
Sign up to save your podcasts
Or


सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 28वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब रावण ने हनुमानजी की पूँछ में आग लगाने की आज्ञा दी तब उनके सब सहयोगी लोगों ने पूँछ में आग लगाने के लिए जल्दी-जल्दी कपडे और तेल की व्यवस्था करी। पूँछ में कपड़ा बांधना प्रारंभ हुआ, और हनुमानजी मजा लेते हुए अपनी पूँछ बड़ी करते गए। किसी तरह से कपड़ा बंधा गया और फिर हनुमानजी को नगर में घुमाया गया। बाद में पूँछ में आग लगा दी गयी। उस समय हनुमानजी ने अपना रूप छोटा करके बंधन से निकल गए एंड घरों की छत पर चढ़ कर सब तरफ आग लगाने लगे - केवल विभीषण का घर छूटा। फिर समुद्र में कूदकर आग बुझाकर सीताजी के पास पुनः छोटा रूप धारण करके पहुँच गए।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 27वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि हनुमानजी ने रावण को भक्ति, विवेक, वेत्राज्ञा और नीति से भरी बातें समझाई, वे सब बातें उसके अपने, उसके परिवार और पूरे राज्य के हित में थी। लेकिन रावण केवल अभिमानी ही बल्कि महा-अभिमानी था। वो कस के हँसा और उपहास करते हुए बोला की आज हमें एक बन्दर गुरु मिला है। अपने सिपाहियों को उसने हनुमानजी को मारने की आज्ञा दी, जिसे सुनते ही सब उन्हें मारने दौड़े। तभी सभा में विभीषण जी का आगमन हुआ। उन्होंने ने आदर सहित रावण का सत्कार किया और पूरी स्थिति समझने के बाद बोले की महाराज, किसी दूत को मारना उचित नहीं होता है, हमारा सुझाव है की आप कोई और दंड इसे दीजिए। जब बाकी सबने भी इस सुझाव के लिए अपनी सहमति दी - तब रावण ने हनुमानजी की पूँछ में आग लगाने की आज्ञा दी।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 26वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि हनुमानजी ने रावण के समस्त प्रश्नों के उत्तर दिए और उसके बाद परात्मा के परम भक्त और ज्ञानी की तरह से रावण के हित के बारे में सोचते हुए उसे कुछ अत्यंत सुन्दर उपदेश देते हैं। यह प्रसंग भी बहुत ही सुन्दर है। ध्यान पूर्वक सुने।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 25वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब रावण ने हनुमानजी से अनेकों प्रश्न करे तो उन्होंने एक-एक करके सभी प्रश्नो का उत्तर दिया। ये सब आप पू स्वामीजी की वाणी से ही सुनें।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 24वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब हनुमानजी रावण की सभा में पहुँच जाते हैं तो रावण ने हनुमानजी से पुछा की वो ककौन है? किसी बल से हमारी अशोक वाटिका उजाड़ दी है हमारे सैनिक और पुत्र को मर दिया। वो आगे बोलता है की क्या तुम्हे दर नहीं लगता है? लगता है तुमने हमारी महिमा नहीं सुनी है। हनुमानजी ने सब प्रहण बड़े ध्यान से सुने और एक-एक करके सभी प्रश्नों का उत्तर दिया। तुम कौन हो इस प्रश्न के उत्तर में हनुमानजी परात्मा के अनेकानेक लक्षण देते हुए कहते हैं की मैं 'उनका' दूत हूँ। यह प्रसंग अत्यंत सुन्दर है।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 23वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब मेघनाद ने हनुमानजी के ऊपर ब्रह्मास्त्र मारा तो उन्होंने इस दिव्य अस्त्र की महिमा बनाये रखने के लिए स्वेछा से अपने प्रभावित होने का निर्णय लिया और मूर्छित होकर गिर गए। गिरते-गिरते भी उन्होंने अनेकों राक्षसों को मार दिया। भवानीजी थोड़ी आश्चर्यचकित हो गयीं की हनुमानजी कैसे मूर्छित हो गए - तो उन्हें शिवजी स्पष्ट करते हुए बताते हैं की जिसका नाम लेने मात्र से भाव-बंधन समाप्त हो जाता है, ऐसे रामी से सेवक को कौन बन्द्ग सकता है, वे तो स्वेच्छा से मूर्छित हो गए थे। लेकिन मूर्छित होने के बाद भी मेघनाद उनके पास तब तक नहीं गया जब तक उसने उन्हें नागपाश में बांध नहीं दिया। फिर उन्हें रावण की सभा में ले जाया गया।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के २२वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब हनुमानजी ने सीताजी फल खाने की आज्ञा लेली - तब वे पेड़ पर कूद पड़े और फल खाने के साथ-साथ कुछ पेड़ भी उखाड़ के गिरा दिए। जब वहां के रक्षकों ने रोकना चाहा तो उन्हें मार दिया। कुछ लोग भागे-भागे रावण के पास पहुंचे और समाचार दिया। रावण ने कुछ और राक्षस भेजे। हनुमानजी ने उन्हें भी मार दिया, फिर रावण ने अपने पुत्र अक्षयकुमार को भेजा - वो भी मारा गया। फिर मेघनाद को भेजा जिससे भयंकर युद्ध हुआ। फिर मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र प्रयोग का निश्चय किया।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के 2१वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब हनुमानजी ने रामजी का सन्देश सीताजी को दिया तो वो धन्य हो गयी, हनुमानजी आगे उन्हें थोड़े दिन धीरज रखने को कहते हैं। अब रामजी शीघ्र आएंगे और समस्त राक्षसों का संहार करके सीताजी को आदर के साथ ले जायेंगे। सीताजी अत्यंत प्रसन्न हो गयी और हनुमानजी को अनेकानेक आशीर्वाद दिए। सबसे अच्छा उन्हें तब लगा जब वे बोलीं की रामजी तुम पर बहुत स्नेह बनाये रखें। वे बोलते हैं की हे माता, अब हम कृतकृत्य हो गए। फिर बालवत अपने माताजी से कहते हैं की माताजी बहुत भूख लगी है, आप की आज्ञा हो तो हम कुछ फल खालें। सीताजी ने आज्ञा दी तो वे वानर स्वाभाव का परिचय देते हुए पेड़ पर कूद पड़े।
सुन्दरकाण्ड ज्ञान यज्ञ के १९वें दिन पूज्य स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी महाराज ने सुंदरकांड की कथा में आगे बताया कि जब सीताजी को यह विश्वास हो गया की हनुमानजी निश्चित रूप से रामजी के भक्त और सेवक हैं तब उन्होंने रामजी और लक्ष्मणजी के समाचार जानने के लिए हनुमानजी से पूछा। हनुमानजी के ये सब उत्तर एवं व्यवहार अत्यंत बुद्धिमत्तापूर्ण और हृदयस्पर्शी हैं - जिन्हे पू स्वामीजी ने भी अत्यंत हृदयस्पर्शी ढंग से सुनाया।
From the publisher's feed