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स्वस्थ शरीर में स्वच्छ मन का निवास होता है और हमारा स्वास्थ्य हमारे पर्यावरण पर निर्भर करता है। विकास की अन्धी दौड़ में हमने अपने परिवेश का न केवल दोहन किया है अपितु इसे प्रदूषित करके अपने ही पैर पर कुठाराघात कर लिया है। प्रदूषण की विभीषिका और समस्या के समाधान पर सुनते हैं हमारी कविता " पर्यावरण "।
परंपरा और आधुनिकता प्रत्येक समाज की पहचान है। समय के साथ हर किरदार में परिवर्तन हो रहा है। वर्तमान समय में ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे सदियों की परम्पराओं को छोड़कर भारतीय नारी, पुरुष से समानता के लिए तथाकथित देवी स्वरूप को छोड़कर सामान्य नारी ही बने रहना चाहती है। आधुनिक नारी यही चाहती है कि पति और पत्नी दोनों को समान अधिकार प्राप्त हो।
सत्ता राजनीति के दलदल का कमल है। सार्वजनिक जीवन में व्यक्ति सेवा के माध्यम से सत्ता तक पहुँचता है। विचारधारा और सिद्धांत राजनीतिज्ञ का दाहिना और बाँया हाथ हुआ करता था लेकिन वर्तमान समय में ऐसा प्रतीत होता है जैसे उसके दोनों हाथ कट चुके हैं। सेवा के नाम पर सत्ता के लिए दलबदल आम बात हो गई है। आइए सुनिये दलबदल पर हमारी कविता "दलबदलू "।
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