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सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के ८वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में बताया की देवता कौन होते हैं जो अनेकों आशीर्वाद के साथ-साथ सुरसा जैसी आपदा भेजते रहते हैं। हुमान्जी की आगे की यात्रा में एक और विचित्र आपदा आती है - वो थी सिंहिका राक्षसी। उसकी विचित्रता इस बात की थी की वो आकाश में उड़ते किसी भी प्राणी की जल के ऊपर परछाईं को पकड़ कर उसको उड़ने में असमर्थ कर देती थी और निचे गिराकर उसको खा लेती थी। यह ही उसने हनुमानजी के साथ किया। हनुमानजी समझ गए और ऐसी नीच शक्ति का संहार करना ही उचित समझा। इसके बाद वे लंका पहुँच जाते हैं। जिसका प्रथम दर्शन बहुत ही सुंदरता का था।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के सातवें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया की हनुमानजी ने बड़ी आत्मीयता से मैनाक के आतिथ्य को स्वीकारते हुए लेकिन बिना रुके आगे चले। आगे उन्हें देवताओं के द्वारा भेजी गयी सुरसा मिली। वो बड़ी प्रसन्नता से कहती है की वाह ! आज तो हमें देवताओं ने बड़ा ही सूंदर भोजन भेजा है। हनुमानजी ने उससे निवेदन किया की हे माता, इस समय हम रामजी के काम से जा रहे हैं, अभी हमें जाने दो, मैं वचन देता हूं की काम पूरा करके मैं आपके पास अवश्य वापस आ जाऊँगा तब हमें खा लेना। लेकिन जब उसने जाने नहीं दिया तो हनुमानजी ने कहा तो खा क्यों नहीं लेती हो? तब जो हुआ उसने सुरसा को केवल आश्चर्यचकित ही नहीं किया बल्कि स्तब्ध कर दिया और अंततः इस व्यवधान को वे अत्यंत बुद्धिमत्ता से अपने लिए आशीर्वाद बनाकर आगे चले।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के छठे दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया की हनुमानजी की लंका की यात्रा एक साधक की भक्ति माता के दर्शन की यात्रा है। किसी भी यात्रा में कोई न कोई अच्छे या बुरे अवरोध आने स्वाभाविक हैं। हनुमानजी को सबसे पहले मैनाक पर्वत मिले। वे उनके पिताजी (पवन देवता) के ऋणी थे, वे पूरी आत्मीयता के साथ हनुमानजी की सेवा के भाव से रस्ते में सामने खड़े हो जाते हैं और उन्हें कुछ देर का विश्राम करने के लिए अपने हरे-भरे पर्वत पर आमंत्रित करते हैं। हनुमानजी उनकी भावना देख कर बड़ी आत्मीयता से उनकी सेवा स्वीकारते हुए मात्र उनके द्वारा दिए गए फल-फूलों को स्पर्श करते हुए कहते हैं की हमें अभी कोई थकावट नहीं है, वस्तुतः हम जब अपने प्रभु श्री राम जी का कार्य पूरा कर लेंगें तभी विश्राम लेंगे।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के पाँचवे दिन पूज्य पाद श्री स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में प्रवेश किया। जाम्बवानजी को गुरु स्थानीय बताते हुए एक अच्छी शिक्षा का स्वरुप बताया। जिस शिक्षा से शिष्य के मन में अपना परिचय, अपने जीवन का उद्देश्य, कार्य में हमारा रोल और सबसे बड़ी बात उसके मन में आत्मा-विश्वास और उत्साह का सृजन हो जाये वो ही शिक्षा उचित और कल्याणकारी होती है। उत्साह और आत्म-विश्वास से भरे हनुमानजी अपने अन्य वानर साथियों के प्रति आत्मीयता और संवेदनशीलता भूलते नहीं है और सबको विश्वास दिलाते हैं की तुम सब हमारी प्रतीक्षा करना और यहाँ रह कर कंद, मूल और फल आदि खाओ - हम सीताजी का समाचार लेकर अवश्य आयेंगें। और वे फिर वहां से प्रभु का स्मरण करते हुए द्रुत गति से भगवान् के बाण की तरह से निकल जाते हैं।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के चौथे दिन इन्दौर स्थित पूज्य पाद श्री स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में प्रवेश किया, और किष्किन्धाकाण्ड के अंतिम प्रसंग से सुंदरकांड की संगती जोड़ी। सम्पति की कहानी और फिर सभी वनरादि ने समुद्र पार कर सीता माता से मिलकर उनका समाचार लाने का निश्चय किया। फिर बात आयी की कौन समुद्र के उस पार जाकर यह कार्य करेगा। इस प्रसंग के माध्यम से अंगद चरित्र / जाम्बवान चरित्र और फिर हनुमानजी का चरित्र - इन सबका चिंतन हुआ। विशेष रूप से जाम्बवान जी का विशेष चिंतन और स्तुति की। यह सब अत्यंत मनोहर कथा है - ध्यान पूर्वक सुने।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के तीसरे दिन इन्दौर स्थित वेदान्त आश्रम के अधीश पूज्य पाद श्री स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने तीसरे श्लोक की विस्तृत व्याखय की। यह श्लोक हनुमान जी की वन्दना का एक अत्यंत सुन्दर श्लोक है।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान-यज्ञ के दूसरे दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने सुंदरकांड के दूसरे प्रार्थना श्लोक पर विस्तृत चर्चा करी। इसका विषय था ईश्वर से भक्ति की प्रार्थना।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान-यज्ञ का शुभारम्भ करते हुए पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वतीजी ने सबसे पहले बताया कि रामचरितमानस का प्रयोजन हमारे ह्रदय में परमात्मा के प्रति भक्ति उत्पन्न हो ऐसी प्रार्थना और आकांशा है। सुन्दरकाण्ड नाम की चर्चा करते हुए उन्होंने अनेकों महत्वपूर्ण रहस्य उद्घाटित करे। उसके बाद विषय में प्रवेश करते हुए प्रभु रामजी की वंदना का प्रथम श्लोक का अर्थ बताया।
पू स्वामिनी समतानंदजी एक अत्यंत प्रेरक और प्रसिद्ध कहानी सुना रही हैं। यह कथा छान्दोग्य उपनिषद् के अंतर्गत प्राप्त होती है। इसका प्रयोजन यह दिखाना है की वर्ण व्यवस्था के पीछे व्यक्ति के गुणों के स्वरुप की प्रधानता थी।
पू स्वामिनी पूर्णानन्दजी एक छोटी एवं सुन्दर सी प्रेरक कहानी में एक प्रसंग के द्वारा बता रही हैं की अगर हमें लोगों के विकार दिखाई दे रहे हैं तो इस समस्या का कारण क्या है और ऐसी समस्या का समाधान क्या है।
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