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सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 38वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब रावण अपने सचिवों पूछ रहा था की आप अपनी-अपनी राय दीजिये तब उसी समय विभीषणजी भी आये और आदर से रावण को प्रणाम करके अपना स्थान ग्रहण करा। जब रावण ने उनसे अपनी राय देने को कहा तो वे बहुत आदर के साथ बोले की 'हे नाथ, हमारा तो यह विचार है की अगर अपना कल्याण कहते है तो परनारी को कभी भी भोग दृष्टी से नहीं देखना चाहिए।' वे आगे चेहते हैं की 'हे महाराज, तीनों लोको के एक ईश्वर होते हैं, लेकिन अगर उनके अंदर भी लोभ आ जाये तो कोई भी उसको उचित नहीं मनाता है। काम, क्रोध, मद और लोभ - नरक जाने के रस्ते हैं। इनको त्याग कर रघुवीर को भजना चाहिए।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 37वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब मन्दोदरी को अपनी प्रजा के मन में डर और चिंता के सतत समाचार प्राप्त हुए तो स्ने एक अच्छी महारानी के नाते अपनी प्रजा के हित और कल्याण की भाव से प्रेरित होकर रावण से इस विषय में पुनर्विचार हेतु निवेदन किया, लेकिन रावण अपने अभिमान के चलते उसके ऊपर हँसा और निश्चिन्त रहने की सलाह देकर अपनीसभा में चला गया। सभा में उसको समाचार प्राप्त हुआ की रामजी की सेना समुद्र के उस पार पहुँच गयी है। उसने अपने सचिवों से उचित सलाह देने के लिए कहा। वे सब चापलूस और डरपोक मंत्रीगण केवल वो ही बात कहने लगे जो रावण को प्रिय लगे। गोस्वामीजी कहते हैं की जब सचिव, वैद्य और गुरु किसी डर के कारण प्रिय बोलने लगें तो निश्चित रूप से राज्य, देह और धर्म का नाश हो जाता है।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 36वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब रामजी की पूरी सेना सागर के पास पहुँच गयी, तब सब वानरों और भालुओं ने फल आदि खाये और विश्राम किया। दूसरी तरफ लंका की स्थिति का वर्णन का गोस्वामीजी बताते हैं की वहां की समस्त प्रजा बहुत ही डरी हुई थी। हनुमानजी का लंका में विनाश घर-घर में चर्चा का विषय था। सब बोल रहे थे की जिसका एक वानर इतना कुछ कर सकता है, जब वे स्वयं यहाँ आ जायेंगे तब क्या होगा। ये बात मंदोदरी तक भी पहुंची, और उन्होंने रावण को समझने का और प्रयास किया। एक अच्छी पत्नी के धर्म का पालन करती हुई उसने रावण को समझाया की हे नाथ, ये सीता हमारे कुल और राज्य के लिए काल बनकर आयी है। ये राम सामान्य व्यक्ति नहीं दिखाई देते हैं। हमारी बात मान लीजिये और सीता को अपने सचिवों के द्वारा वापस भिजवा दीजिये।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 35वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब सब सुग्रीव की आज्ञा और आव्हान पर वानर और भालू गण इकट्ठा हो गए तब भगवान् राम ने सबको अत्यंत कृपा की नज़रों से देखा जिससे सब अत्यंत प्रेरित और उत्साही हो गए, और फिर गरजते हुए उत्साह से युक्त रामजी की सेना ने कूच किया। उस समय का दृश्य और वर्णन अत्यंत रोमांचकारी था, जिसका अत्यंत काव्यात्मक वर्णन किया गया है। और कुछ की समय में वे सब समुद्र के तट पर पहुँच जाते हैं।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 34वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब भगवान् हनुमानजी की भूरी-भूरी प्रशंसा कर रहे थे तब हनुमानजी रामजी के चारों में गिर जाते हैं। रामजी ने उन्हें उठाया और अपने गले से लगाया और पास बैठाया, और पूछने लगे की बताओ हनुमान तुमने रावण के द्व्रारा रक्षित लंका को कैसे जलाया। तब हनुमानजी अत्यंत सरलता एवं निरभिमानता से कहते हैं की प्रभु यथार्थ तो यह ही है की हम एक वानर हैं और एक शाखा से दूसरी शाखा पर कूदते रहते हैं। जो कुछ भी वहां हुआ सब आप की कृपा थी। बाद में रामजी को प्रसन्न जानकार उन्होंने अनपायनी भक्ति का वरदान मांग लिया - जो की भगवान् ने एवमस्तु कहकर उन्हें प्रदान कर दिया। उसके बाद रामजी ने सुग्रीव को बुलवाया और उन्हें कहा की अब चलने की तैयारी करें।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 33वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब हनुमानजी ने रामजी को सीताजी का सन्देश सुनाया तब रामजी भाव से विह्वल हो गए और आंख से आंसू निकलने लगे और हनुमानजी से बोलते हैं की हे हनुमान, जो हमारे प्रति मन, कर्म और वचन से समर्पित होता है उसे कैसे दुःख मिल गया। हनुमानजी कहते हैं हे प्रभु दुःख तो तभी मिलता है जब आपका स्मरण बाधित हो जाता है। विरह का दुःख और व्यक्तिगत संताप दो अलग-अलग चीज़ें है। अब आप शीघ्र तयारी करें और राक्षसों का संहार करके माताजी को वापस ले आइये। रामजी हनुमानजी के प्रति अपनी भूरी-भूरी कृतज्ञता अभिव्यक्त करते है और कहते हैं की हम आपका ऋण कभी नहीं उतार सकते हैं। इसपर हनुमानजी प्रभु के चरणों में गिर जाते हैं और कहते हैं की भगवान् हमारी रक्षा करिये।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 32वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब रामजी ने हनुमानजी से सीता का कुशल-क्षेम पुछा तब उन्होंने अत्यंत मार्मिक शब्दों में सीता के हाल एवं उनका सन्देश रामजी को दिया। यह प्रसंग अत्यंत भाव-प्रधान एवं हृदयस्पर्शी है। सीताजी ने कहा की हमारी तरफ से अनुज समेत रामजी के चरण स्पर्श करना और पूछना की प्रभु तो भक्तवत्सल हैं तो हमें कौन से अपराध के लिए त्याग दिया ? हाँ हमारा एक अपराध है की आप से बिछुड़ते हमारे प्राण नहीं निकले लेकिन प्रभु शरीर की विरह अग्नि को हमारे आंसू बोझा देते हैं - जलने ही नहीं देते हैं। बाद में हनुमानजी रामजी से निवेदन करते हैं की प्रभु अब तो हमें जल्दी से जल्दी चलना चाहिए।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 31वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब सुग्रीव एवं जाम्बवानजी समस्त वानर की मंडली एवं हनुमानजी के साथ रामजी के पास पहुँचे तब कुशल-क्षेम के बाद जाम्बवानजी ने ने रामजी की वंदना करके हनुमानजी की पूरी लंका-लीला बताना प्रारम्भ किया - और कहा की प्रभु हनुमानजी ने जो किया है वो तो हज़ार मुख से भी हम बता नहीं सकते। तो भी उन्होंने सब बताया। फिर रामजी ने हनुमानजी से सीताजी का हाल-चाल पूछा, और यह जानना चाहा की हमें बताओ की सीता जी अपने प्राणों के रक्षा कैसे करती हैं। इसका अत्यंत सूंदर उत्तर हनुमानजी ने दिया - जो आप खुद इस सुन्दर से प्रवचन में सुनिए।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 29वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि हनुमानजी लंका दहन के बाद समुद्र में अपनी पूँछ बुझा कर पुनः छोटा रूप धारण करके सीताजी के पास आये और उन्हें प्रणाम करके बोले की हे माता, आप भी हमें रामजी के लिए कोई चिन्ह दीजिये जैसे प्रभु ने दिया था। तब सीता जी ने अपनी चूड़ामणि उतार कर उन्हें दी और साथ-साथ कुछ विशेष सन्देश भी दिया। उसके बाद हनुमानजी ने लंका से प्रस्थान किया।
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