Suno Kahaniyan

Suno Kahaniyan

By PoonamArtsBooks
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Suno Kahaniyan episodes

  • Gauri#गौरी सुभद्रा कुमारी चौहान
    Gauri Subhadra Kumari Chauhan
    गौरी सुभद्रा कुमारी चौहान
    शाम को गोधूलि की बेला, कुली के सिर पर सामान रखवाये जब बाबू राधाकृष्ण अपने घर आये, तब उनके भारी-भारी पैरों की चाल, और चेहरे के भाव से ही कुंती ने जान लिया कि काम वहाँ भी नहीं बना। कुली के सिर पर से बिस्तर उतरवाकर बाबू राधाकृष्ण ने उसे कुछ पैसे दिए। कुली सलाम करके चला गया और वह पास ही पड़ी, एक आराम कुर्सी पर जिसके स्प्रिंग खुलकर कुछ ढीले होने के कारण इधर-उधर फैल गए थे, गिर से पड़े। उनके इस प्रकार बैठने से कुछ स्प्रिंग आपस में टकराए, जिससे एक प्रकार की झन-झन की आवाज़ हुई। पास ही बैठे कुत्ते ने कान उठाकर इधर-उधर देखा फिर भौं-भौं करके भौंक उठा। इसी समय उनकी पत्नी कुंती ने कमरे में प्रवेश किया। काम की सफलता या असफलता के बारे में कुछ भी न पूछकर कुंती ने नम्र स्वर में कहा, "चलो हाथ-मुंह धो लो, चाय तैयार है।
    'चाय', राधाकृष्ण चौंक से पड़े, "चाय के लिए मैंने नहीं कहा था।"
    "नहीं कहा था तो क्या हुआ, पी लो।" कुंती ने आग्रहपूर्वक कहा।
    "अच्छा चलो", कहकर राधाकृष्ण कुंती के पीछे-पीछे चले गए।
    गौरी, अपराधिनी की भाँति, माता-पिता दोनों की दृष्टि से बचती हुई, पिता के लिए चाय तैयार कर रही थी। उसे ऐसा लग रहा था कि पिता की सारी कठिनाइयों की जड़ वही है। न वह होती और न पिता को उसके विवाह की चिन्ता में, इस प्रकार स्थान-स्थान घूमना पड़ता। वह मुँह खोलकर किस प्रकार कह दे कि उसके विवाह के लिए इतनी अधिक परेशानी उठाने की आवश्यकता नहीं। माता-पिता चाहे जिसके साथ उसकी शादी कर दें, वह सुखी रहेगी। न करें तो भी वह सुखी है। जब विवाह के लिए उसे जरा भी चिन्ता नहीं, तब माता-पिता इतने परेशान क्यों रहते हैं–गौरी यही न समझ पाती थी। कभी-कभी वह सोचती–क्या मैं माता-पिता को इतनी भारी हो गयी हूँ? रात-दिन सिवा विवाह के उन्हें और कुछ सूझता नहीं। तब आत्मग्लानि और क्षोभ से गौरी का रोम-रोम व्यथित हो उठता। उसे ऐसा लगता कि धरती फटे और वह समा जाय, किन्तु ऐसा कभी न हुआ।
    गौरी, वह जो पूनो के चाँद की तरह बढ़ना भर जानती थी, घटने का जिसके पास कोई साधन न था, बाबू राधाकृष्ण के लिए चिंता की सामग्री हो गई थी। गौरी उनकी एकमात्र संतान थी। उसका विवाह वे योग्य वर के साथ करना चाहते थे, यही सबसे बड़ी कठिनाई थी। योग्य पात्र का मूल्य चुकाने लायक उनके पास यथेष्ट संपत्ति न थी। यही कारण था कि गौरी का यह उन्नीसवाँ साल चल रहा था। फिर भी वे कन्या के हाथ पीले न कर सके थे। गौरी ही उनकी अकेली संतान थी । छुटपन से ही उसका बड़ा लाड़-प्यार हुआ था । प्राय: उसके उचित-अनुचित सारे हठ पूरे हुआ करते थे । इसी कारण गौरी का स्वभाव निर्भीक, दृढ़-निश्चयी और हठीला था । वह एक बार जिस बात को सोच-समझकर कह दे, फिर उस बात से उसे कोई हटा नहीं सकता था । पिता की परेशानियों को देखते हुए अनेक बार उसके जी में आया कि यह पिता से साफ-साफ पूछे कि आखिर वे उसके विवाह के लिए इतने चिंतित क्यों हैं ? वह स्वयं तो विवाह को इतना आवश्यक नहीं समझती । और अगर पिता विवाह को इतना अधिक महत्त्व देते हैं, तो फिर पात्र और कुपात्र क्या ? विवाह करना है कर दें, किसी के भी साथ, वह हर हालत में सुखी और संतुष्ट रहेगी । उनकी यह परेशानी, इतनी चिंता अब उससे सही नहीं जाती । किंतु संकोच और लज्जा उसकी जबान पर ताला-सा डाल देते । हजार बार निश्चय करके भी वह पिता से यह बात न कह सकी ।
    पिता को आते देख, गौरी चुपके से दूसरे कमरे में चली गई । राधाकृष्ण बाबू ने जैसे बेमन से हाथ-मुँह धोया और पास ही रखी एक कुरसी पर बैठ गए । वहीं एक मेज पर कुन्ती ने चाय और कुछ नमकीन पूरियाँ पति के सामने रख दीं । पूरियों की तरफ राधाकृष्ण ने देखा भी नहीं । चाय का प्याला उठाकर पीने लगे ।
    ऐसी कन्या को जन्म देकर, जिसके लिए वर ही न मिलता हो, कुन्ती स्वयं ही जैसे अपराधिन हो रही थी । कुन्ती ने डरते-डरते पूछा, जहाँ गए थे क्या वहाँ भी कुछ ठीक नहीं हुआ ?
    -ठीक ! ठीक होने को वहाँ धरा ही क्या है, चाय का घूँट गले से नीचे उतारते हुए बाबू राधाकृष्ण ने कहा, सब हमीं लोगों पर है । विवाह करना चाहें तो सब ठीक है, न करना चाहें तो कुछ भी ठीक नहीं है।
    कुन्ती ने उत्सुकता से पूछा, फिर क्या बात है, लड़के को देखा?
    -हाँ देखा, अच्छी तरह देखा हूँ ! कह राधाकृष्ण फिर चाय पीने लगे । कुन्ती की समझ में यह पहेली न आई, उसने कहा, 'जरा समझाकर कहो । तुम्हारी बात तो समझ में ही नहीं आती ।'
    राधाकृष्ण ने कहा, "समझाकर कहता हूँ, सुनो। वह लड़का, लड़का नहीं आदमी है। तुम्हारी गौरी के साथ मामूली चपरासी की तरह दिखेगा। बोलो करोगी ब्याह?''
    कुंती बोली, ''विवाह की बात तो पीछे होगी। क्या रूप-रंग बहुत खराब है ? फोटो में तो वैसा नहीं जान पड़ता।"
    राधाकृष्ण ने कहा, "रूप-रंग नहीं, रहन-सहन बहुत खराब है
    23 min
  • Rupa#रूपा सुभद्रा कुमारी चौहान
    Rupa Subhadra Kumari Chauhan
    रुपा सुभद्रा कुमारी चौहान
    असमय की घंटी ने सभी को बेचैन-सा कर दिया । अभी आधा घंटा भी नहीं हुआ, मैट्रन जेल बंद करके गई है । फिर तुरंत ही वह घंटी कैसे? जेल-जीवन से घबराई हुई बहनों ने सोचा, शायद उनकी ही रिहाई का फरमान आया हो, जिनके मुलाकाती बहुत दिनों से न आए थे, उन्होंने अंदाज लगाया शायद उनसे कोई मिलने आया है । जिन्हें किसी तरह के सामान की प्रतीक्षा थी उन्होंने समझा, उनका सामान ही आया होगा ।
    मेरी तीन साल की बेटी ममता दौड़ती हुई आई, और मेरे गले में लिपटकर बोली, अम्मा उठो चलो ! घंटी बजी है । फाटक खुलेगा । आज तो हम लोग भी छूटने वाले हैं ।
    मैं अच्छी तरह जानती थी कि उसकी आशा कितनी निराधार है, फिर भी उसका मन रखने के लिए उसके साथ फाटक की ओर चल पड़ी ।
    जमादारिन जल्दी-जल्दी अपना पल्ला संभालती हुई आई; ताला खोलकर उसने फाटक खोल दिया । असिस्टेंट जेलर के साथ एक चौबीस-पच्चीस साल की स्त्री अंदर आई और एक तरफ चुपचाप खड़ी हो गई । उसके साफ कपड़े और गंभीर मुद्रा से बहुत-सी बहनों ने अंदाज लगाया कि यह भी शायद राजबन्दिनी है । जेलर ने जमादारिन को बुलाया और उसे धीरे-धीरे समझाकर चला गया ।
    जमादारिन ताला बन्द करके अंदर आई । अपनी हाथ की छड़ी से उस नई आई हुई स्त्री को मारती हुई बोली, चल हरामजादी ! बच्चे को मारना ही था तो उसे पैदा क्यों किया था ।
    मार से वह स्त्री तिलमिला-सी उठी, फिर भी जमादारिन के आगे-आगे, जल्दी-ज़ल्दी चल पड़ी । शायद इस डर से कि कहीं दूसरा प्रहार भी न हो जाये । परंतु जमादारिन को इतने ही से संतोष कैसे हो जाता? उसने और भी जोर से मारते हुए और अश्लील गालियाँ देते हुए कहा, आँख दिखाती है रंडी ! देख तो नम्बरदारिन, उधेड़ ले चमड़ी, राँड की और गुनहखाने में बन्द कर दे ।
    अब मुझसे न सहा गया । मैंने कहा, जमादारिन, मैट्रन ऐसा करे तो करे, पर तुम बाल-बच्चे वाली स्त्री ठहरीं, तुम किसी पर बिना जाने क्यों हाथ उठाती हो ।
    जमादारिन का स्वर उसी समय बदल गया । उसने मुझे देखा ही न था; नहीं तो शायद इस बेरहमी से न मारती । बोली, आप नहीं जानतीं बहन जी, यह खूनी औरत है, अपने बच्चे को मार डाला है इसने ।
    मैंने कहा, उसके अपराध की सजा तो कानून से छोटी सजा से लेकर फांसी तक की हो सकती है । तुम्हारा काम तो उसे अपनी देख-रेख में बन्द रखना भर है । तुम वही करो । सजा का काम देने वालों पर छोड़ दो ।
    वह गुनहखाने में बन्द कर दी गई । सब लोग अपने-अपने काम में लग गए मगर मुझे उस औरत की याद न भूली । मैं उस गुनहखाने की तरफ गई । लकड़ी का दरवाजा खुला था । वह छड़ के दरवाजे में बन्द थी । मैं अंदर आँगन में गई तो देखा, वह औरत अभी उसी प्रकार बैठी थी, रोटी और दाल उसने छुई भी न थी । मैंने उससे पूछा, तुमने खाया क्यों नहीं?" खाना खा लो ।
    उसने मेरी तरफ देखा । फिर उसकी आँखों में आँसू भर आए । मेरा भी जी भर आया । मैंने कहा, तुम रोयो मत, वर्ना मैं भी तुम्हारे साथ रोऊँगी । खाना खा लो, फिर मुझसे बतलायो कि तुम क्यों पकड़कर लाई गई हो । सचमुच तुमने...पर विश्वास नहीं होता कि कोई माँ अपने बच्चे को मार सकती है ।
    अब वह फूट पड़ी । रोते-रोते बोली, कोई माँ मारे चाहे न मारे, मैंने तो अपनी बच्ची को मार डाला है बहन जी! यह बात सच है ।
    -कैसे? मैंने आश्चर्य से पूछा।
    -कैसे मारा, क्या बताऊँ...और वह फूट-फूट कर रोने लगी । मैं उसके पास बड़ी देर तक खड़ी रही । बहुत बार उससे खाने को कहा, पर उसने न तो खाया और न यही बतलाया कि उसने अपने बच्चे को क्यों और कैसे मारा । मैंने सोचा, इसके पास से जाऊँ तो शायद यह खाना खा ले और कुछ आराम भी कर ले । मैं अपने ओठे पर आकर लेट गई, और वहाँ कुछ देर तक पड़ी रही । एकाएक फाटक की घंटी बजी ओर फाटक खुला । मैंने देखा कि दो स्त्रियाँ रुपा को कहीं लिए जा रही हैं । पास ही खड़ी हुई कैदिन ने पूछा, रूपा को कहां लिए जा रहे हैं ये लोग?
    वह धीरे-धीरे बोली, खूनी औरत है न इसलिए फांसी वार्ड में ले जा रहे हैं।
    रूपा चली गई । पर मुझे उसका रोना, उसकी विषादभरी आँखें, उसका चेहरा भूलता न था । मन कहता था कि वह हत्यारिन नहीं है, पर मेरी आंखों के सामने वह फांसी वार्ड में गई, हत्या के जुर्म में पकड़कर आई, फिर अविश्वास के लिए कहां जगह थी?
    धीरे-धीरे मैं रूपा को भूल चली थी । एक दिन अखबार के एक समाचार ने उस याद को ताजा कर दिया । समाचार था, ...गांव में रूपा नाम की स्त्री अपनी छह साल की बच्ची को लेकर कुएँ में कूद पड़ी...खबर होते ही गाँव वाले आ गए और माँ-बेटी को कुएँ से निकाला । बच्ची तो मर चुकी थी लेकिन रूपा को कोई हानि न पहुंची थी और वह बच्ची की हत्या करने के अपराध में पकड़कर जबलपुर सेंट्रल जेल में लाई गई । बच्ची को लेकर वह कुएँ में क्यों कूदी इसका कारण अज्ञात है ।
    मैंने अखबार पढ़ा और जान गई कि हत्यारिन रुपा है ।
    11 min
  • Holi#होली सुभद्रा कुमारी चौहान
    Holi Subhadra Kumari Chauhan
    होली सुभद्रा कुमारी चौहान
    (1)
    "कल होली है।"
    "होगी।"
    "क्या तुम न मनाओगी?"
    "नहीं।"
    ''नहीं?''
    ''न ।''
    '''क्यों? ''
    ''क्या बताऊं क्यों?''
    ''आखिर कुछ सुनूं भी तो ।''
    ''सुनकर क्या करोगे? ''
    ''जो करते बनेगा ।''
    ''तुमसे कुछ भी न बनेगा ।''
    ''तो भी ।''
    ''तो भी क्या कहूँ?
    "क्या तुम नहीं जानते होली या कोई भी त्योहार वही मनाता है जो सुखी है । जिसके जीवन में किसी प्रकार का सुख ही नहीं, वह त्योहार भला किस बिरते पर मनावे? ''
    ''तो क्या तुमसे होली खेलने न आऊं? ''
    ''क्या करोगे आकर?''
    सकरुण दृष्टि से करुणा की ओर देखते हुए नरेश साइकिल उठाकर घर चल दिया । करुणा अपने घर के काम-काज में लग गई ।
    (2)
    नरेश के जाने के आध घंटे बाद ही करुणा के पति जगत प्रसाद ने घर में प्रवेश किया । उनकी आँखें लाल थीं । मुंह से तेज शराब की बू आ रही थी । जलती हुई सिगरेट को एक ओर फेंकते हुए वे कुरसी खींच कर बैठ गये । भयभीत हिरनी की तरह पति की ओर देखते हुए करुणा ने पूछा- ''दो दिन तक घर नहीं आए, क्या कुछ तबीयत खराब थी? यदि न आया करो तो खबर तो भिजवा दिया करो । मैं प्रतीक्षा में ही बैठी रहती हूं।''
    उन्होंने करुणा की बातों पर कुछ भी ध्यान न दिया । जेब से रुपये निकाल कर मेज़ पर ढेर लगाते हुए बोले- ''पंडितानी जी की तरह रोज़ ही सीख दिया करती हो कि जुआ न खेलो, शराब न पीयो, यह न करो, वह न करो । यदि मैं, जुआ न खेलता तो आज मुझे इतने रुपये इकट्ठे कहाँ से मिल जाते? देखो पूरे पन्द्रह सौ है । लो, इन्हें उठाकर रखो, पर मुझ से बिना पूछे इसमें से एक पाई भी न खर्च करना समझीं?
    करुणा जुए में जीते हुए रुपयों को मिट्टी समझती थी । गरीबी से दिन काटना उसे स्वीकार था । परन्तु चरित्र को भ्रष्ट करके धनवान बनना उसे प्रिय न था । वह जगत प्रसाद से बहुत डरती थी इसलिए अपने स्वतंत्र विचार वह कभी भी प्रकट न कर सकती थी । उसे इसका अनुभव कई बार हो चुका था। अपने स्वतंत्र विचार प्रकट करने के लिए उसे कितना अपमान, कितनी लांछना और कितना तिरस्कार सहना पड़ा था। यही कारण था कि आज भी वह अपने विचारों को अन्दर ही अन्दर दबा कर दबी हुई ज़बान से बोली- ''रुपया उठाकर तुम्हीं न रख दो? मेरे हाथ तो आटे में भिड़े है।'' करुणा की इस इनकारी से जगत प्रसाद क्रोध से तिलमिला उठे और कड़ी आवाज से पूछा-- क्या कहा?''
    करुणा कुछ न बोली नीची नजर किए हुए आटा सानती रही । इस चुप्पी से जगत प्रसाद का पारा एक सौ दस डिग्री पर पहुंच गया । क्रोध के आवेश में रुपये उठा कर उन्होंने फिर जेब में रख लिये- ''यह तो मैं जानता ही था कि तुम यही करोगी। मैं तो समझा था इन दो-तीन दिनों में तुम्हारा दिमाग़ ठिकाने आ गया होगा। ऊट-पटांग बातें भूल गई होगी और कुछ अकल आ गई होगी। परन्तु सोचना व्यर्थ था। तुम्हें अपनी विद्वत्ता का घमंड है तो मुझे भी कुछ है । लो! जाता हूँ अब रहना सुख से '' कहते-कहते जगत प्रसाद कमरे से बाहर निकलने लगे।
    पीछे से दौड़कर करुणा ने उनके कोट का सिरा पकड़ लिया और विनीत स्वर में बोली- ''रोटी तो खा लो मैं रुपये रखे लेती हूँ। क्यों नाराज होते हो?'' एक जोर के झटके के साथ कोट को छुड़ाकर जगत प्रसाद चल दिये । झटका लगने से करुणा पत्थर पर गिर पड़ी और सिर फट गया । खून की धारा बह चली, और सारी जाकेट लाल हो गई ।
    ( 3 )
    संध्या का समय था । पास ही बाबू भगवती प्रसाद जी के सामने बाली चौक से सुरीली आवाज आ रही थी।
    ''होली कैसे मनाऊं? ''
    ''सैया बिदेस, मैं द्वारे ठाढ़ी, कर मल मल पछताऊं ।''
    होली के दीवाने भंग के नशे में चूर थे। गाने वाली नर्तकी पर रुपयों की बौछार हो रही थी । जगत प्रसाद को अपनी दुखिया पत्नी का खयाल भी न था। रुपया बरसाने वालों में उन्हीं का सब से पहिला नम्बर था। इधर करुणा भूखी-प्यासी छटपटाती हुई चारपाई पर करवटें बदल रही थी।
    ''भाभी, दरवाजा खोलो'' किसी ने बाहर से आवाज दी। करुणा ने कष्ट के साथ उठकर दरवाजा खोल दिया। देखा तो सामने रंग की पिचकारी लिए हुए नरेश खड़ा था। हाथ से पिचकारी छूट कर गिर पड़ी। उसने साश्चर्य पूछा-
    ''भाभी यह क्या? ''
    करुणा की आँखें छल छला आई, उसने रूंधे हुए कंठ से कहा-
    ''यही तो मेरी होली है, भैय्या।''
    5 min
  • तांगेवाला सुभद्रा कुमारी चौहान
    Tangewala Subhadra Kumari Chauhan
    ताँगेवाला सुभद्रा कुमारी चौहान
    गरमी की लम्बी छुट्टियां प्रारंभ हो चुकी थीं। मेरे कुछ मित्रों ने इन गर्मियों की छुट्टियों में कश्मीर जाना तय किया था और इस प्रस्ताव को सबसे अधिक समर्थन मैंने दिया। हम लोग जाने की पूरी तैयारी कर चुके थे कि अचानक यात्रा के दो दिन पहले मेरे एक मित्र रामकृष्ण का एक आवश्यक पत्र आया। इस पत्र के अनुसार मुझे अपनी कश्मीर यात्रा स्थगित करनी पड़ी। मैं अपने मित्र से मिलने उसके गांव की ओर चल पड़ा।
    जिस स्टेशन पर उतरना था, गाड़ी वहां दुपहर एक बजे पहुंची । चिलचिलाती धूप, लू की लपट और कच्ची सड़क की धूल ! मेरा गांव तक जाने का साहस न हुआ। मैंने सोचा, शाम को जाना ही ठीक होगा। ताँगेवाले कम थे और उतरनेवाले और भी कम । ताँगेवाले सवारी लेकर चल पड़े। खाली ताँगेवाले भी चलने का उपक्रम कर रहे थे कि एक अच्छा-सा ताँगा-घोड़ा, देखकर उसे मैंने बुलाया। ताँगेवाले ने आकर सलाम किया। मैंने कहा, "देखो, भाई मुझे गांव जाना है, पर मैं अभी इस धूप में न जाऊंगा । शाम को पांच बजे के करीब जाऊंगा । तुम ठहरोगे?"
    "हाँ हुज़ूर, ठहरूंगा ।"
    "किराया क्या होगा ?"
    "हुज़ूर, जो आप खुशी से दे दें।"
    "खुशी की बात नहीं रेट क्या है? वह बतलाओ।"
    "तेईस मील है न हुज़ूर! आप दूसरों से पूछ लीजिए, पांच रुपए पूरे ताँगे के होते हैं। फिर चाहे एक सवारी हो या तीन ।"
    "पर मैं तो इतना न दूंगा।"
    "इसीलिए तो मैंने कहा कि आप खुशी से जो दे दीजिए हुज़ूर ।"
    मैं उसे कुछ पैसे देकर वेटिंग रूम में चला गया।
    शाम के छह बजे हम लोग खा-पीकर और खाने का कुछ सामान साथ रखकर गांव की ओर रवाना हुए । वैसे ताँगेवाला कहता था कि तेईस मील दो घंटे में खुशी से ले जा सकता है, पर स्टेशन से आगे दो मील के बाद ही कच्ची सड़क प्रारंभ हो जाती है, इसलिए देर लगेगी । मोटे साहब से हम चार घंटे बाद गाँव पहुँचेंगे । स्टेशन की सीमा पार करते ही किसानों के साफ-सुथरे लिपे-पुते छोटे-छोटे घर और हरे-भरे खेत बड़े ही सुहावने जान पड़े । सात भी न बज पाए थे कि पू्र्णचन्द्र ने सहस्रों घड़े दूध पृथ्वी पर उँड़ेल दिया । दिन की लू अब ठंडी हवा में परिवर्तित हो चुकी थी ।
    हम इस सुहावने दुश्य को देखकर मैदान में पहुंचे । अब रास्ते में दोनों ओर खाली मैदान था । दूर पर एक-आध पेड़ निर्जन में ऐसा खड़ा था, जैसे किसी की प्रतीक्षा कर रहा हो । मैंने सोचा चाँदनी रात की वह आभा एक साथी के अभाव में उतनी सुखदाई न हो सकेगी जितनी होनी चाहिए । मैंने ताँगेवाले से पूछा, जो धीरे-धीरे कुछ गुनगुना रहा था, 'कितने मील आ चुके हैं हम लोग?'
    -अभी हुज़ूर, कुल सात मील ही तो आए हैं । और फिर वह जरा जोर से गा उठा-
    हम फिर से वतन अपना सवाधीन बना लेंगे
    मैंने जरा सतर्क होकर ताँगेवाले की ओर देखा । खद्दर का कुरता और गान्धी टोपी उसके सिर पर थी । मैंने सोचा, इसीलिए तो यह स्वाधीनता के गीत गाता है ।
    मैंने ताँगेवाले से पूछा, कितने दिनों से ताँगा हांकते हो ताँगेवाले?
    -हुज़ूर कोई पांच साल हुए। किसी की नौकरी करने से यह अच्छा है । तबीयत हुई जोता, न तबीयत हुई बैठे रहे । किसी की ताबेदारी नहीं । अपने मन का राज है ।
    सामने चलकर नदी थी । नदी का पुल पार करते ही ताँगेवाले ने ताँगा रोक दिया । बोला, हुज़ूर, यहाँ जरा आराम कर लीजिए । नदी का पानी बहुत साफ़ और मीठा है । कहते हैं कि सन् सत्तावन के गदर में तात्या टोपे दुश्मनों की सेना को चीरते हुए यहीं से नदी के पार चला गया था ।
    तात्या टोपे? मैंने मन में सोचा, इसे इतिहास का भी कूछ ज्ञान है ।
    ताँगेवाला फिर बोला, हाँ हुज़ूर, तात्या टोपे नदी के पार जाना चाहता था । फिरंगियों की सेना ने उसे चारों ओर से घेर लिया था । फिर भी हुज़ूर वह इतना तेज, इतना फुर्तीला था कि चार-पांच बड़े-बड़े फिरंगी अफसरों के सामने से निकल गया, अपनी सेना समेत, और उसका कोई कूछ भी न कर सका ।
    मुझे ताँगेवाले के मुंह से इतिहास की कहानी बड़ी ही रोचक लगी । मैं जानता था कि आखिर इस ताँगेवाले के मन में क्या है? मैंने पूछा, 'फिर क्या हुआ ?' और मैं ताँगे से उतरकर उसके पीछे-पीछे चला ।
    वह बोला, 'सन सत्तावन के गदर में अगर हिन्दुस्तानियों में एका, होता तो पाँसा ही पलट जाता । पर तकदीर और फूट जो न कराए सो थोड़ा ! मौलवी अहमदशाह और तात्या टोपे सरीखे देशभक्त वीरों को भी हमीं में से धोखेबाज लोगों ने धोखा देकर दुश्मनों के हवाले कर दिया । खून खौल उठता है हुज़ूर, यह बात सोचकर?
    मैंने पूछा, तुम पढ़े-लिखे हो?
    ताँगेवाला उत्साह के साथ बोला, बहुत कम हुज़ूर हिंदी अच्छी तरह पढ़-लिख लेता हूँ। अंग्रेजी भी थोड़ी जानता हूँ । पर हुज़ूर जब से सत्तावन के गदर का इतिहास पढ़ा और यह जाना कि फिरंगी कैसे आए और कैसे फैल गए सारे हिंदुस्तान में, यह जाना, तब से हुजूर, बदले की भावना से रात-दिन जलता रहता हूँ । सरकारी नौकरी इसीलिए नहीं
    11 min
  • किस्मत सुभद्रा कुमारी चौहान
    Kismat/Qismat Subhadra Kumari Chauhan
    किस्मत सुभद्रा कुमारी चौहान
    (१)
    "भौजी, तुम सदा सफेद धोती क्यों पहनती हो ?"
    "मैं क्या बताऊँ, मुन्नी”।
    “क्यों भौजी ! क्या तुम्हें अम्मा रंगीन धोती नहीं पहिनने देती?"
    "नहीं मुन्नी ! मेरी किस्मत ही नहीं पहनने देती, अम्मा भी क्या करें ?"
    किस्मत कौन है, भौजी ! वह भी क्या अम्मा की तरह तुमसे लड़ा करती है और गालियाँ देती है ।”
    सात साल की मुन्नी ने किशोरी के गले में बाहें डाल कर पीठ पर झूलते हुए पूँछा–“किस्मत कहाँ है ? भौजी मुझे भी बता दो ।”
    सिल पर का पिसा हुआ मसाला कटोरी में उठाते हुए किशोरो ने एक ठंडी साँस ली; बोली-"किस्मत कहाँ है मुन्नी, क्या बताऊँ"।
    अँचल से आँसू पोंछकर किशोरी ने तरकारी बघार दी। खाना तैयार होने में अभी आध घन्टे की देर थी। इसी समय मुन्नी की माँ गरजती हुई चौके में आईं; बोली दस, साढ़े दस बज रहे हैं। अभी तक खाना भी नहीं बना ! बच्चे क्या भूखे ही स्कूल चले जायेंगे ? बाप रे बाप !! मैं तो इस कुलच्छनी से हैरान हो गई। घर में ऐसा कौन सा भारी काम है, जो समय पर खाना भी नहीं तैयार होता है ? दुनियाँ में सभी औरतें काम करती हैं। या तू ही अनोखी काम करने वाली है !"
    एक साँस में, मुन्नी. की माँ इतनी बातें कह गईं; और पटा बिछाकर चौके में बैठ गईं। किशोरी ने डरते-डरते कहा-“अम्मा जी, अभी तो नौ ही बजे हैं; आध घंटे में सब तैयार हो जाता है तुम क्यों तकलीफ करती हो ?”
    चिमटा खींच फर किशोरी को मारती हुई सास बोलीं-“तु सच्ची और मैं झूठी ? दस बार राँड से कह दिया कि जबान न लड़ाया कर पर मुँह चलाए ही चली जाती है । तू भूली किस घमंड में है ? तेरे सरीखी पचास को तो मैं उँगलियों पर नचा दूँ। चल हट निकल चौके से।”
    आँख पोंछती हुई किशोरी चौके से बाहर हो गई। ज़रा सी मुन्नी अपनी माँ का यह कठोर व्यवहार विस्मय भरी आँखों से देखती रह गई। किशोरी के जाते ही वह भी चुपचाप उसके पीछे चली । किन्तु तुरंत ही माता की डाँट से वह लौट पड़ी।
    इस घर में प्रायः प्रति दिन ही इस प्रकार होता रहता था ।
    (२)
    बच्चे खाना खाकर, समय से आध घंटे पहले ही स्कूल पहुँच गए । खाना बनाकर जब मुन्नी की माँ हाथ धो रही थीं तब उनके पति रामकिशोर मुवक्किलों से किसी प्रकार की छुट्टी पाकर घर आए । सुनसान घर देखकर बोले–बच्चे कहाँ गये सब ?
    नथुने फुलाती हुई मुन्नी की माँ ने कहा-“स्कूल गए; और कहाँ जाते ? कितना समय हो गया; कुछ ख़बर, भी है ?”
    घड़ी निकाल कर देखते हुए रामकिशोर बोले-“अभी साढ़े नौ ही तो बजे हैं मुझे कचहरी भी तो जाना है न ?”
    मुन्नी की माँ तड़प कर बोली-“जरूर तुमने सुन लिया होगा ? दुलारी बहू ने नौ कहा था और तुम साढ़े नौ पर पहुँच गये तो इतना ही क्या कम किया ? तुम उसकी बात कभी झूठी होने दोगे ? मैं तो कहती हूं कि इस घर में नौकर-चाकर तक का मान मुलाहिजा है, पर मेरा नहीं । सब सच्चे और मैं झूठी, कहके मुन्नी की माँ जोर से रोने लगी।"
    -"मैं तो यह नहीं कहता कि तुम झूठी हो; घड़ी ही गलत हो गई होगी ? फिर इसमें रोने की तो कोई बात नहीं है।"
    कहते-कहते रामकिशोर जी स्नान करने चले गए। वे अपनी स्त्री के स्वभाव को अच्छी तरह जानते थे । किशोरी के साथ वह कितना दुर्व्यवहार करती है, यह भी उनसे छिपा न था । जरा-जरा सी बात पर किशोरी को मार देना और गाली दे देना तो बहुत मामूली बात थी । यही कारण था कि बहू के प्रति उनका व्यवहार बड़ा ही आदर और प्रेम पूर्ण होता । किशोरी उनके पहिले विवाह की पत्नी के एक मात्र बेटे की बहू थी । विवाह के कुछ ही दिन वाद निर्दयी विधाता ने बेचारी किशोरी का सौभाग्य-सिन्दूर पोंछ दिया। उसके मायके में भी कोई न था । वह अभागिनी विधवा सर्वथा दया ही की पात्र थी। किन्तु ज्यों-ज्यों मुन्नी की मां देखतीं कि रामकिशोर जी का व्यवहार बहू के प्रति बहुत ही स्नेह-पूर्ण होता है त्यों-त्यों किशोरी के साथ उनका द्वेष भाव बढ़ता ही जाता । रामकिशोर अपनी इस पत्नी से बहुत दबते थे; इन सब बातों को जानते हुए भी वह किशोरी पर किए जाने वाले अत्याचारों को रोक न सकते थे। सौ की सीधी बात तो यह थी कि पत्नी के खिलाफ कुछ कह के वे अपनी खोपड़ी के बाल न नुचवाना चाहते थे। इसलिए बहुधा वे चुप ही रह जाया करते थे।
    आज भी जान गए कि कोई बात जरूर हुई है और किशोरी को ही भूखी-प्यासी पड़ा रहना पड़ेगा। इसलिए कचहरी जाने से पहिले किशोरी के कमरे की तरफ़ गए और कहते गए कि “भूखी न रहना बेटी ! रोटी ज़रूर खा लेना नहीं तो मुझे बड़ा दुःख होगा।"
    “रोटी जरूर खा लेना नहीं तो मुझे बड़ा दुःख होगा।"
    रामकिशोर का यह वाक्य मुन्नी की मां ने सुन लिया। उनके सिर से पैर तक आग लग गई, मन ही मन सोचा । “इस चुड़ैल पर इतना प्रेम ! कचहरी जाते-जाते उसका लाड़ कर गए; खाना खाने के लिए खुशामद कर गए; मुझसे बात करने की भी फुर्सत न थी ? खायगी खाना, देखती हूँ, क्
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  • Ekadashi#एकादशी सुभद्रा कुमारी चौहान
    Ekadashi Subhadra Kumari Chauhan
    एकादशी सुभद्रा कुमारी चौहान
    (१)
    शहर भर में डाक्टर मिश्रा के मुक़ाबिले का कोई डाक्टर न था। उनकी प्रैकटिस खूब चढ़ी बढ़ी थी। यशस्वी हाथ के साथ ही साथ वे बड़े विनोद प्रिय, मिलनसार और उदार भी थे। उनकी प्रसन्न मुख और उनकी उत्साहजनक बातें मुर्दों में भी जान डाल देती थीं । रोता हुआ रोगी भी हंसने लगता था। वे रोगी के साथ इतनी घनिष्ठता दिखलाते कि जैसे बहुत निकट सम्बन्धी या मित्र हों। कभी कभी तो बीमार की उदासी दूर करने के लिए उसके हृदय में विश्वास और आशा का संचार करने के लिए वे रोगी के पास घंटों बैठ कर न जाने कहाँ कहाँ की बातें किया करते ।
    इन्हें बच्चों से भी विशेष प्रेम था। यही कारण था कि वे जिधर से निकल जाते बच्चे उनसे हाथ मिलाने के लिए दौड़ पड़ते । और सबसे अधिक बच्चों को अपने पास खींच लेने का आकर्षण, उनके पास था, उनके जेब की मीठी गोलियाँ, जिन्हें वे केवल बच्चों के ही लिए रखा करते थे। वे होमियोपैथिक चिकित्सक थे। बच्चे उनसे मिलकर बिना दवा खाए मानते ही न थे, इसलिए उन्हें सदा अपने जेब में बिना दवा की गोलियाँ रखनीं पड़ती थीं।
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  • हींगवाला सुभद्रा कुमारी चौहान
    लगभग 35 साल का एक ख़ान आंगन में आकर रुका. उसकी आवाज़ सुनाई दी,‘‘अम्मा... हींग लोगी?’’ भीतर से नौ-दस वर्ष के एक बालक ने निकलकर उत्तर दिया,‘‘अभी कुछ नहीं लेना है, जाओ!’’ पर ख़ान भला क्यों जाने लगा? ज़रा आराम से बैठ गया और अपने साफे के छोर से हवा करता बोला,‘‘अम्मा, हींग ले लो, अम्मा! हम अपने देश जाता है, बहुत दिनों में लौटेगा.’’ सावित्री रसोईघर से हाथ धोकर बाहर आई और बोली,‘‘हींग तो बहुत-सी ले रखी है ख़ान! अभी पंद्रह दिन हुए नहीं, तुमसे ही तो ली थी.’’
    वह उसी स्वर में फिर बोला,‘‘हेरा हींग है मां, हमको तुम्हारे हाथ की बोहनी लगती है. एक ही तोला ले लो, पर लो ज़रूर.’’ इतना कहकर एक डिब्बा सावित्री के सामने सरकाते हुए कहा,‘‘तुम और कुछ मत देखो मां, यह हींग एक नंबर है.’’
    सावित्री बोली,‘‘पर हींग लेकर करूंगी क्या? ढेर-सी तो रखी है.’’ ख़ान ने कहा‍,‘‘ले लो अम्मा! घर में पड़ी रहेगी. हम अपने देश कू जाता है. ख़ुदा जाने, कब लौटेगा?’’ और ख़ान बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए हींग तोलने लगा. इसपर सावित्री के बच्चे नाराज़ हुए. सभी बोल उठे,‘‘मत लेना मां. ज़बरदस्ती तोले जा रहा है.’’ सावित्री ने बच्चों को उत्तर न देकर, हींग की पुड़िया ले ली. पूछा,‘‘कितने पैसे हुए ख़ान?’’ ‘‘पैंतीस पैसे अम्मा!’’ ख़ान ने उत्तर दिया. सावित्री ने सात पैसे तोले के भाव से पांच तोले का दाम, पैंतीस पैसे लाकर ख़ान को दे दिए. ख़ान सलाम करके चला गया. पर बच्चों को मां की यह बात अच्छी न लगी.
    बड़े लड़के ने कहा,‘‘मां, तुमने ख़ान को वैसे ही पैंतीस पैसे दे दिए. हींग की ज़रूरत नहीं थी.’’ छोटा मां से चिढ़कर बोला,‘‘दो मां, पैंतीस पैसे हमको भी दो. हम बिना लिए न रहेंगे.’’ लड़की जिसकी उम्र आठ साल की थी, बड़े गंभीर स्वर में बोली,‘‘तुम मां से पैसा न मांगो. वह तुम्हें न देंगी.
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  • मछुए की बेटी सुभद्रा कुमारी चौहान
    Machhuye Ki Beti Subhadra Kumari Chauhan
    मछुए की बेटी सुभद्रा कुमारी चौहान
    चौधरी और चौधराइन के लाड़ प्यार ने तिन्नी को बड़ी ही स्वच्छन्द और उच्छृङ्खल बना दिया था। वह बड़ी निडर और कौतूहल-प्रिय थी। आधी, रात, पिछली पहर, जब तिन्नी की इच्छा होती वह नदी पर जाकर नाव खोलकर जल-विहार करती और स्वच्छ लहरों पर खेलती हुई चन्द्रकिरणों की अठखेलियां देखती।
    यही कन्या चौधरी की सब कुछ थी; किन्तु फिर भी आज तक चौधरी उसका विवाह न कर सके थे क्योंकि कन्या के योग्य कोई वर चौधरी को अपनी जात में न देख पड़ता था। इसीलिए तिन्नी अभी तक क्वांरी ही थी।
    नदी के पार और उस पार से इस पार लाने का चौधरी ने ठेका ले रखा था। चौधरी की अनुपस्थिति में तिन्नी अपने पिता का काम बड़ी योग्यता से करती थी।
    -आज इतनी जल्दी कहा जा रही हो तिन्नी?
    -क्या तुम नहीं जानते?
    -क्या?
    -यही कि राजा साहब आज उस पार जायेंगे।
    -कौन राजा साहब?
    -तुम्हें यह भी नहीं मालूम?
    -मैं आज ही तो आया हूं।
    -और अब तक कहां थे?
    -अपने घर।
    तो जैसे मैं रात-दिन घाट पर ही तो बनी रहती हूं न? इसलिए मुझे सब कुछ जानना चाहिये और तुम्हें कुछ भी नहीं। तुम मुझे वैसे ही तंग किया करते हो! जाओ, अब मैं तुमसे बात भी नहीं करूंगी।
    तिन्नी को चिढ़ाकर उसकी क्रोधित मुद्रा को देखने में युवक को विशेष आनन्द आता था। इसलिए वह प्राय: इसी प्रकार के बेसिर-पैर के प्रश्न करके उसे चिढ़ा दिया करता था। किन्तु आज तो बात जरा टेढ़ी हो गयी थी। तिन्न ने क्रोधावेश में यह प्रतिज्ञा कर ली थी कि अब वह युवक से बोलेगी ही नहीं। इसलिए मुंह फेरकर वह तेजी से घाट की ओर चल दी। युवक ने तिन्नी का रास्ता रोक लिया और बड़े विनीत और नम्र भाव से बोला-तिन्नी! सच बता दे मेरी तिन्नी! मैं तेरा डांड़ चला दूंगा, तेरा आधा काम कर दंूगा।
    तिन्नी के क्रोधित मुख पर हंसी नाच गयी। युवक उसके साथ डांड़ चलायेगा, उसे एक साथी मिल जायेगा, इस बात को सोचकर उसे बड़ी प्रसन्नता हुई। वह बोली-सच कहते हो? मेरे साथ तुम डांड़ चलाओगे? देखा, बापू नहीं हैं, मैं अकेली हूं। यदि तुम सचमुच मेरे साथ डांड़ चलाने को कहो, तो फिर बताती हूं।
    -सच नहीं तो क्या झूठ? मैं डांड़ जरूर चलाऊंगा, पर पहिले तुझे बताना पड़ेगा-युवक ने कहा।
    -इधर अपने पास ही कोई रियासत है न? यहीं के राजा साहब नदी के उस पार शिकार खेलने जायंगे। महीना-पन्द्रह दिन का काम है मनोहर! खूब अच्छा रहेगा। खूब पैसे भी मिलेंगे। मैं तुम्हें भी दिया करुंगी। पर इतना वादा करो कि जब तक बापू न लौटकर आवें तुम रोज मेरे साथ डांड़ चलाया करोगे।
    -यह कौन सी बात है तिन्नी? यदि तू मान जा तो मंै तेरे साथ जीवन भर डांड़ चलाने को तैयार हूं।
    -तो जैसे मैंने कभी इंकार किया हो! नेकी और पूछ-पूछ! तुम मेरा डांड़ चलाओ और मैं इंकार कर दूंगी?
    -तिन्नी, तो तू मूझसे ब्याह क्यों नहीं कर लेती? फिर हम दोनों जीवन भर साथ-साथ डांड़ चलाते रहेंगे।
    क्षण भर के लिए तिन्नी के चेहरे पर लज्जा की लाली दौड़ गयी। किन्तु तुरंत ही वह संभलकर बोली- कहने के लिए तो कह गये। मनोहर! किन्तु आज मैं ब्याह के लिए तैयार हो जाऊं तो?
    -तो मैं खुशी के मारे पागल हो जाऊं।
    -फिर उसके बाद?
    -फिर मैं तुम्हें रानी बनाकर अपने आपको दुनिया का बादशाह समझंू।
    -अपने आपको बादशाह समझोगे, क्यों मनोहर? और मैं बनूंगी रानी। पर मैं रानी बनने के बाद डांड़ तो न चलाऊंगी, अभी से कहे देती हूं।
    - तब मैं ही क्यों डांड़ चलाने लगा। मैं बनूंगा राजा, और तुम बनोगी मेरी रानी, फिर डांड़ चलाएंगे हमारे-तुम्हारे नौकर!
    -अच्छा! यह बात है! कहकर तिन्नी खिलखिलाकर हंस पड़ी और दोनों हंसते हुए घाट की तरफ चले गए।
    एक बड़ी नाव पर राजा साहब और उनके पुत्र कृष्णदेव अपने कई मुसाहिबों के साथ उस पर जाने के लिए बैठे। तिन्नी कई मछुओं और मनोहर के साथ डांड़ चलाने लगी। तिन्नी नाव भी खेती जाती थी और साथ ही मनोहर से हंस-हंसकर बातें भी करती जाती थी। वायु के झोंकों के साथ उड़ते हुए उसके काले घुंघराले बाल उसकी सुन्दर मुखाकृति को और भी मोहक बना रहे थे। कृष्णदेव उसके मुंह की ओर किस स्थिरता के साथ देख रहे हैं, इस ओर तिन्नी का ध्यान ही न था। किन्तु राजा साहब से पुत्र की मानसिक अवस्था छिपी न रही। युवा काल में उनके जीवन में कई बार ऐसे मौके आ चुके थे।
    अब कृष्णदेव प्राय: प्रतिदिन ही जल-विहार के लिए नौका पर आते और डांड़ चलाने का काम बहुधा तिन्नी ही किया करती। कृष्णदेव के मूक प्रेम और आकर्षण ने तिन्नी को भी उनकी तरफ बहुत कुछ आकर्षित कर लिया था। जिस समय कृष्णदेव नौका पर आते, उस समय अन्य मछुओं के रहते हुए भी तिन्नी स्वयं ही नौका चलाती।
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