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  • एपिसोड 63: कांग्रेस का चुनावी घोषणापत्र, मॉडल कोड ऑफ़ कंडक्ट, पीएम नरेंद्र मोदी फ़िल्म और अन्य
    बीता हफ़्ता बहुत सारी घटनाओं का साक्षी रहा है. इस हफ़्ते की चर्चा तब आयोजित हुई, जबकि चुनावी सरगर्मियां चरम पर थीं और पहले चरण के चुनाव में हफ़्ते भर से भी कम वक़्त रह गया था. इस हफ़्ते की चर्चा में ‘टाइम मैगज़ीन’ द्वारा पेशे का जोख़िम उठा रहे पत्रकारों की सूची में इस बार हिंदुस्तान की स्वतंत्र पत्रकार राना अयूब का नाम दर्ज़ करने व पेशे में पत्रकारों के लिए लगातार बने हुए खतरों, देशभर में महिलाओं के लिए रोजगार की संभावनाओं पर विस्तार से बात करती ऑक्सफेम इंडिया की रिपोर्ट, राहुल गांधी द्वारा पहली दफ़ा दो जगहों से लोकसभा चुनाव लड़ने, कांग्रेस पार्टी के चुनावी घोषणापत्र व आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन की घटनाओं पर चर्चा के क्रम में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक, जिसमें अभिनेता विवेक ओबेरॉय उनका किरदार निभा रहे, पर चर्चा की गयी.चर्चा में इस बार वरिष्ठ पत्रकार हृदयेश जोशी ने शिरकत की. साथ ही लेखक-पत्रकार अनिल यादव व न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन भी चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.कांग्रेस पार्टी के चुनावी घोषणापत्र से चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल ने कहा कि कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र में शिक्षा व कृषि के क्षेत्र के लिए किए गये वायदों, अलग से कृषि बजट जारी करने व ‘न्याय’ योजना जिसमें देश में ग़रीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन कर रहे पांच करोड़ परिवारों को 6000 रुपये की मासिक आर्थिक मदद की बात कही गयी है. अतुल ने इसी में अपनी बात जोड़ते हुए कहा कि इन सबको ध्यान में रखते हुए अगर चुनावी घोषणापत्र पर गौर करें तो इसमें समाजवादी रुझान की झलक मिलती है, साथ ही इसमें उस लीक से थोड़ा हटकर चलने का प्रयास भी देखने को मिलता है, जिसका निर्माण ऐसे समय में हुआ जब बाज़ारवाद ने अर्थव्यवस्था को अपनी पकड़ में ले लिया है, इस संबंध में आपकी क्या राय है?जवाब देते हुए हृदयेश जोशी ने कहा- “आपने सोशलिस्ट शब्द का इस्तेमाल किया. यहां मूल बात समझने की ये है कि शुरुआत से ही पार्टियों का और ख़ास तौर पर कांग्रेस पार्टी का ये अनुभव रहा है कि जब-जब वो अपनी इस सोशलिस्ट लाइन से हटी है, उसका जनाधार बुरी तरह खिसका है. अगर आप कुछ वक़्त पहले अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ के इंडियन एक्सप्रेस में छपे लेख ‘रैश यू टर्न, हाफ-बेक्ड प्लान्स’ पर गौर करें तो उनका कहना है कि ये जो कैज़ुअल एप्रोच है, चाहे वो प्रधानमंत्री मोदी का ही रहा हो जबकि वो दक्षिणपंथी पार्टी के नेता हैं और खुलेआम पूंजीवादी रुझान में बातें करते हैं, उनका भी किसानों को 6000 रुपये देना सोशलिस्ट स्कीम ही कही जायेगी. लेकिन यह एक तरह का एड-हॉक एप्रोच है कि जब आपको लगे कि लोगों को ख़ुश करने की ज़रूरत है और कुछ ऐसा कर दिया जाये. साल 2004 में कांग्रेस की जब सरकारी बनी, तो मनरेगा जैसी योजनाएं चलाने के बाद अगले चुनाव में उनका जनाधार बढ़ा था, मुझे लगता है कांग्रेस उसी लाइन पर लौटने का प्रयास कर रही है.”जाति-धर्म, संप्रदाय या देश व देशभक्ति के नाम पर किए जा रहे ध्रुवीकरण व हर सवाल के ऊपर आख़िरी ट्रंप-कार्ड की तरह राष्ट्र को रख देने के दौर में कांग्रेस का चुनावी घोषणापत्र कहता है कि सत्ता में आने पर पार्टी आफ्सपा को डाइलूट करेगी, उसके प्रावधानों में कमी लायेगी, साथ ही राजद्रोह के कानून को ख़त्म करेगी. इन्हीं बातों का ज़िक्र करते हुए अतुल ने सवाल किया कि ऐसे वक़्त में कांग्रेस के इस कदम को किस तरह देखना चाहिए? क्या यह साहसी कदम है? या कांग्रेस ने एक तरह से रिस्क लिया है?जवाब देते हुए अनिल ने कहा- “मुझे जो पहली चीज़ लगी, वो ये कि कांग्रेस ने यह कदम हताशा में उठाया है. मुझे ऐसा लगता है कि पिछले पांच सालों के दौरान सेडीशन के मामले हुए हैं, आफ्सपा के भी हुए हैं तो इन सारे मुद्दों पर कांग्रेस की अगर कोई स्पष्ट नीति होती तो वो इन पर बात करती हुई दिखाई देती. मुझे लगता है राहुल गांधी को लग रहा है कि यह डू ऑर डाई का मामला है.”इसी सवाल पर अपना नज़रिया रखते हुए आनंद कहते हैं- “मुझे लगता है चुनावी घोषणापत्र अकादमिक रुचि व उपभोग की ही चीज़ें होती हैं, चुनाव प्रचार और रैलियों में क्या बोला जा रहा है, वह अधिक महत्वपूर्ण है.”इसके साथ-साथ बाकी विषयों पर भी चर्चा के दौरान विस्तार से बहस हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें.

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    56 min
  • एपिसोड 62: मोदी का राष्ट्र के नाम संदेश, राहुल की न्याय योजना और अन्य
    चुनावी गहमा-गहमी के बीच बीता हफ़्ता तमाम अच्छी-बुरी खबरों के साथ हिंदुस्तान के लिए एक उपलब्धि लेकर आया. इस हफ़्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा खगोल विज्ञान के क्षेत्र में भारत की हालिया उपलब्धि को बताते हुए राष्ट्र के नाम संदेश जारी संदेश, राहुल गांधी द्वारा चुनावी अभियान के तहत की एक बड़ी योजना ‘न्याय’ का ऐलान, पिछले हफ़्ते होली के रंगों को धूमिल करती हुई व सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाने वाली गुड़गांव में एक मुस्लिम परिवार के साथ हुई हिंसक वारदात और सामाजिक कार्यकर्ता व अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ की झारखंड में हुई गिरफ़्तारी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रिपब्लिक भारत चैनल को दिया गया इंटरव्यू आदि चर्चा में विषय के तौर पर लिया गया.चर्चा में इस बार लेखक-पत्रकार अनिल यादव व हिंदुस्तान अख़बार के विशेष संवाददाता स्कंद विवेकधर शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ज़ारी राष्ट्र के नाम संदेश में उपग्रह को मार-गिराने की क्षमता के ज़िक्र के साथ चर्चा की शुरुआत हुई. अतुल ने पॉलिटिकल पार्टियों का हवाला देते हुए सवाल किया कि क्या इसकी ज़रूरत थी कि प्रधानमंत्री इतना ज़्यादा सस्पेंस बनाते हुए इसकी घोषणा करें? इसमें दूसरी बात यह भी शामिल की गई कि इसको भारत सरकार की तरफ़ से इस तरह पेश किया गया कि इसमें 1974 या 1998 में हुए परमाणु परीक्षण जैसी कोई बात है. आप इन दोनों ही बातों को किस तरह देखते हैं?जवाब देते हुए अनिल ने कहा, “वास्तव में प्रधानमंत्री को राष्ट्र के नाम विशेष संबोधन के ज़रिए इसे बताने की आवश्यकता नहीं थी. अगर राष्ट्र के नाम संबोधन की आवश्यकता थी तो वह पुलवामा हमले के समय ज़्यादा थी. पूरा देश उस समय बहुत सदमे में था, लोगों में नाराज़गी थी. वो एक बड़ी घटना थी, पूरे देश को हिला देने वाली. लेकिन उस वक़्त प्रधानमंत्री को यह ज़रूरत नहीं महसूस हुई कि राष्ट्र के नाम विशेष संबोधन दें. लेकिन ये जो घटना हुई कि तीन मिनट के भीतर अपने ही कबाड़ हो चुके एक उपग्रह को एक मिसाइल द्वारा नष्ट कर दिया गया तो उन्होंने पूरे देश को बताया. तो इसके पीछे जो मकसद है वो प्रोपेगैंडा का है.”इस घटना पर विपक्ष द्वारा सवाल उठाए जाने पर- ‘विपक्ष हर चीज़ पर सवाल खड़े कर रहा है’- जैसी बात भारतीय जनता पार्टी व प्रधानमंत्री द्वारा बार-बार कही जा रही है. इस बात का ज़िक्र करते हुए अतुल ने सवाल किया कि अब जबकि इस समय आदर्श आचार संहिता लागू है तब इसे राजनीति के चश्मे से देखा जाए या नहीं?जवाब देते हुए स्कंद ने कहा, “ये कहना कि इसमें राजनीति नहीं है, बिल्कुल ग़लत होगा. प्रधानमंत्री ने अगर राष्ट्र के नाम संबोधन किया तो उन्होंने यह भी राजनीतिक नज़रिए से ही किया है क्योंकि अभी चुनाव सिर पर हैं और सत्तारूढ़ दल भाजपा चाहता है कि पूरा का पूरा चुनाव इस बात पर हो कि राष्ट्र के लिए मजबूती से निर्णय लेने वाला दमदार प्रधानमंत्री कौन है. वो पूरा नैरेटिव इस पर ही शिफ्ट कर रहे हैं. यह हमारी बड़ी उपलब्धि हैं, हम इनकार नहीं कर सकते. ख़ास तौर से तब जबकि चीन जिससे आपके बहुत अच्छे रिश्ते नहीं हैं, उसके पास यह ताकत है. और आने वाले वक़्त में ऐसे मौके बने हुए हैं कि युद्ध के दौरान कोई देश आपके उपग्रहों को नष्ट कर दे तो आपके पास एक डेटरेंस होना चाहिए.”इसके साथ-साथ बाकी विषयों पर भी चर्चा के दौरान विस्तार से बहस हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें.

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    53 min
  • एपिसोड 61: येदियुरप्पा की डायरी, आडवाणी का टिकट कटना और अन्य
    बीत रहा हफ़्ता रंगों के त्यौहार ‘होली’ के उल्लास में डूबा रहा. इस बीच तमाम घटनाएं अप्रभावित अपनी गति से घटती रहीं. तमाम चिंताजनक वारदातों से अप्रभावित प्रधानमंत्री के कार्यक्रम वक़्त और तारीख़ में बिना किसी फेरबदल के आयोजित होते रहे. ऐसे में नज़ीर अकबराबादी का होली पर लिखा गीत ‘होली की बहारें’ बेहद मानीखेज़ है. उनके लिए फिराक़ गोरखपुरी लिखते हैं कि नज़ीर दुनिया के रंग में रंगे हुए महाकवि थे. वे दुनिया में रहते थे और दुनिया उनमें रहती थी, जो उनकी कविताओं में हंसती-बोलती, जीती-जागती त्यौहार मनाती नज़र आती है. गीत के कुछ अंश इस प्रकार हैं-“जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली कीऔर दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली कीपरियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली कीख़ुम, शीशे, जाम झलकते हों तब देख बहारें होली की.”अनिल यादव गीत के बारे में बताते हुए कहते हैं कि ऐसे वक़्त में जब सांप्रदायिक आधारों पर समाज को बांटने की कोशिशें बदस्तूर जारी हैं, यह गीत इस लिए भी सुना/ पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि इससे पता चलता है कि हमारी साझी संस्कृति का रंग कितना गहरा है.रंगों के त्यौहार पर संक्षिप्त बातचीत व गीत के ज़िक्र के बात चर्चा के विषयों की ओर लौटना हुआ. इस हफ़्ते की चर्चा में भारतीय जनता पार्टी के लोकसभा उम्मीदवारों की पहली सूची जारी हुई जिसमें वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी का नाम नहीं होने के बाद अब उनके राजनीतिक अवसान, पंजाब नेशनल बैंक से तकरीबन 13000 करोड़ रूपये के गबन के बाद देश से फरार चल रहे नीरव मोदी की लंदन में हुई गिरफ़्तारी, पत्रकार बरखा दत्त को गालियां देने व जान से मारने की धमकी देने वाले कुछ लोगों को पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने, न्यूज़ीलैण्ड में मस्जिदों में घुसकर दो बन्दूकधारियों द्वारा तकरीबन 50 लोगों की हत्या की आतंकवादी घटना, प्रधानमंत्री के चुनावी अभियान ‘मैं भी चौकीदार’ और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा की सीक्रेट डायरी प्रकाश में आने, उससे सामने आ रहे तथ्यों को चर्चा में विशेष तौर पर लिया गया.चर्चा में इस बार लेखक-पत्रकार अनिल यादव व न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन शामिल हुए. चर्चा का संचालन हमेशा की तरह न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.कर्नाटक के डायरी-प्रकरण से चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल ने सवाल किया कि यह डायरी कथित तौर पर कांग्रेस के नेता वीके शशि कुमार के घर से ज़ब्त की गई थी. 2017 से यह डायरी वित्त मंत्रालय के संज्ञान में होने के बावजूद सरकार द्वारा डायरी को दबाकर बैठे जाने को राजनीतिक प्रक्रिया के लिहाज़ से कैसे देखा जाए? क्या इसे तेज़ होती चुनावी सरगर्मियों के बीच कांग्रेस पार्टी द्वारा सनसनी पैदा करने की एक कोशिश कह सकते हैं या फिर यह डायरी बताती है कि राजनीतिक संस्कृति में भारतीय जनता पार्टी भी उतनी ही करप्ट है जितनी कि कांग्रेस?जवाब देते हुए अनिल ने कहा, “देखिए! करप्ट तो सारी पार्टियां हैं. असल बात ये है कि कोई राजनीतिक पार्टी उस करप्शन का पॉलिटिकल मैनेजमेंट कैसे करती है. बीजेपी ने इसका मैनेजमेंट करने के लिए अरसा पहले ही ‘पार्टी विद अ डिफरेंस’ का नारा दिया.” इसी क्रम में 2014 के चुनाव के वक़्त के प्रधानमंत्री मोदी के नारे ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’ का ज़िक्र करते हुए अनिल ने कहा, “पूरे कार्यकाल में बीजेपी के बड़े नेता लगातार कहते रहे हैं कि हमारी सरकार में सब हुआ लेकिन करप्शन नहीं हुआ. लेकिन अब एक के बाद जैसी ख़बरें आ रही हैं वो बताती हैं कि उनका जो करप्शन का प्रबंधन करने का तरीक़ा था वो नाकाम हो गया और ये जो करप्शन हो रहे हैं वो पहले से भी बड़े करप्शन हैं. मुझे लगता है कि नैतिक मुद्रा अपना करके, झूठ बोल करके बीजेपी ने छवि-प्रबंधन की जो कोशिश की थी अब उसके चीथड़े उड़ रहे हैं.”इसी कड़ी में इस बात का ज़िक्र करते हुए कि जब येदियुरप्पा का पूरा कार्यकाल भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा रहा व उन्हें इस्तीफ़ा भी देना पड़ा अतुल ने सवाल किया कि उस पूरे मामले के लिहाज से इस पूरी राजनीतिक संस्कृति पर गौर करते हुए क्या आपको लगता है कि यह महज़ चुनाव के पहले महज़ एक हथकंडा अपना जा रहा है?अपने जवाब में आनंद वर्धन ने कहा, “चुनाव के मौसम में इस तरह की तमाम कहानियां दोनों पक्षों से आएंगी. दूसरी बात कि ‘पार्टी विद अ डिफ़रेंस’ नब्बे के दशक में भाजपा की अपील रही है. मेरे ख़याल से उसके बाद उसकी यह अपील नहीं रही है. यह मुख्यधारा की राष्ट्रीय पार्टी है जो परसेप्शन की लड़ाई ज़्यादा लड़ेगी. और राजनीति में यह तात्कालिक जरूरतों पर हमेशा भारी पड़ता है.”

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    56 min
  • एपिसोड 60: लोकसभा चुनाव की तारीखें, सर्फ एक्सेल विवाद और अन्य
    बीता हफ़्ता कई वजहों से चर्चा में रहा. चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा की जिसके साथ ही नेताओं की बयानबाजी का दौर शुरू हो गया. इस हफ़्ते की कुछ प्रमुख घटनाओं मसलन कर्नाटक के बीजेपी नेता अनंत कुमार हेगड़े का राहुल गांधी और उनके परिवार पर आपत्तिजनक टिप्पणी करना, हिंदुस्तान यूनीलीवर के उत्पाद ‘सर्फ़ एक्सेल’ के होली से जुड़े एक विज्ञापन पर उठा विवाद, अदालत की अवमानना के आरोप के चलते शिलॉन्ग टाइम्स की एडिटर पैट्रीशिया मुखीम पर मेघालय हाईकोर्ट द्वारा लगाया गया जुर्माना और जुर्माने की अदायगी में असफल रहने पर 6 महीने की जेल के साथ अख़बार बंद करने का आदेश, आदि विषय इस बार की चर्चा में शामिल रहे.चर्चा में इस बार पत्रकार राहुल कोटियाल ने बतौर मेहमान शिरकत की. साथ ही न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन व लेखक-पत्रकार अनिल यादव भी चर्चा में शामिल रहे. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल ने कहा कि हमारे समाज या समय में हर चीज़ के साथ विवाद जुड़ जाने की एक परंपरा विकसित हो गई है और अब किसी भी चीज़ का विवादों के साए में चले जाना आम सी बात हो गई है. चुनाव की तारीख़ों के ऐलान के बाद रमज़ान के महीने में चुनाव होने और चुनाव की तारीख़ों व फेज़ को लेकर भी विवाद हो गया. राजनीतिक गलियारों में लगाई जा रही इन अटकलों का ज़िक्र करते हुए कि चुनाव की तारीख़ें बीजेपी के मुफ़ीद हैं, अतुल ने सवाल किया कि इस विवाद को कैसे देखा जाए? क्या इसमें विपक्ष को किसी भी तरह का डिसएडवांटेज है?जवाब देते हुए अनिल ने कहा, “ये चुनाव काफ़ी अविश्वास के माहौल में हो रहे हैं. एक संभावना यह भी थी कि क्या पता चुनाव हों ही न. सर्जिकल स्ट्राइक के बाद ये अटकलें लगाई गईं कि हो सकता है प्रधानमंत्री मोदी आपातकाल लागू करने के लिए इस अवसर का इस्तेमाल करें और चुनाव आगे चलकर तब कराएं जब परिस्थितियां उनके पक्ष में हो जाएं दूसरा एक बहुत बड़ी आशंका पिछले पांच सालों में हवा में रही है कि ईवीएम के ज़रिए चुनाव में गड़बड़ी की जाती है. तो एक तरह से सरकार और चुनाव आयोग के प्रति पिछले पांच सालों में एक अविश्वास का माहौल हवा में रहा है और उसी पृष्ठभूमि में ये चुनाव हो रहे हैं. तो जहां असुरक्षा होती है, अविश्वास होता है, हर चीज़ के दूसरे अर्थ निकाले जाते हैं. और मुझे यह लगता है कि चुनाव का कई फेज़ में होना किसी के भी पक्ष जा सकता है. सिर्फ भाजपा को ही इसका फायदा मिलेगा, यह सोचना ठीक नहीं है.”विवाद लाज़मी था या ग़ैरज़रूरी? इस सवाल का जवाब देते हुए आनंद कहते हैं, “हम लोग अतिविश्लेषण युग में रह रहे हैं, हर चीज़ का विश्लेषण बहुत अधिक होता है, और अतिविश्लेषण के बाद कुछ न कुछ तो निष्कर्ष निकलता ही है. या निष्कर्ष तय करके फिर विश्लेषण कर लिया जा रहा है. यह दोनों ही चीज़ें हो रही हैं.” आनंद ने इसी में आगे जोड़ते हुए कहा कि अगर इस तरह कि अटकलें इवीएम के स्तर पर हैं तो फिर चुनाव की तारीख़ें और चरण क्या हैं उस आरोप का कुछ ख़ास मतलब नहीं रह जाता.नवीन पटनायक द्वारा 33% और ममता बनर्जी द्वारा 35% टिकट महिलाओं को दिया जाना क्या बाकी दलों पर एक दबाव की तरह काम करेगा? महिला आरक्षण का कानून पास हुए बिना ही राजनीतिक दल इस तरह के सकारात्मक बदलाव करने के लिए मजबूर हैं? इस सवाल के जवाब में राहुल कहते हैं, “बिल्कुल! पहली ही नज़र में यह बहुत सकारात्मक कदम लगता है. अब बीजेपी-कांग्रेस जैसे दलों में फैसले आलाकमान की तरफ से लिए जाते हैं. टिकटों का निर्धारण वहीं से होता है. ऐसे में इन पार्टियों के लिए टिकट बंटवारे में 33% सीटें महिलाओं के देने की बात करना मुश्किलों भरा हो जाएगा क्योंकि तब इन्हें कैंडिडेट ढूंढ़ने में ख़ासी मशक्कत करनी पड़ेगी.”इसी क्रम में बाकी विषयों पर भी बेहद गंभीर व दिलचस्प चर्चा हुई. बाकी विषयों पर पैनल की विस्तृत राय जानने-समझने के लिए पूरी चर्चा सुनें.

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    55 min
  • एपिसोड 59: सांसद-विधायक जूतम पैजार, अयोध्या, राफेल और अन्य
    बीते हफ़्ते एक तरफ़ जहां कुछ बेहद अहम मुद्दे चर्चा में रहे वहीं कुछ घटनाएं मीडिया गलियारों में सनसनी की तरह छाईं रहीं. इस हफ़्ते की चर्चा में हमने उन्हीं में से कुछ को विषयों के लिया. उत्तर प्रदेश के संत कबीरनगर में सांसद और विधायक के बीच हुई जूतम-पैजार की घटना और भारतीय राजनीति की अहंकार-नीति, अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद और विवाद सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा हुई तीन मध्यस्थों की नियुक्ति, राफेल डील से जुड़े कुछ दस्तावेज़ों की चोरी, सरकार के रवैये और द हिन्दू को निशाने पर लिए जाने और प्रधानमंत्री द्वारा मानवीय गरिमा और समझ-बूझ को परे रखते हुए बेहद संवेदनहीनता से डिस्लेक्सिया पीड़ितों का मज़ाक उड़ाए जाने की घटना को चर्चा के विषय के तौर पर लिया गया.चर्चा में इस बार ‘पेट्रियट’ न्यूज़पेपर के सीनियर एसोसिएट एडिटर मिहिर श्रीवास्तव ने बतौर मेहमान शिरकत की. साथ ही चर्चा में लेखक-पत्रकार अनिल यादव भी शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत में ‘न्यूडिटी’ पर अपने शोध और क़िताबों के लिए मशहूर मिहिर इस विषय पर अपनी संक्षिप्त राय रखते हुए कहते हैं, “जहां तक न्यूडिटी का सवाल है, इसके नाम पर कुछ लोग संस्कृति के ठेकेदार बने फिरते हैं. लोगों को मारते हैं, पेंटिंग फाड़ देते हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि जिस चीज़ की वह सुरक्षा करने में लगे हैं, वह भारत की संस्कृति नहीं है. वह ‘विक्टोरियन मोरैलिटी’ है. यह ‘विक्टोरियन मोरैलिटी’ ढाई-तीन सौ साल पहले अंग्रेज़ी शासन के दौरान हम पर थोपी गई है.”इसके बाद उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर में हुए ‘जूता-प्रकरण’ से चर्चा के निर्धारित विषयों की ओर लौटते हुए चर्चा की शुरुआत हुई. भारतीय समाज और राजनीति में पद-प्रतिष्ठा और नाम की भूख और इससे पैदा अहंकार पर बात करते हुए अतुल सवाल करते हैं, “नाम की भूख और यश लोलुपता की यह परंपरा इस स्तर तक पहुंच जाए कि वह ‘जूता’ चलने की एक परंपरा को जन्म दे और वह परंपरा अमर हो जाए, आप इसे कैसे देखते हैं?”जवाब में बरसों पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा में जूतम-पैजार की घटना का ज़िक्र करते हुए अनिल कहते हैं, “जो लोग पॉलिटिक्स में हैं, वो अपनी जो छवि पेश करते हैं, वो असल में वैसे हैं नहीं. वो पोज़ करते हैं कि वो लोगों की सेवा करने के लिए, अपने इलाके का विकास करने के लिए या जो अन्याय, ग़रीबी है उसे ख़त्म करने के लिए वो पॉलिटिक्स में हैं. लेकिन वो मूलतः पॉलिटिक्स में अपनी प्रतिष्ठा के लिए हैं, अपने अहंकार, अपने जलवे, अपने दबदबे के लिए हैं. इस बात को वो आम तौर पर छिपाए रहते हैं लेकिन ये बात छिपती नहीं है. और जहां भी ज़रा सा ऊंच-नीच होता है यह छवि उभर कर सामने आ जाती है.”इसी बात को आगे बढ़ाते हुए मिहिर कहते हैं, “इसमें महत्वपूर्ण बात यह भी है कि कोई परोपकार करने तो पॉलिटिक्स में आता नहीं है और किसी को इस ग़लतफ़हमी में रहना भी न चाहिए. लेकिन जो बात ये जूताबाजी सामने लाती है, वो है असहिष्णुता. यहां ये बात है कि अगर पद-प्रतिष्ठा में मैं ऊंचा हूं तो आप मेरी बात सुनेंगे और अगर नहीं सुनेंगे तो जूता खाएंगे.”चर्चा में अतुल ने श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘राग दरबारी’ का एक अंश पढ़ा जिसे इस घटना से जोड़कर देखना बेहद मौजूं है, “इस बात ने वैद्यजी को और भी गंभीर बना दिया, पर लोग उत्साहित हो उठे. बात जूता मारने की पद्धति और परंपरा पर आ गई. सनीचर ने चहककर कहा कि जब खन्ना पर दनादन-दनादन पड़ने लगें, तो हमें भी बताना. बहुत दिन से हमने किसी को जुतिआया नहीं. हम भी दो-चार हाथ लगाने चलेंगे. एक आदमी बोला कि जूता अगर फटा हो और तीन दिन तक पानी में भिगोया गया हो तो मारने में अच्छी आवाज़ करता है और लोगों को दूर-दूर तक सूचना मिल जाती है कि जूता चल रहा है. दूसरा बोला कि पढ़े-लिखे आदमी को जुतिआना हो तो गोरक्षक जूते का प्रयोग करना चाहिए. ताकि मार तो पड़ जाए, पर ज़्यादा बेइज्ज़ती न हो. चबूतरे बैठे-बैठे एक तीसरे आदमी ने कहा कि जुतिआने का सही तरीक़ा यह है कि गिनकर सौ जूते मारने चले, निन्यानबे तक आते-आते पिछली गिनती भूल जाय और एक से गिनकर फिर नये सिरे से जूता लगाना शुरू दे. चौथे आदमी ने इसका अनुमोदन करते हुए कहा कि सचमुच जुतिआने का यही तरीक़ा है और इसीलिए मैंने भी सौ तक गिनती याद करनी शुरू कर दी है.”इसके अलावा अन्य विषयों पर भी बेहद दिलचस्प चर्चा हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें.

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    46 min
  • एपिसोड 58: भारत-पाकिस्तान तनाव, चैनलों को नोटिस और अन्य
    बीता पूरा हफ़्ता काफ़ी उठापटक भरा रहा. चर्चा में उन्हीं में से कुछ विषयों पर विस्तार से बात की गई. इस हफ़्ते की सबसे महत्वपूर्ण घटना रही, भारत और पाकिस्तान के हवाई हमलों के बाद पैदा हुआ तनाव. पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले के बाद भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादी ठिकानों पर कार्रवाई की थी. बदले में पाकिस्तान ने भारत की हवाई सीमा का उल्लंघन किया. भारत- पाकिस्तान के बीच पैदा तनाव की वजह से एक और महत्वपूर्ण घटना जो उस तरह से सुर्ख़ियों में न आ सकी, वह अरुणाचल प्रदेश में वहां के स्थानीय निवासियों द्वारा किया गया बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन है. टकराव की वजह वहां पर ऐसे छः समुदायों को ‘स्थानीय निवासी प्रमाणपत्र’ देने की सिफ़ारिश थी जो मूल रूप से अरुणाचल के निवासी नहीं हैं, लेकिन दशकों से नामसाई और चांगलांग जिलों में रह रहे थे.तीसरी घटना जो इस हफ़्ते चर्चा का विषय रही, वह है 13 से ज़्यादा चैनलों को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा नोटिस जारी किया जाना. इन चैनलों के ऊपर आरोप है कि उन्होंने पाकिस्तान के सैन्य प्रवक्ता मेजर जनरल गफूर की उस प्रेस कांफ्रेंस को लाइव दिखाया. जिसमें वो भारत को हमले का जवाब देने की धमकी दे रहे थे. सरकार का इस पर कहना रहा कि यह ग़लत परम्परा है, इससे देश की एकता और अखंडता पर संकट पैदा हो सकता है.इस हफ्ते चर्चा में ‘द ट्रिब्यून’ की डेप्युटी एडिटर स्मिता शर्मा बतौर मेहमान शिरकत की. साथ ही चर्चा में हमारे साथ लेखक-पत्रकार अनिल यादव भी शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.भारत-पाकिस्तान के बीच तनावपूर्ण माहौल पर चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल ने एक सवाल रखा कि ऊरी हमले के बाद पिछला जो सर्जिकल स्ट्राइक हुआ और अब ये जो इंडियन एयरफोर्स ने किया है, इससे क्या वह धारणा टूट गई है कि न्यूक्लियर पॉवर रहते हुए भी इस तरह की परिस्थितियां आने पर या किसी तरह की क्रॉस बॉर्डर टेररिज्म की स्थिति में हम पाकिस्तान को जवाब दे सकते हैं? या हम न्यूक्लियर पॉवर होते हुए भी एक लिमिटेड लेवल पर एक दूसरे से कॉन्फ्रंट कर सकते हैं?इसका जवाब देते हुए स्मिता ने कहा कि अगर आप न्यूक्लियर डेटरेंस की बात करते हैं तो न्यूक्लियर डेटरेंस क्या है? इस कांसेप्ट को लेकर बहुत चर्चाएं होती रहती हैं. जब आपके पास परमाणु हथियार होता है तो क्या वो सही में डेटरेंस का काम करता है? या सामने वाले को और प्रोवोक करता है. सामने वाले को और आक्रामक रवैया अपनाने पर मजबूर करता है. इसकी वजह से हम एक ‘आर्म्स रेस’ देखते हैं.स्मिता कहती हैं, “इन सबके बीच दो चीज़ें हमें नहीं भूलनी चाहिए. पुलवामा में हमला हुआ, जैश-ए-मोहम्मद ने जिसकी ज़िम्मेदारी ली. 40 जवानों की जानें गईं. भारत जैसे देश में, जो आज विश्व भर में खुद को एक बड़ी पोजीशन पर महसूस कर रहा है. इस वक़्त चुनाव हों या न हों, लेकिन हमले से एक दबाव निश्चित तौर पर बन जाता है सरकार पर कि वो कोई न कोई कार्रवाई ज़रूर करे. भारत ने जवाबी हमला करते हुए कहा कि हमने बालाकोट में गैर सैन्य हमला किया है. और सूत्रों के हवाले से पता चला कि यह बालाकोट दरअसल पाक के कब्जे वाले कश्मीर में नहीं बल्कि खैबर पख्तूनख्वाह में है, जो पाकिस्तान की सीमा के बिल्कुल अंदर है.”स्मिता आगे कहती हैं, “भारत, अमेरिका जैसा एक देश हो जो ऐब्टाबाद में घुसकर नेवी सील्स के ज़रिए ओसामा बिन लादेन को मार गिराता है. पर यहां वैसा नहीं है. भारत-पाकिस्तान की सीमाएं लगी हुई हैं. हमारी जो हक़ीकत है वो अमेरिका और पाकिस्तान की हकीकत से अलग है. इसलिए हमें साईट नहीं लूज करनी चाहिए.”चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अतुल ने कहा, “बार बार ये जो स्थिति आती थी कि हम दोनों न्यूक्लियर पॉवर होने की वजह से लगभग तल पर आ गए हैं. ये न्यूक्लियर ब्लैकमेल पाकिस्तान की तरफ से होता था. हम एक सीमा से आगे नहीं जा सकते थे. लेकिन अब ये कहा जा रहा है कि नरेन्द्र मोदी ने इस धारणा को तोड़ दिया है और यह नया इंडिया है, अब इन सबके रहते हुए भी भारत-पाकिस्तान में जाकर हमला कर सकता है. इसको एक नया टर्म दिया गया कि यह भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में वाटरशेड मोमेंट है.”यहां पर चर्चा में हस्तक्षेप करते हुए अनिल कहते हैं कि ‘न्यू इंडिया’ और एक नया चलन शुरू करने वाली जो बात है कि भारत अब पहले की तरह आतंकवाद को सहन करने वाला देश नहीं रहा. हम उस तरह तरह से कार्रवाई करेंगे जैसा की अमेरिका आतंकवाद की स्थिति में करता रहा है. लेकिन मैं थोड़ा पीछे जाना चाहूंगा कि ऑल ऑफ सडेन, अचानक, रातोंरात आप अपना कैरेक्टर नहीं बदल सकते. इसको थोड़ा पॉलिटिकली भी देखना चाहिए कि अगर सचमुच आतंकवाद मोदी सरकार का कंसर्न है तो सडेन एक्शन की बजाय और भी बहुत कुछ है जो किया जा सकता था.

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    55 min
  • एपिसोड 57: भारत रत्न, भूपेन हजारिका, एन राम और अन्य
    इस चर्चा की रिकॉर्डिंग के दौरान ही कश्मीर में अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले को अंजाम दिया जा रहा था. सीआरपीएफ के 40 जवानों की एक आत्मघाती हमले में मौत हो गई. हम इस विषय पर चर्चा नहीं कर सके लेकिन यह विषय ही इस पूरे हफ्ते चर्चा में रहेगा. एनएल चर्चा का केंद्रित विषय रहा मशहूर गायक भूपेन हजारिका को दिए गए भारत रत्न को उनके बेटे तेज हजारिका द्वारा वापस करना. तेज ने एक बयान में बताया कि इसकी वजह नागरिकता संशोधन बिल 2016 है. उन्होंने कहा कि यह बिल भूपेन हजारिका के विचार और मूल्यों के सर्वथा विपरीत है. जब तक सरकार इसे वापस नहीं ले लेती, वह अपने पिता के लिए यह सम्‍मान ग्रहण नहीं करेंगे. इसके अलावा द हिन्दू के संपादक एन राम की रफेल घोटाले संबंधी रिपोर्ट, युवा साहित्यकार अविनश मिश्र की कामसूत्र से प्रेरित नए कविता संग्रह के तमाम पहलुओं, पत्रकार अर्नब गोस्वामी पर गोपनीय दस्तावेज हासिल करने के अपराध में एफआईआर आदि पर इस बार की एनएल चर्चा केंद्रित रही.चर्चा में इस बार युवा कवि व साहित्यकार अविनाश मिश्र ने बतौर मेहमान शिरकत किया. साथ में पत्रकार और लेखक अनिल यादव और न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकर आनंद वर्धन भी चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.भूपेन हजारिका का भारत रत्न पर बातचीत करते हुए अतुल ने अविनाश से पूछा, "मैं आपसे जानना चाहूंगा क्या भारत रत्न जैसे बड़े सम्मान को इन सब बातों और राजनीति से अलग रखना चाहिए? तेज हजारिका ने भी थोड़ा सा बचपना दिखया है?”अविनाश जवाब देते हुए कहते है, "एक ऐसे समाज में जहां चीज़ें लगातार गड़बड़ हो रही हो तो एक नागरिक सोचता है की वो प्रतिरोध कैसे करे, उदाहरण के तौर पर जब अख़लाक़ वाला कांड हुआ था दादरी में तब हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार उदय प्रकाश का एक बयान आया था कि वो कैसे इसका प्रतिरोध करें. तो उनको ख्याल आया राज्य ने उनको सम्मानित किया है. तो उन्होंने राज्य द्वारा दिए गए सम्मान को लौटा दिया. मुझे लगता है एक सामान्य नागरिक होने के नाते कोई तरीका नहीं बचता आपके पास. एक सामान्य नागरिक जो खुद कुछ नहीं कर सकता जिसके बस में कुछ नहीं है तो मुझे लगता है उसके पास कोई तरीका है तो वो यही है कि सम्मान वापस लौटा देना. उदय प्रकाश जी ने यही किया. मैं मानता हूं भूपेन हजारिका जी के बेटे शायद इस बात को ज़्यादा समझते हैं.”चर्चा को आगे बढ़ाते हुए आनंद वर्धन कहते हैं, "मेरा इस पर कोई स्पष्ट मत नहीं है लेकिन ऐसा भी कुछ समाचार पत्रों ने लिखा है कि तेज हजारिका आपने पिता के साथ ज़्यादा रहे भी नहीं थे. तो अब जो व्यक्ति है ही नहीं उसका किस विषय पर क्या धारणा होगी ये तो अब अटकल का विषय है. कोई भी राजनैतिक विचारधारा हो, वो भारत रत्न के हक़दार थे. एक बड़ी सांस्कृतिक शख्सियत होने के कारण मेरे ख्याल में भारत रत्न स्वीकार करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए. वहां के जो लोग नागरिकता संशोधन बिल का विरोध या समर्थन कर रहे हैं उनमें हज़ारिका के पुत्र उसके विरोध में हैं ये तो निश्चित हो ही गया है. अब इसका निष्कर्ष क्या होगा ये निर्णय तो उनके परिवार को करना है. हालांकि परिवार में भी इस पर एकमत नहीं है.”इस पर अनिल यादव आपने नजरिए को परिभाषित करते हुए कहते हैं, "इस प्रश्न को इस नज़रिए से भी देखा जा सकता है की क्या भारत रत्न जैसा पुरस्कार किसी राजनीति के तहत नहीं दिया जाता है. अगर वो राजनीति के तहत नहीं दिया जाता तो ये मांग क्यों लगातार होती रहती है कि फला की उपेक्षा हो रही है, उनको मिलना चाहिए था. इसके पीछे हमेशा राजनीति रही है अगर राजनैतिक कारणों से पुरस्कार दिया जा सकता है तो उससे वापस भी किया जा सकता है. अब ये जो नागरिकता संशोधन का मसला है ये नार्थ ईस्ट में, तो मैं कह सकता हूं कि ये वहा के लोगों के जीवन के लिए बहुत केन्द्रीय मसला है. नार्थ ईस्ट ही वो जगह है जहा पिछले एक साल के भीतर देशद्रोह के सबसे ज़्यादा मामले लोगो पर दर्ज किए गए हैं. और ये वो लोग है जो नागरिकता संशोधन बिल का विरोध कर रहे थे."राफेल डील पर एन राम की रिपोर्ट और अर्नब गोस्वामी पर एफआईआर के आदेश पर भी पैनल के बीच चर्चा हुई. आनंद वर्धन और अविनाश मिश्र ने इस चर्चा में अपने अनुभव साझा किए. अन्य विषयों पर पैनल की विस्तृत राय जानने के लिए पूरी चर्चा सुने.

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    1 hr 3 min
  • एपिसोड 56: ममता-सीबीआई विवाद, मार्कंडेय काटजू और अन्य
    इस हफ्ते चर्चा का मुख्य विषय रहा पश्चिम बंगाल में सीबीआई का अनपेक्षित छापा, नतीजे में सीबीआई टीम की गिरफ्तारी और साथ में ममता बनर्जी का सत्याग्रह. ममता बनर्जी ने अपने पुलिस प्रमुख राजीव कुमार से पूछताछ करने पहुंची सीबीआई टीम को पूरे हिंदुस्तान में सुर्खी बना दिया. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई से संबंधित एक लेख लिखा जिसे किसी भी भारतीय मीडिया ने प्रकाशित नहीं किया. इस लेख में मुख्य न्यायाधीश से 4 सवाल पूछे गए थे. इसको लेकर मार्कंडेय काटजू ने भारतीय मीडिया के चरित्र, कार्यशैली पर काफी तीखा प्रहार किया. साथ ही राहुल गांधी का नितिन गडकरी के बयान को समर्थन और ट्विटर पर हुई बहस और अन्ना हज़ारे का रालेगण सिद्धि में अनशन आदि विषय इस बार की एनएल चर्चा के केंद्र में रहे.चर्चा में इस बार वरिष्ठ पत्रकार अनुरंजन झा पहली बार मेहमान के रूप में हमारे साथ जुड़े. झा एक स्वतंत्र पत्रकार हैं. साथ ही पत्रकार और लेखक अनिल यादव और न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकर आनंद वर्धन भी चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.सीबीआई और ममता बनर्जी के जुड़े टकराव पर बातचीत करते हुए अतुल ने आनंद से कहा, “सीबीआई ने कोलकाता के पुलिस प्रमुख राजीव कुमार के यहां छापा मारा. जवाब में बंगाल की पुलिस ने सीबीआई अधिकारियों को ही गिरफ्तार कर लिया. भाजपा कह रही है ये एक संवैधानिक संकट है, तृणमूल वाले कह रहे है ये लोकतंत्र की हत्या है. विरोध में ममता बनर्जी सत्याग्रह पर बैठ गईं. यहां तक तो सब ठीक था लेकिन साथ में अजीब बात यह रही कि राजीव कुमार भी सत्याग्रह पर बैठ गए. एक पुलिस अधिकारी का इस तरह से सत्याग्रह पर बैठ जाना क्या बताता है?”आनंद ने इस स्थिति को पुलिस के राजनीतिकरण से जोड़ते हुए कहा, “जितनी भी अखिल भारतीय सेवाएं हैं, आईएएस, आईपीएस आदि, यह सभी अचार संहिता नियम 1968 से जुड़ी हैं. पहले राजनैतिक वर्ग और अधिकारी तंत्र दोनों का एक हद तक तालमेल था क्योंकि एकमात्र शक्तिशाली पार्टी कांग्रेस थी. अब राज्यों के स्तर पर राजनीति का स्थानीयकरण हुआ है, इसके फलस्वरूप अधिकारियों का भी बंटवारा हुआ है. अधिकारी जातीय खेमों में भी बंटे हुए हैं. सबसे ज़्यादा राजनीतिकरण पुलिस का इसलिए दिखता है क्योंकी रोज़मर्रा के जीवन में लोगों का राज्य के अंग के तौर पर सबसे ज्यादा सामना पुलिस से ही होता है. राजीव कुमार का अनशन पर बैठना तो सही नहीं है पर यह अभूतपूर्व भी नहीं है.”चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अतुल कहते हैं, “एक बात और है. एक हफ्ते पहले ममता बनर्जी ने कोलकाता में जिस तरह से समूचे विपक्ष की गोलबंदी की थी, उसने भी कहीं न कहीं हलचल पैदा कर दी थी केन्द्र सरकार के भीतर. यह भी एक वजह है ममता और मोदी के टकराव की.”अनुरंजन जा यहां पर हस्तक्षेप करते हुए कहते हैं, “केन्द्र की सरकार जिस तरीके से अभी चल रही है, चुनाव बिलकुल सिर पर है और सत्ताधारी पार्टी के प्रवक्ता कहते हैं की वो स्लॉग ओवर के छक्के लगा रहे हैं. तो उनके हिसाब से तो यह सब छक्का है, अब वो नो बॉल पर मार रहे है या वो बॉउंड्री पर कैच हो रहे हैं, ये किसी को नहीं पता है. ये सब बाद में पता चलेगा. लेकिन हो ये रहा है की जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी की सरकार पिछले दो-तीन महीने में एक्टिव हुई है, खासकर विपक्षी पार्टियों को लेकर, वह काम उसे 4 साल पहले करना चाहिए था. आप 5 साल सत्ता में रहे. जिन आधार पर आप सत्ता में आए उनको लेकर आपने 5 सालों में कुछ किया नहीं. और फिर आप अचानक आ कर कहने लगे कि भ्रष्टाचार का विरोध कर रहे है और भ्रष्टाचार पर कार्रवाई कर रहे है तो आपको पता होना चाहिए कि उसके भी कुछ नियम और कानून तय हैं. यह सही बात है कि ममता जिस तरह से विपक्ष की गोलबंदी कर रही हैं उसपे सबकी नज़र है. सबको पता है अगर विपक्ष एकजुट हो गया तो बहुत बड़ा नुकसान हो जायगा.”नितिन गडकरी का बयान और अन्ना हज़ारे पर भी पैनल के बीच चर्चा हुई. आनंद वर्धन और अनुरंजन झा ने इस चर्चा में अपने दिलचस्प अनुभव साझा किए. अन्य विषयों पर पैनल की विस्तृत राय जानने के लिए पूरी चर्चा सुने.

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    58 min
  • एपिसोड 55: राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग, चंदा कोचर और अन्य
    इस हफ्ते की चर्चा बिज़नेस स्टैंडर्ड में छपी सोमेश झा की रिपोर्ट के इर्द गिर्द सिमटी रही. इसके मुताबिक मौजूदा समय में बेरोजगारी की दर सबसे अधिक है. बीते 45 वर्षो में यह सबसे ऊंचे स्तर पर जाकर करीब 6.1% तक पहुच गई है. नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस का लेबर फोर्स सर्वे 2017-18 का यह आंकड़ा है. इससे पहले ही नेशनल स्टैटिस्टिकल कमीशन यानी राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के दो गैर सरकारी सदस्यों ने भी इस्तीफा दे दिया. इनके नाम पीसी मोहनन और जीवी मिनाक्षी हैं. इसके साथ ही अब एनएससी में सिर्फ एक सदस्य नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत शेष रह गए हैं. इसके अलावा भारत के पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिज़ का लंबी बीमारी के बाद निधन, कोबरापोस्ट की एक खोजी पड़ताल जिसमें उन्होंने लोनदाता कंपनी एडीएफएल द्वारा करीब 31000 करोड़ की हेराफेरी का दावा और राहुल गांधी की घोषणा जिसमें उन्होंने न्यूनतम आय की गारंटी योजना लागू करने का वादा किया है. साथ में भाजपा के मंत्री नितिन गडकरी का बयान और आईसीआईसीआई बैंक की मुखिया रही चन्दा कोचर के ऊपर सीबीआई द्वारा दर्ज किया गया एफआईआर भी इस चर्चा के केंद्र में रहे.इस बार की चर्चा में बतौर मेहमान एशियाविल वेबसाइट के पत्रकार दिलीप खान हमारे साथ जुड़े. इससे पहले वो राज्यसभा टीवी से जे थे. साथ ही न्यूज़लॉन्ड्री के विशेष संवादाता बसंत कुमार और न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकर आनंद वर्धन भी चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का संचालन हमेशा की तरह न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के आकड़ों से जुड़े विवाद से हुई अतुल ने कहा, “दो दिन पहले राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग से जुड़े दो अंतिम गैर सरकारी सदस्य पीसी मोहनन और जेवी मिनाक्षी ने इस्तीफा दे दिया. इनका आरोप था कि सरकार बेरोजगारी से जुड़े आंकड़े दबा कर बैठी है, जारी नहीं कर रही है. इसके साथ ही अब राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग निष्क्रिय संस्था बन गया है. राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग देश में तमाम तरह के बेरोज़गारी और अन्य आर्थिक संबंधी आंकड़ों को तैयार करने वाली ज़िम्मेदार संस्था है. माना जाता है कि दुनिया भर में आंकड़ों को इकट्ठा करने वाली गिनी चुनी संस्थाओं में से भारत की राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग को गिना जाता था. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की एक प्रोफेसर जयति घोष जो कि एक अर्थशास्त्री भी हैं, उनका कहना था की सरकार जानबूझ कर इस संस्था को कमज़ोर करने में लगी हुई थी. 2017 से 2018 के बेरोज़गारी के जो आकड़े हैं, सीधे-सीधे उसका संबंध नोटबंदी जैसे अहम फैसले से जुड़ता है. बिज़नेस स्टैंडर्ड ने उसका एक लीक हिस्सा प्रकाशित किया है. मैं बसंत से यह जानना चाहूंगा कि ये जो राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के सदस्य ने जो इस्तीफा दिया उनसे बातचीत में आपको क्या लगा की सरकार जानबूझकर इसको दबाती जा रही थी या फिर इसके पीछे कोई और वजह भी है?”अपनी बात रखते हुए बसंत ने कहा, "जिन लोगों ने अपने पद से इस्तीफा दिया है उनसे सम्पर्क नहीं हो पाया लेकिन मैंने प्रणब सेन से विस्तार से बात की,, जो कि मौजूदा सरकार के दौरान एनएससी के चेयरमैन थे. उन्होंने बताया के जब वे चेयरमैन था तब सरकार का नया नया गठन हुआ था हमारे आकड़ो से सरकार की सफलता-असफलता तय नहीं होती थी. लेकिन अभी जो सरकार है वह जानबूझ कर आंकड़ों को जारी नहीं कर रही है. जिन लोगो से अपने पद से इस्तीफा दिया है उन लोगों ने मुझसे बात की थी और यह आंकड़े इसीलिए जारी नहीं हो रहे है क्योकि बेरोज़गारी दर बहुत बुरी स्थिति में है. सरकार नहीं चाहती की चुनाव से दो महीने पहले ऐसा कोई आंकड़ा सामने आए जिससे उसको नुकसान. इन आकड़ों से एक तरह से सरकार की पोल खुल जाएगी और सरकार किसी भी स्थिति में ऐसा नहीं चाहेगी. हालांकि बजनेस स्टैंडर्ड में यह ख़बर छप चुकी है. आंकड़े कितने सही हैं ये तो बाद में तय होगा.”चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अतुल कहते है, “दिलीप राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग जो इस प्रकार की लोकतांत्रिक संस्थाए हैं अगर ये ठीक से काम नहीं करती हैं तो आपको पता ही नहीं चलेगी कि देश में बेरोज़गारी की दर क्या है. ऐसे में आप बेरोज़गारी को कम करने लिए नीतियां कैसे बनाएंगे. इसके आलावा भी तमाम संस्थानों के साथ सरकार का टकराव रहा है. क्या यह इस सरकार की अक्षमता का सबूत है?”इसका जवाब देते हुए दिलीप ने कहा, “ऐसा नहीं है की सरकार को इन आकड़ों का पता नहीं है सरकार के सामने ये आकड़े पेश हो चुके हैं एनएससी ने एनएसएसओ के सामने डेटा रखा और एनएसएसओ इसे अप्रूव करता है. सरकार के पास ये सारे डेटा हैं. होम मिनिस्ट्री ने जब एनसीआरबी ने जब किसान आत्महत्या के आंकड़े जारी करना बंद किया तो यह भी इसीलिए कि ये आंकड़े सरकार की छवि के ख़िलाफ़ जाते हैं.”

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    1 hr
  • एपिसोड 54: प्रियंका गांधी, महागठबंधन, ईवीएम हैकिंग और अन्य
    इस हफ्ते की चर्चा कांग्रेस द्वारा प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाने पर केंद्रित रही. 2019 लोकसभा चुनावों से ठीक पहले प्रियंका गांधी को मैदान में उतारने के क्या अर्थ है और इसके क्या परिणाम संभावित हैं, इन सब विषयों पर चर्चा हुई साथ ही कोलकाता में ममता बनर्जी ने एक बड़ी विपक्ष की रैली आयोजित की जिसमें करीब 20 बड़े राजनैतिक दलों के नेता और उनके प्रतिनिधि शामिल हुए. इस पर बीजेपी की तरफ से एक प्रतिक्रिया आई कि यह भ्रष्ट और नामदार लोगो का गठबंधन है. क्या भाजपा के अंदर कोई बेचैनी पैदा हुई है, इस पर भी पैनल ने बहस की. बीते हफ्ते एक और बड़े घटनाक्रम के तहत सईद शुज़ा नाम के साइबर एक्सपर्ट ने लंदन में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके दावा किया कि ईवीएम को हैक किया जा सकता है और 2014 के बाद से देश में हुए सारे चुनाव में ईवीएम के जरिए घपला किया गया है. ईवीएम में गड़बड़ी के ज़रिए चुनावी नतीजों को प्रभावित किया गया है. हालांकि शुजा के दावे में तथ्य कम और खामियां बहुत हैं. जो कि हमारी चर्चा का विषय रहा. साथ ही ऑक्सफेम के वह रिपोर्ट भी हमारी चर्चा में शामिल हुई जिसमें देश के 9 बड़े उद्योगपतियों के पास देश की आधी आबादी के बराबर संपत्ति है.चर्चा में इस बार आउटलुक पत्रिका के असिस्टेंट एडिटर ओशिनॉर मजूमदार पहली बार चर्चा का हिस्सा बने, इसके अलावा न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकर आनंद वर्धन भी चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का संचालन हमेशा की तरह न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.शुरुआत प्रियंका गांधी को कांग्रेस पार्टी द्वारा पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाए जाने के निर्णय से हुई. अतुल ने आनंद वर्धन से पूछा, “आनंद एक सवाभाविक सा सवाल पैदा होता है की राहुल गांधी ने हाल ही में एक अच्छा परफॉर्मेंस दिया था. तीन राज्यों में कांग्रेस पार्टी जीतने में सफल रही. सबसे बड़ा सन्देश था की भाजपा का स्कोर 0-5 रहा. तो ऐसी स्थिति में आखिरी पल में प्रियंका गांधी को पार्टी में लाने के निर्णय को कैसे देखते है क्यों इसकी नौबत आन पड़ी कांग्रेस को?”इसका जवाब देते हुए आनंद ने कहा, “इसको कई नज़रिए से देखा जा सकता है. मैं इसमें नहीं जाना चाहूंगा. सम्भव है की यह एक पारिवारिक निर्णय हो, डाइनिंग टेबल निर्णय हो और कांग्रेस के लोग वहां बैठ कर पत्रकारों पर हंस रहे हों की ये लोग कैसे-कैसे कारण बता रहे हैं.”आनंद आगे कहते हैं, "अभी जो सपा-बसपा का अंक गणित है, जो केमिस्ट्री है उसमें कांग्रेस ने बदलाव कर दिया है. क्योंकी गठबंधन से दरकिनार करने से भी बुरी स्थिति है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश जहां अल्पसंख्यक या मुस्लिम संख्या में ज्यादा हैं वहां सपा-बसपा को स्पष्ट मज़बूती मिलती दिख रही है. लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश में गणित अभी भी उलझा हुआ है. यहां जातीय गणित है. सभी दलों का अपने वोटबैंक पर दावा है. मतलब स्थिति इतनी स्पष्ट नहीं है. कांग्रेस इस मुकाबले को त्रिकोणीय बनाकर भाजपा को कमज़ोर ज़रूर कर सकती है.”अतुल ने यहां पर ओशिनॉर को चर्चा में शामिल करते हुए पूछा, “आनंद ने बहुत सफाई से उस वाले सवाल को टाल दिया कि "ऐसा क्यों". तो मैं ये जानना चाहूंगा की आप उस क्यों के बारे में बात करना चाहेंगे या फिर आप भी प्रियंका को सक्रिय राजनीति में शामिल होने के संभावित नतीजों के बारे में ही बात करना पसंद करेंगे?”ममता बनर्जी की कोलकाता में बड़ी विपक्षी रैली और ईवीएम हैकिंग पर भी पैनल के बीच दिलचस्प सवाल-जवाब हुए. आनंद और ओशिनॉर मजूमदार ने इसमें हस्तक्षेप किया. अन्य विषयों पर पैनल की विस्तृत राय जानने के लिए पूरी चर्चा सुने.

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    54 min

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