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सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के १८वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब सीताजी अत्यंत व्याकुल और वराह की अग्नि में जल रहीं थीं और सबसे और अंततः अशोक वृक्ष से प्रार्थनाकर रहीं थीं की हमको अग्नि की एक चिंगारी दे दो - उस समय हनुमानजी ने रामजी की मुद्रिका उनकी गोद में डाल दी। वो भी इतनी दिव्य और चमकीली थी की मनो अशोक वृक्ष ने उनकी प्रार्थना सुनली और एक अंगारा दे दिया हो। लेकिन जब उन्होंने ध्यान से देखा तब वे आश्चर्य चकित हो गयीं और सोचने लगीं की रामजी तो अजेय हैं और ऐसी मुद्रिका माया से तो बन नहीं सकती है - तो यह यहाँ आयी कैसे? मन में हर्ष और विषाद - दोनों आ रहे थे। उस समय हनुमानजी ने रामजी का गुणगान गाना / कहना प्रारम्भ कर दिया - जो की अत्यंत मधुर लग रहे थे। आगे हनुमानजी का सीताजी के सामने आना और चर्चा करना ये समस्त दिव्य बातें आप स्वयं पू स्वामीजी के वचन सुनें।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के १७वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब रावण समस्त राक्षसियों को एक महीने का समय देकर की इस बीच में सीताजी को मना लो, तब तिजाता ने सब राक्षसियों को बुलाकर अपना सपना बताया - जिससे वे सब डर गयीं और सीताजी को ज्यादा नहीं लेकिन थोड़ा बहुत प्रताड़ित करने लगीं। तब सीताजी बहुत व्याकुल एवं विह्वल हो गयीं और उन्होंने त्रिजटा को बुलाकर निवेदन किया की - हे माता, अब हमसे और नहीं सहा जाता है अतः हमारे लिए एक कृपा करके थोड़ी लकड़ियों की चिता और अग्नि की व्यवस्था कर दो जिससे हम अपना देह त्याग दे। यह प्रसंग अत्यंत द्रवित कर देने वाला है। फिर आगे क्या हुआ आप खुद सुने। रावण समस्त राक्षसियों को एक महीने का समय देकर की इस बीच में सीताजी को मना लो, तब तिजाता ने सब राक्षसियों को बुलाकर अपना सपना बताया - जिससे वे सब डर गयीं और सीताजी को ज्यादा नहीं लेकिन थोड़ा बहुत प्रताड़ित करने लगीं। तब सीताजी बहुत व्याकुल एवं विह्वल हो गयीं और उन्होंने त्रिजटा को बुलाकर निवेदन किया की - हे माता, अब हमसे और नहीं सहा जाता है अतः हमारे लिए एक कृपा करके थोड़ी लकड़ियों की चिता और अग्नि की व्यवस्था कर दो जिससे हम अपना देह त्याग दे। यह प्रसंग अत्यंत द्रवित कर देने वाला है। फिर आगे क्या हुआ आप खुद सुने।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के १६वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब जब रा सीताजी और उसकी सभी राक्षसियों को एक महीने का समय देकर चला जाता है तो सभी राक्षसियाँ अनेकानेक ढंग से सीता को प्रताडिक करने लगीं। तब वहां त्रिजटा नामक राक्षसी थी, उसने सभी राक्षसियों को अपने पास बुलाया और अपना रात का ही सपना सुनाया। उसने कहा की हमने देखा की लंका में एक विशाल वानर आया है और उसने लंका जला डाली। रावण को हमने एक गधे के ऊपर नग्न बैठा देखा और वो दक्षिण दिशा की तरफ जा रहा था, अर्थात मरने जा रहा था। लंका का राज्य विभीषण जी के पास आ गया है और रामजी ने आदर सहित सीताजी को बुला भेजा है। यह सब सुनकर सभी राक्षसियाँ सीताजी के पास जाकर क्षमा याचना करती हैं।वण सीताजी और उसकी सभी राक्षसियों को एक महीने का समय देकर चला जाता है तो सभी राक्षसियाँ अनेकानेक ढंग से सीता को प्रताडिक करने लगीं। तब वहां त्रिजटा नामक राक्षसी थी, उसने सभी राक्षसियों को अपने पास बुलाया और अपना रात का ही सपना सुनाया। उसने कहा की हमने देखा की लंका में एक विशाल वानर आया है और उसने लंका जला डाली। रावण को हमने एक गधे के ऊपर नग्न बैठा देखा और वो दक्षिण दिशा की तरफ जा रहा था, अर्थात मरने जा रहा था। लंका का राज्य विभीषण जी के पास आ गया है और रामजी ने आदर सहित सीताजी को बुला भेजा है। यह सब सुनकर सभी राक्षसियाँ सीताजी के पास जाकर क्षमा याचना करती हैं।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के १५वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि रावण के बहुत मानाने और डराने के बावजूद सीताजी ने रावण की तरफ आँख उठा कर भी नहीं देखा - जिससे वो बहुत ही दुखी था। यद्यपि रावण समर्थ था, बुद्धिमान था, शिवजी का भक्त था और यह भी सच है की सीताजी के साथ उसने कोई जोर-जबरदस्ती नहीं करी थी, तथापि हिन्दू महिलाओं के चरित्र और मूल्यों पर यहाँ प्रकाश पड़ता है। समबन्धों का आधार धर्म होता है, जिसकी पवित्रता सदैव बनाई रखी जाती है। जो अपने संबंधों को धन, दौलत आदि के तराजू पर तौलते हैं वे व्यभिचारी लोग होते हैं। सीताजी रावण के अनेकों प्रयासों के बावजूद तस-से-मस नहीं होती हैं बल्कि उसको रामजी रुपी सूर्य के सामने मात्र जुगनू तुल्य बताती हैं। इसपर रावण अत्यंत क्रोधित हो जाता है और फिर सीताजी की प्रतिक्रिया देखने योग्य थी। ये आप कथा में सुनिए।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के १४वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि हनुमानजी और विभीषणजी के परिचय और मित्रता के उपरान्त विभीषणजी ने सीताजी के बारे में समाचार सुनाया। फिर यह भी बताया की वे अशोक वाटिका नामक उपवन में हैं। उस जगह की विशेष सुरक्षा के बारे में और उन्हें वहां पहुँचने का रहस्य भी बताया। हनुमानजी अशोक वाटिका के लिए निकल गए, और शीघ्र उस स्थान पर पहुँच गए जहाँ सीताजी बैठी हुई थीं। इस प्रवचन में पूज्य गुरूजी ने वहां तक की कथा सुनाई जब रावण सीताजी के पास आता है और उन्हें डरता और धमकाता है। ये पूरी कथा आप स्वतः सुनिए।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के १३वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब हनुमानजी विभीषणजी से मिले तो वह एक अत्यंत दिव्य प्रसंग था। भगवान् के दो अत्यंत सुन्दर और भक्तों का मिलान। भक्ति बहुत ही विशिष्ट गुण होता है। समयतः है व्यक्ति के ह्रदय में जिव की ही प्रधानता होती है। अपने लिए जीना और जिव क्यूंकि छोटा और अलप होता है इसलिए सतत अपने लिए इच्छा और प्रार्थना। अनेकानेक सिद्धियों के उपरांत भी दिल में वो छोटापन नहीं जाता है। लेकिन भक्ति में जीवन के केंद्र बिंदु भगवान् बन जाते हैं। ऐसा भक्त सतत भगवत स्मरण और चिंतन स्वाभाविक रूप से करता रहता है। ये दोनों भक्त अपनी अपनी भावना प्रकट करते हैं - की कैसे उनके ऊपर ईश्वर कृपा बरस रही है। ये पूरा प्रसंग अत्यंत सुन्दर और मनोहर है। सुंदरकांड की सुंदरता का एक नमूना।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के १२वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब हनुमानजी ने लंका में एक देखा जहाँ रामजी के आयुध अंकित थे तो वे आश्चर्यचकित हुए और प्रसन्न भी। वहां तुलसीवृन्द भी थे। वे देख ही रहे थे की उस समय विभीषणजी जगे और राम-राम की आवाज़ आई। हनुमानजी ने हर पहलु से विचार किया, तर्क से हर पक्ष सोचा और फिर निर्णय किया की यह व्यक्ति निश्चित रूप से एक साधु पुरुष ही है, और इससे हमें आगे बढ़कर अवश्य मिलना चाहिए। उन्होंने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया और रामजी का गुण-गान करना प्रारम्भ किया। विभीषणजी ने सुना तो एकदम बहार आए और उन्हें देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए और उनका परिचय पूछा, और हनुमानजी ने अपना परिचय और प्रयोजन बताया। फिर आगे दिव्य वार्तालाप हुआ।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के ११वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब हनुमानजी लंकिनी से मिलते हैं तो उसने अपने वास्तविक रूप में आते ही अत्यंत अद्धभुत बातें कहीं। निश्चित रूप से वो ब्रह्मलोक की निवासी व्यक्ति जिसे ब्रह्माजी का सत्संग प्राप्त हुआ था दिख रही थी। उसने हनुमानजी को कहा की आप रामजी को अपने ह्रदय में रख कर लंका में प्रवेश करें और अपना काम करिये। आगे उसे कहा की जो भी रामजी (ईश्वर) को अपने ह्रदय में रखता है उसके लिए असंभव संभव हो जाता है। अकल्पनीय सामर्थ्य प्रकट हो जाते हैं। यह प्रसंग अत्यंत सुन्दर है। फिर हनुमानजी लंका में प्रवेश करते हैं और सीताजी की खोज प्रारम्भ करी। विस्तार से आप यह सब प्रवचन में सुने।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के १०वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब हनुमानजी ने सुन्दर लंका को देखा उसके बाद उन्होंने शहर के अंदर प्रवेश का निश्चय किया। उसके लिए उन्होंने रात्रि का समय उचित समझा। अंधेरा होते उन्होंने मच्छड़ के परिमाण का अपना रूप कर लिया और लंका के अंदर जाने लगे। उस समय लंका की प्रसिद्द रक्षिका जिसका नाम लंकिनी था और जो अपने कार्य में अत्यंत दक्ष थी उसने देख लिया की कोई अजनबी चोरी से लंका में प्रवेश कर रहा है। उसने हनुमानजी का सामना किया और कहा की हमारी बिना आज्ञा के कैसे नगर में प्रवेश कर रहे हो? हनुमानजी ने उससे कोई वार्तालाप नहीं किया और सीधे उसे एक मुक्का मारा जिससे वो लहू-लुहान होकर गिर गयी। उठकर वो दोनों हाथ जोड़कर बोली की रामजी के दूत को हमारा नमन है। उसने अपने कथा सुनाई - और बताया की वो एक श्राप के अंतर्गत लंका की रक्षिका बानी हुई है, मूल रूप से वो एक गन्धर्व कन्या है जिसे ब्रह्माजी ने श्राप दिया था की वो लंका की तब तक रक्षा करे जबतक एक वानर के प्रहार से वो घायल न हो जाये। फिर श्राप मुक्त होकर वो ब्रह्मलोक चली आएगी। रामजी के दूत के दर्शन से वो धन्य थी।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के ९वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा को आगे ले जाते हुए बताया की जब हनुमान जी लंका पहुंचते हैं तो उन्होंने लंका का अत्यंत सुन्दर दृश्य देखा। प्रारम्भ में प्राकृतिक सुंदरता का दृश्य - पेड़, फल, फूल उनपे मंडराते हुए भवरें, पहाड़ की तलेटी में बसा हुआ अत्यंत सुरक्षित, सुसज्जित एवं समृद्ध नगर। नगर के अनेकानेक लोग आदि आदि। यहाँ पर पूज्य स्वामीजी ने मनुष्य की संवेदनशीलता के ऊपर विशेष चर्चा करी। संवेदनशीलता जागृति का पर्याय होती है। जो ईश्वर रचित सृष्टि को ठीक से नहीं देख सकता है वो वस्तुतः अभी ईश्वर से प्रेम नहीं रखता है और इसीलिए वो ईश्वर को भी नहीं देख सकता है। अतः हनुमानजी से संवेदनशीलता की शिक्षा अवश्य लेनी चाहिए।
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