...।’’ लगभग डेढ़ वर्ष के मन्नू को शायद आज भी यह अहसास हुआ था कि माँ जब बहुत बार उसके सिर व माथे को चूमती है, तो उसके बाद उसे छोड़कर चली जाती है। और कन्धे से कसकर चिपटे हुए मन्नू को वह हाथ से दुलारती हुए कहने लगी, ‘‘हर रोज तुम्हें छोड़कर चली जाती हूँ न...जानते हो कहाँ जाती हूँ ? मैं जंगल में से फूल तोड़ने नहीं जाऊँगी, तो अपने देवता की पूजा कैसे करूँगी ?’’ और पूजा के मस्तिष्क में बिजली के समान वह दिन कौंध गया, जब एक ‘गेस्ट हाउस’ की मालकिन मैडम डी. ने उसे कहा था—‘‘मिसिज़ नाथ ! यहाँ किसी लड़की का असली नाम किसी को नहीं बताया जाता। इसलिए तुम्हें जो भी नाम पसन्द हो रख लो।’’
    और उस दिन उसके मुँह से निकला था—‘‘मेरा नाम पूजा होगा।’’ गेस्ट हाउस वाली मैडम डी. हँस पड़ी थी—‘‘हाँ, पूजा ठीक है, पर किस मन्दिर की पूजा ?’’ और उसने कहा था—‘‘पेट के मन्दिर की।’’ माँ के गले से लगी बाँहों ने जब बच्चे को आँखों में इत्मीनान से नींद भर दी, तो पूजा ने उसे चारपाई पर लिटाते हुए, पैरों के बल चारपाई के पास बैठकर अपना सिर उसकी छाती के निकट, चारपाई की पाटी पर रख दिया और कहने लगी—‘‘क्या तुम जानते हो, मैंने अपने पेट को उस दिन मन्दिर क्यों कहा था ? जिस मिट्टी में से किसी देवता की मूर्ति मिल जाए, वहाँ मन्दिर बन जाता है—तू मन्नू देवता मिल गया तो मेरा पेट मन्दिर बन गया....’’ और मूर्ति को अर्ध्य देने वाले जल के समान पूजा की आँखों में पानी भर आया, ‘‘मन्नू, मैं तुम्हारे लिए फूल चुनने जंगल में जाती हूँ। बहुत बड़ा जंगल है, बहुत भयानक, चीतों से भरा हुआ, भेड़ियों से भरा हुआ, साँपों से भरा हुआ...’’ और पूजा के शरीर का कंपन, उसकी उस हथेली में आ गया, जो मन्नू की पीठ पर पड़ी थी...और अब वह कंपन शायद हथेली में से मन्नू की पीठ में भी उतर रहा था।
    उसने सोचा—मन्नू जब खड़ा हो जाएगा, जंगल का अर्थ जान लेगा, तो माँ से बहुत नफरत करेगा—तब शायद उसके अवचेतन मन में से आज का दिन भी जागेगा, और उसे बताएगा कि उसकी माँ किस तरह उसे जंगल की कहानी सुनाती थी—जंगल की चीतों की, जंगल के भेड़ियों की और जंगल के साँपों की—तब शायद....उसे अपनी माँ की कुछ पहचान होगी। पूजा ने राहत और बेचैनी का मिला-जुला साँस लिया। उसे अनुभव हुआ जैसे उसने अपने पुत्र के अवचेतन मन में दर्द के एक कण को अमानत की तरह रख दिया हो.... पूजा ने उठकर अपने लिए चाय का एक गिलास बनाया और कमरे में लौटते हुए कमरे की दीवारों को ऐसे देखने लगी जैसे वह उसके व उसके बेटे के चारों ओर बनी हुई किसी की बहुत प्यारी बाँहें हों...उसे उसके वर्तमान से भी छिपाकर बैठी हुई....
    पूजा ने एक नज़र कमरे के उस दरवाजे की तरफ देखा—जिसके बाहर उसका वर्तमान बड़ी दूर तक फैला हुआ था....
    23 min
  • Shah Ki Kanjri# शाह की कंजरी: अमृता प्रीतम
    १९८७ में जब मेरी कहानी "शाह की कंजरी" टेलिविज़न पर "कश़मकश" सीरिज़ में टेलिकास्ट हुई, तो यह कहानी बहुत चर्चित हुई थी। कहानी के तीनों किरदार बहुत अच्छे पेश हो पाये थे। लेकिन देखा उसकी जो चर्चा हो रही थी वह कहानी की गहरायी तक नहीं उतर पा रही थी।
    वो कहानी मैंने अपनी आंखों के सामने घटित होते देखी थी, सन १९४५ में जब लाहौर में एक शादी वाले घर से निमंत्रण आया था, और मैं उस दिन वहां शामिल थी, जब घर में शादी ब्याह के गीतों वाला दिन बैठाया जाता है। उस दिन घर की मालकिन भी उस समागम में थी, और लाहौर की वो मशहूर नाजनीना भी, जिसे मल्लिकाये तरन्नुम कहा जाता था। और सब जानते थे कि वह घर के मालिक की रखैल थी।
    उस नाज़नीना के पास सब कुछ था, हुस्न भी, नाज़ नखरा भी, बेहद खूबसूरत आवाज भी, लेकिन समाज का दिया हुआ वहा आदरणिय स्थान नहीं था, जो एक पत्नी के पास होता है। और जो पत्नी थी उसके पास ना जवानी थी, न कोई हुनर, लेकिन उसके पास पत्नी होने का आदरणिय स्थान था। पत्नी होने का भी और मां होने का भी।
    दोनों औरतों के पास अपनी अपनी जगह थी, और अपना अपना दर्द। लेकिन एक का दर्द दूसरी के दर्द से टूटा हुआ था। दर्द का एक टुकड़ा दर्द के दूसरे टुकड़े को समझने में असमर्थ था।
    दोनों के पास अपना अपना बल था, पर अपनी अपनी अपाहिज अवस्था का।
    दोनों के पास एक एक सहारा था, जो कभी उनकी नजर में बेहद कीमती हो जाता था, और कभी बिल्कुल नाचीज़ सा।
    हार का एहसास दोनों को था। लेकिन कभी एक का सहारा उसे जीत की गलतफहमी सी दे जाता और कभी दूसरी का सहारा उसे जीत की खुशफहमी में डाल देता।
    यह एक भयानक टाकराव था - अपनी अपनी हार का, जो अपने अपने दर्द का इज़हार चाहता था। लेकिन समाज से नहीं, सिर्फ किसी उससे, जो दोनों के दर्द को अपने गले से लगा सके।
    और यह हकीकत है कि पूरे पच्चीस साल दोनों क दर्द, मेरे दिल के एक कोने में बैठा रहा। और पच्चीस साल बाद १९७० में मैं यह कहानी लिख पायी थी- शाह की कंजरी ।
    17 min
  • Yeh kahani nahi#यह कहानी नहीं; अमृता प्रीतम
    यह कहानी नही .......... अमृता प्रीतम
    कभी तो कोई इन दीवारों से पूछे
    कि कैसे इबादत गुनाह बन गई है .....
    अमृता के जहन पर जो साए थे वही उसकी कहानियो में ढलते रहे ..उसकी कहानी के किरदार बनते रहे .चाहे वह शाह जी की कंजरी हो या जंगली बूटी की अंगूरी ..या फ़िर और किरदार .अमृता को लगता कि उनके साथ जो साए हैं वह आज के वक्त के नहीं हैं पता नही किस काल से ,किस वक्त से हैं ,वह ख़ुद बा ख़ुद कहानी के कविता के किरदार बनते चले गए .कई बार ऐसा होता है कि हमारे आस पास कई छोटी -छोटी घटनाएँ घटित होती रहती है और उनको हम जैसे उनको चेतन मन में संभाल लेते हैं ...इसी तरह की एक घटना को अमृता ने तब लिखा जब साहिर को एक रुमाल की जरुँरत पड़ी .तो अमृता ने उसको नया रुमाल दिया और उसका पुराना मैला रुमाल अपने पास संभाल लिया जो साहिर ने वहीँ छोड़ दिया था ...इसी तरह के वाकया को लिखने के लिए उन्होंने कहा कि नज्में तो बहुत लिखी पर इस तरह की छोटी छोटी बातों को संभालने के लिए एक कहानी भी लिखी थी ,जिस को उन्होंने नाम दिया था ...यह कहानी नहीं ..पर यह कहानी थी .........इस में उन्होंने किरदारों के नाम अ और स दिए ....उन्हीं के लफ्जों में ...
    यह कहानी नही ..........[भाग १ ]
    पत्थर और चूना बहुत था ,लेकिन अगर थोडी सी जगह पर दीवार की तरह उभर कर खड़ा हो जाता तो घर की दीवारें बन सकती थी ...पर बनीं नहीं ..वह धरती पर फ़ैल गया ,सड़कों की तरह और वे तमाम उम्र उन्ही सड़कों पर चलते रहे ...
    सड़कें कभी एक दूसरे के पहलू से भी फटती है ,एक दूसरे के शरीर को चीर कर गुजरती भी हैं ..एक दूजे का हाथ छुडा कर गुम भी हो जाती है और एक दूसरे के गले मिल कर एक दूजे में लीन भी हो जाती हैं ..वे भी एक दूसरे से मिलते रहे .पर सिर्फ़ तब जब उनके पैरों के नीचे बिछी हुई सड़कें आपस में मिल जाती ..
    घड़ी पल भर के लिए शायद सड़कें भी चौंक कर रुक जाती और उनके पैर भी ...और तब शायद उनको दोनों को उस घर का ध्यान आ जाता जो शायद बना ही नहीं था ...बन सकता था ,फ़िर भी क्यों नही बना था ? वे दोनों हैरान हो कर पांवों के नीचे की जमीन को ऐसे देखते थे जैसे उस जमीन से पूछ रहे हों ....
    और कितनी देर तक उस जमीन को देखते रहते और उसको इस नजर से देखते जैसे वह नजर से उस जमीन में उस घर की नीवं खोद देंगे और अपना एक घर बना लेंगे ...
    और कई समय बाद सचमुच वहां वह जादू का घर उभर कर खडा हो जाता और वह दोनों इस तरह से सहज हो जाते मानों बरसों से उस घर में रह रहे हों ...
    यह उनकी भरपूर जवानी की बात नहीं ,अब की बात है ,ठंडी उम्र की बात ..कि "अ" एक सरकारी मीटिंग के 'स "के शहर गई ..अ को वक्त ने स जितना सरकारी ओहदा दिया है और बराबर की हेसियत के लोग जब मीटिंग से उठे ,सरकारी दफ्तर ने बाहर के शहरों से आने वालों के वापसी के टिकट तैयार रखे हुए थे ,स ने आगे बढ़ कर अ का टिकट ले लिया और बाहर आ कर अ से अपनी गाड़ी में आ कर बैठने को कहा ...
    पूछा समान कहाँ है ?
    "होटल में !"
    स ने ड्राइवर से पहले होटल में चलने को कहा और फ़िर वापस घर चलने के लिए
    अ ने कोई आपत्ति नही की .पर तर्क के तौर पर कहा कि "'प्लेन जाने में सिर्फ़ दो घंटे बाकी है होटल हो कर मुश्किल से एयरपोर्ट पहुंचूंगी "
    प्लेन कल भी जाएगा परसों भी जायेगा और रोज जायेगा .स ने सिर्फ़ इतना कहा और फ़िर पूरे रास्ते कुछ नही कहा .
    होटल से सूटकेस ले कर गाड़ी में रख लिया तो अ ने फ़िर कहा ..."वक्त थोड़ा है प्लेन मिस हो जाएगा "
    स ने जवाब दिया कि घर पर माँ इन्तजार रही होगी ...
    अ सोचती रही कि शायद स ने माँ को मीटिंग का दिन बताया हुआ था पर वह समझ नही सकी कि "क्यों "बताया हुआ था ?
    अ कभी कभी मन से यह क्यों पूछ लेती थी पर जवाब का इन्तजार नही करती थी .वह जानती थी कि मन के पास कोई जवाब नहीं है .वह चुप बैठी बाहर इमारतों को देखती रही ..
    कुछ देर बार इमारतों का सिलसिला टूट गया शहर से बाहर दूर आबादी आ गई और पाम के बड़े बड़े पेडों की कतारे शुरू हो गयीं
    समुंदर शायद कहीं पास था अ की साँसे जैसे नमकीन हो गई उसको लगा जैसे पाम के पत्तों में कम्पन आ गया है .... स का घर अब पास था ..
    पेड़ पत्तों से लिपटी हुई कॉटेज के पास पहुँच कर गाड़ी खड़ी हो गई अ भी उतरी पर कॉटेज के पास भीतर जाते हुए वह एक पल के लिए केले के पेड़ के पास खड़ी हो गई ..जी किया अपने कांपते हुए हाथो को वह कांपते हुए केले ले पत्तो के बेच में रख दे ..वह स के साथ भीतर जा सकती थी पर हाथों कि वहां जरुरत नहीं थी ..इन हाथों से अब वह न स को कुछ दे सकती थी न स से कुछ ले सकती थी .....
    माँ ने शायद गाड़ी की आवाज़ सुन ली थी .बाहर आके उन्होंने हमेशा की तरह अ का माथा चूमा और कहा ...आओ बेटी ...
    इस बार अ बहुत दिनों बाद माँ से मिली थी ..
    21 min
  • Jangli Booti#जंगली बूटी; अमृता प्रीतम
    जंगली बूटी: अमृता प्रीतम की कहानी Story Junglee Booti by Amrita Preetam
    अंगूरी, मेरे पड़ोसियों के पड़ोसियों के पड़ोसियों के घर, उनके बड़े ही पुराने नौकर की बिल्कुल नई बीवी है. एक तो नई इस बात से कि वह अपने पति की दूसरी बीवी है, सो उसका पति ‘दुहाजू’ हुआ. जू का मतलब अगर ‘जून’ हो तो इसका पूरा मतलब निकला ‘दूसरी जून में पड़ चुका आदमी’, यानी दूसरे विवाह की जून में, और अंगूरी क्योंकि अभी विवाह की पहली जून में ही है, यानी पहली विवाह की जून में, इसलिए नई हुई. और दूसरे वह इस बात से भी नई है कि उसका गौना आए अभी जितने महीने हुए हैं, वे सारे महीने
    मिलकर भी एक साल नहीं बनेंगे.
    पांच-छः साल हुए, प्रभाती जब अपने मालिकों से छुट्टी लेकर अपनी पहली पत्नी की ‘किरिया’ करने के लिए अपने गांव गया था, तो कहते हैं कि किरिया वाले दिन इस अंगूरी के बाप ने उसका अंगोछा निचोड़ दिया था. किसी भी मर्द का यह अंगोछा भले ही अपनी पत्नी की मौत पर आंसुओं से नहीं भीगा होता, चौथे दिन या किरिया के दिन नहाकर बदन पोंछने के बाद वह अंगोछा पानी में ही भीगा होता है, पर इस साधारण-सी गांव की रस्म से किसी और लड़की का बाप उठकर जब यह अंगोछा निचोड़ देता है तो जैसे कह रहा होता है,“उस मरनेवाली की जगह मैं तुम्हें अपनी बेटी देता हूं और अब तुम्हें रोने की ज़रूरत नहीं, मैंने तुम्हारा आंसुओं से भीगा हुआ अंगोछा भी सुखा दिया है.”
    इस तरह प्रभाती का इस अंगूरी के साथ दूसरा विवाह हो गया था. पर एक तो अंगूरी अभी आयु की बहुत छोटी थी, और दूसरे अंगूरी की मां गठिया के रोग से जुड़ी हुई थी. इसलिए गौने की बात पांच सालों पर जा पड़ी थी.… फिर एक-एक कर पांच साल भी निकल गए थे. और इस साल जब प्रभाती अपने मालिकों से छुट्टी लेकर अपने गांव गौना लेने गया था तो अपने मालिकों को पहले ही कह गया था कि या तो वह अपनी बहू (पत्नी) को भी साथ लाएगा और शहर में अपने साथ रखेगा, और या फिर वह भी गांव से नहीं लौटेगा. मालिक पहले तो दलील करने लगे थे कि एक प्रभाती की जगह अपनी रसोई में से वे दो जनों की रोटी नहीं देना चाहते. पर जब प्रभाती ने यह बात कही कि वह कोठरी के पीछे वाली कच्ची जगह को पोतकर अपना अलग चूल्हा बनाएगी, अपना पकाएगी, अपना खाएगी तो उसके मालिक यह बात मान गए थे. सो अंगूरी शहर आ गई थी. चाहे अंगूरी ने शहर आकर कुछ दिन मुहल्ले के मर्दों से तो क्या औरतों से भी घूंघट न उठाया था, पर फिर धीरे-धीरे उसका घूंघट झीना हो गया था. वह पैरों में चांदी के झांझरें पहनकर छनक- छनक करती मुहल्ले की रौनक बन गई थी. एक झांझर उसके पांवों में पहनी होती, एक उसकी हंसी में. चाहे वह दिन का अधिकतर हिस्सा अपनी कोठरी में ही रहती थी पर जब भी बाहर निकलती, एक रौनक उसके पांवों के साथ-साथ चलती थी.
    “यह क्या पहना है, अंगूरी?”
    14 min
  • एक जीवी, एक रतनी,एक सपना; अमृता प्रीतम
    पुरानी यादों के धागों को पकड़कर कहानियां बनुना अमृता प्रीतम की अनूठी शैली थी. कहानी एक जीवी, एक रत्नी, एक सपना इस कहानी को पढ़ते हुए आप उनकी इस शैली से परिचित होंगे. पाठकों से बतियाते हुए कहानियां लिख देना यह अमृता प्रीतम ही कर सकती थीं.
    ‘‘पालक एक आने गठ्ठी, टमाटर छह आने रत्तल और हरी मिर्चें एक आने की ढेरी…’’ पता नहीं तरकारी बेचनेवाली स्त्री का मुख कैसा था कि मुझे लगा पालक के पत्तों की सारी कोमलता, टमाटरों का सारा रंग और हरी मिर्चों की सारी ख़ुशबू उसके चेहरे पर पुती हुई थी.
    एक बच्चा उसकी झोली में दूध पी रहा था. एक मुठ्ठी में उसने मां की चोली पकड़ रखी थी और दूसरा हाथ वह बार-बार पालक के पत्तों पर पटकता था. मां कभी उसका हाथ पीछे हटाती थी और कभी पालक की ढेरी को आगे सरकाती थी, पर जब उसे दूसरी तरफ़ बढ़कर कोई चीज़ ठीक करनी पड़ती थी, तो बच्चे का हाथ फिर पालक के पत्तों पर पड़ जाता था. उस स्त्री ने अपने बच्चे की मुठ्ठी खोलकर पालक के पत्तों को छुड़ाते हुए घूरकर देखा, पर उसके होंठों की हंसी उसके चेहरे की सिल्वटों में से उछलकर बहने लगी. सामने पड़ी हुई सारी तरकारी पर जैसे उसने हंसी छिड़क दी हो और मुझे लगा, ऐसी ताज़ी सब्ज़ी कभी कहीं उगी नहीं होगी.
    कई तरकारी बेचनेवाले मेरे घर के दरवाज़े के सामने से गुज़रते थे. कभी देर भी हो जाती, पर किसी से तरकारी न ख़रीद सकती थी. रोज़ उस स्त्री का चेहरा मुझे बुलाता रहता था.
    उससे ख़रीदी हुई तरकारी जब मैं काटती, धोती और पतीले में डालकर पकाने के लिए रखती-सोचती रहती, उसका पति कैसा होगा! वह जब अपनी पत्नी को देखता होगा, छूता होगा, तो क्या उसके होंठों में पालक का, टमाटरों का और हरी मिर्चों का सारा स्वाद घुल जाता होगा?
    कभी-कभी मुझे अपने पर खीझ होती कि इस स्त्री का ख़्याल किस तरह मेरे पीछे पड़ गया था. इन दिनों मैं एक गुजराती उपन्यास पढ़ रही थी. इस उपन्यास में रौशनी की लकीर-जैसी एक लड़की थी-जीवी. एक मर्द उसको देखता है और उसे लगता है कि उसके जीवन की रात में तारों के बीज उग आए हैं. वह हाथ लम्बे करता है, पर तारे हाथ नहीं आते और वह निराश होकर जीवी से कहता है, ‘‘तुम मेरे गांव में अपनी जाति के किसी आदमी से ब्याह कर लो. मुझे दूर से सूरत ही दिखती रहेगी.’’ उस दिन का सूरज जब जीवी देखता है, तो वह इस तरह लाल हो जाता है, जैसे किसी ने कुंवारी लड़की को छू लिया हो कहानी के धागे लम्बे हो जाते हैं, और जीवी के चेहरे पर दु:खों की रेखाएं पड़ जाती हैं इस जीवी का ख़्याल भी आजकल मेरे पीछे पड़ा हुआ था, पर मुझे खीझ नहीं होती थीं, वे तो दु:खों की रेखाएं थीं, वही रेखाएं जो मेरे गीतों में थीं, और रेखाएं रेखाओं में मिल जाती हैं पर यह दूसरी जिसके होंठों पर हंसी की बूंदें थीं, केसर की तुरियां थीं.
    दूसरे दिन मैंने अपने पांवों को रोका कि मैं उससे तरकारी ख़रीदने नहीं जाऊंगी. चौकीदार से कहा कि यहां जब तरकारी बेचनेवाला आए तो मेरा दरवाज़ा खटखटाना दरवाज़े पर दस्तक हुई. एक-एक चीज़ को मैंने हाथ लगाकर देखा. आलू-नरम और गड्डों वाले. फरसबीन-जैसे फलियों के दिल सूख गए हों. पालक-जैसे वह दिन-भर की धूल फांककर बेहद थक गई हो. टमाटर-जैसे वे भूख के कारण बिलखते हुए सो गए हो. हरी मिर्चें-जैसे किसी ने उनकी सांसों में से ख़ुशबू निकाल ली हो, मैंने दरवाज़ा बंद कर लिया. और पांव मेरे रोकने पर भी उस तरकारी वाली की ओर चल पड़े.
    आज उसके पास उसका पति भी था. वह मंडी से तरकारी लेकर आया था और उसके साथ मिलकर तरकारियों को पानी से धोकर अलग-अलग रख रहा था और उनके भाव लगा रहा था. उसकी सूरत पहचानी-सी थी इसे मैंने कब देखा था, कहां देखा था-एक नई बात पीछे पड़ गई.
    ‘‘बीबी जी, आप!’’
    ‘‘मैं… पर मैंने तुम्हें पहचाना नहीं.’’
    ‘‘इसे भी नहीं पहचाना? यह रत्नी!’’
    ‘‘माणकू रत्नी.’’ मैंने अपनी स्मृतियों में ढूंढ़ा, पर माणकू और रत्नी कहीं मिल नहीं रहे थे.
    ‘‘तीन साल हो गए हैं, बल्कि महीना ऊपर हो गया है. एक गांव के पास क्या नाम था उसका आपकी मोटर ख़राब हो गई थी.’’
    ‘‘हां, हुई तो थी.’’
    ‘‘और आप वहां से गुज़रते हुए एक ट्रक में बैठकर धुलिया आए थे, नया टायर ख़रीदने के लिए.’’
    ‘‘हां-हां.’’और फिर मेरी स्मृति में मुझे माणकू और....
    10 min
  • Unmadini#उन्मादिनी (प्रेम कहानी) सुभद्रा कुमारी चौहान
    Unmadini (उन्मादिनी)
    लोग मुझे उन्मदिनि कहते हैं। क्यों कहते हैं, यह तो कहने वाले ही जाने, किन्तु मैने आज तक कोई भी ऐसा काम नहीं किया है जिसमें उन्माद के लक्षण हो ...........क्या ऐसी कोई भी संध्या गयी है जब मैंने वहाँ दीपक नहीं जलाया है? कौन सा ऐसा सबेरा हुआ है जब ओस से धुली हुई नयी-नयी कलियों से मैंने उस समाधि को नहीं ढँक दिया? फिर भी मैं उन्मादिनी हूँ! यदि अपने किसी आत्मीय के सच्चे और निःस्वार्थ प्रेम को समझने और उसके मूल्य करने को ही उन्माद कहते हैं, तो ईश्वर ऐसा उन्माद सभी को दे।
    28 min

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