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पू स्वामिनी पूर्णानंद जी से आज एक सुन्दर प्रेरक कहानी सुने जिसका शीर्षक है - सत्संग की महिमा।
पू स्वामिनी अमितानन्द जी महाभारत के अंतर्गत आतापि और वातापी नामक नरभक्षक राक्षसों की कहानी सुना रही हैं। उनका पाला अगस्त्य ऋषि से पड़ा और उनको एक विलक्षण शिक्षा तो मिली लेकिन बाद में उनका विनाश भी हो गया।
पू स्वामिनी समतानन्द जी एक तोते की कहानी को निमित्त बनाकर एक महत्वपूर्ण सन्देश दे रही हैं - की बिना गुरु के ज्ञान नहीं और बिना ज्ञान के मुक्ति नहीं। आइये सुनिए।
पू स्वामिनी पूर्णानन्द जी आज एक छोटे के प्रसंग को निमित्त बनाकर एक महत्वपूर्ण सन्देश देती हैं - की दुनिया हमको वैसी ही दिखाई देती है जैसी हमारी दृष्टी है।
पू स्वामिनी अमितानन्द जी आज एक अनोखी प्रतियोगिता की एक कहानी सुना रही हैं। यह कहानी कुछ विकलांग बच्चों की दौड़ की प्रतियोगिता की कहानी है। जिसमे यद्यपि कोई जीतता अवश्य है लेकिन तब भी सबकी जीत-हार से ज्यादा सबके जज्बे और उत्साह के प्रोत्साहन की प्रधानता थी। इससे हमें जीवन की कुछ महत्वपूर्ण शिक्षा भी प्राप्त होती है - जो आप पू स्वामिनीजी से सुनिए।
पू स्वामिनी समतानन्द जी आज शास्त्र प्रसिद्ध महाराज जनक के गुरु आचार्य अष्टावक्र जी के बारे में अत्यंत सुन्दर और प्रेरक कहानी सुना रही हैं। गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर ऐसी सुन्दर कथा सबको अध्यात्म के गुरु एवं उनकी शिक्षा के बारे में महत्वपूर्ण शिक्षा प्रदान करेगी।
पू स्वामिनी पूर्णानन्द जी एक सुन्दर और प्रेरक कहानी सुना रही हैं - जहाँ पर एक छोटे से प्रसंग से एक महत्वपूर्ण शिक्षा प्रदान कर रही हैं। सुनिए।
पू स्वामिनी अमितानन्द जी तानसेन जी के गुरु हरिदास जी का प्रसंग सुना रही हैं। एक बार तानसेनजी का वीणावादन बादशाह अकबर सुन रहे थे, उनको बहुत अच्छा लगा और जब वे उनकी तारीफ़ करने लगे तो उन्होंने बड़ी विनम्रता के साथ बादशाह को निवेदन किया की उनका वीणावादन तो कुछ नहीं है उन्हें उनके गुरु की वीणावादन सुनना चाहिए। उसके लिए उन्हें चुपचाप जंगल में जाना पड़ेगा और उनका सुनना पड़ेगा। जब उन्होंने सुना तो वे स्तब्ध रह गए। उसका रहस्य बताते तानसेन ने बताया की वे तो ईश्वर की आराधना के लिए बजाते हैं - यह ही उनकी वीणा की दिव्य मधुरता का राज़ है।
आज के प्रसंग में पू स्वामिनी समतानंदजी पुराणों का एक सुन्दर प्रसंग सुना रही हैं। यह कथा है भगवन विष्णु की, जब एक बार उन्होंने भगवन शंकर की पूजा करनी चाही - और वो भी १००० कमल के फूलों से अर्चना। शिवजी ने चुपचाप एक फूल उठा लिया तो जब अर्चना समाप्ति की तरफ आई तब उन्हें पता चला की एक फूल कम है। उस समय उन्हें विचार आया की लोग हमें कमलनयन कहते हैं तो क्यों न अपनी एक आँख ही अर्पित कर दे। उस समय शिवजी प्रकट हो गए और फिर क्या हुआ आप खुद ही इस सुन्दर सी कथा में सुने।
पू स्वामिनी पूर्णानन्द जी से एक छोटी की प्रेरक कहानी सुने जहाँ एक बाबा जी किसी दूकान में जाकर दूकान वाले से पूछते हैं की उसके वहां एक-एक डिब्बे में क्या है। वो बताता रहता है, लेकिन एक डिब्बे के बारे में उसने कहा की इसमें श्री कृष्ण हैं। बाबाजी आश्चर्य चकित हो गए और उसका रहस्य पूछा। उसने कहा की वो खाली है, लेकिन हम लोग डिब्बे का खाली नहीं कहते हैं, बल्कि उसमे श्री कृष्ण हैं। इस वाक्य से बाबाजी की आँख खुल गयी और उनको अपने गुरुजनों के वो वाक्य याद आये की अपना मन भी जब खाली हो जाता है तब ही मन में प्रभु के दर्शन होते हैं।
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