NL Charcha

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  • एनएल चर्चा 74: तबरेज़ अंसारी की लिंचिंग, संसद का पहला सत्र, रिलीजन फ्रीडम रिपोर्ट और अन्य
    बीता हफ़्ता बहुत सारी बहसें लेकर आया. संसद का पहला सत्र शुरू हो चुका है और राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद प्रधानमंत्री सहित तमाम विपक्षी दलों के नेताओं ने अपनी अपनी-अपनी बात रखी. झारखंड में भीड़ की हिंसा यानी  मॉब लिंचिंग का मामला सामने आया, जिसमें भीड़ ने 24 वर्षीय युवक तबरेज़ अंसारी की हत्या कर दी. इसी से मिलती-जुलती एक घटना कोलकाता में हुई, जहां पर एक मुस्लिम युवक ने आरोप लगाया कि उसको 'जय श्री राम' का नारा लगाने के लिए कहा गया और चलती ट्रेन से उसे धक्का दे दिया गया. इसके अलावा नयी लोकसभा गठित होने के बाद, जो पहला बिल लोकसभा में पेश हुआ है वो ट्रिपल तलाक का बिल है. इसको लेकर विपक्ष ने विरोध किया है और सत्ता पक्ष ने इसका समर्थन किया है. उत्तर प्रदेश से एक ख़बर आयी है. लोकसभा चुनाव के ठीक बाद समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच का गठबंधन ख़त्म करने का ऐलान किया गया है. इसके अलावा अमेरिका की तरफ से 'रिलिजन फ्रीडम रिपोर्ट' पिछले हफ़्ते आयी, जिस पर भारत सरकार की तरफ से आपत्ति जतायी गयी है. इसके अलावा प्रधानमंत्री ने कांग्रेस पार्टी के ऊपर काफी कड़ा निशाना साधा. दूसरी तरफ, बलात्कार के मामले में जेल में सज़ा काट रहे गुरमीत राम रहीम को पैरोल देने का हरियाणा सरकार ने समर्थन किया. वहीं देश में गर्मी और हीटवेव की प्रचंड लहर चल रही है.चर्चा में इस बार शामिल हुए डाउन टू अर्थ  के कंसल्टिंग एडिटर जॉयजीत दास. साथ में न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन ने भी शिरकत की. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.अतुल ने बातचीत की शुरुआत करते हुए सवाल उठाया, ''झारखंड में 24 साल के तबरेज़ अंसारी पर भीड़ के द्वारा जय श्री राम, जय हनुमान कहने के लिए दबाव डाला गया और फिर उसकी पिटाई की गयी. उसके ऊपर आरोप था कि उसने कुछ चोरी की है. साल 2014 से जो चीज़ें चल रही थी या देखने को मिल रही थी, बात अब उससे कई गुना आगे बढ़ चुकी है. अब आरोप कुछ और होता है, शक कुछ और है. लेकिन धर्म भीड़ को इस बात के लिए प्रेरित कर रहा है कि जय श्री राम या दूसरे धर्म के नारे लगवाएं जायें और उसकी पिटाई की जाये. लगातार गिरावट दर्ज़ की जा रही है. क्या इससे भी बुरी स्थितियां हो सकती हैं आगे जा कर?"प्रतिक्रया में आनंद ने कहा कि, "सांप्रदायिक लीचिंग, जो धार्मिक लिंचिंग है, उससे पहले भीड़ के 'न्याय' की जो समस्या है, यहां उसका संदर्भ ज़्यादा है. यह कई रूप में भारत में देखा जाता है. उसमे कई चीज़ें जुड़ती हैं, जैसे पहचान, धर्म या कभी-कभी कोई जाति विशेष भी. पटना शहर की हाल की घटना है. कार से एक्सीडेंट हुआ और जिस व्यक्ति ने एक्सीडेंट किया था, उसको लोगों की भीड़ ने पत्थरों और लाठियों से मार दिया और दूसरा गंभीर रूप से घायल है. ऐसा क्यों हो रहा है और हो ये दशकों से हो रहा है. क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में लोगों की आस्था कम है या इसके नियमों के अनुपालन में सामूहिकता की मानसिकता नहीं है. तो जो इसका शिकार है वो कभी चोरी, कभी ड्राइविंग कभी किसी और चीज़ से संबंधित हो सकता है.  भीड़ का तैयार होना न्याय की समस्या है. पॉपुलर कल्चर है. जैसे सिनेमा में में जो अंत का सीन होता है, जिसमें भीड़ से किसी विलेन का ख़ात्मा कराया जाता है. वह ये नही बताते हैं कि जब भीड़ ख़ात्मा करती है तो वह शिकार हुए आदमी को अपमानित भी करती है. मैंने भीड़ की हिंसा में हुई दो मौते अपनी आंखों से देखी है. और दोनों में ये पाया है कि निरादर का भी फॉर्मूला होता है. भारत में हेट क्राइम को लेकर जो आंकड़े जुटाये जाते हैं, वो भी सिर्फ मीडिया रिपोर्ट के आधार पर होते हैं. हेट क्राइम को कैसे परिभाषित किया जाये, इसे भी मीडिया नैरेटिव में सोचना चाहिए.इस मसले के साथ-साथ बाक़ी विषयों पर भी चर्चा के दौरान विस्तार से बातचीत हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें.पत्रकारों की राय, क्या देखा, सुना या पढ़ा जाये:आनंद वर्धन :हॉट फ्लैट एंड क्राउडेड: व्हाई वी नीड अ ग्रीन रेवोल्यूशन (थॉमस फ्रीडमन)जॉयजीत दास:स्टेट ऑफ़ इंडियाज़ एन्वायरमेंट इन फिगर्स 2018: डाउन टू अर्थअतुल चौरसिया:आर्टिकल 15: अनुभव सिंहा

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  • एनएल चर्चा 73: बिहार में बच्चों की मौतें, संसद में धार्मिक नारे और अन्य
    बीता हफ़्ता बहुत सारी बहसें लेकर आया. बीते दिनों बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर जिले में एक्यूट इंसेफ़ेलाइटिस सिंड्रोम का प्रकोप देखने को मिला है, जिसमें लगभग 150 बच्चों की मौत हो चुकी है और 500 बच्चे अभी भी पीड़ित बताये जा रहे हैं. इस मुद्दे के साथ-साथ, मीडिया की रिपोर्टिंग को लेकर भी काफी बातचीत चलती रही. इसके अलावा इस बार जो जो नये सांसद चुन कर संसद आये, उनका शपथग्रहण समारोह हुआ. समारोह के दौरान संसद के भीतर धार्मिक नारे भी लगाये गये. इसके अतिरिक्त, बंगाल से शुरू हुई डॉक्टरों की राष्ट्रव्यापी हड़ताल थी अब खत्म हो गयी है. मुखर्जी नगर, दिल्ली के पुलिस थाने के पुलिसकर्मियों और एक ऑटो ड्राइवर के बीच लड़ाई हुई, जिसका वीडियो भी खूब वायरल हुआ. इसी हफ़्ते एनडीटीवी के मालिक प्रणव रॉय और राधिका रॉय के प्रमोटर को सेबी ने बंद कर दिया था, अब एनडीटीवी ने लीगल नोटिस भेजा है और जिसके बाद कोर्ट ने भी सेबी के फैसले पर स्टे लगा दिया है. इसके अलावा, नयी लोकसभा में ओम बिरला नये स्पीकर चुने गये हैं, जो कोटा राजस्थान के नये एमपी है. वहीं, अधीर रंजन चौधरी कांग्रेस पार्टी के लोकसभा में नेता होंगे, अगले पांच सालों तक. एक और घटना है जिसको लेकर हम बात करेंगे और वो है जे पी नड्डा अब बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष होंगे. हालांकि अगले कुछ समय के लिए अमित शाह ही अध्यक्ष बने रहेंगे, लेकिन नड्डा उनके साथ में काम करेंगे. इसके अलावा देश-दुनिया के तमाम अन्य मुद्दों पर भी चर्चा हुई.  चर्चा में इस बार शामिल हुए जनज्वार.कॉम के संपादक अजय प्रकाश. साथ में न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन ने भी शिरकत की. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.अतुल ने बातचीत की शुरुआत करते हुए आनंद से कहा कि, "बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर की घटना है, इंसेफ़ेलाइटिस सिंड्रोम से बच्चों की मौत हो रही है. जिस तरह से नेशनल मीडिया ने वहां जा कर कवरेज किया है उसकी शैली को लेकर विवाद तो हो ही रहा है, इसमें सरकार की अक्षमता भी सामने आयी है. इंसेफ़ेलाइटिस को लेकर एक बात कहीं जाती है कि इसको लेकर अभी कोई संपूर्ण इलाज़ या दवाई उपलब्ध नहीं है. साफ़ सफाई आदि जैसी चीज़ें भी इस बीमारी के प्रभाव को रोकने में अहम भूमिका अदा करती है. और ये माना जा रहा है कि चुनाव की जो पूरी प्रक्रिया रही इस साल, लोकसभा के जो चुनाव हुए, उस चक्कर में वहां का प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग था इतना उलझा रहा कि जो तमाम जागरूकता अभियान चलाया जाता था, वो इस बार नहीं हो पाये. नतीज़न इस बार बड़ी संख्या में बच्चों की मौत देखने को मिल रही है. आनंद आप इसकी क्या वजहें देखते हैं?"जवाब में आनंद ने कहा कि, "देखिये, बहुत लोग इसे इंसेफ़ेलाइटिस का मामला मानते भी नहीं है. जो मेडिकल विशेषज्ञ है वो इसे एसेंसिनिया नामक परिवार का मानते हैं, इसे जमैकन बुखार से भी जोड़ा कर देखा गया है. एक तरह से ये मेडिकल मिस्ट्री का केस हो गया है और किसी की ये स्पष्ट राय नहीं है कि इसका कारण क्या है. जिनके शरीर में ब्लड शुगर निचला लेवल है, ख़ासकर कुपोषित बच्चों में जो बिना कुछ खाये-पिये सोये भी नहीं हैं, और सुबह-सुबह बागवानी से सुबह के चार बजे लीची को तोड़ते हैं, खाते हैं और फिर सो जाते हैं. जो बच्चा रात भर तक कुछ नहीं खाया है और सुबह-सुबह सिर्फ लीची खाता है. तो उसमें इसका प्रभाव ज्यादा होता है. तो ये खाली पेट रहने वालों और उसमें भी कुपोषित रहने वालों में अधिकतर पाया जा रहा. जिन बच्चों का पोषण अच्छा था उनमें इसका असर नहीं पाया गया है. तो इस तरह की कई चीज़ें हैं, जो जटिल हैं, जिन पर मेरा बोलना ठीक भी नहीं होगा क्योंकि मैं विशेषज्ञ नहीं हूं. जब पहली बार 2012 में इस संकट का भयावह रूप से सामने आया तो उस समय मौतें अभी से ज़्यादा हुई थी. उस समय मौत का आकड़ा 156 था. जब आधिकारिक स्वीकृति ये थी तो मौतें ज़्यादा हो सकती हैं. इस साल अभी ये मुज़फ़्फ़रपुर, समस्तीपुर, हाजीपुर और बेगूसराय तक सीमित है. 2012 में मगध, गया और राजधानी पटना के कुछ इलाकों तक और सीतामढ़ी तक भी आ गया था. तो उस समय ज़्यादा भयावह स्तिथि थी. लेकिन उस समय राष्ट्रीय मीडिया ने इस मुद्दे को काफी देरी से लिया. इस बार ये अच्छा बदलाव है. लेकिन अब हुआ ये है कि कुछ ज़्यादा ही हो रहा है कवरेज के नाम पर. पिछली बार क्यों मीडिया इतना चूक गया था. ये शायद मीडिया समाजशास्त्र या मीडिया के छात्रों के लिए अच्छा शोध का विषय है कि ऐसा क्यों हुआ."इस मसले के साथ-साथ बाक़ी विषयों पर भी चर्चा के दौरान विस्तार से बातचीत हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें.

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  • एनएल चर्चा 72: पत्रकारों की गिरफ़्तारी, कठुआ रेप केस में आया फैसला और अन्य
    बीता हफ़्ता विशेष रूप से पत्रकारों के लिए मुश्किल रहा. इस दौरान पत्रकारों के ऊपर असंवैधानिक रूप से हमले किये गये, उत्तर-प्रदेश और बिहार के स्थानीय पत्रकारों पर कानूनी कार्रवाई की गयी. इसी बीच स्वतंत्र पत्रकार प्रशांत जगदीश कनौजिया को यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से जुड़े एक ट्वीट के लिए गिरफ़्तार कर लिया गया. बाद में इसको लेकर काफी हंगामा हुआ और आगे जाकर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में प्रशांत को जमानत दे दी. पत्रकार से जुड़ा एक और मामला यूपी के शामली से है, जहां पर न्यूज़ 24 चैनल के पत्रकार अमित शर्मा के साथ मारपीट की गयी. साल 2018 में हुए कठुआ बलात्कार मामले में भी निर्णय आ गया है, जिसमें कोर्ट ने 6 अभियुक्तों को दोषी करार दिया है और 1 अभियुक्त को बरी कर दिया है. हाल में अलीगढ़ में एक बच्ची के हत्या की घटना हुई है, पिछली एनडीए सरकार में आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने एक लेख लिख कर जीडीपी के आंकड़ों की वैधता के ऊपर सवाल खड़े किये हैं. इसके अलावा देश-दुनिया के तमाम अन्य मुद्दों पर भी चर्चा हुई.चर्चा में इस बार शामिल हुईं वरिष्ठ पत्रकार व एनडीटीवी की कंसल्टिंग एडिटर नग़मा सहर. साथ में न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन ने भी शिरकत की. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.अतुल ने बातचीत की शुरुआत करते हुए कहा कि, "कठुआ का मामला जब पिछले साल हमारे सामने आया था तो उस दौरान कई सारी बातें हुई, जिसमें हमने देखा कि जो भारतीय जनता पार्टी के नेता थे उन्होंने अभियुक्तों के समर्थन में रैली निकाली और मांग की थी कि उन्हें छोड़ा जाये. इसके अलावा जम्मू बार एसोसिएशन के भाजपा समर्थक वकीलों ने ऐसी अराजकता पैदा की थी कि पुलिस को अपनी चार्जशीट दाखिल करने में भी दिक्कत हुई थी और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले की सुनवाई को पठानकोट की ट्रायल कोर्ट में शिफ्ट किया, जिसके बाद ये फैसला आया."कठुआ मामले में आये फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए आनंद ने कहा - ''देखिये, मै इस तरह के मामले को अपराध के तौर पर देखता हूं और जिसकी एक प्रक्रिया है और वह निचली अदालत में न्यायिक निष्कर्ष पर पहुंची है. इसको उसी तरह देखना चाहिए. यह इतना बड़ा देश है, यहां रोज़ हज़ारों घटनाएं होती रहती हैं. लेकिन कठुआ के अलग होने के कई कारण हैं, एक तो वह जिसकी ओर आपने संकेत दिया और एक घटना जो दरिंदगी थी, इसके कारण और जो नेशनल मीडिया में नेरिटिव बना, उससे मामला राष्ट्रीय सुर्खियों में रहा. लेकिन भारत को अभी ऐसी कई घटनाओं पर संवेदनशील होने की ज़रूरत है. और जहां तक पार्टियों की बात है, एक वर्ग है जिसे लगा कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को इसकी जांच करनी चाहिए क्योंकि किसी एक समुदाय को निशाना बनाया गया. इस केस को किसी दूसरी तरह से रखा जा सकता था."इस मसले के साथ-साथ बाक़ी विषयों पर भी चर्चा के दौरान विस्तार से बातचीत हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें.

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    56 min
  • एनएल चर्चा 71: स्मृति ईरानी का अर्थी को कंधा देना, नवीन पटनायक पांचवी बार बने सीएम और अन्य
    इस हफ़्ते की चर्चा हालिया राजनीतिक उठापटक पर केंद्रित रही. पिछले दिनों एक फोटो मीडिया में आयी, जिसमें स्मृति ईरानी कंधे पर अर्थी उठाते हुए देखी गयी थी. उन्होंने अमेठी के बीजेपी कार्यकर्ता की अर्थी उठायी थी. 23 मई के नतीजों के आने के बाद देश के कई हिस्सों में हेट क्राइम की वारदातें हुईं. बिहार के बेगूसराय से लेकर दिल्ली के कनॉट प्लेस तक ऐसी घटनाएं सुनने को मिलीं. दूसरी तरफ़, चुनावी नतीजों के बाद कांग्रेस पार्टी में काफी उथल-पुथल मची हुई है. कहा जा  रहा है कि राहुल गांधी अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देने के लिए अड़े हुए हैं, जबकि पार्टी के लोग उन्हें मना रहे है. इसके अलावा, इस बार के नतीजों में सबसे महत्वपूर्ण नतीजा ओडिशा से देखने में आया. नवीन पटनायक पांचवी बार मुख्यमंत्री बनने में सफल हुए हैं.चर्चा में इस बार वरिष्ठ लेखक-पत्रकार अनिल यादव ने शिरकत की. साथ में पब्लिक पॉलिसी के एक्सपर्ट और न्यूज़लॉन्ड्री में ही कार्यरत पत्रकार एस मेघनाद भी चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.अतुल ने बातचीत शुरू करते हुए सवाल उठाया, अमेठी में सुरेंदर सिंह, जो भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता थे, उनकी नतीजे के एक दिन बाद ही हत्या हो गयी और स्मृति ईरानी वहां पहुंची और उनकी अर्थी को कंधे पर ले कर चली तो तमाम लोगों ने उनकी आलोचना भी की कि ईरानी ने लोगों के बीच में वाहवाही लूटने के लिए ऐसा किया था. महिलाओं का अंतिम संस्कार में शामिल होना हिंदू समाज में खासकर उत्तर भारत के समाज में निषेध माना जाता है उनको शमशान में जाने की इजाज़त नहीं दी जाती है. साथ ही महिलाओं को अर्थी को कंधा देने की भी मनाही है. तो उस लिहाज़ से ये फोटो काफी विचलित करने वाली भी है?

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    1 hr 3 min
  • एनएल चर्चा 70: मीडिया की आज़ादी और लोकसभा चुनाव के नतीजे
    इस हफ़्ते की चर्चा विशेष थी. बीते गुरुवार लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे आये और अकेले बीजेपी ने देश में 303 सीटें हासिल कर लीं. वहीं कांग्रेस केवल 52 सीट ही जीत सकी. इस बार की चर्चा के केंद्र में मीडिया की आज़ादी की ज़रूरत और लोकसभा चुनाव के नतीजे रहे.चर्चा में इस बार शामिल हुए वरिष्ठ पत्रकार व लेखक उर्मिलेश उर्मिल, लेखक-साहित्यकार अनिल यादव. साथ में न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन ने भी शिरकत की. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.अतुल ने बातचीत की शुरुआत करते हुए सवाल उठाया कि मीडिया और पत्रकारों के ऊपर दवाब कई तरह के दबाव डाले जाते हैं. विज्ञापन वाले मॉडल में सरकारों तथा कॉर्पोरेट के ऊपर निर्भरता आ जाती है. इससे बचने के लिए सब्सक्रिप्शन का मॉडल, जिसका उपयोग न्यूज़लॉन्ड्री भी करता है, कितना बड़ा विकल्प है? इसके अलावा क्या कोई और भी विकल्प हैं, जिससे इन तमाम दबावों से बचा जा सके?जवाब में उर्मिलेशजी ने कहा- "देखिये, ये काफ़ी जटिल प्रश्न है कि भारत मे आज़ाद मीडिया के लिए क्या रेवेन्यू मॉडल हो, उसका तंत्र किस तरह खड़ा किया जाये. इस समय देश में जिस तरह के जर्नलिस्ट हैं, बेहतर जर्नलिज़्म की चाह रखने वाले लोग इस मसले पर बहस करते रहते हैं. लेकिन जो सबसे बुनियादी बात मुझे लगती है, वह यह है कि हम आज़ाद मीडिया तो तभी बना सकते हैं. जब देश में जनतंत्र भी मज़बूत हो. मीडिया की जनतांत्रिकता, मीडिया की स्वतंत्रता, लोकतंत्र के बगैर मुश्किल है. आप देखिये, दुनिया के 180 मुल्कों का एक इंडेक्स जारी होता है. उस इंडेक्स को आप उठा कर देखिये, हर साल का आप पायेंगे कि जो सबसे ऊपर के 10 देश हैं, वो यूरोप के वो देश हैं जिन्हें पूंजीवादी जनतंत्र कहा जाता था. इन देशों में अमेरिका काफ़ी नीचे आता है. लेकिन जो तथाकथित समाजवादी जनतंत्र है, वहां की मीडिया के हालत आप देख लीजिये. आप वेनज़ुएला और रूस का हाल देख लीजिये, जो समाजवादी देश रहे हैं."इसी कड़ी में अतुल ने कहा कि "यह ठीक बात है कि अगर डेमोक्रेसी मज़बूत होगी, तो डेमोक्रेटिक मॉडल में कुछ ऐसी चीज़े लायी जायें जिससे मीडिया मज़बूत हो. ये तो एक पक्ष है. लेकिन रेवेन्यू के लिए कॉरपोरेट और सरकारी विज्ञापन के ऊपर जो निर्भरता है, क्या उसका कोई विकल्प है, क्योंकि वैसे तो पाठक के लिए न्यूज़ भी एक प्रोडक्ट है, जिसका वो कोई भुगतान नहीं कर रहा है. वह कैसे पता लगाये कि न्यूज़ कितनी सही होगी और कितने साफ़ तरीके से आ रही है. इस बात को मैं समझना चाह रहा हूं कि सब्सक्रिप्शन के अलावा और कोई मॉडल क्यों नहीं है रेवेन्यू के लिए?”जवाब में अनिल यादव ने कहा, “हम लोग थोड़ा जटिल दौर में आ गये हैं. रेवेन्यू जिन स्रोतों से आता है, उनका दबाव मीडिया के ऊपर होगा और जो खबरें आप दिखायेंगे वो प्रभावित होंगी. बात अब आगे बढ़ गयी है. आजकल मीडिया हॉउस सत्ता के साथ या जनविरोधी ताकतों के साथ मिल गया है. साथ होने के कारण वो पॉवरप्लेयर की भूमिका में आ गया है. तो दोनों फ्रंट पर सोचना पड़ेगा कि आप अगर सही रेवेन्यू मॉडल खोज भी लें, तो उस मॉडल के तहत आप लोगो को बतायेंगे क्या. पुराने समय वाला निष्पक्ष और चीजों से दूरी बनाकर रखने वाला मीडिया अब नहीं चलेगा. मुझे लगता है कि मॉडल एक ही है. आपका जो सब्सक्राइबर है और पाठक है, अगर वह जागरूक होता है तो सारी चीज़ों में भागीदारी करता है, जिससे सारी लोकतांत्रिक संस्थाएं बचती हैं. उसी तरह से जिस दिन से वो मीडिया को रेवेन्यू देने के लिए भागीदार करेगा और उस पर निगरानी रखने में भी भागीदार होगा, तो मुझे लगता है उस समय मज़बूत मीडिया हमें देखने को मिलेगा. इसके साथ-साथ लोकसभा चुनाव के नतीजों पर विस्तार से बातचीत हुई. पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें.

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    1 hr 4 min
  • एनएल चर्चा 69: साध्वी प्रज्ञा का विवादित बयान, बंगाल में चुनावी हिंसा, खान मार्किट गैंग और अन्य
    इस हफ़्ते की चर्चा ऐसे वक़्त में आयोजित हुई जब राजनीति के गलियारों से लेकर पान की दुकानों तक संभावित चुनावी परिणामों की ही चर्चा हो रही है. इस बीच साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने एक विवादित बयान दिया, जिसमें उन्होंने गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को देशभक्त बता दिया. ये मामला काफ़ी विवादों में आ गया और यहां तक कि पीएम मोदी को भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया देनी पड़ी. पश्चिम बंगाल में इस पूरे हफ़्ते अमित शाह के रोड शो और उसमें हुई हिंसा के बाद बवाल खड़ा हुआ, जब ईश्वरचंद्र विद्यासागर की प्रतिमा गिरा दी गयी. वहां की स्थितियों को देखते हुए चुनाव आयोग ने 1 दिन पहले ही चुनाव प्रचार को रोकने का आदेश दे दिया. इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल की भारतीय जनता पार्टी की कार्यकर्ता प्रिंयका शर्मा को कंडीशनल बेल दी, जिन्हें ममता बनर्जी की एक फोटोशॉप्ड इमेंज शेयर करने की वजह से गिरफ्तार कर लिया गया था. इसी बीच कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर ने मोदी के ऊपर की गयी ‘नीच’ की टिप्पणी को एक लेख के द्वारा जारी रखा, साथ ही सैम पित्रोदा ने 84 सिंख दंगों पर ‘जो हुआ सो हुआ’ बोल कर कांग्रेस की परेशानी भी बढ़ा दी, जिसके बाद राहुल गांधी को इसके लिए सफाई देनी पड़ी. दूसरी ओर नरेंद्र मोदी ने इंडियन एक्सप्रेस में दिये साक्षात्कार में कहा कि मेरी छवि को किसी खान मार्किट की गैंग ने नहीं बनाया, बल्कि 45 साल की तपस्या से मैं यहां पहुंचा हूं. इसलिए इसे कोई खान मार्किट गैंग ख़त्म नहीं कर सकता. इसके अलावा, ईरान-भारत संबंधों, आने वाले मानसून और संभावित सरकार को भी चर्चा के विषयों में शामिल किया गया. चर्चा में इस बार तेज़-तर्रार युवा पत्रकार राहुल कोटियाल और अमित भारद्वाज शामिल हुए. साथ में वरिष्ठ लेखक-पत्रकार अनिल यादव ने चर्चा में शिरकत की. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. अतुल ने बातचीत शुरू करते हुए सवाल उठाया, साध्वी प्रज्ञा की जो राजनीति है, और जिस तरह की विचारधारा से वह आती हैं, उसमें गांधी और आज़ादी की लड़ाई से जुड़े अन्य नेताओं के प्रति घृणा का भाव दिखता है. जब ऐसा कोई बयान आया हो तो उसमें कोई आश्चर्यचकित होने वाली बात दिखती है?जवाब में अनिल ने कहा- “देखिये, इसमें मुझे कोई आश्चर्यचकित होने वाली बात नहीं दिखती, लेकिन इस बयान के बाद उस बड़ी विडंबना की ओर इशारा मिलता है, जिससे आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी को अपने जन्मकाल से ही दो-चार होना पड़ता है. आप अगर देखेंगे तो पायेंगे कि आरएसएस ऐसे मौकों पर अपने आप को एक बड़ी विचित्र स्थिति में पाता है. उसके पास ऐसे बहुत से नायक हैं, जो उसने उधार के लिए हुए हैं और वह उनके बारे में बता भी नहीं सकता और उनको इग्नोर भी नहीं कर सकता. मिसाल के तौर पर आप देखिये, जैसे वह कहता है कि गांधी से वह प्रेरणा लेता है और उनकी विचारधारा का हामी है. अंबेडकर को आरएसएस की फोटो गैलरी में जगह मिली हुई है. भगत सिंह ने तो शुरू से आरएसएस की विचारधारा का विरोध किया और गांधी को तो अपनी जान देनी, लेकिन ऐसी क्या मजबूरी है जो आरआरएस इनकी फोटो लगाता है, इनको अपना आदर्श बताता है. इसी के साथ एक और बात गौर करने की है, आरएसएस ने 15 अगस्त 1947 को आज़ादी के दिन अपने नागपुर मुख्यालय में तिरंगा झंडा नहीं फहराया, भगवा झंडा फहराया. उस समय के सर संघसचालक ने कहा था कि हम तिरंगे को नहीं मानते, अंखड भारत के लिए तो भगवा ध्वज ही है. फिर संविधान लागू हुआ तो इनको उससे भी दिक्कत थी, क्योंकि वे मानते थे कि जो हिंदुओं के रीति-रिवाज़ हैं, उसका संविधान विरोध करता है. तो एक तरफ तिरंगे और संविधान का विरोध और दूसरी तरफ अपने आप को राष्ट्रवादी कहना ये एक बड़ा विरोधाभास है. वहीं दूसरी तरफ, आज़ादी से निकले हुए नेताओं को अपना प्रेरणादायक बताना और उनके हत्यारे को देशभक्त बताना, स्पष्ट करता है कि आरएसएस ने इन लोगों को, संविधान को, झंडे को कभी दिल से स्वीकार नहीं किया.” इसी कड़ी में अतुल ने कहा कि “आज की पीढ़ी में तमाम ऐसे लोग हैं जो इस तरह की बातों में भरोसा रखते हैं और गांधी की हत्या को जायज़ ठहराने का काम तथा नाथूराम को महान बनाने का काम करते हैं. जब कोई बात शुरू होती है तो वह रुकती नहीं.इस मसले के साथ-साथ बाक़ी विषयों पर भी चर्चा के दौरान विस्तार से बातचीत हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें.

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    1 hr
  • एनएल चर्चा 68: क्षेत्रवाद की राजनीति के आरोप पर तिलमिलाए मनीष सिसोदिया
    इस बार हमने चर्चा का स्वरूप थोड़ा बदल दिया है. आमतौर पर स्टूडियोमें पत्रकारों के बीच कई विषयों पर होने वाली चर्चा इस बार नहीं हुई.चुनाव का मौसम है. दिल्ली का लोकसभा चुनाव छठवें चरण में 12 मईको हो रहा है. लिहाजा हमने इस बार चर्चा को चुनाव के मैदान से करनेका तय किया. और हम पहुंचे दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया केपास. ‘आप’ के चुनावी घोषणापत्र के दावे, दिल्ली सरकार की नीतियों औरचुनावी अभियान के संबंध में मनीष सिसोदिया के साथ हमारी लंबी चर्चाहुई.देखा जाय तो दिल्ली के इस लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी काबहुत कुछ दांव पर लगा है. पार्टी सिर्फ दिल्ली, हरियाणा और पंजाब कीकुछ सीटों पर चुनाव लड़ रही है. ऐसे में चुनाव के नतीजे उसकी भविष्यकी योजनाओं पर दूरगामी असर पैदा करने वाले होंगे.आम आदमी पार्टी का मुख्य चुनावी अभियान इस बार दिल्ली को पूर्णराज्य का दर्जा दिलवाना है. दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा एक ऐसी गेंदहै जिसे समय-समय पर अलग-अलग पार्टियां अपनी सुविधा के हिसाब सेउछालती और लपकती रही हैं. दिल्ली देश की राजधानी है लिहाजा इसकेपूर्ण राज्य की राह में कई तरह की जटिलताएं हैं. आप की मौजूदा स्थितिको देखते हुए दिल्ली को पूर्ण राज्य की मांग निकट भविष्य में भी पूरीहोने की संभावना नगण्य है. 30 के आस-पास लोकसभा सीटों पर लड़ रहीआप का मुख्य चुनाव अभियान एक काल्पनिक परिस्थिति पर निर्भर है.पार्टी का मानना है कि आगामी सरकार गैर भाजपा गठबंधन की सरकारहोगी. और उसके पास अगर दिल्ली की सात सीटें होती हैं तो वह पूर्णराज्य के बदले में अगली बनने वाली सरकार को समर्थन देगी. देखनाहोगा कि यह काल्पनिक स्थिति चुनाव बाद कितना साकार रूप लेती है.पार्टी के भविष्य के सवाल को इस लिहाज से भी देखा जा सकता है किनामांकन की तारीख से एक दिन पहले तक वह कांग्रेस पार्टी के साथगठबंधन की प्रक्रिया में थी. इससे एक सहज अटकल को बल मिलता हैकि जिस पार्टी को दिल्ली की जनता ने विधानसभा में 67 सीटें दी, उसआम आदमी पार्टी में आज दिल्ली में अकेले चुनाव लड़ पाने काआत्मविश्वास क्यों नहीं है.पार्टी के घोषणापत्र में कहा गया है कि आगामी सरकार बनने के बाद वहदिल्ली विश्वविद्यालय और तमाम दूसरे शिक्षण संस्थानों में 85 फीसदीसीटें दिल्ली के लोगों के लिए आरक्षित करेगी. एक पार्टी जो राष्ट्रीय स्तरपर एक बड़ा भरोसा, बड़े आंदोलन से शुरू हुई थी वह चुनाव से ठीक पहलेकिसी क्षेत्रीय दल की भाषा में बात कर रही है, क्षेत्रीय अस्मिता कोउभारने की कोशिश कर रही है.मनीष सिसोदिया ने इन तमाम सवालों पर विस्तार से अपना और पार्टीका पक्ष रखा. पूरा पॉडकास्ट सुने.

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  • एनएल चर्चा 67: मसूद अज़हर वैश्विक आतंकी घोषित, मिथकीय ‘येती’, श्रीलंका में बुर्क़े पर प्रतिबंध व अन्य
    इस हफ़्ते की चर्चा में सुप्रीम कोर्ट कोर्ट के मुख्य न्यायधीश जस्टिस रंजन गोगोई पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों की बाबत सुप्रीम कोर्ट के ही वकील एम एल शर्मा द्वारा कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण पर लगाये गये सीजेआई को साजिश के तहत फंसाने के आरोप, सेना के पर्वतारोही दल द्वारा ‘येती’ नामक मिथकीय जीव (हिम मानव) व उसके पदचिन्हों को देखने के दावे, आतंकी वारदात से निपटने के क्रम में श्रीलंका में सरकार द्वारा बुर्क़ा पहनने पर लगाये गये प्रतिबंध, देश के सियासी माहौल में प्रधानमंत्री का बंगाल के संदर्भ में बयान, राहुल गांधी की नागरिकता का सवाल व अन्य चुनावी उठा-पटक और अज़हर मसूद को ‘ग्लोबल टेररिस्ट’ घोषित किये जाने को चर्चा के विषय के तौर पर लिया गया.चर्चा में इस बार पूर्व पत्रकार व कम्युनिकेशन एक्सपर्ट दिवाकर आनंद ने शिरकत की. साथ ही लेखक-पत्रकार अनिल यादव व न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्द्धन भी चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.बीते बुधवार को संयुक्त राष्ट्र ने अज़हर मसूद को ‘वैश्विक आतंकी’ घोषित कर दिया. इसके साथ ही जहां एक तरफ़ पिछले कुछ सालों में विकसित हुई परंपरा के तहत हर सकारात्मक वाकये की तरह इसे भी जहां ‘मोदी है तो मुमकिन है’ से जोड़ दिया गया, वहीं दूसरी तरफ़ मज़े कि बात है कि अमेरिका ने इसे अमेरिकी कूटनीति की जीत क़रार दिया. इसे मसले से चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल ने कहा कि अज़हर मसूद वही आतंकी है जिसे भारत सरकार ने कंधार हाईजैकिंग मामले में तमाम यात्रियों की हिफाज़त और रिहाई के बदले में छोड़ा था. मुबंई के 26/11 के आतंकी हमले के बाद से ही ये कोशिश चल रही थी कि अज़हर मसूद को आतंकियों की सूची में डाला जाय. चीन लगातार इसके विरोध में खड़ा रहा. लेकिन अंततः मज़दूर दिवस के दिन संयुक्त राष्ट्र द्वारा अज़हर मसूद को वैश्विक आतंकी मान लिया गया. यह भारत सरकार के लिये कितना सिंबॉलिक है, कितनी बड़ी कूटनीतिक सफलता है?जवाब देते हुए आनंद ने कहा- “सफलता के लिहाज़ से कहें तो इससे निश्चित तौर पर न कहा जा सकता कि आतंकी वारदातों में कमी आएगी ही. अज़हर मसूद के ज़िंदा होने पर भी लोगों को शक है. अगर जीवित है तो उसकी गतिविधियों में कमी आ जाएगी, पूरी तरह ऐसा भी नहीं कहा जा सकता. लेकिन कूटनीतिक तौर पर यह बड़ी सफलता इसलिये है क्योंकि सुरक्षा परिषद् के जो स्थायी सदस्य हैं, यह वाकया एक तरह से उनपर भारत के प्रभाव का सूचक है. इसमें एक विघ्न चीन ही था, लेकिन उसे इसकी भरी कीमत अदा करने की गुंजाइश बढ़ रही थी और कुछ ख़ास फायदा हो नहीं रहा था. तो शायद चीन के लिये वो स्थिति आ गयी थी कि वो पीछे हटे. इसको इस संदर्भ में भी देखा जा सकता है कि इमरान खान हाल ही में चीन गये थे और उसमें क्या बातचीत हुई, लोग इस संदर्भ में भी इसका विश्लेषण कर रहे हैं. लेकिन इस पूरे वाकये को कांस्पीरेसी थियरी के रूप में देखूंगा.”इसी कड़ी में अतुल ने कहा कि भारत के संदर्भ में भारत-चीन का व्यापार किसी भी मसले में ख़ास अहमियत रखता है. तमाम तरह के सीमा से जुड़े विवाद और संकट होते हुए भी जब व्यापार की बात आती है तो दोनों देश मौके-मौके पर तमाम चीज़ों को छोड़कर आगे बढ़ते हैं. क्या इसको इस संदर्भ में देखा जा सकता है कि भारत के बाज़ार को मद्देनज़र रखते हुए चीन ने यह फ़ैसला लिया है?जवाब देते हुए अनिल कहते हैं- “कह सकते हैं क्योंकि इसके पहले चीन के फैसले लेने चीन की ख़ास टेंडेंसी रही है. एक तो उनके लिये अपना राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला बेहद अहम है और वे इस मामले में कभी समझौता नहीं करते फिर चाहे वो अरुणाचल का मामला हो या अन्य सीमा विवाद. दूसरा व्यापार एक मसला है जहां वो कोई समझौता नहीं करते. इसका एक मतलब ये भी है कि दोनों ही मामले में वो लचीलापन नहीं दिखाते, अपने फ़ायदे की ही सोचते हैं. तो भारत को मसूद अज़हर के वैश्विक आतंकी घोषित किये जाने का निश्चित तौर पर चीन को व्यापार में फ़ायदा हो सकता है लेकिन भारत को कोई ख़ास फ़ायदा होता मुझे नहीं नज़र आ रहा.”दिवाकर कहते हैं- “यूपीए के वक़्त से ही यह कोशिश जारी थी. इसलिये इसे प्रथम दृष्टया कूटनीतिक सफलता मानना ठीक है. आपने बिल्कुल सही कहा कि इस मामले में हाफ़िज़ सईद के रूप में हमारे सामने बड़ा उदहारण है. इस घोषणा के बाद अब पाकिस्तान क्या करता है, भारत के साथ मिलकर इस दिशा में कितने असरदार तरीक़े से व कितना काम करता है, ख़ास तौर से इस बात को मद्देनज़र रखते हुए कि इमरान ख़ान बहुत बढ़-चढ़कर बयान देते रहे हैं और लगातार इस दिशा में पहल को तत्पर दिखे हैं.”इसके साथ-साथ बाक़ी विषयों पर भी चर्चा के दौरान विस्तार से बातचीत हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें.

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  • एपिसोड 65: साध्वी प्रज्ञा को भोपाल से बीजेपी का टिकट, जेट एयरवेज़ की उड़ानें बंद और अन्य
    बीते हफ़्ते राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर घटित हुई घटनाओं ने कई मायनों में नयी बहस को जन्म दिया. चर्चा में इस हफ़्ते उन्हीं में से तीन बेहद ज़रूरी विषयों- जेट एयरवेज़ की उड़ानें बंद होने व हज़ारों की तादाद में लोगों के बेरोज़गार होने, विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांज की इक्वाडोर के लंदन स्थित दूतावास से गिरफ़्तारी और भाजपा द्वारा तमाम आतंकवादी गतिविधियों में सह-अभियुक्त रही साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को 2019 के लोकसभा चुनावों में भोपाल से टिकट दिये जाने पर विस्तार से बातचीत की गयी.चर्चा में इस बार ‘प्रभात ख़बर-दिल्ली’ के ब्यूरो चीफ़ प्रकाश के रे ने शिरकत की. साथ ही चर्चा में लेखक-पत्रकार अनिल यादव भी शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.भारतीय जनता पार्टी द्वारा साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को भोपाल से टिकट दिये जाने के बाद एक बार फिर देश में उग्र हिंदुत्व की राजनीति ने जोर पकड़ लिया है. साध्वी प्रज्ञा सिंह ने 2019 के लोकसभा चुनावों को धर्मयुद्ध करार दिया है. साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के बयानों के बाद अब धार्मिक भावनाओं के आधार की जाने वाली राजनीति तेज़ हो गयी है, जिसमें देशभक्ति का भी फ़्लेवर पड़ गया है. इसी मुद्दे से चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल ने सवाल किया कि जिस तरह की उनकी छवि है व जिस तरह के उनपर आरोप हैं, उसके बाद उन्हें या उन जैसे किसी व्यक्ति के उम्मीदवार बनाये जाने के कुछ मक़सद होते हैं. ध्रुवीकरण होता है और जीत की संभावनाएं ऐसे में बढ़ जाती हैं. और जबकि भोपाल की सीट भाजपा के लिये सालों से सुरक्षित सीट रही है, तो पार्टी द्वारा ऐसे किसी उम्मीदवार के ऊपर दांव लगाने के पीछे क्या मक़सद हो सकता है?जवाब देते हुये प्रकाश कहते हैं- “उनको खड़ा करने के पीछे जो मक़सद है, उसपर बात करने के पहले हमें यह देखना चाहिए कि उनकी उम्मीदवारी के तकनीकी या कानूनी पहलू क्या हैं. एक समय स्वास्थ्य के आधार पर लालू प्रसाद यादव जमानत की अर्ज़ी दाख़िल करते हैं, तो उनकी अर्ज़ी खारिज़ कर दी जाती है और यहां स्वास्थ्य के नाम पर एक व्यक्ति जमानत पर बाहर है और वह जमानत भी अपने आप में सवालों के घेरे में है. एक और मामला हार्दिक पटेल का भी है, जिन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी गयी. तो प्रज्ञा ठाकुर के मामले में यह एक बड़ा सवाल है और इसमें चुनाव आयोग के काम-काज पर भी सवालिया निशान है. मुझे लगता है कि आने वाले वक़्त में जब इन सब के कानूनी पहलुओं पर बहस होगी, उनका विश्लेषण किया जायेगा तब अदालतों को भी इसमें क्लीनचिट नहीं दी जा सकती है.”प्रकाश ने आगे कहा- “मुझे लगता है कि इस कैंडिडेचर के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की साफ़-साफ़ घोषणा है कि अब हम उस मुक़ाम पर खड़े हैं, जहां हमें पर्दादारी की बहुत ज़रूरत नहीं है.”जवाब देते हुए अनिल कहते हैं- “साध्वी प्रज्ञा ठाकुर कैंडिडेट से ज़्यादा ख़ुद एक मुद्दा हैं. जैसे ही उन्हें उम्मीदवार बनाया गया, एक नये तरह का डिस्कोर्स शुरू हो गया. उन्होंने पहले तो कहा कि यह धर्मयुद्ध है और बाद में एटीएस द्वारा पूछताछ में उनके साथ जो कुछ भी किया गया होगा, उसे अत्याचार की अतिरंजित कहानी बताते हुये विक्टिम कार्ड खेला. और बीजेपी लगातार ट्रायल एंड एरर करते हुये गोलपोस्ट चेंज करती हुई नज़र आ रही है व उग्र हिंदुत्व की तरफ़ जा रही है. यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि भाजपा ने किसी साधु-संत को टिकट दिया हो. लेकिन पहली बार भाजपा ने एक ऐसी साध्वी को उम्मीदवार बनाया है, जिसके ऊपर कई सारी आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने व मददगार होने के आरोप हैं. यह इस बात की तरफ़ साफ़-साफ़ संकेत है कि जिन लोकतांत्रिक मूल्यों पर, जिस बुनियाद पर, जिन वायदों-इरादों से सरकार बनती है, भारतीय जनता पार्टी पूरी तरह उनसे विमुख हो चुकी है.”अब जबकि चुनावी माहौल को धर्म व देशभक्ति के रंग में एक साथ रंगने की कोशिशें बदस्तूर जारी हैं, लोकतांत्रिक व संवैधानिक मूल्य कटघरे में हैं, संवेदनाएं व नैतिकताएं हाशिये पर हैं, धूमिल की कविता ‘पटकथा’ बेहद प्रासंगिक जान पड़ती है. उसी का एक हिस्सा अभी के माहौल पर बिल्कुल फिट बैठता है-यह जनता...इसकी श्रद्धा अटूट हैउसको समझा दिया गया है कि यहांऐसा जनतंत्र है जिसमेंघोड़े और घास कोएक-जैसी छूट हैकैसी विडंबना हैकैसा झूठ हैदरअसल, अपने यहां जनतंत्रएक ऐसा तमाशा हैजिसकी जानमदारी की भाषा हैहर तरफ़ धुआं हैहर तरफ़ कुहासा हैजो दांतों और दलदलों का दलाल हैवही देश भक्त हैइसके साथ-साथ बाक़ी विषयों पर भी चर्चा के दौरान विस्तार से बातचीत हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें.

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  • एपिसोड 64: राफेल मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला, इमरान खान का नरेंद्र मोदी प्रेम और अन्य
    बीता हफ़्ता तमाम तरह की घटनाओं का गवाह रहा. इस बार की चर्चा जब आयोजित की गयी, उस वक़्त देश के कुछ हिस्सों में साल 2014 के बाद तनाव, द्वंद्व, संघर्ष, भ्रम व मायूसी के 5 सालों से हताश-निराश अवाम एक बार फ़िर उम्मीदों से बेतरह लैश होकर पहले चरण के मतदान में अपने मताधिकार का प्रयोग कर रही थी. चर्चा में इस हफ़्ते सुप्रीम कोर्ट द्वारा राफेल मामले में प्रशांत भूषण, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए दिये गये फैसले, चुनाव के धड़कते माहौल में सीमा पार से आती ख़बर जिसमें इमरान ख़ान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व उनकी पार्टी द्वारा बहुमत हासिल करने पर भारत-पाकिस्तान संबंधों में गर्माहट आने की उम्मीद जतायी, बस्तर में नकुलनार इलाके में हुआ नक्सली हमला जिसमें बीजेपी के विधायक व 5 सीआरपीएफ जवानों समेत कुल छः लोगों की मृत्यु हो गयी और भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के ब्लॉग अपडेट व भाजपा के चुनावी घोषणापत्र पर चर्चा की गयी.इस हफ़्ते की चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार हृदयेश जोशी ने शिरकत की. साथ ही लेखक-पत्रकार अनिल यादव भी चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.राफेल मामले में दायर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए दिये गये फैसले से चर्चा की शुरुआत करते हुए, अतुल ने सवाल किया कि एक तरफ़ सरकार द्वारा इस मामले से लगातार पीछा छुड़ाने के प्रयास लगातार जारी रहे और अब चुनावी उठापटक के बीच सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस तरह का फैसला दिये जाने के बाद अब आप राफेल मामले को किस तरफ़ जाता हुआ देखते हैं? क्या बात राहुल गांधी द्वारा लगातार लगाये जा रहे आरोपों की दिशा में आगे बढ़ गयी है?जवाब में पेंटागन पेपर्स का ज़िक्र करते हुए हृदयेश ने कहा, “यहां पर एक तो प्रोसीजर का मामला इन्वाल्व है, इसके साथ ही मामला पॉलिटिकल परसेप्शन का भी हो गया है. इस वक़्त कांग्रेस ने मैनिफेस्टो में जिस तरह से ख़ुद को सोशल प्लेटफ़ॉर्म पर ऊपर दिखाने की कोशिश की थी, इसके बाद प्रोपराइटी के मामले में एक बयानबाजी करने में उसको मदद मिलेगी.”इसी कड़ी में मीडिया के नज़रिये से इस मसले को देखते हुए अतुल ने सवाल किया कि इस मौके पर यह फैसला सरकार के लिए तो झटके जैसा है, लेकिन जबकि पिछले पांच सालों में लगातार यह बात चर्चा में रही कि मीडिया पर सरकारी दबाव है, मीडिया की आज़ादी के लिहाज़ से इसे कैसे देखा जाये? क्या मीडिया के लिए यह ऐसा मौका है, जो आगे बार-बार ऐतिहासिक संदर्भों में याद किया जायेगा?जवाब देते अनिल ने कहा, “देखिये! जहां तक मीडिया की बात है तो सुप्रीम कोर्ट ने ये सारी बात मीडिया के संदर्भ में नहीं की हैं. उसके द्वारा पेंटागन पेपर्स का ज़िक्र करना दरअसल एक लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात करना है. वर्ना भारत में, ख़ास तौर से पिछले कुछ सालों में मीडिया में जो कुछ उठापटक, मनमुताबिक़ या डर वश फेरबदल चल रहा है, यह सबकुछ सुप्रीम कोर्ट की आंखों के सामने हो रहा. तो अगर सुप्रीम कोर्ट मीडिया की स्वतंत्रता का असल में पक्षधर होता, तो वह ज़रूरी दखल देता. लेकिन सुप्रीम कोर्ट की चिंता ये नहीं है. दूसरी बात ये है कि जो मीडिया आर्गेनाईजेशन्स हैं, वो भी इस हालत में नहीं हैं कि अगर सुप्रीम कोर्ट मीडिया के पक्ष में कोई सकारात्मक बात करता है तो वो उसका फ़ायदा ले सकें, उसे आगे ले जा सकें. जो ज़्यादातर मीडिया आर्गेनाईजेशन्स हैं, वो बिना नाखून व दांत वाली संस्थाओं में तब्दील हो गये हैं.”इसके साथ-साथ बाक़ी विषयों पर भी चर्चा के दौरान विस्तार से बातचीत हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें.

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