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सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 58वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने बताया कि जब तीन दिन की आराधना के बाद भी समुद्र देवता प्रकट नहीं हुए तो रामजी नाराज हो गए और बोले की कुछ लोगों में बिना भय प्रीती नहीं होती है। उन्होंने नीति के अनेकानेक वचन कहे जिसका भाव यह ही था की अनधिकारी को ज्ञान, प्रेम आदि निरर्थक हो जाता है। उन्होंने लक्ष्मण को कहा की हमारा धनुष-बाण लाओ। रामजी ने जैसे ही धनुष के ऊपर बाण का संधान किया, समुद्र में अग्नि की ज्वाला उठाने लगी और उसके जीव-जंतु व्याकुल हो गए। तब ही समुद्र देवता ब्राह्मण का रूप धारण करके, हाथ में सोने का थाल और उसके अनेकानेक मणियाँ आदि के साथ रामजी के सामने प्रकट हो गए।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 57वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने बताया कि जब शुक नामक दूत ने रावण को लक्ष्मणजी का पत्र दिया तो वो मन ही मन तो थोड़ा डर गया लेकिन फिर ऊपर से हँस के बोलै की 'वो छोटा तपस्वी जमीन पर पड़ा है और अपने छोटे हाथो के आकाश को पकड़ना चाहता है।' तब शुक ने कहा की 'महाराज ! जो कुछ पत्र में लिखा है उसको सच ही समझिये'! उसने पुनः रावण का हितैषी होने के नाते उससे निवेदन किया की महाराज, अपना अभिमान त्याग कर रामजी की शरण में चले जाइये। वे बहुत ही उदार हैं आप के सब दोष क्षमा कर देंगे। आप सीताजी को वापस दे दीजिये। जहाँ उसने यह बात कही वो भड़क गया, और शुक को भी एक लात मारी। शुक ने उसके चरण में सिर नवाया और सीधे रामजी के पास चला गया। वो एक शापित मुनि था, राजी ने उसको मुक्त कर दिया और वो अपने आश्रम चला गया। इधर रामजी तीन दिनों तक समुद्र से प्रार्थना करते रहे लेकिन वो प्रकट भी नहीं हुआ , तो रामजी क्रोधित हो गए और कहा की कुछ लोगों में क्रोध के बिना प्रीती नहीं होती है।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 56वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने बताया कि शुक नामक दूत रावण को दूसरी तरफ के समाचार बता रहा था। उसने सब कुछ यथावत वर्णन करा। वो अंत में रामजी के सामर्थ्य का वर्णन करता है - कि वे अत्यंत तेजस्वी, बलवान एवं बुद्धिमान दिखते हैं। यद्यपि वे अपने एक बाण से सैकड़ों समुद्रों को सुखा देने में सक्षम हैं, तथापि वे अत्यंत विनम्र और शालीन दिखते हैं। आपके भाई ने उन्हें समुद्र से ही प्रर्थना पूर्वक मार्ग दिखने के लिए बोला तो वे वैसा ही कर रहे हैं। यह सुनकर रावण जोर से हँसा और बोल की - बस, ज्यादा तारीफ़ मत कर, मैंने उनकी बुद्धि और बल को भांप लिया है। जिसका डरपोक विभीषण जैसा सचिव हो वो क्या विजय प्राप्त करेगा। फिर शुक ने लक्षण जी द्वारा भेजी गयी पत्री दी जिसे उसने किसी से पढ़वाया। उसमे क्या था ये सब आप प्रवचन में सुनिए।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 55वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने बताया कि रावण का शुक नामक दूत रावण को वहां के समाचार आगे दे रहा है। वो कहता है की - हे रावण ! ये जो हमने द्विविद आदि के नाम बताए हैं वे सब सुग्रीव की तरह ही बहुत बलवान हैं। इनके जैसे वहां करोड़ों हैं जिनके पास अतुल्य बल दिखाई देता है और जो तीनों लोकों को तिनके के समान समझते हैं। हमने सुना कि वहां अठारह पद्म (एक पद्म = दस लाख अरब) तो वानरों के सेनापति हैं, और महाराज, वे सब इतने बलवान दिखते हैं की एक-एक वानर आप को भी लड़ाई में जीत लें। वे क्रोध से भरे हुए हैं और गुस्से के मारे हाथ मसल रहे हैं। समुद्र को सुखा देने की बातें कह रहे हैं, आप को मारने की और लंका को निगल जाने की बातें कर रहे हैं - बस रामजी उन्हें आज्ञा नहीं दे रहे हैं।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 54वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने बताया कि जब रावण ने अपने दूत से विभीषण एवं उस पार का सब हाल-चाल पूछा तो उसने कहा की 'हे नाथ! आपने जिस स्नेह और कृपा से हमारा हाल-चाल आदि पूछा है, हमारा निवेदन है की हमारी सब बातें आप उसी कृपा का भाव बनाए रख कर आप सुन लीजियेगा। महाराज, जब विभीषण वहां पहुंचा तो रामजी ने उसी समय उसका राज-तिलक कर दिया। हमको रावण का दूत जानकार पकड़ लिया और बहुत दुःख दिया और हमारी नाक-कान कटाने लगे। जब रामजी की दुहाई दी तब ही छोड़ा। उनकी वानरों और भालुओं की सेना बहुत ही विशाल है और एक से एक बड़े-बड़े योद्धा हैं। जो वानर यहाँ आया था वो तो उनमे बहुत ही छोटा है।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 53वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने बताया कि जब रावण का दूत रामजी के गुणों का मन ही मन गाने से प्रभावित हुआ, तो उसका कपट से धारण किया हुआ रूप समाप्त हो गया और वो अपने वास्तविक रूप में आ गया - और पकड़ा गया। उसकी बहुत पिटाई हुई और सुग्रीव ने तो उसके नाक-कान काटने का निर्णय किया। उसके बहुत रोने-चिल्लाने और अंत में रामजी की दुहाई देने पर लक्ष्मणजी ने सुना तो उसे अपने पास बुलवाया, और अंत में उसे ही अपना दूत बनाकर रावण को मौखिक सन्देश और लिखित पत्र भिजवाया। वो रामजी और लक्ष्मणजी के गुणों का स्मरण करती हुए लंका वापस आ गया। रावण के पास गया तो उसने वहां के सब हाल-चाल पूछे।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 50वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने बताया कि जब रामजी ने विभीषणजी का राज-तिलक कर दिया तो गोस्वामीजी कहते हैं की ऐसे प्रभु को छोड़ कर और किस का भजन करा जाये, जो मात्र भक्ति और शरणागति के कारण अत्यंत विनम्रता से भक्तों को बिना मांगे सब कुछ दे देते हैं। ऐसे सर्व-समर्थ, सर्वज्ञ, सबके अंतर्यामी प्रभु अब सुग्रीव और विभीषणजी से पूंछते हैं - की आप अपनी राय दीजिये की हम लोग समुद्र के पार कैसे जाएँ। तो लंकापति विभीषणजी कहते हैं की 'प्रभु, यद्यपि आपके एक बाण से आप करोड़ों समुद्रों को सुखा सकते हैं, तथापि निति यह कहती हैं की सबको पहले शांति और प्रेम से काम करना चाहिए। समुद्र आपके कुलगुरु हैं, इसलिए आप उन्ही से प्रार्थना पूर्वक पूछिए - वे आप को अवश्य बताएंगें जिससे आपकी पूरी सेना आराम से उस पार जा सकेगी।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 49वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने बताया कि जब रामजी ने बताया की कौन भक्तजन हमको प्रिय होते हैं और कब हमारी कृपा उनको प्राप्त होती है, फिर आगे भगवान् कहते हैं की 'हे विभीषण, तुम्हारे अंदर तो वो सब गुण हैं, इसीलिए वे भगवान् को अत्यंत प्रिय हैं। वभीषणजी कहते हैं के हे प्रभु, आपके दर्शन से पहले हमारे मन में कुछ वासनाएं थीं लेकिन आपके दर्शन और आपके प्रेम रुपी सरिता में वे सब बह गईं, अब प्रभु कृपया हमें अपनी वो पावनि भक्ति हमें दीजिये जिसे शिवजी अपने ह्रदय में रखते हैं। भगवान् ने एवमस्तु कहा - और विभीषणजी अत्यंत धन्य हो गए। फिर रामजी ने समुद्र का जल मंगवाया और उनका राज्य-तिलक कर दिया। देवता लोग भी धन्य हो गए और आकाश से पुष्प-वृष्टि होने लगी।
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