
Sign up to save your podcasts
Or


Shrimad Bhagavad Gita Chapter-13 (Part-13) in Hindi Podcast
गीता के आरम्भ में धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र का नाम तो लिया गया, किन्तु वह क्षेत्र वस्तुत: है कहा? वह स्थल बताना शेष था, जिसे स्वयं शास्त्रकार ने प्रस्तुत अध्याय में स्पष्ट किया। कौन्तेय! यह शरीर ही एक क्षेत्र है। जो इसको जनता है, वह क्षेत्रज्ञ है। वह इसमें फँसा नहीं बल्कि निर्लेप है। इसका संचालक है। ” अर्जुन! सम्पूर्ण क्षेत्रों में मैं भी क्षेत्रज्ञ हूँ। ” अन्य महापुरुषो से अपनी तुलना की। इससे स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण भी एक योगी थे क्योकि जो जनता है वह क्षेत्रज्ञ है, ऐसा महापुरुषो ने कहा है। मैं भी क्षेत्रज्ञ हूँ अथार्त अन्य महापुरुषों की तरह मैं भी हूँ।
उन्होंने क्षेत्र जैसा है, जिन विकारो वाला है तथा क्षेत्रज्ञ जिन प्रभावों वाला है, उस पर प्रकाश डाला। मैं ही कहता हूँ ऐसी बात नहीं, महर्षियों ने भी यही कहा है। वेद के छन्दों में भी उसी को विभाजित करके दर्शाया गया है। ब्रह्मसूत्र में भी वही मिलता है।
शरीर ( जो क्षेत्र ) है क्या इतना ही है, जितना दिखयी देता है? इसके होने के पीछे जिसका बहुत बड़ा हाथ है, उन्हें गिनाते हुये बताया कि अष्टधा मूल प्रक्रति, अव्यक्त प्रक्रति, दस इन्द्रियाँ और मन, इन्द्रियाँ के पांचो विषय, आशा, तृष्णा और वासना – इस प्रकार इन विकारो का सामूहिक मिश्रण यह शरीर है। जब तक ये रहेंगे, तब तक ये शरीर किसी न किसी रूप में रहेगा ही। यह ही क्षेत्र है जिसमें बोया भला बुरा बीज संस्कार रूप में उगता है। जो इसका पार पा लेता है, वह क्षेत्रज्ञ है। क्षेत्रज्ञ का स्वरूप बताते हुये उन्होंने ईश्वरीय गुणधर्मों पर प्रकाश डाला और कहा कि क्षेत्रज्ञ इस क्षेत्र का प्रकाशक है।
उन्होंने बताया की साधना के पूर्तिकाल में परमतत्त्व परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन ही ज्ञान है। ज्ञान का अर्थ है साक्षात्कार। इसके अतिरिक्त जो कुछ भी है, अज्ञान है। जानने योग्य वस्तु है परात्पर ब्रह्म। वह न सत है न असत- इन दोनों से परे है। उसे जानने के लिये लोग ह्र्दय में ध्यान करते है, बाहर मूर्ति रखकर नहीं। बहुत से लोग सांख्य-माध्यम से ध्यान करते है, शेष निष्काम कर्मयोग, सम्पूर्ण के साथ उसकी प्राप्ति के लिये उसी निर्धारित कर्म आरधना का आचरण करते है। वे भी परम कल्याण को प्राप्त हो जाते है अत: कुछ भी समझ न आये तो उसके ज्ञाता महापुरुष का सत्संग आवश्यक है।
स्थितप्रज्ञ महापुरुष के लक्षण बताते हुये योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि- जैसे आकाश सर्वत्र सम रहता हुआ भी निर्लेप है, जैसे सूर्य सर्वत्र प्रकाश करते हुये भी निर्लेप है, ठीक उसी प्रकार स्थितप्रज्ञ, पुरुष सर्वत्र सम ईश्वर को जैसा है वेसा ही देखने की क्षमता वाला पुरुष क्षेत्र से अथवा प्रक्रति से सर्वथा निर्लेप है। अन्त में उन्होंने निर्णय दिया कि क्षमता वाला पुरुष क्षेत्र से अथवा प्रक्रति से सर्वथा निर्लेप है। अन्त में उन्होंने निर्णय दिया कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ की जानकारी ज्ञानरूपी नेत्रों द्वारा ही सम्भव है। ज्ञान जैसा की पीछे बताया गया, उस परमात्मा के प्रत्यक्ष दर्शन के साथ मिलने वाली जानकारी है। शास्त्रों को बहुत रटकर दुहराना ज्ञान नहीं बल्कि अध्ययन तथा महापुरुषों से उस कर्म को समझकर, उस कर्म पर चलकर मनसहित इन्द्रियों के निरोध और उस निरोध के भी विलयकाल में परमतत्व को देखने के साथ जो अनुभूति होती है, उसी अनुभूति का नाम ज्ञान है। क्रिया आवश्यक है। इस अध्याय में मुख्यत: क्षेत्रज्ञ का विस्तार से वर्णन किया गया है। वस्तुत क्षेत्र का स्वरूप व्यापक है। शरीर कहना तो सरल है किन्तु शरीर का सम्बन्ध कहाँ तक है? तो समग्र ब्रह्माण्ड मूल प्रक्रति का विस्तार है। अनन्त अन्तरिक्षों तक आपके शरीर का विस्तार है। उनसे आप का जीवन ऊर्जस्वी है, उनके विना आप जी नहीं सकते। यह भूमंडल, विश्व, जगत, देश, प्रदेश और आपका यह दिखाई देने वाला शरीर उस प्रकर्ति का एक टुकड़ा भी नहीं है। इस प्रकार क्षेत्र का ही इस अध्याय में विस्तार से वर्णन है अत: –
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में ” क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग ” नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
Shrimad Bhagavad Gita Chapter-12 (Part-12) in Hindi Podcast
गत अध्याय के अन्त में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि- अर्जुन! तेरे सिवाय न कोई पाया है, न कोई पा सकेगा। जैसा तू ने देखा, किन्तु अनन्य भक्ति अथवा अनुराग से जो भजता है, वह इसी प्रकार मुझे देख सकता है, तत्व के साथ मुझे जान सकता है और मुझमें प्रवेश भी पा सकता है। अथार्त परमात्मा ऐसी सत्ता है, जिसको पाया जाता है। अत: अर्जुन भक्त बन।
अर्जुन ने इस अध्याय में प्रश्न किया कि- भगवन! अनन्य भाव से जो आपका चिन्तन करते है और दुसरे वे जो अक्षर अव्यक्त की उपासन करते है, इन दोनों में उत्तम योगवेत्ता कौन है? योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि दोनों मुझे ही प्राप्त होते है क्योंकि मैं अव्यक्त स्वरूप हूँ। किन्तु जो इन्द्रियों को वश में रखते हुये मन को सब ओर से समेटकर अव्यक्त परमात्मा में आसक्त है, उनके पथ में कलेश विशेष है। जब तक देह का अध्यास (भान) है, तब तक अव्यक्त स्वरूप की प्राप्ति दु:खपूर्ण है, क्योकि अव्यक्त स्वरूप तो चित्त के निरोध और विलयकाल में मिलेगा। उसके पूर्व उसका शरीर ही बीच में बाधक बन जाता है। मैं हूँ, मैं हूँ, मुझे पाना है- कहते है अपने शरीर की ओर घूम जाता है। उसके लड़खड़ाने की अधिक सम्भावना है। अत: अर्जुन! तू सम्पूर्ण कर्मो को मुझमें अर्पण करके मानव शरीरधारी मुझ सगुण योगी के रूप का ध्यान द्वारा तैलधारावत् निरन्तर चिन्तन करते है, उनका मैं शीघ्र संसार – सागर से उद्धार करने वाले हो जाता हूँ। अत: भक्तिमार्ग श्रेष्ठ है।
अर्जुन! मुझमें मन को लगा। मन न लगे तो भी लगाने का अभ्यास कर। जहाँ भी चित जाय, पुनः घसीटकर उसका निरोध कर। यह भी करने में असमर्थ है तो तू कर्म कर। कर्म एक ही है, यज्ञार्थ कर्म। तू कार्यम् कर्म करता भर जा, दूसरा न कर। उतना ही कर, पार लगे चाहे न लगे। यदि यह भी करने में असमर्थ है तो स्थितप्रज्ञ, आत्मवान्, तत्त्वज्ञ महापुरुष की शरण होकर सम्पूर्ण कर्मफलो का त्याग कर। ऐसा त्याग करने से तू परमशान्ति को प्राप्त हो जायेगा।
तत्पश्चात् परमशान्ति को प्राप्त हुये भक्त के लक्षण बताते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- जो समूर्ण भूतो में द्वेषभाव से रहित है, जो करुणा से युक्त और दयालु है, ममता और अहंकार से रहित है, वह भक्त मुझे प्रिय है। जो ध्यान योग में निरन्तर तत्पर और आत्मवान्, आत्मस्थित है, वह भक्त मुझे प्रिय है। जिससे न किसी को उद्वेग प्राप्त होता है और स्वयं भी जो किसी से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता, ऐसा भक्त मुझे प्रिय है। शुद्ध है, दक्ष है, व्यथाओं से उपराम है, सर्वारम्भों को त्यागकर जिसने पार पा लिया है, ऐसा भक्त मुझे प्रिय है। सम्पूर्ण कामनाओं का त्यागी और शुभाशुभों का पार पाने वाला भक्त मुझे प्रिय है। जो निंदा और स्तुति में समान और मोंन है, मनसहित जिनकी इन्द्रियाँ शान्त और मौन है, जो किसी भी प्रकार शरीर-निर्वाह में संतुष्ट और रहने के स्थान में ममता से रहित है, शरीर-रक्षा में भी जिनकी आसक्ति नहीं है, ऐसा स्थितप्रज्ञ पुरुष मुझे प्रिय है।
Shrimad Bhagavad Gita Chapter-11 (Part-11) in Hindi Podcast
इस अध्याय के आरम्भ में अर्जुन ने कहा – भगवन! आपकी विभूतियों को मैंने विस्तार से सुना, जिससे मेरा मोह नष्ट हो गया, अज्ञान का शमन हो गया, किन्तु जैसा आपने बताया कि मैं सर्वत्र हूँ, इसे मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ। यदि मेरे द्वारा देखना संभव हो, तो कृपया उसी रूप को दिखाइये। अर्जुन प्रिय सखा था, अनन्य सेवक था अतएव योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कोई प्रतिवाद न कर तुरन्त दिखाना प्रारम्भ किया कि अब मेरे ही अन्दर खड़े सप्तऋषि और उनसे भी पूर्व होने वाले ऋषियों को देख, सर्वत्र फेले मेरे तेज को देख, मेरे ही शरीर में एक स्थान पर खड़े तू चराचर जगत को देख, किन्तु अर्जुन ऑंखें ही मलता रह गया।
इसी प्रकार योगेश्वर श्रीकृष्ण तीन श्लोकों तक अनवरत दिखाते गयें, किन्तु अर्जुन को कुछ भी दिखाई नहीं पड़ा। सभी विभूतिया योगेश्वर में उस समय थी, किन्तु अर्जुन को वे समान्य मनुष्य जैसे ही दिखायी पड़ रहे थे। तब इस प्रकार दिखाते – दिखाते योगेश्वर श्रीकृष्ण सहसा रुक जाते है और कहते है – अर्जुन! इन आँखों से तू मुझे नहीं देख सकता। अपनी बुद्धि से तू मुझे परख नहीं सकता। लो, अब मैं तुझे वह दृष्टि देता हूँ, जिससे तू मुझे देख सकेगा। भगवान तो सामने खड़े ही थे। अर्जुन ने देखा, वास्तव में देखा। देखने के पश्चात क्षुद्र त्रुटियों के लिये क्षमायाचना करने लगा, जो वास्तव में त्रुटियाँ नहीं थी। उदाहरण के लिए, भगवान! कभी मैंने आपको कृष्ण, यादव और सखा कह दिया था, इसके लिए आप मुझे क्षमा करे। श्रीकृष्ण ने क्षमा भी किया, क्योकि अर्जुन की प्रार्थना स्वीकार कर वे सौम्य स्वरूप मैं आ गये, धीरज बँधाया।
वस्तुतः कृष्ण कहना अपराध नहीं था। वे सावलें थे ही, गोर कैसे कहलाते। यदुवंश में जन्म हुआ ही था। श्रीकृष्ण स्वयं भी अपने को सखा मानते थे। वास्तव में प्रत्येक साधक महापुरुष को पहले ऐसा ही समझते है। कुछ उन्हें रूप और आकार से संबोधित करते है, कुछ उनकी वृति से उन्हें पुकारते है और कुछ उन्हें अपने ही समकक्ष मानते है, उनके यथार्थ स्वरूप को नहीं समझते है। उनके अचिंत्य स्वरूप को अर्जुन ने समझा तो पाया कि ये न तो काले है और न गोरे, न किसी कुल के है और न किसी के साथी है। इनके सामान कोई है ही नहीं, तो सखा कैसा? बराबर कैसा? यह तो अचिंत्य स्वरूप है। जिसे वह स्वयं दिखा दे वह देख पता है। अत: अर्जुन ने अपनी प्रारंभिक भूल के लिये क्षमायाचना की।
प्रश्न उठता है कि जब कृष्ण कहना अपराध है तो उनका नाम जपा कैसे जाय? तो जिसे योगेश्वर श्रीकृष्ण ने जपने के लिये स्वयं बल दिया जपने की हो विधि बताई, उसी विधि से आप चिन्तन-स्मरण करें। वह है –
श्रीकृष्ण ने कहा – अर्जुन! तेरे सिवाय मेरे इस रूप को न कोई देख सका है और न भविष्य में कोई देख सकेगा। तब गीता तो हमारे लिये व्यर्थ है। किन्तु नहीं, योगेश्वर कहते है एक अपाय है। जो मेरा अनन्य भक्त है, मेरे सिवाय जो दुसरे किसी का स्मरण न करके निरन्तर मेरा ही चिन्तन करने वाला है, उनकी अनन्य भक्ति के द्वारा मैं प्रत्यक्ष देखने को ( जैसा तूने देखा है ), तत्व से जानने को और प्रवेश करने को भी सुलभ हूँ। अथार्त अर्जुन अनन्य भक्त था। भक्ति का परिमार्जित रूप है अनुराग, इष्ट के अनुरूप लगाव। ” मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। ” अनुरागविहीन पुरुष न कभी पाया है और न पा सकेगा। अनुराग नहीं है तो कोई लाख योग करे, जप करे, तप करे या दान करे वह नहीं मिलता। अत: इष्ट के अनुरूप राग अथवा भक्ति नितान्त आवश्यक है।
Shrimad Bhagavad Gita Chapter-10 (Part-10) in Hindi Podcast
इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने कहा कि – अर्जुन! मैं तुझे पुनः उपदेश करूँगा, क्योकि तू मेरा अतिशय प्रिय है। पहले कह चुके है, फिर भी कहने जा रहे है, क्योकि पूर्तिपर्यन्त सदगुरु से सुनने की आवश्यकता रहती है। मेरी उत्पति को न देवता और न महर्षिगण ही जानते है क्योकि मैं उनका भी आदि कारण हूँ। अव्यक्त स्थिति के पश्चात की सार्वभौम अवस्था को वही जनता है, जो हो चुका है। जो मुझे अजन्मा, अनादी और सम्पूर्ण लोको के महान ईश्वर को साक्षात्कारसहित जानता है वही ज्ञानी है।
बुद्धि, ज्ञान, असंमूढ़ता, इन्द्रियों का दमन, मन का शमन, सन्तोष, तप, दान और कीर्ति के भाव अथार्त देवी संपद् के उक्त लक्षण मेरी देन है। सात महर्षिजन अथार्त योग की सात भूमिकाएँ, उससे भी पहले होने वाले तदनुरूप अन्त:करण चतुष्टय और इनके अनुकूल मन जो स्वयंभू है, स्वयं रचयिता है ये सब मुझमें भाव वाले है, लगाव और श्रद्धावाले है, जिंनकी संसार में सम्पूर्ण प्रजा है, ये सब मुझ से ही उत्पन्न है अर्थात् साधनामयी प्रवार्तिया मेरी ही प्रजा है। इनकी उत्पति अपने से नहीं, गुरु से होती है। जो उपर्युक्त मेरी विभूतियों को साक्षात् जान लेता है, वह नि:सन्देह मुझमें एकीभाव से प्रवेश करने के योग्य है।
अर्जुन! मैं ही सबकी उत्पति का कारण हूँ- ऐसा जो श्रद्धा से जान लेते है वे अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते है, निरन्तर मुझमें मन, बुद्धि और प्राणों से लगने वाले होते है, आपस में मेरा गुण चिन्तन और मुझमें रमण करते है। उन निरन्तर मुझसे सयुक्त हुए पुरुषो को मैं योग में प्रवेश करने वाली बुद्धि प्रदान करता हूँ। यह मेरी ही देन है। इस प्रकार बुद्धियोग देते है तो अर्जुन! “आत्मभावस्थ” उनकी आत्मा में जाग्रत होकर खडा हो जाता हूँ और उनके ह्र्दय में अज्ञान से उत्पन अंधकार को ज्ञानरुपी दीपक से नष्ट करता हूँ।
अर्जुन ने प्रश्न किया कि भगवन! आप परम पवित्र, सनातन, दिव्य, अनाधि और सर्वत्र व्याप्त है- ऐसा महर्षिगण कहते है तथा वर्तमान में देवर्षि नारद, देवल, व्यास और आप भी वही कहते है। यह सत्य भी है कि आप को न देवता जानते है न दानव , स्वयं आप जिसे जाना दे वही जान पाता है। आप ही अपनी विभूतियों को विस्तार से कहने में समर्थ है। अत: जनार्दन! आप अपनी विभूतियों को विस्तार से कहिये। पूर्तिपर्यन्त इष्ट से सुनते रहने की उत्कंठा बनी रहनी चाहिये। आगे इष्ट के अन्तराल में क्या है, उसे साधक क्या जाने।
इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने एक-एक करके अपनी प्रमुख विभूतियों का लक्षण संक्षेप में बताया – जिनमें से कुछ योग साधन में प्रवेश करने के साथ मिलने वाली अंतरग विभूतियों चित्रण है और शेष कुछ समाज में ऋद्धियों-सिद्धियों के साथ पाई जाने वाली विभूतियों पर प्रकाश डाला और अन्त में उन्होंने बल देकर कहा – अर्जुन! बहुत कुछ जानने से तेरा क्या प्रयोजन है? इस संसार में जो कुछ भी तेज और ऐश्वर्ययुक्त वस्तुएं है, वह सब मेरे तेज के अंश मात्र में स्थित है। वस्तुत: मेरी विभूतियाँ अपार है। ऐसा कहते हुये योगेश्वर ने इस अध्याय का पटाक्षेप किया।
इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने अपनी विभूतियों की मात्र बौद्धिक जानकारी दी, जिससे अर्जुन की श्रद्धा ओर से सिमटकर एक इष्ट में लग जाये। किन्तु बन्धुओं! सब कुछ सुनलेने और बाल की खाल निकालकर समझ लेने के बाद भी चलकर उसे जानना शेष ही रहता है यह क्रियात्मक पथ है।
सम्पूर्ण अध्याय में योगेश्वर की विभूतियों का ही वर्णन है। अत: –
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में “विभूति-वर्णन” नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
Shrimad Bhagavad Gita Chapter-09 (Part-09) in Hindi Podcast
इस अध्याय के आरम्भ मै श्रीकृष्ण ने कहा – अर्जुन! तुझ दोषरहित भक्त के लिये मैं इस ज्ञान को विज्ञानं सहित कहूँगा, जिसे जानकर कुछ भी जानना शेष नहीं रहेगा। इसे जानकर तू संसार बंधन से छुट जायेगा। यह ज्ञान सम्पूर्ण विधियाओ का राजा है विद्या वह है जो परमब्रह्म में प्रवेश दिलाये। यह ज्ञान उसका भी राजा है अथार्त निश्चय ही कल्याण करने वाला है। यह सम्पूर्ण गोपनीयों का भी राजा है, गोपनीय वस्तु को भी प्रत्यक्ष करने वाला है। यह प्रत्यक्ष फलवाला, साधन करने मै सुगम और अविनाशी है। इसका थोडा साधन आप को पार लगा जाये तो इसका कभी नाश नहीं होता वरन इसके प्रभाव से वह परमश्रेय तक पहुचं जाता है, किन्तु इसमें एक शर्त है। श्रद्धाविहीन पुरुष परमगति को न प्राप्त होकर संसार-चक्र में भटकता है।
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने योग के ऐश्वर्य पर भी प्रकाश डाला। दुःख के सयोग का वियोग ही योग है अथार्त जो संसार के संयोग वियोग से सर्वथा रहित है। उसका नाम योग है। परमतत्व परमात्मा के मिलने का नाम योग है परमात्मा की प्राप्ति ही योग की पराकाष्ठा है। जो इसमें प्रवेश पा गया, उस योगी के प्रभाव को देख कि सम्पूर्ण भूतो का स्वामी और जीवधारियों का पोषण करने वाला होने पर भी मेरा आत्मा उन भूतो में स्थित नहीं है। आत्मस्वरूप में स्थित हूँ। वही हूँ। जैसे आकाश से उत्पन सर्वत्र विचरने वाला वायु आकाश में ही स्थित है किन्तु उसे मलिन नहीं कर पाता उसी प्रकार सम्पूर्ण भुत मुझमें स्थित है लेकिन में उनमे लीन नहीं हूँ।
अर्जुन कल्प के अदि में मैं भूतो को विशेष प्रकार से रचता हूँ, सजाता हूँ और कल्प के पूर्तिकाल में सम्पूर्ण भुत मेरी प्रकर्ति को अथार्त योगरूढ़ महापुरुष की रहनी को, उनके अव्यक्त भाव को प्राप्त होते है। यद्यपि महापुरुष प्रकर्ति से परे है, किन्तु प्राप्ति के पश्चात स्वभाव अथार्त स्वयं में स्थित रहते हुये लोक संग्रह के लिये जो कार्य करता है वह उसकी एक रहनी है। इसी रहनी के कार्य कलाप को उस महापुरुष की प्रकर्ति कहकर संबोधित किया गया है।
एक रचयिता तो में हूँ, भूतो को कल्प के लिए प्रेरित करता हूँ और दूसरी रचयिता त्रिगुणमयी प्रकर्ति है, जो मेरे अध्याय से चाराचर सहित भूतो को रचती है। यह भी एक कल्प है। जिसमें शरीर परिवर्तन और काल परिवर्तन निहित है तुलसीदास भी यही कहते है
प्रकर्ति के दो भेद विधा और अविधा है। इनमें अविधा दुष्ट है, दुख रूप है जिससे विवश जीव भवकूप में पड़ा है, जिससे प्ररित होकर जीव काल, कर्म, स्वभाव और गूढ़ के घेरे में आ जाता है। दूसरी है विधामाया, जिसे श्रीकृष्ण कहते है की मैं रचता हूँ। गोस्वामी जी के अनुसार प्रभु रचते है।
यह जगत की रचना करती है, जिनके आश्रित गुण है। कल्याणकारी गुण एकमात्र ईश्वर में है प्रकर्ति में गुण है ही नहीं, वह तो नश्वर है लेकिन बिद्या में प्रभु ही प्ररक बनकर करते है।
इस प्रकार कल्प दो प्रकार के है। एक तो वस्तु का, शरीर और काल का परिवर्तन कल्प यह परिवर्तन प्रकर्ति ही मेरे आभास से करती है। किन्तु इसमें महान कल्प जो आत्मा को निर्मल स्वरूप प्रदान करता है, उसका शृंगार महापुरुष करते है। वे अचेत भूतो को सचेत करते है भजन का आदि हि इस कल्प का आरम्भ है और भजन की पराकाष्ठा कल्प का अन्त है। जब यह कल्प भवरोग से पूर्ण निरोग वनाकर शाश्वत ब्रह्म में प्रवेश ( स्थिति ) दिला देता है, प्रवेश काल में योगी मेरी रहनी और मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है। के पश्चात महापुरुष की रहनी ही उसकी प्रकर्ति है।
Shrimad Bhagavad Gita Chapter-08 (Part-08) in Hindi Podcast
जिससे जीव माया के आधिपत्य से निकल कर आत्मा के आधिपत्य में होजाता है वही अध्यात्म है। और भूतो के वह भाव जो शुभ अथवा अशुभ संस्कारो को उत्पन करते है। उन भावो का रुक जाना विसर्ग – मिट जाना ही कर्म की सम्पूर्णता है। इसके आगे कर्म करने कि आवश्यकता नहीं रह जाती। अत: कर्म कोई ऐसी वस्तु है, जो संस्कारो के उद्गम को ही मिटा देता है।
इसी प्रकार क्षरभाव अधिभूत है अथार्त नष्ट होने वाले ही भूतो को उत्पन करने मे माध्यम है। वे ही भूतो के अधिष्ठाता है। परमपुरष ही अधिदैव है। उसमें देव्य सम्पद विलीन होती है इस शरीर में अधियज्ञ मैं ही हूँ अथार्त जिसमे यज्ञ विलय होते है वह मैं हूँ यज्ञ का अधिष्ठाता हूँ। वह मेरे स्वरूप को ही प्राप्त होता है अथार्त श्रीकृष्ण एक योगी थे। अधियज्ञ कोई ऐसा पुरुष है जो इस शरीरि में रहता है बाहर नहीं। अन्तिम प्रश्न समय में आप किस प्रकार जानने में आते है? उन्होंने वताया की जो मेरा निरंतर स्मरण करते है, मेरे सिवाय किसी दुसरे विषय-वस्तु का चिन्तन नहीं आने देते और ऐसा करते हुए शरीर का सम्बन्ध त्याग देते है वे मेरे साक्षात् स्वरूप को प्राप्त होते है जिसे अन्त में वहीं प्राप्त रहता है। शरीर की मृत्यु के साथ यह उपलव्धि होती हो ऐसी बात नहीं है। मरने पर ही मिलता तो श्रीकृष्ण पूर्ण न होते, अनेको जन्मो में चलकर पानेवाला ज्ञानी उनका स्वरूप न होता। मन का सर्वथा निरोध और निरुद्ध मन का भी विलय ही अन्तकाल है, जहाँ फिर शरीर की उत्पति का माध्यम शांत हो जाता है। उस समय वह परमभाव में प्रवेश पा जाता है। उसका पुनः जन्म नहीं होता।
इस प्राप्ति के लिए उन्होंने स्मरण का विधान वताया – अर्जुन! निरंतर मेरा स्मरण कर और युद्ध कर। दोनों एक साथ कैसे होंगे? कदाचित ऐसा हो कि जय गोपाल, हे कृष्णा कहते रहे, लाठी भी चालते रहे। स्मरण का स्वरूप स्पष्ट किया कि योग धारण में स्थिर रहते हुए, मेरे सिवाय अन्य किसी की वास्तु का स्मरण न करते हुए निरन्तर स्मरण कर जब स्मरण इतना सूक्ष्म है तो युद्ध कोन करेगा? मान लीजिये, यह पुस्तक भगवान है, तो अगल बगल की वस्तु, सामने बेठे हुये लोग या अन्य देखी सुनी कोई वस्तु संकल्प में भी ना आये, दिखाई न पड़े। यदि दिखाई पड़ती है तो स्मरण नहीं है। ऐसे स्मरण में युद्ध कैसा? वस्तुत: जब आप इस प्रकार निरंतर स्मरण में प्रवृत्त होंगे, तो उसी क्षण युद्ध का सही स्वरूप खड़ा होता है। उस समय मायिक प्रवार्तिया बाधा के रूप में प्रत्यक्ष ही है। काम, क्रोध, राग, द्वेष दुर्जय शत्रु है। ये शत्रु स्मरण करने नहीं देंगे। इनसे पार पाना ही युद्ध है इस शत्रुओं के मीट जाने पर ही व्यक्ति परमगति को प्राप्त होता है।
इस परम गति को पाने के लिए अर्जुन! तू जप तो ॐ का और ध्यान मेरा कर अथार्त श्रीकृष्ण एक योगी थे। नाम और रूप आराधना की कुंजी है।
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इस प्रश्न को भी लिया की पुनर्जन्म क्या है? उसमें कोन – कोन आते है? उन्होंने बताया की ब्रह्मा से लेकर यावन्मात्र जगत पुनरावर्ती है और इन सबके समाप्त होने पर भी मेरा परम अव्यक्त भाव तथा उसमें स्थिति समाप्त नहीं होती।
इस योग मैं प्रविष्ट पुरुष की दो गतिया है। जो पूर्ण प्रकाश को प्राप्त षडैश्वर्यसम्पन्न ऊर्ध्वरेता है, जिसमें लेस मात्र भी कमी नहीं है, वह परमगति को प्राप्त होता है। यदि उस योगकर्ता में लेशमात्र भी कमी है, कृष्णपक्ष-सी कालिमा का संचार है ऐसी अवस्था में शरीर का समय समाप्त होने वाले योगी को जन्म लेना पड़ता है वह समय जीव के तरह जन्म – मरण के चक्कर में नहीं फसता बल्कि जन्म लेकर उससे आगे की शेष साधना को पूरा करता है।
इस प्रकार आगे के जन्म में उसी क्रिया से चलकर वह भी वही पहुचं जाता है। जिसका नाम परमधाम है पहले भी श्रीकृष्ण कह आये है कि इसका थोडा भी साधन जन्म मरण के महान भय से उद्धार करके के छोड़ता है। दोनों रास्ते शाश्वत है, अमिट है, इस बात को समझकर कोई भी पुरुष योग से चलये मान नहीं होता। अर्जुन! तू योगी बन। योगी वेद, तप, यज्ञ और दान के पुण्यफलो का उल्लंघन कर जाता है, परमगति को प्राप्त होता है।
इस अध्याय में स्थान – स्थान पर परमगति का चित्रण किया गया है जिसे अव्यक्त अक्षय और अक्षर कहकर संबोधित किया गया, जिसका कभी क्षय अथवा विनाश नहीं होता।
अत: –
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में “अक्षर ब्रह्मयोग” नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
Shrimad Bhagavad Gita Chapter-07 (Part-07) in Hindi Podcast
इस सातवें अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया की – अनन्य भाव से मुझमें समर्पित होकर, मेरे आश्रित होकर जो योग में लगता है वह समग्र रूप से मुझे जनता है। मुझे जानने के लिये हजारो में कोई विरला ही प्रयत्न करने वालो में विरला ही कोई जानता है। वह मुझे पिण्ड रूप में एक देशीय नहीं वरन सर्वत्र वियाप्त दिखता है।
आठ भेदों वाली मेरी जड़ प्राकर्ति है और इसके अन्तराल में जीवरूप मेरी चेतन प्रकर्ति है। इन्ही दोनों के संयोग से पूरा जगत खड़ा है। तेज और बल से मेरे ही द्वारा राग और काम से रहित बल तथा कामना भी मैं ही हूँ। जैसा की सब कामनाये तो वर्जित है, लेकिन मेरी प्राप्ति के लिए कामना कर। ऐसी इच्छा का अभ्युदय होना मेरा ही प्रसाद है। केवल परमात्मा को पाने की कामना ही “धर्मानुकूल कामना” है।
श्रीकृष्ण ने बताया कि – मैं तीनो गुणों में अतीत हूँ। परम का स्पर्श करके परमभाव में स्थित हूँ, किन्तु भोगासक्त मूढ़ पुरुष सीधे मुझे न भजकर अन्य देवताओ की उपासना करते है, जबकि वहा देवता नाम का कोई है ही नहीं। पत्थर, पानी, पेड़ जिनको भी पूजना चाहते है, उसी मैं उनकी श्रद्धा को मैं ही पुष्ट करता हूँ। उसकी आढ़ खड़ा होकर मैं ही फल देता हूँ, क्योकि न वहा कोई देवता है, न ही किसी देवेता के पास कोई भोग ही है। लोग मुझे कोई साधारण व्यक्ति समझकर नहीं भजते, क्योकि मैं योग प्रक्रिया द्वारा ढाका हुआ हूँ। अनुष्ठान करते – करते योगमाया का आवरण पार करने वाले ही मुझ शारीरधरी को भी अव्यक्त रूप मैं जानते है, अन्य स्थितयो में नहीं।
मेरे भक्त चार प्रकार के है – अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी। चिन्तन करते – करते अनेक जन्मो के अन्तिम जन्म में प्राप्ति वाला ज्ञानी मेरा ही स्वरुप है अर्थात् अनेक जन्मो से चिन्तन करके उस भगवत्स्वरूप को प्राप्त किया जाता है। राग-द्वेष के मोह से आक्रान्त मनुष्य मुझे कदापि नहीं जान सकते, किन्तु राग-द्वेष मोह से रहित होकर जो नियतकर्म ( जिसे संक्षेप आराधना कह सकते है ) का चिन्तन करते हुये जरा-मरण से छुटने के लिए प्रयत्नशील है। वे पुरुष सम्पूर्ण रूप से मुझे जान लेते है। वे सम्पूर्ण ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को, सम्पूर्ण अधिभूत को, सम्पूर्ण अधिदैव को, सम्पूर्ण कर्म को और सम्पूर्ण यज्ञ के सहित मुझे जानते है अर्थात् फिर कभी वे विस्मृत नहीं होते।
इस अध्याय में परमात्मा की समग्र जानकारी का विवेचन है, अत: –
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में “समग्र जानकारी” नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
Shrimad Bhagavad Gita Chapter-06 (Part-06) in Hindi Podcast
इस अध्याय के आरम्भ मे योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि फल के आश्रय से रहित होकर जो “कार्यम् कर्म” अर्थात् करने योग्य प्रक्रिया-विशेष का आचरण करता है। वही सन्याशी है और उसी कर्म को करने वाला ही योगी है। केवल क्रियाओं अथवा अग्नि को त्यागनेवाला योगी अथवा सन्यासी नहीं होता। संकल्पों का त्याग किये बिना कोई भी पुरुष सन्याशी अथवा योगी नहीं होता। हम संकल्प नहीं करते – ऐसा कह देने मात्र से संकल्प पिंड नहीं छोड़ते। योग में आरूढ़ होने की इच्छावाले पुरुष को चाहिए कि ‘कार्यम् कर्म’। कर्म करते – करते योगआरूढ़ हो जाने पर ही सर्वसंकल्पों का अभाव होता है, इससे पूर्व नहीं। सर्वसंकल्पों का अभाव ही सन्यास है।
योगेश्वर ने पुनः बताया की आत्मा अधोगति में जाता है। और उसका उद्धार भी होता है जिस पुरुष द्वारा मनसहित इन्द्रिया जीत ली गई है उसका आत्मा उसके लिए मित्र बनकर मित्रता में बरतता है तथा परमकल्याण करने वाला होता है। जिसके द्वारा ये नहीं जीती गयी, उसके लिए उसी का आत्मा शत्रु बनकर शत्रुता में बरतता है, यातनाओं का कारण बनाता है। अत: मनुष्य को चाहिये की अपने आत्मा को अधोगति में न पहुँचावे, अपने द्वारा अपनी आत्मा का उद्धार करे।
उन्होंने प्राप्ति वाले योगी की रहनी बतायी। “यज्ञस्थली”, बैठने का आसन तथा बैठने के तरीके पर उन्होंने कहा की स्थान एकांत हो और स्वच्छ हो। वस्त्र, मृगचर्म अथवा कुश की चटाई में से कोई एक आसन हो। कर्म के अनुरूप चेष्टा, युक्ताहार-विहार, सोने – जागने के संयम पर उन्होंने बल दिया। योगी के निरुद्ध चित्त का भी विलय हो जाता है, उस समय वह योग की पराकाष्ठा अनन्त आनंद को प्राप्त होता है। संसार के संयोग वियोग से रहित अनन्त सुख का नाम योग है। योग का अर्थ है उससे मिलन। जो योगी इसमें प्रवेश पा जाता है, वह सम्पूर्ण भूतो में समदृष्टिवाला हो जाता है। जैसे अपनी आत्मा वैसे ही सबकी आत्मा को देकता है। वह परम पराकाष्ठा की शान्ति को प्राप्त होता है। अत: योग आवश्यक है, मन जहा जहा जाये वहां – वहां घसीटकर बारम्बार इसका निरोध करना चहिये। श्रीकृष्ण ने स्वीकार किया की मन बड़ी कठिनाई से वश मे होने वाला है, लेकिन होता है। यह अभ्यास और वैराग्य द्वारा वश में हो जाता है। शिथिल प्रयत्नवाला व्यक्ति भी अनेक जन्म के अभ्यास से वही पहुचं जाता है। जिसका नाम परमगति अथवा परमधाम है तपस्वियों, ज्ञानर्मािगयों तथा केवल र्किमयों से भी योगी श्रेष्ठ है, इसलिये अर्जुन! तू योगी बन। समर्पण के साथ अन्तर्मन से योग का आचरण कर। प्रस्तुत अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने प्रमुख रूप से योग की प्राप्ति के लिये अभ्यास पर बल दिया। अत:
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में “अभ्यासयोग” नामक छठाँ अध्याय पूर्ण होता है।
Shrimad Bhagavad Gita Chapter-05 (Part-05) in Hindi Podcast
इस अध्याय के आरम्भ में अर्जुन ने प्रश्न किया कि कभी तो आप निष्कर्म कर्मयोग की प्रशंसा करते है और कभी आप सन्यास मार्ग से कर्म करने की प्रशंसा करते है, अत: दोनों में एक को, जो आपने सुनिश्चित किया हो, परमकल्याणकारी हो, उसे कहिये। श्रीकृष्ण ने बताया – अर्जुन परमकल्याण तो दोनों में है। दोनों में वही निर्धारित यज्ञ की क्रिया ही की जाती है, फिर भी निष्काम कर्मयोग विशेष है। बिना इसे किये सन्यास ( (शुभाशुभ कर्मो का अंत ) नहीं होता। सन्यास मार्ग नहीं, मंजिल का नाम है। योगयुक्त ही सन्याशी योगयुक्त के लक्षण बताये की वही प्रभु है। वह न कुछ करता है, न कुछ करता है, बल्कि स्वभाव में प्रकृति के दबाव के अनुरूप लोग व्यस्त है। जो साक्षात् मुझे जान लेता है वही ज्ञाता है, वही पंडित है। यज्ञ के परिणाम में लोग मुझे जानते है। श्वास-प्रश्वास का जप और यज्ञ – तप जिसमें विलय होते है, मैं ही हूँ अर्थात् श्रीकृष्ण जैसा, महापुरुष – जैसा स्वरूप उस प्राप्ति वाले को भी मिलता है। वह भी ईश्वरों का ईश्वर, आत्मा का भी आत्मस्वरूपमय हो जाता है, उस परमात्मा के साथ एकीभाव पा लेता है। ( एक होने में जन्म चाहे जितने लगे। ) इस अध्याय मे स्पष्ट किया कि यज्ञ-तपो का भोक्ता, महापुरुषो के भी रहने वाली शक्ति महेश्वर है, अत:
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में “यज्ञभोक्ता महापुरुषस्थ महेश्वर” नामक पंचम अध्याय पूर्ण होता है।
Shrimad Bhagavad Gita Chapter-04 (Part-04) in Hindi Podcast
इस अध्याय के आरम्भ में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि इस योग को आरम्भ में मैने सूर्य के प्राप्ति कहा, सूर्य ने मनु से और मनु ने इक्ष्वाकु के प्रति कहा और उन से राजर्षियों ने जाना। मैंने अथवा अव्यक्त स्थितिवाले ने कहा। महापुरुष भी अव्यक्त स्वरूपवाला ही है। शरीर तो उसके रहने का मकान मात्र है। ऐसे महापुरुष की वाणी में परमात्मा ही पर्वह्वित होता है। ऐसे किसी महापुरुष से योग सूर्य द्वारा संचारित होता है। उस परम प्रकाश रूप का प्रसार सूरा के अन्तराल में होता है इसलिये सूर्य के प्रति कहा है। श्वास में संचारित होकर वे संस्काररूप में आ गये। सूरा में संचित रहने पर, समय आने पर वही मन में संकल्प बनकर आ जाता है। उसकी महत्ता समझने पर मन में उस वाक्य के प्रति इच्छा जाग्रत होती है और योग कार्य रूप ले लेता है। क्रमश: उत्थान करते करते यह योग ऋद्धियों-सिद्धियों की राजर्षित्व श्रेणी तक पहुचने पर नष्ट होने की स्थिति में पहुच जाता है, किन्तु जो प्रिय भक्त है, अनन्य सखा है उसे महापुरुष ही सभाल लेते है।
अर्जुन के प्रश्न करने पर कि आप का जन्म तो अब हुआ है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया अव्यक्त, अविनाशी, अजन्मा और सम्पूर्ण भूतो में प्रवाहित होने पर भी आत्ममाया, योग-प्रक्रिया द्वारा अपनी त्रिगुणमयी प्रकति को वश में करके मैं प्रकट होता हूँ। प्रकट हो के करते क्या है? साध्य वस्तुओ को परित्राण देने तथा जिनसे दूषित उत्पन्न होते है। उनका विनाश करने के लिये, परमधर्म परमात्मा को स्थिर करने के लिये मैं आरम्भ से पूर्तिपर्यन्त पैदा होता है। मेरा वह जन्म और कर्म दिव्य है। उसे केवल तत्वदर्शी ही जान पाते है। भगवान का आविर्भाव तो कलियुग की अवस्था से ही हो जाता है, यदि सच्ची लगन हो, किन्तु आरंभिक साधक समझ ही नहीं पाता कि भगवान बोल रहे है या योही संकेत मिल रहे है। आकाश से कोन बोलता है? महाराज जी बताते थे कि जब भगवान कृपा करते है, आत्मा से रथी हो जाते है तो खम्बे से, वृक्ष से, पत्ते से, शून्य से हर स्थना से बोलते और सँभालते है। उत्थान होते – होते जब परमतत्व परमात्मा विदित हो जाये, तभी स्पर्श के साथ ही वह स्पष्ट समझ पाता है। इसलिये अर्जुन! मेरे उस स्वरुप को तत्त्वदर्शियों ने देखा और मुझे जानकर वे तत्क्षण मुझमें ही प्रविष्ट हो जाते है, जहा से पुन: आवागमन में नहीं आते।
इस प्रकार उन्होंने भगवान के आविर्भाव की विधि को बताया कि वह किसी अनुरागी के ह्रदय में होता है, बाहर कदापि नहीं। श्रीकृष्ण ने बताया मुझे कर्म नहीं बाँधते और इस स्तर से जो जानता है, उसे भी कर्म नहीं बाँधते। यही समझकर मुमुक्षु पुरुषो ने कर्म का आरम्भ किया था कि उस स्तर से जानने वाला वह पुरुष, और जान लेने पर वैसा ही वह मुमुक्षु अर्जुन। यह उपलब्धि निश्चित है, यदि यज्ञ किया जाय। यज्ञ का स्वरूप बताया। यज्ञ का परिणाम परमतत्व परमशांति बताया। इस ज्ञान को पाया कहा जाये? इस पर किसी तत्वदर्शी के पास जाने और उन्ही विधियों से पेश आने को कहा, जिससे में महापुरुष अनुकुल हो जायं।
योगेश्वर ने स्पष्ट किया वह ज्ञान तू आचरण करके पायेगा, दुसरे के आचरण से तुझे नहीं मिलेगा। वह भी योग की सिद्धि के काल में प्राप्त होगा, प्रारम्भ में नहीं। वह ज्ञान (साक्षात्कार) हृदय-देश मैं होगा, बाहर नहीं। श्रद्धालु, तत्पर, संयतेन्द्रिय एवं संशयरहित पुरष से ही प्राप्त करता है। अत: ह्रदय में स्थित अपने संशय को वैराग्य की तलवार से काट। यह ह्रदय देश की लडाई है। बाह्य युद्ध से गीतोक्त युद्ध का कोई पर्योजन नहीं है।
इस अध्याय योगेश्वर श्रीकृष्ण ने मुख्य रूप से यज्ञ का स्वरूप स्पष्ट किया। और बताया की यज्ञ जिससे पूरा होता है, उसे करने (कार्य-प्रणाली) का नाम कर्म है। कर्म को भली प्रकार इसी अध्याय में स्पष्ट किया। अत:
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में “यज्ञकर्म स्पष्टीकरण” नामक चौथा अध्याय पूर्ण होता है।
From the publisher's feed

1,182 Listeners

1,856 Listeners

24 Listeners

6 Listeners