The GreyMatters Podcast

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By GreyMatters CommunicationsBusiness
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The GreyMatters Podcast episodes

  • Unsung Hero of India's Freedom Struggle Series: Bimalpratibha Debi Cuttack, Odisha

    Hello friends! Welcome to GreyMatters Podcast.


    Freedom, a golden word. The mere utterance of which gives a pleasant feeling. our country has paid a lot to get this freedom. This year we are celebrating the 75th anniversary of independence. On this auspicious occasion, we must talk about some such heroes of the country who could not land on the pages of history. 

    Yes of course, we are talking about the unsung heroes of our country and the hero of today’s podcast is Mrs. Bimalpratibha Devi. So stay tuned and let's know about her in this podcast today.


    Bimalpratibha Debi

    Cuttack, Odisha


    Born in Cuttack, Bimalpratibha Debi(1901-1978) spent most of her eventful life in Bengal. She had her initiation into nationalism from her father, Surendranath Mukhopadhyay of the Prabartak Sangha. She was married to Dr. Charuchandra Bandyopadhyay a conservative aristocrat, who did not like political activities for women.

    But, from 1918 onwards she regularly took part in political activities, joined the non-violent movement as a member of the Nari Karmamandir of Urmila Debi. In 1927, she became the president of the Akhil Bharatiya Naujwaan Sabha, of which Bhagat Singh was the all India president. She took part in the salt satyagraha as a congress worker.

    In June 1930, she was imprisoned for six months for leading a procession in Calcutta in violation of the prohibitory order. A fearless lady, she collected funds for Chattagram revolutionaries by selling their photo albums in Calcutta; also met some of them while attending the Tripura Youth Conference in 1931. All these led to her arrest on the charges of her alleged link with the Manicktala Dacoity Case (1931). She was released by the court but police took her immediately into remand and lodged in different jails of Bengal for six years without trial.

    After the Tripuri Congress, she ended her long association with the party. In 1941, she was arrested again for incriminating papers and was imprisoned in the Presidency Jail till 1945. Having lost her son and husband, she lived a sordid last life.

     Here we were listening about Bimalpratibha devi. And this was a small contribution from GreyMatters Communications on the occasion of 75th anniversary of Independence.


    Happy Independence Day!

    4 min
  • Unsung Hero of India's Freedom Struggle Series: Shri Jeet Singh, Himachal Pradesh

    Hello दोस्तों! GreyMatters पॉडकास्ट में आपका स्वागत है। 

    आजादी का अमृत महोत्सव, आज पूरा देश आजादी के 75वें वर्ष को पूरा करने की खुशी मना रहा है। 

    इस आजादी को पाने के लिए न जाने कितने लोगों ने अलग-अलग तरीके से अपना योगदान दिया। कुछ तो इतिहास के पन्नों पर उतर गए, परंतु कुछ वीरों की दास्तान अनकही रह गई। ऐसे ही कुछ unsung heroes की दास्तान लेकर GreyMatters Communications अपने इस पॉडकास्ट में आपके लिए उपस्थित है। हमारे इस पॉडकास्ट के आज के हीरो हैं कांगरा, हिमाचल के श्री जीत सिंह।    


    जीत सिंह

    Kangra, Himachal Pradesh

    जीत सिंह का जन्म गाँव व डाकघर गुलेर तहसील देहरा, जिला काँगड़ा में 1919 में हुआ था। इनके पिता श्री हरी सिंह और माता श्रीमती कलावती थी। घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण जीत सिंह शिक्षा तो हासिल नहीं कर पाए लेकिन शारीरिक रूप से काफी वलिष्ठ और मजबूत थे इसी कारण वह 1940 के लगभग जब द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए बड़ी संख्या में सेना में भर्ती की जा रहीं थी उसी भर्ती में इन्हें भी चुन लिया गया और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजी सेना की ओर से भाग लेते हुए जापान में बंदी बना लिए गए। तत्पश्चात नेताजी सुभाषचंद्र बोस के आह्वान पर आजाद हिन्द फौज में सिपाही के रूप में भर्ती हुए। अखिल भारतीय आजाद हिन्द फौज समिति से प्राप्त पत्र पर उनकी भारतीय सेना में पंजीकरण संख्या 7759 है। 

    बारह वर्ष सिंगापुर और मलाया की जेल में रहे। पारिवारिक साक्षात्कार से प्राप्त जानकारी के अनुसार अक्सर उनको जेल के दौरान काफी यातनाऐ दी जाती थी उनको जेल के एक बाड़े में चारों तरफ करंट लगाकर खुला छोड़ दिया जाता था ताकि कोई भाग न सके। खाने के लिए बहुत कम भोजन दिया जाता था। कभी कभी तो काफी दिनों तक भोजन न मिलने पर घास भी खाकर गुजरा करना पड़ता था। वर्ष 1947 में आजादी के बाद जब घर बापस लोंटे तो श्रीमती कलावती से उनकी शादी हुई। जीवनयापन के लिए कुछ समय अमृतसर की एक कपडे की फैक्ट्री में काम किया| शुरुआती तौर पर उनको उस समय 25 रूपये पेंशन मिलती रही। 1967 में जीत सिंह अद्रंग की चपेट में आ गए जिसके कारण उनके शरीर के लगभग एक तिहाई हिस्से ने काम करना बंद कर दिया और सन् 1985 में जीत सिंह की मृत्यु हो गयी । भारत सरकार की ओर से स्वतंत्रता के चालीसवें वर्ष पर प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी द्वारा आजादी में इनके स्मरणीय योगदान के लिए ताम्र पत्र भी भेंट किया गया।

    आजादी के अमृत महोत्सव पर आपके लिए GreyMatters Communications की तरफ से एक छोटी सी भेंट। 

    Happy Independence Day!

    4 min
  • बिहार की धरोहरों, नालंदा विश्वविद्यालय

    नालंदा विश्वविद्यालय  


    हेलो दोस्तों! GreyMatters पॉडकास्ट में आपका स्वागत है!


    बिहार की धरोहरों पर आधारित विशेष पॉडकास्ट सीरीज के पिछले अंक में हमने पटना के गोलघर की चर्चा की थी। इस कड़ी को आगे बढ़ाते हुए आज हम दुनिया के पहले आवासीय विश्वविद्यालय की सैर करेंगे, जहां कभी कई देशों के विद्यार्थी पढ़ने आते थे। जी हां, आपने बिल्कुल सही समझा। आज हम आपको बताएंगे नालंदा विश्वविद्यालय के अतीत और वर्तमान की पूरी दास्तान।

    बिहार की राजधानी पटना से करीब 90 किलोमीटर दक्षिण में स्थित विश्व प्रसिद्ध नालंदा यूनिवर्सिटी आज भी अपने अवशेषों के साथ विद्यमान है। इसकी स्थापना कुमारगुप्त प्रथम ने 450 ई० में की थी। इसका परिसर स्थापत्य कला का एक अद्भुत नमूना था, जहां करीब 300 कमरे और 7 बड़े कक्ष और एक विशाल 9 मंजिला पुस्तकालय था, जिसमें कभी 3 लाख से अधिक किताबें मौजूद थीं। इसका परिसर एक विशाल दीवार से घिरा हुआ था, जिसमें प्रवेश के लिए एक मुख्य द्वार था। यहां अध्ययनरत करीब 10 हजार विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए करीब दो हजार शिक्षक थे। यहां भारत के अलावा कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, ईरान, ग्रीस, मंगोलिया एवं कई अन्य देशों से विद्यार्थी पढ़ाई के लिए आते थे। चीनी यात्री हेनसांग ने भी अपनी शिक्षा यहीं ग्रहण की थी और बाद में अपनी पुस्तक में नालंदा विश्वविद्यालय का विस्तार से उल्लेख किया था।

    करीब 800 वर्षों तक विश्व में ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाले इस प्राचीन विश्वविद्यालय को 1193 ई में बख्तियार खिलजी के आक्रमण ने नेस्तनाबूत कर दिया। कहा जाता है कि आक्रमण के दौरान यहां न केवल मार-काट मचाई गई थी, बल्कि इसे आग लगा कर ज्ञान के इस प्रकाश-पुंज को अंधेरे में धकेल दिया गया था। 

    अपने सुनहरे अतीत को खंडहरों में समेटे नालंदा विश्वविद्यालय सदियों तक पत्थर बन कर देवी अहिल्या की तरह अपने तारणहार का इंतजार करता रहा। मार्च 2006 में तत्कालीन राष्ट्रपति Dr. A.P.J Abdul Kalam इस विश्वविद्यालय के लिए अहिल्या के राम बन कर आये। तब बिहार विधानसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने Nalanda University को पुनर्जीवित करने का प्रस्ताव रखा। उनके इस दूरदर्शितापूर्ण विचार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तुरंत स्वीकार कर लिया और जल्द ही नालंदा यूनिवर्सिटी को पुनर्जीवित करने का आधिकारिक प्रस्ताव केंद्र सरकार के समक्ष पेश कर दिया। दुनिया के कई देशों ने इस यूनिवर्सिटी को पुनर्जीवित करने में मदद की पेशकश की। वर्ष 2010 में नालंदा यूनिवर्सिटी एक्ट भारतीय संसद के दोनों सदनों में पास हुआ।

    प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर के निकट ही करीब 450 एकड़ में इसके नये कैंपस का निर्माण किया गया और 2014 में इसने फिर से विद्यार्थियों के लिए अपने द्वार खोल दिये। इस तरह करीब 800 वर्षों के अंतराल के बाद नालंदा यूनिवर्सिटी पुनर्जीवित हो गई।  

    करीब 800 वर्षों तक अपने ज्ञान से विश्व को आलोकित करने, फिर करीब 800 वर्षों तक गुमनामी के अंधेरे में खो जाने और एक बार फिर दुनियाभर में ज्ञान का प्रकाश बिखेरने वाला यह नालंदा विश्वविद्यालय अपने आप में एक मिसाल है। आज भारत सहित 18 देश इसके सदस्य हैं।

    तो दोस्तों यह थी नालंदा यूनिवर्सिटी पर आधारित GreyMatters Communications की विशेष पेशकश। अगले पॉडकास्ट में फिर मुलाकात होगी बिहार की एक नई धरोहर की चर्चा के साथ। 

    तब तक के लिए सलाम- नमस्ते!

    5 min
  • GreyMatters Heritage Series: Patna Ke Golghar ki Kahani

    गोलघर


    हेलो दोस्तों! GreyMatters पॉडकास्ट में आपका स्वागत है।

    किसी देश को विरासत में मिले धरोहर सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि उसके अतीत का आईना होते हैं। धरोहरों के जरिए हम उस देश की प्राचीन सभ्यता-संस्कृति, जीवन शैली, परंपराओं और स्थापत्य कला को करीब से जान पाते हैं।

    भारत में भी अनेक ऐसे धरोहर हैं, जिनकी देश-दुनिया में एक विशिष्ट पहचान है और जिनको देखने मात्र के लिए सैलानी खिंचे चले आते हैं।

    आज से हम अपने देश की कुछ बहुचर्चित धरोहरों पर एक विशेष पॉडकास्ट सीरीज शुरू कर रहे हैं और इसकी शुरुआत बिहार की धरोहरों से कर रहे हैं।

    बिहार, जो लोकतंत्र की जननी है। बिहार, जहां दुनिया का सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय था। बिहार, जहां भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था...

    लेकिन, क्या आपको पता है कि इस बिहार में एक ऐसी अनूठी इमारत भी है, जिसमें एक साथ 1 लाख 40 हजार टन अनाज रखा जा सकता है! नहीं पता!

    चलिए, एक हिंट और देती हूं। उस इमारत की आकृति गुम्बदाकार है और उसमें एक भी पिलर नहीं है! याद आया!

    जी हां! मैं बात कर रही हूं बिहार की राजधानी पटना में स्थित, 236 साल पुराने गोलघर की, जो आज भी बिहार आने वाले पर्यटकों के आकर्षण का एक प्रमुख केंद्र है।

    तो चलिए, आपको इस गोलघर की कहानी सुनाती हूं, और साथ में इसकी सैर कराती हूं।

    बात उन दिनों की है, जब अंग्रेज नए-नए भारत आए थे। 1764 ईस्वी में बक्सर का युद्ध जीतने के बाद पूरे बंगाल पर ईस्ट इंडिया कंपनी को शासन का अधिकार मिल गया था। तब बिहार भी बंगाल का ही हिस्सा था। इसके पांच साल बाद, वर्ष 1769 से 1773 के बीच बंगाल में भीषण अकाल पड़ा, जिसमें सरकारी अनुमानों के मुताबिक करीब एक करोड़ से अधिक लोग भुखमरी के शिकार हो गये थे!

    भूख से त्राहिमाम करती बंगाल की जनता पर शासन करना अंग्रेजों के लिए मुश्किल हो गया था। इसे देखते हुए तब के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग ने ब्रिटिश फौजों के भोजन के लिए अनाज का भंडारण करने उद्देश्य से गोलघर के निर्माण की योजना बनाई। गोलघर पर लगे शिलापट्ट में लिखा है कि इसका निर्माण अकाल के प्रभाव को कम करने के लिए, तत्कालीन गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स के आदेश पर, जनवरी 1784 ईस्वी को शुरु हुआ था जो कि 1786 में जा कर पूरा हुआ।

    गोलघर पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान से पश्चिम में स्थित है। और 125 मीटर चौड़ी एवं 29 मीटर ऊंची इस गोलाकार इमारत के शिखर पर चढ़ने के लिए कुल 145 सीढ़ियां हैं। जो भी इस गोलघर को देखने आता है, उसका मन इन सीढ़ियों पर चढ़ते हुए इसके शिखर तक पहुंचने के लिए मचल उठता है। हो भी क्यों न, गोलघर पर  चढ़ कर जहां एक तरफ पटना शहर का बड़ा हिस्सा देखा जा सकता है, तो वहीं, दूसरी तरफ पतित पावनी गंगा के मनोहारी दृश्यों और उस पर निर्मित लंबे पुलों को भी निहारा जा सकता है।

    क्या आपको पता है कभी गोलघर के शीर्ष पर 2 फीट 7 इंच व्यास का एक छेद भी हुआ करता था, जिसे इसके अंदर अनाज डालने के लिए छोड़ा गया था। हालांकि अब हम उस छेद को नहीं देख सकते, क्योंकि बाद में उसे भर दिया गया था। 

    आपके लिए यह हैरानी की बात यह हो सकती है कि जिस प्रकार वादियों में आवाज echo होती है, उसी प्रकार गोलघर के अंदर भी एक आवाज 27 से 32 बार प्रतिध्वनित होती है। है न यह अपने आप में रोचक!

    इस गोलघर को वर्ष 1979 में राज्य संरक्षित स्मारक घोषित किया गया। 2019 में 'इंडियाज मोस्ट वांटेड' नामक हिन्दी फिल्म में भी गोलघर को दिखाया गया है।

    कभी पटना की सबसे ऊंची इमारत के रूप में जाना जाता था यह गोलघर। वक्त के साथ इस शहर में भले ही और भी बहुत सी ऊंची इमारतें खड़ी हो गई हों, लेकिन सैलानियों में आज भी यह अपनी एक अलग अहमियत रखता है और गोलघर को देखने का रोमांच आज भी उतना ही है।  

    तो दोस्तों आज के पॉडकास्ट में GreyMatters Communications की तरफ से यह थी बिहार के धरोहरों पर एक चर्चा, जिसमें आज का विषय था गोलघर। अगले पॉडकास्ट में आपसे फिर मुलाकात होगी एक नए धरोहर और उसकी विशेषताओं पर चर्चा के साथ।

    तब तक के लिए सलाम- नमस्ते!

    6 min
  • International Day of Yoga

    योग: कर्मसु कौशलम् 

    अर्थात्, योग से कर्मों में कुशलता आती है।


    हेलो दोस्तों! आज अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर इस स्पेशल पॉडकास्ट में आपका स्वागत है।

    योग न केवल हमारे शरीर को निरोग रखता है, बल्कि हमारे अंदर नई ऊर्जा और आत्मविश्वास का भी संचार करता है। 

    माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने 27 सितंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए, प्रतिवर्ष 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने का प्रस्ताव दिया था और योग की महत्ता का वर्णन कुछ इस प्रकार किया था:

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    मोदी जी के संबोधन का अंश

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    और माननीय प्रधानमंत्री जी के इस प्रस्ताव को ऐतिहासिक समर्थन मिलने के बाद, वर्ष 2015 से प्रतिवर्ष 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जा रहा है। आज भारत की इस प्राचीन ज्ञान परंपरा को पूरी दुनिया शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए अमृत के समान मान रही है।

    हालांकि, योग की तमाम खूबियों को जानते हुए भी बहुत से लोग इसके लिए बस सोचते ही रह जाते हैं। लेकिन, हमारे आस-पास बहुत से ऐसे लोग ऐसे भी हैं, जिन्होंने योग को अपनाकर न केवल अपने स्वास्थ को बेहतर किया, बल्कि इससे बढ़े आत्मविश्वास के दम पर कामयाबी की नई उड़ान भरी।

    आज के इस विशेष पॉडकास्ट में हम दो महिला सख्शीयतों, श्रीमती मधुलिका पाठक जी और श्रीमती ज्योत्सना सहाय जी, से योग के संबंध में उनके अनुभव और विचार जानेंगे। इन दोनों का यह मानना है कि इनकी कामयाबी में योग की बड़ी भूमिका रही है।

    हमारी पहली गेस्ट श्रीमती मधुलिका पाठक जी वर्ष 2018 में Mrs Jharkhand और 2019 में Mrs India World Wide रह चुकी हैं। आप रांची में रहती हैं और फैशन डिजाइनर तथा पर्सनालिटी डेवलपमेंट कोच के रूप में अपनी खास पहचान बना चुकी हैं।

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    श्रीमती मधुलिका पाठक का इंटरव्यू ... 

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    तो ये थीं श्रीमती मधुलिका पाठक जी।

    अब हम बात करेंगे एक और बेहद खास गेस्ट, ग्रेमैटर्स कम्युनिकेशंस की डायरेक्टर श्रीमती ज्योत्सना सहाय जी से। करियर की शुरुआत में अपनी आवाज से सबके दिलों में जगह बनाने वाली RJ Jyotsana आज एक सक्सेसफुल बिजनेस वुमन हैं।  आप दिल्ली में रहती हैं और तमाम व्यस्तताओं के बावजूद आपने योग का दामन मजबूती से थाम रखा है।

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    श्रीमती ज्योत्सना सहाय का इंटरव्यू...  

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    तो दोस्तों, अभी आपने श्रीमती ज्योत्सना सहाय जी को सुना। इससे पहले आपने श्रीमती मधुलिका पाठक जी को सुना था। दोनों के अनुभवों का सार यही है कि वह चाहे स्त्री या पुरुष, योग हर किसी के लिए बेहद जरूरी है। यदि आपको जीवन से प्यार है, तो आज ही योग को अपनाइए। साथ ही अपने परिवार और आसपास के लोगों को भी इसके लिए जागरूक करिए।


    यह थी योग दिवस पर ग्रेमैटर्स कम्युनिकेशंस की विशेष प्रस्तुति। आप सभी को योग दिवस की शुभकामनाएं।

    18 min
  • Happy Father's Day

    मुझे रख दिया छांव में,

    खुद जलते रहे धूप में,

    मैंने देखा है एक फरिश्ता,

    मेरे पिता के रूप में...


    हेलो दोस्तों! ग्रेमैटर्स पॉडकास्ट में आपका स्वागत है!

    आज जून महीने का तीसरा रविवार है। इस दिन को दुनिया 'Father's Day' के रूप में मनाती है।

    'फादर्स डे', यानी पिता को समर्पित एक दिन।

    तो आज आपको पिता और पुत्र की एक मर्मस्पर्शी कहानी सुनाती हूं...

    एक लड़का पिता से झगड़ा कर गुस्से में घर से निकला और बस स्टैंड की तरफ तेजी से जाने लगा; यह बड़बड़ाते हुए कि पता नहीं पापा ने कितने पैसे छुपा रखे हैं, पर मेरे लिए एक बाइक भी नहीं खरीद सकते!

    उसे पैरों में कुछ चुभने का अहसास हुआ। नीचे देखा तो पाया कि जल्दी में उसने पापा के जूते पहन लिये हैं! जूते में एक कील उभरी हुई थी, जो उसके पैरों में चुभ रही थी। लेकिन, वह गुस्से में बढ़ता चला गया।

    फिर उसे याद आया कि उसने तो घर से भागने के ख्याल से पापा का पर्स भी चुरा कर अपने पास रख लिया है। वह पुराना पर्स, जिसे पापा किसी को हाथ भी लगाने नहीं देते थे। उसने सोचा था, पर्स में काफी पैसे होंगे।

    लेकिन यह क्या! पर्स खोला तो उसमें पैसे थे ही नहीं! पैसों की जगह एक मिनी डायरी थी। उसने सोचा, जरूर पापा की सेविंग का राज इसी में लिखा होगा। लेकिन, जब उसने डायरी को पढ़ना शुरू किया तो उसे जोर का झटका लगा! डायरी में जो लिखा था, उसकी उसे कतई उम्मीद नहीं थी। डायरी में उन पैसों का हिसाब था, जो पापा ने उसके सपनों को पूरा करने के लिए अलग-अलग लोगों से उधार लिये थे।

    एक पन्ने पर था, 50,000 रुपये बेटे के लैपटॉप के लिए। यह वही लैपटॉप था, जिसे उसने ऑनलाइन क्लास अटेंड करने के लिए खरीदवाया था। लेकिन, उसने कभी सोचा ही नहीं कि पापा ने इसके पैसे कहां से लाये होंगे!

    डायरी में उस कैमरे के लिए लिये गये उधार का भी हिसाब था, जिसे उसने अपने जन्मदिन पर जिद कर पापा से गिफ्ट लिया था; जिसे पाकर वह खुशी से झूम उठा था और उसे खुश देख कर पापा भी काफी खुश नजर आये थे।

    लड़के का गुस्सा गायब हो चुका था। वह बस स्टैंड पहुंच चुका था। वहां बेंच पर बैठ कर उसने डायरी का अगला पन्ना पलटा। उसमें पापा की कुछ अपनी जरूरतें लिखी थीं। पहली थी- नये जूते!

    उसने पापा के जूते को हाथ में लेकर देखा, वह कई जगह से फट रहा था। उसे तुरंत मां की बात याद आई। घर में जब भी कुछ नया खरीदने की बात होती, मां कहती- अब तो नये जूते ले लो। लेकिन, पापा यह कह कर टाल देते कि अभी कुछ दिन और चल जाएगा!

    लड़के की आंख भर आई। उसने सीधे डायरी का आखिरी पन्ना पलट दिया। उसमें एक दिन पहले की तारीख लिखी थी और नीचे लिखा था- 50,000 रुपये, बेटे की बाइक के लिए।

    लड़के का दिमाग सुन्न होने लगा था। उसने फटे जूते वहीं फेंक दिये और नंगे पांव घर की ओर भागा। घर पहुंचा, तो पिता वहां नहीं थे। उसे तुरंत समझ में आ गया कि पिता कहां गये होंगे! वह भागता हुआ बाइक की दुकान पर पहुंचा। उसके पिता वहीं थे। उसने दौड़ कर पिता को गले लगा लिया! उसके पश्चाताप के आंसू रुक नहीं रहे थे।

    इससे पहले कि पिता कुछ अंदाजा लगा पाते कि यह क्या हो रहा है, लड़के ने सीधे-सीधे कहा, पापा मुझे बाइक नहीं चाहिए। आप अभी चल कर नये जूते खरीदिए और मैं बाइक तब खरीदूंगा, जब खुद कमाने लगूंगा।...


    जी हां दोस्तों, पापा होते ही हैं ऐसे,

    अपनी इच्छाओं का गला घोंट कर,

    बच्चों के सपने पूरे करने के लिए जुटाते हैं पैसे...


    इस कहानी में पिता के प्रति व्यक्त भावनाओं ने अगर आपके दिल को किंचित मात्र भी छुआ हो, तो आज Father’s Day के मौके पर अपने पिता के त्याग का दिल खोल कर स्वागत करिए और उन्हें कुछ ऐसा उपहार देने का प्रयास करिए, जिसकी इच्छा को कभी उन्होंने आपके सपनों के बोझ दले दबा दिया था।

    यह थी GreyMatters Communications की तरफ से एक छोटी सी अपील।


    #HappyFather'sDay! #Father'sDay #Papa #Beti #Fatherbetilove

    6 min
  • Respect for food is respect for life

    भूखे भजन न होय गोपाला

    ले लो अपनी कंठी माला...

    यह पुरानी कहावत आपने भी जरूर सुनी होगी। मतलब बहुत सीधा सा है। पेट जब भूखा हो, तब भगवान के भजन में भी ध्यान नहीं लगता... इंसान के विकास का इतिहास जितना पुराना है, भूख और भोजन का रिश्ता भी उतना ही पुराना है । है न!

    हेलो दोस्तों, ग्रेमैटर्स पॉडकास्ट में आपका स्वागत है।

    आज रविवार है, 12 जून। आज डब्ल्यूटीओ यानी विश्व व्यापार संगठन के 164 सदस्य देशों के व्यापार मंत्री चार साल बाद 12वें मंत्री स्तरीय सम्मेलन (MC12) के लिए जेनेवा में मिल रहे हैं। ये मंत्रीगण दुनिया भर में चिंता का सबब बन रहे कुछ नये-पुराने मुद्दों का समाधान तलाशने का प्रयास करेंगे। इनमें जिन दो मुद्दों पर सर्वाधिक चर्चा होगी, वे हैं कई विकासशील देशों में बढ़ती खाद्य असुरक्षा और कोरोना से सुरक्षा के लिए टीकों की अपर्याप्त आपूर्ति।

    लेकिन, इस पॉडकास्ट की शुरुआत से आप समझ गये होंगे, कि हम आज भूख और भोजन यानी खाद्य असुरक्षा पर चर्चा करेंगे।

    आपको यह जानकर हैरानी हो सकती है कि संयुक्त राष्ट्र की संस्था द्वारा इसी साल जारी Food Waste Index Report 2021 के मुताबिक दुनिया में वर्ष 2019 में 93 करोड़ 10 लाख टन भोजन बर्बाद हो गया था! जी हां, 93 करोड़ 10 लाख टन! और यह कुल वैश्विक खाद्य उत्पादन का 17 फीसदी है। इनमें सबसे ज्यादा 61 फीसदी भोजन घरों से बर्बाद हुआ। फूड सर्विस प्रोवाइडर यानी होटल, रेस्टोरेंट आदि से 26 फीसदी खाना बर्बाद हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में भारत के घरों में बर्बाद हुए भोजन की मात्रा 6 करोड़ 87 लाख टन थी।

    यह स्थिति तब है, जबकि उसी वर्ष दुनियाभर में 69 करोड़ से अधिक, जबकि भारत में करीब 20 करोड़ लोगों को एक शाम ही भरपेट भोजन मिल पाया। दुनिया में भूखे सोने वालों की संख्या वर्ष 2030 तक 84 करोड़ से अधिक हो जाने का अनुमान है! 

    कितनी अजीब विडंबना है न! एक तरफ करोड़ों टन भोजन बर्बाद हो रहा है और दूसरी तरफ करोड़ों लोग भूखे सो रहे हैं। इस पर, हर उस व्यक्ति को जरूर गौर करना चाहिए, जो किसी भोज में, होटल में या अपने घर में भूख से ज्यादा खाना लेकर उसे बर्बाद कर देते हैं।

    खाने से भरे हुए प्लेट को डस्टबिन में फेंकने से पहले यह जरूर याद रखिएगा कि लाखों लोग ऐसे हैं, जिनके नसीब में भूख तो है पर भरपेट भोजन नहीं। जितना खाना आपने एक प्लेट में फेंका है, महज़ उतने ही खाने की कमी से कोई आज भूखा तड़प रहा होगा।

    भोजन की कीमत भूख से तड़पते लोगों की नजर से आंकने का प्रयास करिए।


    एक बार सोच कर देखिए,

    भूख को महसूस करके देखिए,

    भोजन जीवन का आधार है, इसे कचरे में मत फेंकिए।


    Respect for food is respect for life

    आइए एक संकल्प करें, इस संदेश को तीन और लोगों तक पहुंचाएं।

    सोशल मीडिया और whatsapp पर जोक्स और अन्य मेसेजेस् के साथ इस संदेश को भी फैलाएं ।


    यह थी GreyMatters Communications की तरफ से एक छोटी सी अपील।

    4 min
  • World Environment Day

    ये हसीं वादियां, ये खुला आसमां 

    आ गए हम कहां ऐ मेरे जानेजां... (Song Play, These two lines only)

    90’s का यह खूबसूरत गाना आज भी प्रकृति की गोद में बैठकर गुनगुनाया जाने वाले लोकप्रिय गानों में शुमार है। लेकिन क्या आपने कभी ये सोचा है कि जिस तेजी से हम modernisation की तरफ बढ़ रहे हैं और उसकी आड़ में प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, उसमें यह प्रकृति अपनी खूबसूरती कब तक बनाए रख पाएगी?

    हेलो दोस्तों!! GreyMatters podcast में आपका स्वागत है। आज विश्व पर्यावरण दिवस है। इस वर्ष पर्यावरण दिवस की थीम है ‘सिर्फ एक पृथ्वी’, यानि कि पृथ्वी ही हमारा एक मात्र घर है और हमें अपने बचे हुए संसाधनों की रक्षा करनी चाहिए।

    In the universe there are billions of galaxies,

    In our galaxy there are billions of planets,

    But there is #OnlyOneEarth.

    Let’s take care of it.

    धरती तथा जीवन को सुरक्षित रखने के लिए पर्यावरण का सुरक्षित रहना बहुत जरूरी है। क्लाइमेट चेंज से निपटने के लिए यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) के पार्टियों के सम्मेलन (COP-26) में भारत के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने वैश्विक समुदाय को ‘पंचामृत’ द्वारा पाँच संकल्पों से वचनबद्ध किया ताकि पर्यावरण संरक्षण के लिए हम चौतरफा कार्य कर सकें।

    क्या आपको पता है कि दुनिया के 20 सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में से 13 भारत में हैं? Center for science and environment के अनुसार हमारी गंगा और यमुना नदियां, दुनिया की 10 सबसे प्रदूषित नदियों में शुमार हैं। प्रकृति और मनुष्य के adaptation के अनुपात में जलवायु बहुत तेजी से गर्म हो रही है। जलवायु के विपरीत प्रभाव से 1 मिलियन प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा बना हुआ है। कुछ अन्य रिपोर्टों के अनुसार, दुनिया भर में 90% से अधिक लोगों को स्वच्छ हवा नहीं मिलती है।

    है न चिंतनीय विषय! सोचिए, अगर यही हाल रहा तो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को क्या देंगे? 

    लेकिन क्या पर्यावरण संरक्षण के लिए केवल कोई एक दिन होना चाहिए? आपको यह जरूर जानना चाहिए कि पशु-पक्षियों को आश्रय देना, आस-पास के जल स्रोतों को गंदा नहीं करना, कचरा खुले में नहीं फेकना, बिजली की खपत तथा इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का प्रयोग जरूरत भर ही करना, पानी बर्बाद न करना, कम दूरी के लिए गाड़ियों का उपयोग नहीं करना आदि कुछ ऐसे छोटे-छोटे कदम हैं जिनकी सहायता से हम पर्यावरण की रक्षा कर सकते हैं। 

    Small steps can make a big change.

    Let’s nurture our nature so that we have a better future!


    GreyMatters Communications की तरफ से एक छोटी सी अपील।


    #WorldEnvironmentDay #earth #planet #narendramodi

    4 min
  • World No-Tobacco Day

    Hello and Welcome to the GreyMatters Podcast.

    आज World No-Tobacco Day है, विश्व तंबाकू निषेध दिवस। आप तंबाकू का सेवन करते हों, या न करते हों, लेकिन आज की चर्चा को आपको अंत तक जरूर सुनना चाहिए।

    रफी साहब का गाया यह लोकप्रिय गीत आपने भी जरूर सुना होगा...

    (यहां गाना 'मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया, हर फिक्र को धुएं में उड़ाता....' तक प्ले करना है।)

    जी हां, आपके आसपास भी कुछ लोग होंगे, जो सिगरेट का धुआं उड़ाने या अन्य तंबाकू उत्पादों के सेवन के लिए ऐसे बहाने दोहराते होंगे। पर क्या आप जानते हैं कि ऐसा करने वाले लोग जिंदगी का साथ निभाने की बजाय उसे कितने बड़े खतरे में डाल रहे हैं?

    विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार तंबाकू के सेवन से दुनिया में हर साल 70 लाख से ज्यादा, जबकि भारत में 10 लाख से ज्यादा लोगों की मृत्यु हो जाती है। एक शोध के मुताबिक भारत में हर 9वां व्यक्ति किसी-न-किसी रूप में तंबाकू का सेवन करता है। 

    यह स्थिति तब है, जबकि विशेषज्ञ बताते हैं कि इसके सेवन से फेफड़े, लिवर, मुंह के कैंसर सहित कई प्रकार के रोग होते हैं, हृदय रोग का खतरा कई गुना बढ़ जाता है, और रोग प्रतिरोधक क्षमता में भारी कमी हो जाती है। कोरोना काल में हुए एक सर्वे के मुताबिक धूम्रपान और तंबाकू का सेवन करने वालों को कोरोना के जोखिम का अन्य लोगों के मुकाबले 40-50% तक अधिक सामना करना पड़ा है। 

    तंबाकू का सेवन बीमारियों और मौत को न्योता देने के साथ-साथ देश के आर्थिक विकास और पर्यावरण को भी प्रभावित करता है। तंबाकू की खेती, उत्पादन और वितरण का हमारे पर्यावरण पर अत्यंत विपरीत असर पड़ता है।

    तंबाकू उत्पादों के सेवन से होने वाली मौतों की संख्या में लगातार हो रही वृद्धि को देखते हुए World Health Organisation ने 1987 में एक resolution pass किया और इसके प्रति जनजागरूकता के उद्देश्य से विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाने की शुरुआत की गयी। हालांकि पहली बार यह दिवस 7 अप्रैल 1988 को मनाया गया था, लेकिन 1988 में ही एक अन्य प्रस्ताव पारित कर इसे हर वर्ष 31 मई को मनाने की घोषणा की गयी। तब से हर वर्ष इस दिन दुनियाभर में तंबाकू और इसके उत्पादों के सेवन के घातक परिणामों के प्रति लोगों में जागरूक करने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। इस दिवस को हर वर्ष एक नई theme के साथ  मनाया जाता है और इस वर्ष की थीम है- 'पर्यावरण के लिए खतरनाक है तंबाकू'।

    तो आइए, आज तंबाकू और पर्यावरण से जुड़े कुछ जरूरी तथ्यों को जानते हैं।

    WHO की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार तंबाकू उगाने से हर वर्ष करीब 3.5 मिलियन हेक्टेयर भूमि की उत्पादकता नष्ट होती है। तंबाकू की खेती से मिट्टी के पोषक तत्वों में कमी तो आती ही है, कृषि रसायनों के भारी इस्तेमाल के कारण जल, मिट्टी और पर्यावरण के प्रदूषण को भी बढ़ावा देती है।

    तंबाकू उत्पादों को बनाने और पैकेजिंग में तथा उसके कचरे को निपटाने में पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंच रहा है। तंबाकू और इसके कचरे को जलाने से निकलने वाला धुआं बड़ी मात्रा में मानव कार्सिनोजेन्स, जहरीले पदार्थ तथा 84 मेगा टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर annual ग्रीनहाउस गैसों को वातावरण में समाहित करता है, जो वैश्विक तापमान को बढ़ाने में मददगार है।

    मतलब साफ है, तंबाकू उत्पाद आपको बीमार तो बना ही रहे हैं, पर्यावऱण को भारी नुकसान पहुंचा कर आने वाली पीढ़ियों के लिए भी खतरा पैदा कर रहे हैं।

    तो क्या इस तंबाकू निषेध दिवस पर आप अपने खुद के स्वास्थ्य और अपनी आनेवाली पीढ़ियों के पर्यावरण की रक्षा के लिए एक नई शुरुआत करेंगे? 

    जीवन और पर्यावरण दोनों अनमोल है, इसे धुएं में उड़ा कर या 'अस्सी चुटकी नब्बे ताल' लगा कर बर्बाद न करें।

    तंबाकू उत्पादों का सेवन छोड़िए, जीवन और पर्यावरण को बचाइए। खुद तो जागरूक होइए ही, अपने आसपास के लोगों को भी जागरूक करिए।

    यह थी GreyMatters Communications की तरफ से एक छोटी सी अपील। अंत तक सुनने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। फिर मिलेंगे, एक नये विषय के साथ।


    #WorldNoTobaccoDay  #tobacco #health #WHO

    5 min
  • International Tea Day

    एक प्याली चाय। सबकी प्यारी चाय।

    बंगाली में चा, कन्नड में चाह, मलयाली में छाया तो तमिल में थिमिर।

    नाम अनेक पर काम एक, सुकून दिलाती चाय, थकान मिटाते चाय!

    सुबह-सुबह चाय की प्याली के साथ अख़बार पढ़ते हुए या स्मार्टफोन चलाते हुए खुद के साथ जो वक्त बीतता है, उसके आनंद को शब्दों में बयां करना मुश्किल है।

    आपको यह जानकर हैरानी हो सकती है कि चाय के दीवाने इसके लिए कितने रुपये तक खर्च करते हैं। जी हाँ, हाल में गुवाहाटी टी ऑक्शन सेंटर पर, असम की 'मनोहरी गोल्ड' चाय की एक किलो के लिए 99,999 रुपए की बोली लगाई गयी। यह देश में चाय के लिए सबसे महँगी बोली है।

    आज इंटरनेशनल टी डे के मौके पर GreyMatters podcast के इस स्पेशल एडिशन में हम कुछ ऐसे ही रोचक तथ्यों के साथ हाजिर हैं। आइए, साथ में इसका आनंद उठाएं। 

    इस भाग-दौड़ भरी जिंदगी में tea lovers के लिए चाय वो साथी है, जिसके साथ दो पल बिताने के लिए वे busy से busy schedule से भी कुछ पल निकाल ही लेते हैं।

    भारत में चाय की खेती बहुत ज़माने से होती रही है, लेकिन officially इसकी खोज 1823-24 के करीब Robert Bruce और मणिराम दीवान द्वारा की गयी। आज चाय की दुनिया में भारत की दार्जिलिंग और असम चाय की अपनी एक अलग ही पहचान है। एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में  चाय की 3000 से अधिक वेराइटीज हैं, और सबकी अपनी एक अलग ही खासियत है।

    पूरे दिन की थकान के बाद शाम का वो लम्हा जब चाय की चुस्कियां ली जा रही होती हैं, हलक से उतरती हर घूँट आत्मा को तृप्त करती है और थकान मानो काफ़ूर हो जाती है।

    पर इस दौरान क्या कभी यह ख्याल आया है कि इस चाय की उत्पत्ति कहां हुई होगी? एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार चीन चाय की जन्मस्थली है। और वहां भी यह 'चा' ही कही जाती है। चीन के सम्राट शेन नुन्ग ने चाय की खोज की और वो ही चाय पीने वाले पहले व्यक्ति हैं। एक फैक्ट यह भी है कि आज की तारीख में टर्की विश्व में चाय की सबसे बड़ी उपभोक्ता है, जहां annually चाय की औसत खपत 6.961 पौण्ड per person है। 

    रोज़मर्रा की जिंदगी में लोग सुबह-शाम चाय पीते हैं, लेकिन शायद ही कोई चाय के इस सफरनामे को जानते होंगे। क्यों, था न यह, चाय का एक बेहतरीन सफरनामा विद फैक्ट्स।

     International Tea Day पर GreyMatters Communications की तरफ से Tea Lovers के लिए एक छोटी सी भेंट।


    #InternationalTeaDay #tea #tealover 

    5 min

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