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सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 48वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने बताया कि जब विभीषणजी ने भगवान् को बताया की भगवन कुशल तो तब हो होता है जब आपकी कृपा किसी निर्मल भक्त तो मिल जाती है। तब प्रभु श्री राम बोले की हमारी कृपा किसी को भी प्राप्त हो सकती है, बशर्ते वो अपने मन के विकारों को किनारे कर ह्रदय से हमारी शरण में आ जाये। अपने मन के अनेकानेक ममता के तार बटोर के एक रस्सी बनाये और उससे अपने मन को हमारे चरणों के साथ बांध दे। वो सबके प्रति सम बुद्धि रखे और हर्ष-विशाद से दूर रहे - उसे हमारी कृपा शीघ्र मिल जाती है।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 47वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने बताया कि जब प्रभु श्री राम ने विभीषणजी से उनका कुशल पूँछा तब वे बोले की 'भगवन, जब तक किसी के मन में अनेकों दुष्टों का वास है तब तक लोभ, मोह, आदि ह्रदय में बसते हैं और जब ईश्वर भक्ति रुपी सूर्य उगता है तभी ये सब विकार समाप्त हो जाते हैं और मन में ये सभी विकार भाग जाते हैं। हमें तो आप की कृपा से उन चरणों के दर्शन का सौभाय मिल गया है जिन चरणों को ब्रह्माजी और शिकजी अपने ह्रदय में रखते हैं - अतः हमारा तो सब कुशल-मंगल है'।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 46वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब विभीषणजी रामजी के पास लाये गए, तब दूर से ही जब उन्होंने रामजी और लक्ष्मणजी को देखा तो वे स्तब्ध होकर एक क्षण उन्हें देखते ही रह गए। फिर संभल कर अपना परिचय दिया और दंडवत प्रणाम किया। रामजी ने उन्हें अपने हाथों से उठाया और अपने पास बैठाया और उन्हें लंकेश कहते हुए उनका कुशल पूछा। विभीषणजी ने अत्यंत भक्ति और विनम्रता के साथ बोलै की प्रभु अब आपके चरण कमलों का दर्शन कर लिया है - अब तो सब मंगल ही है।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 45वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब रामजी ने विभीषण को लाने की लिए कहा तो सब अत्यंत प्रसन्न होकर उन्हें लाने के लिए गए और बहुत आदर के साथ लाये। विभीषणजी ने दूर से रामजी और लक्ष्मणजी को देखा, वे स्तब्ध होकर एक क्षण के लिए खड़े हो गए। उन्होंने जो देखा उसका बहुत ही सुन्दर और विशद वर्णन है। मन में हर्ष और प्रफुल्लता थी। वे पास आये और उन्होंने पूरी सच्चाई से अपना परिचय दिया और उनसे निवेदन किया की वे उनकी रक्षा करें। मैं आपकी शरण में हूँ।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 44वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब सुग्रीव ने दुश्मन के भाई के बारे में सचेत रहना चाहिए, तब रामजी ने अपने उस प्राण के बारे में बताया की वे शरणागत का सदैव रक्षा करते हैं। उन्होंने आगे बताया की अगर किसी ने करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या भी क्यों न करी हो लेकिन जब वो हमारी शरण में आ जाए तब भी हम उसकी रक्षा करते हैं। उन्होंने बताया की पापी व्यक्ति तो हमारे सामने आ ही नहीं सकता है, और अगर आता भी है तो उसके पाप नष्ट हो जाते हैं। अगर हम तुम्हारी बात मान भी लें की ये जासूस हमारा भेद लेने आया है तो भी कोई चिंता की बात नहीं है। लक्ष्मण इतने समर्थ हैं की वे अकेले ही दुनिया के सभी निशाचरों को एक क्षण में समाप्त कर सकते हैं। अतः दोनों दृष्टी से उनको हमारे पास लाने में कोई हर्जा नहीं है। यह सुनते ही सभी उपस्थित वानर लोग रामजी की जैकार करते हुए विभीषणजी को लाने के लिए चले गए।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 43वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब विभीषण मन ही मन प्रभु राम के चरणों का स्मरण करते-करते समुद्र के उस पार पहुँच गए। उन्हें आता देख वानर प्रहरियों ने दूर से ही किसी को आते देख लिया और इस पार उतरते ही उन्हें पकड़ लिया। उन्होंने सुग्रीव को समाचार दिया की ऐसा कोई दूत आया है। सुग्रीव ने अधिक जानकारी निकली और पता चला की वो तो रावण का भाई है। यह अत्यंत अप्रत्याशित था। वे सीधे रामजी के पास गए और सूचना दी। रामजी ने शान्त और संतुलित भाव से सुग्रीव की ही राय मांगी। सुग्रीव ने तो कहा की 'महाराज, इन रक्षाओं का कोई भरोसा नहीं है। ये बहुत नाटक करते हैं, हमारा विचार तो इन्हे बंदी बना लेने का है। तब रामजी बोले की 'तुम्हारी राय भी व्यावहारिक है, लेकिन हमारा एक प्रण है की हम शरणागत की सदैव रक्षा करते हैं।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 42वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब विभीषणजी को रावण ने प्रताड़ित और अपमानित करके लंका से निकल जाने को कहा तब वे आकाश मार्ग से ऊपर उठे और पुनः बोले के रामजी के शरण में जाओ, अन्यथा ये सभा काल के वश में हो गयी है। शिवजी कहते हैं की जहाँ पर एक साधु व्यक्ति की अवज्ञा होती है वहां सब प्रकार के कल्याण समाप्त हो जाते हैं। विभीषणजी रामजी के चरण कमल के संभावित दर्शन से अत्यंत हर्षित थे। आज हम उन चरम कमल के दर्शन करेंगे जिन्होंने अहिल्या का उद्धार किया था, जिन्होंने पूरे दण्डकारण्य को पावन कर दिया है, जो चरण कमल सीताजी और शिवजी सदैव अपने ह्रदय में रखते हैं।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 41वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब विभीषण ने रावण को सीताजी को वापस देने के लिए समझाया और वह बहुत क्रोधित हो गया और विभीषणजी और माल्यवान जी को निकल जाने को कहा। माल्यवानजी तो खुद ही उठ के चले गए, लेकिन विभीषणजी रावण के चरण पकड़ के पुनः निवेदन करने लगे। अंततः रावण ने विभीषण जी को लात मार के कहा की जिनका गुणगान गए रहे हो, उन्ही की शरण में जाओ और अपनी नीति उनको ही बताओ। जब उसने लात मरी, तो भी विभीषणजी ने बोलै की कोई बात नहीं, आप हमारे पिता समान हैं लेकिन जो उचित और कल्याणकारी है आप वो ही करें। जब कुछ बात नहीं बानी तो विभीषण को भी निकल जाना उचित लगा, और आकाशमार्ग से अपने सचिवों के साथ ऊपर उठ गए, और सबको घोषणा करते हुए बोले की आप की सभा काल वश हो गयी है। अब हमको दोष नहीं देना।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 40वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब विभीषण ने रावण को अपना विचार बताया तो वहां बैठे माल्यवान जी, जो की रावण के सबसे बुद्धिमान सचिव एवं उसके नानाजी भी थे वे बहुत प्रसन्न हुए और कहा की हे रावण, आपका अनुज निश्चित रूप से नीति-विभूषण कहलाने योग्य है। इसने जो कहा है वो सही राइ है और मैं भी इसका अनुमोदन करता हूँ। इस पर रावण अत्यंत क्रोधित हो गया और बोलै की हमारे दुश्मन का तुम दोनों महिमामंडप कर रहे हो - इनको हमारी नज़रों से दूर करो। इतना सुनते ही माल्यवान खुद वहां से उठ के अपने घर चले जाते हैं। लेकिन विभीषण ने फिर भी हार नहीं मानी और पुनः रावण से बोलै की हम आपके चरण में गिर के निवेदन करते हैं की सीताजी जो की निशाचर कुल के लिए काल-रात्रि है आप उनसे प्रीती छोड़कर उन्हें रामजी को वापस करदें।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 39वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब रावण ने विभीषण से उनकी राय मांगी तो उन्होंने अत्यंत आदर और सम्मान पूर्वक रावण को बताया की काम आदि से दूर रहते हुए सीताजी को वापस भिजवा कर रामजी की शरण में जाना ही कल्याणकारी है। वे कहते हैं की रामजी सामान्य नारों के राजा नहीं हैं, वे साक्षात् ईश्वर हैं। यह सब बातें हमें अभी पुलस्त्य ऋषि जी (रावण के दादाजी) ने अपने शिष्य के द्वारा संदेशा भिजवाया है।
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