Vikas

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By Vikas AgarwalComedyStand-Up
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Vikas episodes

  • कैसे भूलूँ तुमको!
    क्यों जगा जाती हो तुम नींदों से,
    सोया था भुला कर तुमको अच्छे से,
    मींच कर आँखों को कस कर,
    की कहीं तुम सपनों से,
    भीतर न आ जाओ,
    गर आ भी जाओ तो
    मुझको न दिख पाओ,
    यादों को तुम्हारी मैं,
    समेट कर,
    जैसे तैसे,
    अच्छे से बाँध कर,
    दुछत्ती पर जो रख आया हूँ,
    किवाड़ भी बंद कर आया हूँ,
    बोलो फिर,
    क्यों परेशान करते हो मुझको,
    कानों को भींच कर,
    यूँ बन्द किआ,
    जिससे तुमको न सुन पाउ,
    न पायल,
    न चूड़ी,
    न कोई खन-खन,
    न तुमहारी कोई आहट,
    कुछ भी नही,
    कुछ भी नही सुन पाऊँ,
    जिनसे तुम्हारे अहसास मेरे पास आ सके,
    तुमहारी बातों को,
    अलमारी में कुछ यूं ही भर दिया है,
    बेतरकीब,
    जल्दी-जल्दी,
    की कहीं तुम न आके,
    फिर से,
    न बिखरा जाओ,
    मेरे मन मे,
    सबकुछ,उथल-पुथल कर जाओ,
    दुबारा!
    7 min
  • बताओ तो कैसे भूलें तुम्हे!
    नही लिखेँगे तुमको,
    अब बिल्कुल नही लिखेंगे,
    नफरत करेंगे तुमसे,
    अबतो जी भर-भर कर नफरत करेंगे!
    तुम्हारे नखरों को,
    अदाओं को,
    तुम्हारी हर एक नज़र को,
    नज़रअंदाज़ करेंगे,
    बिल्कुल भी न देखेंगे तुमको,
    एक झलक भर भी नही,
    हुह!
    न जाने क्या समझते हो खुद को,
    पर हम तो कुछ नही समझते,
    मिलेंगे तुम जैसे बहुत,
    सच मे बहुत,
    हर मोड़ पर,
    हर जगह,
    तुम कोई खास कहाँ,
    हमारे लिए,
    ऐसे हसीन चेहरे,
    ऐसी आँखे,
    ऐसी अदाएं,
    बहुत देखी है हमने,
    हर जगह,
    तो तुम क्या कोई अलग हो,
    लगता तोह नही,
    न जाने कब से सोच रहे हैं
    ये सब,
    पर क्यों सोच रहे हैं,
    पता नही,
    शायद इसलिए कि,
    कुछ देर को तुमको भुला सके,
    पर सच कहें,
    नही भुला पा रहे!
    2 min
  • सवाल...the question?
    क्यों डरती है सरकारे आज़ादी से,
    आज़ादी के नारों से,
    क्यों बने रहने देना चाहती हैं,
    हमे किसी का गुलाम,
    गुलाम,
    किसी साम्राज्य का,
    किसी सोच का,
    किसी समझ या किसी विश्वास का,
    कभी धर्म के नाम पर,
    कभी देश के नाम पर,
    या कभी वायरस के?
    क्यों आखिर क्यों,
    क्यों डरती है
    ये आवाज़ों से,
    उन आवाज़ों से,
    जो किसी किताब से निकलति है,
    वो आवाजें जो,
    किसी सवाल से उठती है,
    वो आवाजें जो किसी स्थापित पर,
    शक़् करता है,
    पर शक तो करना पड़ेगा न!
    जब झाँका गैलीलियो ने आकाश में,
    बोला धरती गोल है,
    चक्कर काटती सूरज का,
    ज़हर पीना पड़ा उसको,
    विरुद्ध मान्यता के बोलने पर!
    जमाना बदल रहा है,
    और सोच विचार भी,
    पर डर वहीं है,
    उसी जगह
    दृढ़,
    सत्ता जाने का डर,
    मन मानी का डर,
    किसी नई सोच,
    किसी नई खोज का डर,
    कहीं मेरे हाथ जो है,
    वो फिसल न जाये,
    उसका डर,
    डर हर एक सवाल से,
    डर हर उस चीज़ से जो सवाल पैदा करती हो,
    हर वो साँस,
    हर वो सोच,
    हर वो निगाह,
    जो सवाल पैदा करती हो,
    2 min
  • सच कहना...just be fair...
    सच कहना,
    आज सुबह जब पहली आँख खुली थी,
    किसे देखा था,
    कल रात जो आँख लगते लगते
    किसे देखा था,
    सच कहना,
    सच कहना,
    आज अखबार के पन्ने,
    पलटते-पलटते,
    किस शब्द पर,
    तुम्हारी आँखे रुक जाती है,
    जिनके आगे,
    कुछ यादें,
    पन्नो सी पलट जाती है,
    सच कहना,
    सच कहना,
    आईने के सामने,
    कुछ तो डर लगता होगा,
    कभी खुद को,
    देखा था,
    मेरी आँखों से,
    वो तुम्हारी खुद की छाया,
    चुभती तोह होगी न
    सच कहना।
    सच कहना,
    की शाम को कभी फुरसत मे,
    डूबते सूरज को,
    एक टक देखते हुए,
    यही सोच रही थी न,
    की दूर क्षितिज से,
    मेरी आँखे,
    तुम्हे अब भी निहार रही है,
    है ना,
    सच कहना।
    2 min

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