इस ओर खड़ी होके बस देख रही थी
कि हर ठेहरी चीज़ क्या गेहरी भी होती है?
बेहती नदी, गिरते झरने, उफान भरता समंदर
इन सब से कभी वैसा डर क्यों नहीं लगता
जितना खामोश तलाब या निस्तरंग झील से लगता है?
सौ मर्तबा सोचते हैं उसकी गहराइयों से ज़रा रूबरू हो लें
पर एक अंजान भय शायद ये होने नही देता
पर जब बात इश्क़ पे आती है
कैसे बेखयाली में बस उसमें बहते चले जाते हैं
बगैर अंजाम की परवाह में, बस गहराइयों में खो जाते हैं
उस पार क्या हाल है इससे फ़र्क नहीं पड़ता,
बस खुद के इश्क को गेहरा कर उसकी गहराइयों पे इतराते हैं
! – स्वप्निल 🎵