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संसार सागर में समय की सापेक्षता सबके साथ सन्निहित है। स्वयं में निरपेक्ष होते हुए भी वह शाश्वत सापेक्ष है। अगर हम यह मान लें कि वक्त ही जगत में हमें लाया है और कालांतर में वही लेकर जायेगा तो इस कबूतर की तरह हम भी दुनियाभर के झंझावातों से भयमुक्त हो जायेंगे। क्या स्थूल वस्तुओं के साथ हम निरपेक्ष रह सकते हैं। आइए निरपेक्षता के पाठ को पढ़ते हैं इस कबूतर के जोड़े से।
एक बार फिर चुनाव का मौसम आने वाला है। सत्ता की चाहत रखने वाले नेतागण अपनी बाजीगरी दिखाने लगे हैं। उनके गठजोड़ पर गाँव के चौराहों पर
चर्चाओं का बाजार गरम है। आइए इस गर्मागर्म माहौल में अपना हाथ सेंकते हैं हमारी कविता "चौराहे पर राजनीतिक चर्चा" से।
राजनीति का अर्थ है सत्ता के लिए संघर्ष। येन केन प्रकारेण सत्ता मिलनी चाहिए। सत्ता मिल जाने के बाद तो कुर्सी बचाने के लिए संघर्ष होता है। राज्य की नीतियों का निष्पादन तो नौकरशाह करते हैं जो सैद्धांतिक रूप में राजनीति नहीं करते। व्यावहारिक रूप में राजनीति तो हम सभी कहीं न कहीं करते ही हैं। राजनीतिज्ञों के आपसी सम्बन्धों की व्यंगात्मक प्रस्तुति है हमारी नयी कविता " सत्ता का खेल "।
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