NL Charcha

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  • एपिसोड 53: पोर्न और हिंसा का संबंध, उत्तर प्रदेश में गठबंधन और अन्य
    इस हफ्ते की चर्चा बीबीसी की उस रिपोर्ट को केंद्रित रही जिसमें भारत में पोर्न वीडियो, पोर्न वेबसाइट से सामाज में पड़ने वाले हिंसक प्रभावों की पड़ताल की गई. इसके अलावा कारवां पत्रिका की एक बड़ी खोजी रिपोर्ट में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल के बेटे विवेक डोवाल द्वारा कालेधन के लिए बदनाम केमन आइलैंड में कंपनी स्थापित करने का मामला, यकायक केंद्र सरकार के कई शीर्ष मंत्रियों, भाजपा नेताओं की बीमारी, उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के बीच हुआ गठबंधन आदि इस बार की चर्चा का मुख्य केंद्र रहे.चर्चा में इस बार दो नए मेहमान जुड़े, दिव्या आर्या जो की बीबीसी में वुमेन अफेयर, पत्रकार हैं साथ ही स्वतंत्र पत्रकार और लेखक अनिल यादव भी इस बार चर्चा का हिस्सा रहे. इसके अलावा न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकर आनंद वर्धन भी चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत बीबीसी की उस रिपोर्ट से हुई जिसमें पोर्न की समस्या और इसका महिलओं के प्रति होने वाली हिंसा से संबंध है. अतुल ने दिव्या से सवाल किया, “आपकी जो रिपोर्ट है, संक्षेप में आप हमारे श्रोताओं को बताए कि इसका विचार कहा से आया और इस रिपोर्ट का निष्कर्ष क्या रहा?”इसका जवाब देते हुए दिव्या ने कहा, “हमारी रिपोर्ट जो आपने बीबीसी हिंदी डॉट कॉम पर एक लेख के तौर पर पढ़ी वो एक घंटे की रेडियो डॉक्यूमेंट्री के तौर पर अंग्रेजी, हिंदी में बीबीसी रेडियो पर आई थी. इसकी शुरुआत एक ऐसे वीडियो से हुई जो मेरे पास मेरे एक व्हाट्सएप्प ग्रुप में आया था, जिससे बहुत सारे एक्टिविस्ट और पत्रकार जुड़े हुए हैं. उस वीडियो में एक लड़की के कपड़े फाड़ने की कोशिश 10-15 लड़कों का समूह कर रहा था.”दिव्या के मुताबिक बिहार के एक गांव से यह वीडियो आया था और ये ऐसा इकलौता वीडियो नहीं था. ऐसे वीडियो लगातार आते रहे हैं जिसमे लड़कियों के साथ ज़बरदस्ती की जा रही है, और उनकी अनुमति के बिना ये वीडियो बनाके फैलाया जा रहा है. और बातचीत करने पर सामने आया कि इन वीडियों को प्रोफेशनली कैमरे से शूट किए गए हिंसक पोर्नोग्राफी की तरह ही बड़ी मात्रा में शेयर किया जा रहा है.चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अतुल कहते है, "इस मसले जुड़ा एक विषय है सेक्स एजुकेशन का. हिंदुस्तानी सामाज में सेक्स टैबू है. सेक्स एजुकेशन को लेकर न तो कोई माहौल है ना उसको खुले मन से कोई स्वीकार करता है. अनिल यादव की एक कहानी है जिसमें भारतीय सामाज में सेक्स की बेसिक ट्रेनिंग का जरिया सड़क पर चलते हुए कुत्तों के बीच होने वाला सेक्स है या फिर घरों की छतों पर गौरैय्या या कबूतरों के बीच होने वाले सेक्स को देखकर युवा सेक्स की समझ पाते हैं. इस तरह के माहौल में तो आप लड़कियों की सेक्स एजुकेशन की बात ही छोड़ दीजिए. हिंदुस्तान के संदर्भ में सेक्स एजुकेशन और सेक्सजनित हिंसा है उन दोनों में किस तरह से तालमेल हो सकता है?इसका जवाब देते हुए अनिल यादव ने कहा, “हम लोग एक सोसाइटी के तोर पर बड़ी अजीब स्थिति में है. हमारे यहां सेक्स एजुकेशन या सेक्स पर बातचीत को एक तरह से अस्वीकार किया जाता है जबकि दूसरी तरफ वो एक नेचुरल आर्गेनिक चीज़ है. सेक्स एजुकेशन के अभाव में उसके बारे में जानना, उसके बारे में सीखना पोर्न वीडियो के ज़रिए शुरू होता है.”वो आगे कहते हैं, "मतलब हमारी सोसाइटी में इन चीज़ों पर बात करने के, इन चीज़ो के बारे में एजुकेट करने के चैनल, कब के बंद कर दिए गए हैं. यह एक पाखंडी और दोहरे मापदंडो वाला सामाज है. ऐसे में जो नई पीढ़ी है उनको अगर जानना है तो वो पोर्न के ज़रिए ही सीख़ रहे हैं. लेकिन यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि पोर्न अनिवार्य तौर पर हिंसक और सैडिस्ट होता है. इसलिए नई पीढ़ी पोर्न के जरिए जो कुछ भी सीख रही है वो हिंसा सीख रही है और परपीड़ा सीख रही है, और ये बहुत ख़तरनाक बात है."आनंद वर्धन ने इस विषय पर अपनी राय रखते हुए कहा, “सूचना क्रांति ने विजुअल सेक्स का तथाकथित तौर पर लोकतांत्रीकरण किया है. इसकी पहुंच आम जन तक हुई है. इससे जो सेक्शुअली रिप्रेस्ड समाज है विशेषकर उत्तर भारतीय समाज उसको अपनी कुंठा को अभिव्यक्त करने का एक आसान जरिया मिला है. तब लोगों को पोर्न से ज्यादा चिंता ननहीं थी जब यह कुछ खास लोगों तक सीमित था. लेकिन इसके लोकतांत्रीकरण से यह बहस देखने को मिल रही है. पोर्न से एक समाज कैसे डील करता है यह भी बहुत कुछ उस समाज के बारे में बताता है.”अजीत डोवाल और सपा-बसपा गठबंधन पर भी पैनल के बीच दिलचस्प सवाल-जवाब हुए. दिव्या और अनिल ने इस चर्चा में हस्तक्षेप किया. आनंद वर्धन ने भी कुछ जरूरी, ज़मीनी जानकारियां साझा की. उनका पूरा जवाब और अन्य विषयों पर पैनल की विस्तृत राय जानने के लिए पूरी चर्चा सुने.

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  • एपिसोड 52: सामान्य श्रेणी को आरक्षण, सीबीआई विवाद, राहुल गांधी का बयान और अन्य
    की जरूरत थी जो कि महज 48 घंटे में संसद के दोनों सदनों में पास हो गया. किसी भी बिल को पास करने की एक लंबी चौड़ी प्रक्रिया होती है, घंटों बहस चलती है उस पर विचार विमर्श किया जाता है, ज्यादा से ज्यादा लोगों के विचार उसमें शामिल होते हैं. लेकिन यहां एक हड़बड़ी नजर आती है. संविधान संशोधन में इतनी जल्दबाजी ठीक है?”इसका जवाब देते हुए आनंद ने कहा, “आरक्षण पर अंबेडकर ने कहा था कि आरक्षण तात्कालिक है और इसका प्रतिशत कम ही होना चाहिए. कुछ राज्यों में इसे बढ़ाया गया जैसे तमिलनाडु में जनसंख्या के आधार पर आरक्षण 50% से बढ़ाकर 67% कर दिया गया, लेकिन केंद्र सरकार द्वारा 10% आरक्षण बढ़ाना पैंडोरा बॉक्स खुलने जैसा है. अब केंद्र सरकार ने एक शुरुआत कर दी है. इससे बाकी समुदायों में भी आरक्षण पाने की होड़ लग सकती है. इसके अलावा ऐसा नहीं है कि आरक्षण मिलने से नौकरी मिल जाएगी. 10% आरक्षण के लिए जो क्राइटेरिया तय किया गया है उसके हिसाब से भारत की 95% आबादी आरक्षण के लिए योग्य है. अब उसमें तो प्रतिस्पर्धा बनी ही रहेगी यह सवर्णों के लिए खुद बहुत कंफ्यूज करने वाली स्थिति है.”चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अतुल ने सिद्धांत से सवाल किया, “आरक्षण का लक्ष्य था सामाजिक, शैक्षिक समानता लाना. जो चीजें जातियों से तय होती हैं उसको खत्म करने के लिए आरक्षण लाया गया था. हम पाते हैं कि लंबे समय से आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग भी हो रही थी. लेकिन यह 10% कोटा सामाजिक समानता के लक्ष्य को कहीं ना कहीं असफल करने वाली बात नहीं लगती?”इसका जवाब देते हुए सिद्धांत ने कहा, “आर्टिकल 15 (4) 16 (4) जिसकी आप बात कर रहे हैं उसमें सोशली और एजुकेशनली बैकवर्ड लोगों के बारे में जिक्र होता है, लेकिन इकोनॉमिकली बैकवर्ड के बारे में हम सिर्फ सुनते आ रहे थे. नरेंद्र मोदी उसे लेकर आ गए कि 10% आरक्षण आर्थिक आधार और पिछड़े लोगों को दिया जाएगा.”वो आगे कहते हैं, “66,000 प्रति महीना कमाने वाले आदमी को आप गरीब मानते हैं. तो देखना होगा कि इकोनोमिकली बैकवर्ड का क्लॉज़ जोड़ने के बाद भी आप हासिल क्या कर रहे हैं. कोई नई तस्वीर बन भी रही है या नहीं. क्योंकि हो सकता है सुप्रीम कोर्ट इसे रद्द कर दे, तब यह देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी की इस पॉलिटिक्स का क्या होगा.आरक्षण के मौजूदा स्वरूप को लेकर जो यथास्थिति है उसके बारे में बताते हुए सिद्धांत ने कहा, “2 साल पहले मैंने बीएचयू पर एक स्टोरी की थी. इसमें यह सामने आया, कि बीएचयू में असिस्टेंट प्रोफेसर की कुल 900 पोस्ट है जिसमें 850 केवल जनरल केटेगरी के प्रोफेसर हैं, एसटी कैटेगरी का एक भी प्रोफेसर नहीं है, एससी के 15 और ओबीसी के कुल 35 असिस्टेंट प्रोफेसर वहां पर कार्यरत है. यह स्थिति जब बनी हुई है नौकरियों में तो फिर सवर्ण के लिए आरक्षण की जरूरत ही क्या है.”इस मसले पर जयया निगम ने भी अपनी राय कुछ इस तरह से रखी, “आरक्षण का यह बिल आर्थिक तौर पर पिछड़े लोगों के लिए लाया गया है और अभी तक इसमें जितनी बातें सामने आई हैं उससे यह कहा जा सकता है इसका फायदा सभी धर्मों के लोगों को मिलेगा लेकिन इस पर अभी तक तार्किक रूप से ऐसा कुछ नहीं आया है, जिसमें यह साफ हो कि सरकार आर्थिक तौर पर पिछड़े हुए लोगों को कैसे पहचानेगी. इसमें एक बात और सामने आ रही है यूथ फॉर इक्वलिटी की, जो सामान्य श्रेणी के लोगों का एक फोरम है. यूथ फॉर इक्वलिटी इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में गया है. मतलब सवर्णों के अंदर भी दो मत हैं. अब आप गरीब सवर्ण कैसे तय करेंगे यह आने वाले समय में समाज के लिए एक बड़ी बहस हो सकती है.”पैनल की विस्तृत राय जानने और अन्य मुद्दों के लिए सुने पूरी चर्चा।

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  • एपिसोड 51: सरकारी एजेंसियों की निगरानी, एनआईए का 17 जगहों पर छापा और अन्य
    इस हफ्ते चर्चा का मुख्य विषय रहा नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी द्वारा 17 जगहों पर छापा मारकर आईएस के 10 कथित आतंकियों की गिरफ्तारी. इसके अलावा नोएडा के पार्क होने वाली जुमे की नमाज को लेकर पैदा हुआ विवाद, गृह मंत्रालय द्वारा 10 सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों को किसी के भी कंप्यूटर डाटा निगरानी की अनुमति और पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों परिणाम के बाद आया नितिन गडगरी का बयान भी चर्चा में शामिल रहे. इसके बाद से अटकलें लगाई जा रही हैं कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में खटपट चल रही है.इस बार की चर्चा में बतौर मेहमान हिदुस्तान टाइम्स के एसोसिएट एडिटर राजेश आहुजा शामिल हुए. साथ ही न्यूज़लॉन्ड्री के असिस्टेंट एडिटर राहुल कोटियल भी चर्चा का हिस्सा रहे. हमेशा की तरह चर्चा का संचालनन्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल ने राजेश से सवाल किया, "एनआईए द्वारा की गई कार्रवाई की टाइमिंग को लेकर जो सवाल खड़े हो रहे है कि चुनाव का मौसम आते ही इस तरीके की कार्रवाई खुफिया एजेंसियां करती हैं. आईएम से जुड़े मामलों में भी हमने देखा था कि युवकों को गिरफ्तारी भी होती है लेकिन कोर्ट में वो साबित नहीं हो पाती, क्या वास्तव एनआईए और अन्य एजेंसीयां सरकार के इशारे पर काम करती है या उनकी कोई स्वायत्तता भी है?"राजेश इसका जवाब देते हुए कहते है, “एनआईए के अधिकारियों ने बताया है कि इस पूरे मॉडयूल की चार महीने से निगरानी की जा रही थी. अधिकारी इनकी बातचीत पर नज़र रखे हुये थे, इनका एक हैंडलर भी था जिसने इन सब को उकसाया और एक ऐसा दस्ता बनाने को कहा. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है पिछले 3 सालों मे देश के अलग अलग हिस्सो में पहले भी ऐसे दर्जनों मामले सामने आए जो इस्लामिक स्टेट से प्रभावित थे. खुशकिस्मती से केवल मध्य प्रदेश ट्रेन ब्लास्ट के अलावा बाकी सभी बाकी सभी दस्ते कुछ कर पाते उससे पहले ही सुरक्षा एजेंसियों ने उनका भंडाफोड़ दिया. तो यह कहना सही नहीं होगा कि आगामी चुनावों के चलते एनआईए ने इस तरह की कार्रवाई कर रही है.”मुद्दे को आगे बढ़ते हुए अतुल ने पूछा, "राजनाथ सिंह ने 2016 में जब आईएस का प्रकोप चरम पर था, तब एक बड़ा बयान दिया था कि आईएस भारत के लिए कोई बड़ा खतरा नहीं है. तो क्या यह माना जाए कि 2 साल में स्थितियां बदल गई हैं?”इस पर राजेश ने जवाब देते हुए कहा, "इसे हमें तुलनात्मक दृष्टिकोण से देखना होगा. भारत में लगभग 25 करोड़ मुसलमान हैं उनमें से सौ-सवा सौ लोग अगर भटक जाते है तो यह बहुत बड़ी संख्या नहीं है. दूसरी तरफ यूरोप में पांच हज़ार से ज्यादा लोग आईएस में शामिल हुए और वापस आकर बड़ी घटनाओं को अंजाम दिया. भारत में ऐसे युवाओं को केवल गिरफ्तार किया गया बल्कि बहुत से ऐसे मामले भी थे जहां बच्चों को जाने से रोका गया, उनके परिवारों को काउंसलिंग दी गई. यहां तुलनात्मक रूप से संख्या बहुत कम है इसलिए आईएस को बहुत बड़ा खतरा नहीं माना गया.”आगे राहुल को चर्चा में शामिल करते हुए अतुल ने सवाल किया, “सोशल मीडिया के अतिवाद के दौर में हर विषय को लेकर एक माहौल बना दिया जाता है. व्यक्तिगत रूप से हम तय कर पाने की स्थिति में नहीं होते कि क्या सही है क्या गलत है. क्योंकि अतीत ऐसा रहा है कि इंडियन मुजाहिद्दीन के नाम पर तमाम युवाओं को गिरफ्तार किया गया फिर कुछ भी साबित नहीं हो पाया है.”इसका जवाब देते हुए राहुल ने कहा, “सुरक्षा एजेंसियों के दोनों तरह के रिकॉर्ड हमारे सामने हैं हम यह भी नहीं कह सकते कि एजेंसियां पॉलिटिकल टाइमिंग के हिसाब से काम करती हैं और दूसरी तरफ ऐसा भी नहीं है कि इनकी कार्यशैली इतनी मजबूत रही है कि इन पर आंख बंद करके भरोसा कर लिया जाय. जैसे मोहम्मद आमिर के मामले में हमने देखा कि जब वह जेल गया था, तब केवल 18 वर्ष का ही था और 18 वर्ष जेल में रहने के बाद वो निर्दोष साबित हुआ. उसकी लगभग सारी जिंदगी जेल में कट गई और उसके बाद हमारा सिस्टम ऐसे लोगों के पुनर्वास का कोई इंतजाम नहीं कर पाता. लेकिन सिर्फ टाइमिंग की वजह से एनआईए की कार्रवाई को नकारा नहीं जा सकता. क्योंकि यह बात सच है कि किसी भी तरह का चरमपंथ काम करता है और उसके अनेक उदाहरण हमने देखे हैं. कश्मीर की अगर हम बात करें तो 90 के दशक में वह क्षेत्रीय अस्मिता का सवाल हुआ करता था लेकिन आज वह क्षेत्रीय अस्मिता से ज्यादा धार्मिक कट्टरता का सवाल बन चुका है. कश्मीर में चरमपंथ बढ़ा है, इसे नकारा नहीं जा सकता.”

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    1 hr 1 min
  • एपिसोड 50: सज्जन कुमार को सज़ा, फ्रांस में आंदोलन और अन्य
    एनएल चर्चा अपने 50वें अध्याय पर पहुंच गई. इस लिहाज से इस बार की चर्चा बेहद ख़ास रहीं. 50वीं चर्चा को हमने न्यूज़लॉन्ड्री के यूट्यूब चैनल पर लाइव प्रसारित किया.इस बार की चर्चा का मुख्य विषय रहा 1984 के सिख विरोधी दंगों के एक मामले में कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को हुई उम्रकैद की सज़ा. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट द्वारा राफेल डील के मामले में हुए कथित घोटाले के आरोपों से जुड़ी सारी याचिकाओं को ख़ारिज करना, दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु के नेता एमके स्टालिन द्वारा राहुल गांधी को अगला प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की घोषणा और साथ ही फ्रांस में बीते डेढ़ महीने से चल रहे यलो वेस्ट आंदोलन पर हमारी चर्चा केंद्रित रही.इस बार की चर्चा में बतौर मेहमान द वायर की सीनियर एडिटर आरफा खानम शेरवानी हमारे साथ जुड़ी साथ ही साथ न्यूज़लॉन्ड्री के ओपिनियन राइटर व स्तंभकार आनंद वर्धन भी इस चर्चा का हिस्सा रहे. इसके अलावा न्यूज़लॉन्ड्री के असिस्टेंट एडिटर राहुल कोटियाल भी चर्चा में शामल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.

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    52 min
  • एपिसोड 49: पांच राज्यों के चुनाव, उर्जित पटेल का इस्तीफा और अन्य
    इस बार की चर्चा का केंद्र पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में आए नतीजे रहे. इसके आलावा आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल का समय से पहले अपने पद से इस्तीफा देना, नए गवर्नर के रूप में शक्तिकांता दास का पद संभालना, रफेल विमान सौदे पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आदि विषय इस बार की चर्चा के मुख्य बिंदु रहे.इस बार की चर्चा में बतौर मेहमान न्यूज़ 24 चैनल की पत्रकार साक्षी जोशी और वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी शामिल हुए. इसके अलावा न्यूज़लॉन्ड्री के असिस्टेंट एडिटर राहुल कोटियाल भी चर्चा का हिस्सा रहे. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत अतुल चौरसिया ने पांच राज्यों के विधानसभा के चुनावी नतीजों से की. उन्होंने पैनल के सामने एक सवाल रखा, “जिस रूप में भाजपा पिछले 4-5 सालों में बदली है, हमने देखा कि हर विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद नरेंद्र मोदी दिल्ली की सड़कों पर विजय परेड निकालते थे. उस दौरान मोदी जो भाषण देते थे उसमें एक विचित्र सी साम्यता दिखाई देती थी. वो अमित शाह को जीत का पूरा श्रेय देते थे बजाय पूरी पार्टी और उसके संगठन के. ये एक अलग तरीके की रणनीति दोनों नेताओं के बीच में विकसित हुई थी. अब इस हार से क्या उस जुगलजोड़ी के ऊपर किसी तरह का दबाव बढ़ा है?”इसके जवाब में हर्षवर्धन त्रिपाठी ने कहा, “जब हम माध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान के चुनावी नतीजों की बात करते हैं तो इससे पहले के भारतीय जनता पार्टी के जितने भी चुनाव हैं उसकी स्थिति में और इसमें एक बड़ा बेसिक सा अंतर है. फर्क ये हैं की ये वो 3 राज्य हैं जहां की मुख्यमंत्रियों को समय-समय पर नरेंद्र मोदी के कद का नेता समझा जाता रहा. यहां तक की अगर आप लोगों ने ध्यान दिया हो तो 2013 -14 के दौरान कई बार चर्चा चली कि शिवराज सिंह चौहान भी प्रधानमंत्री पद के एक ताकतवर दावेदार हैं.”हर्षवर्धन आगे कहते हैं, “पर शायद ऐसा नहीं हो सका. मैं ये नहीं मानता कि अमित शाह और नरेंद्र मोदी ने इन चुनावों में उस तरह से अपनी भूमिका नहीं निभाई जैसे बाकी राज्यों में करते थे. उसके बावजूद वे चुनाव हारे. मेरा मानना है कि मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ से बहुत अच्छा सन्देश है कि एक अरसे के बाद मतलब मुझे नहीं याद है की कब इस तरह से कोई चुनाव पूरी तरह स्थानीय मुद्दों पर लड़ा गया. राजस्थान एक बहुत बुरा चुनावी कैंपेन रहा. वहां कोई जमीनी मुद्दा नहीं था. विपक्ष के अभियान का एकमात्र मुद्दा था वसुंधरा अहंकारी हैं. यानी सब हवा हवाई मुद्दे थे.”नतीजों पर हो रही बहस का दूसरा पहलू था राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी को मिली चमत्कारिक सफलता. क्या इससे राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता स्थापित हो गई है या फिर इसे सिर्फ तुक्के में मिली जीत और एंटी इंकंबेंसी का नतीजा मानकर खारिज किया जा सकता है? साक्षी जोशी इस पर हस्तक्षेप करती हैं, “राहुल गांधी एक परिपक्व नेता के तौर पर साल भर पहले ही स्थापित हो गए थे. गुजरात चुनावों के दौरान उन्होंने जिस तरह से चुनाव अभियान की कमान संभाली वह ध्यान देने लायक है. उन्होंने. उन्होंने बार-बार एक बात कही कि आप (भाजपा के लोग) मुझे पप्पू कहते हैं. आप मुझे चाहे जो भी कहें लेकिन मेरे सवालों का जवाब जरूर दें. वो सवाल बहुत जरूरी हैं. तो जिस तरह से उन्होंने मुद्दों को पकड़े रखा और विपक्ष के उकसावे में बिना फंसे अपना अभियान चलाया वह उनकी क्षमता को साबित करता है.”राहुल कोटियाल ने इसके एक और पहलू पर रोशनी डाली, “राहुल गांधी की जो छवि साल भर पहले थी, ऐसा नहीं है कि उन्होंने उसमें कोई बड़ा बदलाव किया है. इन 3-4 सालों में मोदी की अपनी असफलताओं का इन नतीजों में भूमिका ज्यादा है. जिस तरह से उन्होंने अपनी छवि बनाई थी कि वो सबकुछ हल कर देंगे और बाद में जिस तरह से विधवा के संबंध में उनके अटपटे बयान आए, जिस तरह से प्रधानमंत्री की बातों को संसद की कार्यवाही से हटाना पड़ा, उन सबने मिलकर मोदी के लिए एक नकारात्मक माहौल बनाना शुरू कर दिया है.”राफेल डील और उर्जित पटेल के इस्तीफे पर भी दिलचस्प सवाल और निष्कर्ष के साथ साक्षी जोशी और राहुल कोटियाल ने इस चर्चा में हस्तक्षेप किया. हर्षवर्धन जी ने भी कुछ जरूरी, ज़मीनी जानकारियां साझा की. उनका पूरा जवाब और अन्य विषयों पर पैनल की विस्तृत राय जानने के लिए पूरी चर्चा सुने.

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    1 hr 8 min
  • एपिसोड 48: किसान आंदोलन, राममंदिर विवाद, राजस्थान चुनाव और अन्य
    इस बार की चर्चा का केंद्र रहा दिल्ली के रामलीला मैदान में देश भर से इकट्ठा हुए किसान और उनका संसद मार्च. इसके अलावा अयोध्या और बनारस में राम मंदिर निर्माण पर दो अलग-अलग संतों के आयोजन हुए, साथ ही साथ राजस्थान चुनाव में कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप का मुद्दा, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भगवान हनुमान को दलित समुदाय का बताने से मचे विवाद आदि विषय इस बार की चर्चा के मुख्य बिंदु रहे.इस बार की चर्चा में बतौर मेहमान शामिल हुए मीडिया विजिल वेबसाइट के संस्थापक सदस्य और पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव. इसके अलावा न्यूज़लॉन्ड्री के असिस्टेंट एडिटर राहुल कोटियाल भी चर्चा में शामिल रहे. न्यूज़लॉन्ड्री के विशेष संवाददाता अमित भारद्वाज इस समय राजस्थान चुनाव की कवरेज कर रहे हैं. वो हमसे फोन पर जुड़े. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत अतुल चौरसिया ने न्यूज़लॉन्ड्री के विशेष संवादाता अमित भारद्वाज के सामने एक सवाल रखकर की, “अमित हम देखते आ रहे हैं कि गुजरात के बाद राजस्थान का एक हिस्सा पिछले 3-4 सालों में हिंदुत्व की प्रयोगशाला के तौर पर उभरा है. अलवर के इलाकों में समय-समय पर गौरक्षकों का आतंक दिखा. अलवर के इलाके में कई मॉब लिंचिंग की घटनाएं देखने को मिली. क्या इन घटनाओं का असर राजस्थान के चुनाव पर दिख रहा हैं?”अमित ने कहा, “मैंने अपने कवरेज की शुरुआत राजस्थान के अलवर और भरतपुर इलाके से की थी. अलवर में विधानसभा की 11 सीटें है और भरतपुर में 7. अलवर इलाके में उग्र हिंदुत्व के कारण एक डिवाइड दिख रहा है. आप अगर मुस्लिम वोटर्स के पास जाएंगे तो उनकी एक अलग प्रतिक्रिया है और अगर आप हिन्दू वोटर के पास जाएंगे तो उनकी एक अलग प्रतिक्रिया है. यह कहीं ना नहीं पिछले कुछ सालों में हुई घटनाओं के कारण है. चाहे वो मॉब लिंचिंग हो या गौरक्षा हो. तमाम जो हिंदूवादी सांगठनों ने जो गतिविधियां की हैं, उनका असर इस चुनाव में साफ़-साफ़ दिख रहा है. इस इलाके में जब हमने कुछ लोगों से बात की तो पाया कि भाजपा को एक बढ़त है, हालांकि बहुतायत में युवा मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से खुश नहीं है. वहां युवा नारा लगा रहे थे- मोदी तुझसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं.”वो आगे कहते हैं, “एक चीज़ और है जो व्हाट्स ऐप के जरिएए फैलाया जा रहा है. एक सीट है रामगढ़, जहां पर रकबर खान की हत्या हुए थी. उस सीट पर कांग्रेस की प्रत्याशी है सफिया खान उनका एक वीडियो वायरल किया गया, जिसमें वो बयान दे रही हैं कि हर हालत में चुनाव जीतना है चाहें कुछ भी करना पड़े. उस वीडियो को हिंदूवादी संगठन के लोग खूब फैला रहे हैं. तो भाजपा की कोशिश डिवाइड के ऊपर चुनाव लड़ने की दिखती है.”यहां पर अतुल ने बात आगे ले जाते हुए कहा, “अमित, मैं यह समझना चाह रहा था की क्या पूरे राज्य में किसी तरह की हवा किसी पार्टी के पक्ष में बह रही है? मसलन हमने देखा है कि 2014 के जो लोकसभा चुनाव या फिर बंगाल के विधानसभा चुनाव ऐसे थे जहां साफ तौर पर एक हवा दिख रही थी. भविष्यवाणी करना आसान था. क्या इस तरह की ऐसी कुछ एंटी इंकम्बेंसी वेव राजस्थान में महसूस हो रही है?”इस पर अमित का जवाब आया, “राजस्थान में बड़ा इंट्रेस्टिंग ट्रेंड है. अगर आप राजस्थान का इतिहास देखे तो जो पार्टी प्रचंड बहुमत से सरकार बनाती है अगले चुनाव में बड़े ही शर्मनाक तरीके से हार जाती हैं. जैसे अशोक गेहलोत की सरकार जब हारी तो 25 सीटों पर सिमट के रह गई. उससे पहले भैरों सिंह शेखावत के साथ ऐसा हुआ हैं. इस बार लोग लगातार कह रहे हैं कि टक्कर कांटे की है.”अमित ने बताया, “जब प्रधानमंत्री ने भरतपुर में सभा की तो वहां से कुछ लोग प्रधानमंत्री के भाषण के बीच से ही जाना शुरू हो गए. हालांकि यह संख्या कम थी. लोग खुल कर बोल रहे थे की प्रधानमंत्री हमारे मुद्दों पर बात ही नहीं कर रहे हैं, इसलिए हम जा रहे हैं. ऐसी स्थिति में आप कंफ्यूज हो जाते हैं की जनता असल में करने क्या वाली हैं.”राजस्थान के चुनाव में तीसरे मोर्चे की भूमिका और कई अन्य दिलचस्प सवाल और निष्कर्ष के साथ अभिषेक श्रीवास्तव और राहुल कोटियाल ने इस चर्चा में हस्तक्षेप किया. अमित ने भी कुछ जरूरी, ज़मीनी जानकारियां राजस्थान से साझा की. उनका पूरा जवाब और अन्य विषयों पर पैनल की विस्तृत राय जानने के लिए पूरी चर्चा सुने.

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    52 min
  • एपिसोड 47: ट्विटर और पैट्रियार्की विवाद, इमरान-ट्रंप टकराव, सीबीआई और अन्य
    इस बार की चर्चा विशेष रूप से ट्विटर के सीईओ जैक डोर्सी की भारत यात्रा के दौरान मचे घमासान को समर्पित रही. हालांकि वह अपने देश लौट चुके हैं. इसके अलावा भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने घोषणा की है कि स्वास्थ्य सही न होने के कारण वे 2019 का चुनाव नहीं लड़ेंगी, हालांकि उन्होंने राजनीति से सन्यास नहीं लिया है. पाकिस्तान के करीबी मित्र अमेरिका द्वारा 1.66 बिलियन डॉलर की सुरक्षा सहायता राशि रद्द करने का फैसला और भारत की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई की लगातार उलझती गुत्थी के इर्दगिर्द इस बार की चर्चा केंद्रित रही.इस बार की चर्चा में स्वतंत्र पत्रकार स्वाति अर्जुन बतौर मेहमान शामिल हुई साथ ही राजनीतिक पत्रकार सैय्यद मोजिज़ इमाम भी पहली बार चर्चा का हिस्सा बने. इसके अलावा न्यूज़लॉन्ड्री के विशेष संवाददाता अमित भारद्वाज भी चर्चा का हिस्सा रहे. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत अतुल चौरसिया ने स्वाति अर्जुन के सामने एक सवाल रखकर की, “ट्विटर सीईओ जैक डोर्सी ने कुछ महिला पत्रकार और कुछ महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मीटिंग की. उस मीटिंग में किसी ने उन्हें एक पोस्टर गिफ्ट किया, जिस पर लिखा था- स्मैश द ब्राह्मिनिकल पैट्रियार्की यानी ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का नाश हो. इसे जाति विशेष से जोड़कर जिस तरह से दक्षिणपंथी समूहों ने हमला किया, उसे किस हद तक जायज या नाजायज कहा जा सकता है?"स्वाति ने कहा, “यह जो मुद्दा उठा है मुझे लगता है यह ब्लेसिंग इन डिस्गाइज़ मोमेंट है. सोशल मीडिया के लिए ट्विटर, फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म के लिए. अगर हम भारत में देखे तो हाल के 2-4 सालों में सोशल मीडिया ट्रोलिंग, गाली-गलौज, लिंचिंग जैसी चीजें लगातार बढ़ती जा रही है. पता नहीं कितनी महिलाओं को सोशल मीडिया पर रेप करने की धमकी दी गई हैं. महिलाओं के ख़िलाफ़ भद्दी भाषा का भी इस्तेमाल किया जाता है. तो इसलिए मैं इसको ब्लेसिंग इन डिस्गाइज़ मोमेंट ही मानती हूं.”वो आगे कहती हैं, “जहां तक सवाल है जाति का तो सोशल मीडिया में कहा जाता है कि पढ़ा-लिखा तबका है जो एक ख़ास तबके से ही आता है. वो ब्राह्मणवाद को ब्राह्मण कैसे समझ लेते हैं. जब आप ब्राह्मणवाद की बात कर रहे हैं तो आप ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की बात कर रहे हैं. और जिस दलित महिला ने ये पोस्टर डोर्सी को दिया उनका ये अभियान काफी सालों से चल रहा है जो की दलित महिलाओं का ग्रुप हैं.”उन महिलाओं ने बस यही बताया की मैं एक पिछड़ी, निचली जाति से आती हूं तो जब भी मेरे ऊपर कोई हमला करता है तो उसमें जाति का एंगल जोड़ देता है.यहां पर अतुल ने हस्तक्षेप किया, “मुझे लगता हैं जिस तरह से ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को ब्राह्मण जाति से जोड़ा गया उसके दो पहलु हैं. पहला, जो प्रभावी संस्कृति है देश की उस पर सवर्ण जातियों का कब्जा है. जाहिर है ब्राह्मण उसमें शीर्ष पर है. अगर किसी तरह की अच्छाई या बुराई इसमें है तो प्रतीकात्मक रूप से ब्राह्मण को इस्तेमाल किया जाता है. क्योंकि यह ब्राह्मणों की हितैषी की संस्कृति है.”

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    54 min
  • एपिसोड 46: बीबीसी की फ़ेक न्यूज़ पर रिसर्च, सीएनएन-ट्रंप टकराव, रफाल विवाद और अन्य
    इस बार की चर्चा विशेष रूप से फ़ेक न्यूज़ को समर्पित रही. बीबीसी द्वारा फेक न्यूज़ के ऊपर किया गया एक रिसर्च इस हफ्ते बहस में रहा. इसके अलावा अमेरिका में ट्रंप प्रशासन द्वारा सीएनएन के व्हाइट हाउस संवाददाता जिम एकोस्टा का पास निलंबित करना, बदले में सीएनएन द्वारा ट्रंप को अदालत में घसीटना और एएनआई समाचार एजेंसी की संपादक स्मिता प्रकाश द्वारा रफाल लड़ाकू जहाज बनाने वाली कंपनी दसों के सीईओ का साक्षात्कार इस हफ्ते की एनएल चर्चा के प्रमुख विषय रहे.इस बार की चर्चा में बीबीसी डिजिटल हिंदी के संपादक राजेश प्रियदर्शी बतौर मेहमान शामिल हुए. इसके अलावा न्यूज़लॉन्ड्री के असिस्टेंट एडिटर राहुल कोटियाल, विशेष संवाददाता अमित भारद्वाज भी शामिल रहे. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत अतुल चौरसिया ने राजेश प्रियदर्शी के सामने एक सवाल के साथ की- “बीबीसी के रिसर्च की बड़ी चर्चा है. हम चाहेंगे कि आप संक्षेप में इसके मुख्य नतीजों और रिसर्च के तरीके के बारे में बताएं.”राजेश प्रियदर्शी ने बताया, “फ़ेक न्यूज़ को लेकर हर तरफ से कहा जाता है कि दूसरा पक्ष फ़ेक न्यूज़ फैला रहा है. समस्या की जड़ वहां है जहां आम आदमी किसी न्यूज़ पर भरोसा करके उसे आगे बढ़ाता है. यह काम वो किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए करता है.”वो आगे कहते हैं, “हमने इस रिसर्च के जरिए यह जानने की कोशिश की है कि फ़ेक न्यूज़ फैलाने वाले लोग कौन हैं. किन वजहों से वो ऐसा करते हैं. उनके दिमाग में क्या है. ऐसे लोगों का मोटीवेशन क्या है. इस पर बीबीसी ने एक क्वालिटेटिव रिसर्च की है, जिसमें चीजों को गहराई से समझने की कोशिश की गई है. हमने राष्ट्रीय स्तर पर कोई सर्वेक्षण नहीं किया है. अलग-अलग शहरों में अलग-अलग आयु, आय और जेंडर के 40 लोगों के सोशल मीडिया बिहेवियर को परखा गया है.”यहां अतुल ने हस्तक्षेप किया, “आपने कई बातें बताई. रिसर्च से एक बात सामने निकल कर आई कि भारत में फ़ेक न्यूज़ के पीछे नेशनलिज्म बड़ा फैक्टर है जो लोगों को फ़ेक न्यूज़ की दिशा में प्रेरित कर रहा है. दुनिया भर में दक्षिणपंथी सोच का प्रभाव फ़ेक न्यूज़ के ऊपर ज्यादा है. इस समय ज्यादातर देशों में ऐसी ही सरकारें भी हैं. तो इसमें सरकारों की क्या भूमिका दिखती है.”राजेश के मुताबिक इसमें चार चीजें मुख्य रूप से भर कर सामने आई. हिंदू सुपीरियॉरिटी, हिंदू धर्म का पुनरुत्थान, राष्ट्रीय अस्मिता और गर्व, एक नायक का व्यक्तित्व (इस मामले में मोदी). ये चारो चीजें आपस में गुंथी हुई हैं.राहुल कोटियाल ने इसके एक दूसरे पहलु पर रोशनी डालते हुए कहा, “इस रिसर्च को किसी अकादमिक दस्तावेज में शामिल नहीं किया जाएगा. इसकी वजह शायद इसका छोटा सैंपल साइज़ है. यह विरोधियों को इस रिसर्च को खारिज करने का अवसर भी देता है. बीबीसी इस सवाल से कैसे निपटेगा?”जवाब में राजेश कहते हैं, “मूल बात यह है कि बीबीसी कोई अकादमिक संस्था नहीं है. यह येल या हार्वर्ड नहीं है. हमारी चिंता मीडिया फ्रटर्निटी में मौजूद फ़ेक न्यूज़ की समस्या थी. यह रिसर्च कोई अंतिम सत्य नहीं है.”अमित भारद्वाज का सवाल इस पूरी चर्चा को एक अलग धरातल पर ले जाता है. उन्होंने कहा, “इस रिसर्च से यह बात उभर कर सामने आई कि हिंदुत्व और नेशनलिज्म फ़ेक न्यूज़ के अहम फैक्टर हैं. रिपोर्ट पढ़कर हिंदुत्व का फैक्टर बड़ी प्रमुखता से सामने आता है. लेकिन रिपोर्ट में नेशनलिज्म शब्द चुना गया, हिंदुत्व नहीं. क्या यह सोच-विचार कर उठाया गया क़दम था?”इस सवाल के साथ ही अतुल ने भी एक सवाल जोड़ा, “आपने बताया कि 40 लोगों से सहमति ली गई कि आप उनके सोशल मीडिया बिहेवियर का आकलन करना चाहते हैं. बहुत संभव है कि जिन लोगों पर आप रिसर्च कर रहे थे उनके दिमाग में कहीं न कहीं यह बात चल रही हो कि उनके ऊपर नज़र रखी जा रही है, ऐसे में उनका व्यवहार सामान्य न रहकर चैतन्य हो सकता है.”इन सवालों के बेहद दिलचस्प जवाब राजेश प्रियदर्शी ने दिए. उनका पूरा जवाब और अन्य विषयों पर पैनल की विस्तृत राय जानने के लिए पूरी चर्चा सुने.

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    46 min
  • एपिसोड 45: रिज़र्व बैंक विवाद, नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी, कर्नाटक उपचुनाव और अन्य
    भारतीय रिजर्व बैंक की स्वायत्तता पर सरकार का खतरा, डोनाल्ड ट्रम्प और मीडिया के बीच टकराव, इसकी भारतीय संदर्भ में विवेचना, कर्नाटक में लोकसभा की तीन और विधानसभा की दो सीटों पर हुआ उपचुनाव, इसमें जेडी(एस) और कांग्रेस गठबंधन की जीत, पं. नेहरू के आवास तीनमूर्ति भवन की नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम और लाइब्रेरी की गवर्निंग बॉडी में 4 नए सदस्यों की नियुक्ति आदि इस हफ्ते की चर्चा के मुख्य विषय रहे.इस बार चर्चा में बतौर मेहमान शामिल हुए पत्रकार नीरज ठाकुर, जो मूलरूप से आर्थिक मामलों के पत्रकार हैं. इनके अलावा स्तम्भ लेखक आनंद वर्धन और न्यूज़लॉन्ड्री के विशेष संवाददाता अमित भारद्वाज भी चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल चौरसिया ने पूछा, “आरबीआई एक्ट का सेक्शन 7 यानी जिस रेयर लॉ की बात हो रही है, वह सरकार को किस तरह के अधिकार देता है?”इसका जवाब देते हुए नीरज ठाकुर ने कहा, “सरकार के पास पैसे की कमी पड़ गयी है, और वह जल्द से जल्द कुछ कुछ निर्णय लेना चाह रही है. जिसे आरबीआई मना कर रहा है. आरबीआई हमेशा से अपनी स्वायत्तता को बचाए रखना चाहता है, जबकि सरकारें हमेशा से चाहती रही हैं कि वह उनके हिसाब चले. इसके अंदर सेक्शन 7 सरकार को किसी भी तरह का निर्देश जारी करने का अधिकार सरकार को देता है, जिसे आरबीआई को मानना ही पड़ेगा.”नीरज ने इस संकट के उत्पन्न होने की वजहें और भारतीय अर्थव्यवस्था में पैदा हुए उटापटक के सूत्र नोटबंदी से जोड़े. जिसको लेकर सरकार ने समय-समय पर बड़े-बड़े दावे किए थे. लेकिन आज की तारीख में यह बात साबित हो गई कि नोटबंदी असफल रही.अतुल ने नोटबंदी के सवाल को आगे बढ़ाते हुए आर्थिक विशेषज्ञ प्रियरंजन दास का हवाला दिया जिन्होंने कहा है कि सरकार का आकलन था कि नोटबंदी से अर्थव्यवस्था में करीब साढ़े तीन से चार लाख करोड़ रुपए का काला धन वापस नहीं लौटेगा. लिहाजा सरकार यह शेष रकम रिजर्व बैंक से लेगी. लेकिन नोटबंदी में सारा पैसा वापस आ गया. अब सरकार वही साढ़े तीन लाख करोड़ रुपए रिजर्व बैंक से उसके रिजर्व से वसूलना चाहती है.आनंद वर्धन ने इसका जवाब देते हुए कहा, “अब जबकि सत्ता का केन्द्रीकरण बहुत अधिक है, और इसमें संवादहीनता और पारदर्शिता की कमी है. नोटबंदी के उद्देश्य पहले भी बार-बार बदलते रहे हैं. इसमें सरकारी संवाद भी बहुत हद तक लचर रहा है. शायद सरकार की सोच चुनाव के पहले इस पैसे के जरिए कुछ लोकलुभावन योजनाओं को बड़े पैमाने पर शुरू करने की है.”नीरज ने सरकार द्वारा रिज़र्व बैंक के ऊपर बनाए जा रहे दबाव को पूरी तरह से राजनीतिक निर्णय बताया.अमित भारद्वाज के मुताबिक पंजाब नेशनल बैंक घोटाला सामने आने के बाद से चीजें बदली हैं. जैसे फरवरी सर्कुलर है जिसके जरिए 11 बैंकों को पीसीए के तहत लाया गया. विरल आचार्य ने जैसे कहा कि जो आरबीआई या केंद्रीय बैंक के स्वायत्तता के साथ जो खिलवाड़ करेगा, उसे मार्केट की नाराजगी झेलनी पड़ेगी. उस बयान के बाद अरुण जेटली का बयान आया कि आरबीआई को सरकार के मुताबिक ही काम करना चाहिए क्योंकि वह चुनी हुई संस्था है और लोगों के प्रति जवाबदेह है. इससे आरबीआई और सरकार के बीच का टकराव सतह पर आ गया.आगे उन्होंने कहा कि रघुराम राजन की छवि सरकार विरोधी बना दी गई थी, लिहाजा राजन की इच्छा के बाद भी उन्हें दूसरा कार्यकाल न देते हुए उर्जित पटेल को नया गवर्नर सरकार ने नियुक्त किया. उनके बारे में यह धारणा बनाई गई कि वे गुजरात से आते हैं और मोदी के करीबी हैं. अब इस संकट के बाद अगर उर्जित पटेल इस्तीफा देकर दे जाते हैं तो दुनिया के बाजार में सरकार की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता को बड़ा धक्का लगेगा.पैनल की विस्तृत राय जानने और अन्य मुद्दों के लिए सुनें पूरी चर्चा.

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    1 hr
  • एपिसोड 44: हाशिमपुरा, डीडी न्यूज़ पत्रकार की मौत, पाकिस्तान में ईशनिंदा और अन्य
    दंतेवाड़ा में हुआ नक्सली हमला, पाकिस्तान में आसिया बीबी के ईशनिंदा मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला और पाकिस्तानी अवाम का विरोध, राम मंदिर की सुनवाई की तारीख बढ़ने और हाशिमपुरा नरसंहार पर आया दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला आदि इस बार की एनएल चर्चा का विषय रहे.इस बार की चर्चा में दो खास मेहमानों ने टेलीफोन के जरिए हिस्सा लिया. इनमें हैदराबाद से पत्रकार मालिनी सुब्रमण्यम, जिन्होंने नक्सली इलाकों में काफी पत्रकारिता की है और साथ ही पाकिस्तान से बीबीसी के पूर्व पत्रकार हफीज चाचड़ शामिल हुए. इसके अलावा न्यूज़लॉन्ड्री के असिस्टेंट एडिटर राहुल कोटियाल, विशष संवाददाता अमित भारद्वाज भी शामिल रहे. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल चौरसिया ने दंतेवाड़ा में हुए नक्सली हमले और दूरदर्शन के कैमरामैन अच्युतानंद साहू की मौत पर दुख व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे किसी भी हिंसाग्रस्त इलाके में काम करने वाले पत्रकारों की क्या चुनौतियां हैं, जो पत्रकार वहां जा रहे है उनको किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? यह बड़ा प्रश्न है. इसके जवाब में मालिनी सुब्रमण्यम ने कहा, “यह बहुत ही बड़ा घटना है. और इस बात पर दोनों पक्षों को, सरकार और माओवादी, सफाई देने की जरूरत है. हालांकि माओवादियों ने एक पर्चा जारी कर कहा है कि- “पत्रकारों पर हमला करने का उनका कोई उद्देश्य नहीं था. उन्होंने पुलिस के ऊपर हमला किया था. जैसे ही उन्होंने पुलिस को देखा तो हमला कर दिया. इस हमले को लेकर प्रपोगेंडा चलाया जा रहा है कि माओवादियों ने पत्रकारों को निशाना बनाया. उन्हें बिलकुल भी पत्रकारों के बारे में नहीं था पता था.”अतुल ने पुलिस और पत्रकारों के साथ होने की ओर ध्यान खींचते हुए सवाल किया कि क्या पत्रकारों को ऐसे युद्धरत इलाकों में किसी भी एक पार्टी (सुरक्षा बल या माओवादी) के साथ रिपोर्टिंग के लिए जाना चाहिए? क्योंकि वहां किसी एक पार्टी के साथ होने की सूरत में रिपोर्टर खुद ब खुद दूसरी पार्टी के निशाने पर आ जाते हैं. मालिनी ने डीडी के पत्रकारों द्वारा की गई एक चूक बताया. उनके मुताबिक पत्रकार को स्वतंत्र रूप से ऐऐसे इलाकों में जाना चाहिए. पुलिस चाहे कितनी भी संख्या में हो, पत्रकार के साथ होना खतरे का सबब है.इसी चर्चा को आगे बढ़ते हुए राहुल कोटियाल का एक सवाल आया कि यह जो घटना घटी है, क्या इसको एक छोटी-मोटी घटना मान लिया जाये या फिर इसमें कोई बड़ा संदेश छिपा है? मालिनी ने जवाब में कहा, “इसमें से एक संदेश पत्रकारों को लिए है. एंबुश आए दिन होते रहते हैं. तो ऐसे इलाकों में पत्रकारों की अपनी पहचान के साथ जाना होगा. जैसा कि माओवादियों ने भी कहा है कि कोई पत्रकार चुनाव कवर करने आ रहा है, वह स्वतंत्र होकर आए. किसी भी तरह की सुरक्षा न ले.”न्यूज़लांड्री के रिपोर्टर अमित भारद्वाज ने एक नए पहलू की पर रोशनी डालते हुए सवाल किया कि दरगा कमेटी द्वारा जारी चिट्ठी, जिसमें माओवादियों ने पत्रकारों और चुनाव कर्मियों से कहा कि वो आयें चुनाव कवर करें, चुनाव प्रक्रिया में शामिल हों लेकिन बिना सुरक्षाबलों के। हम उन्हें क्षति नहीं पहुंचाएंगे, लेकिन वहीं दूसरी तरफ अटैक करते हैं। तो क्या इसमें विरोधाभाष नजर नहीं आता? जिसके जवाब में मालिनी ने कहा कि हर पक्ष स्वयम को बचाने की कोशिश कर रहा है।इस विषय के आखिर में अतुल ने कहा कि डीडी न्यूज़ के पत्रकारों की तरफ से यह बड़ी चूक हुई है. दुनिया भर के संघर्षरत इलाकों में, युद्धग्रस्त इलाकों में रिपोर्टिंग के लिए जाने वाले पत्रकारों को एक स्पष्ट गाइडलाइंस फॉलो करने की जरूरत है. उन्हें क्या करना है, क्या नहीं करना है, इसकी स्पष्ट समझ होनी चाहिए. यह ज़िम्मेदारी पत्रकारिता संस्थानों की भी है कि वे ऐसे पत्रकारों को व्यापक प्रशिक्षण देकर ही युद्धरत इलाकों में रिपोर्टिंग के लिए भेजें.पैनल की विस्तृत राय जानने और अन्य मुद्दों के लिए सुनें पूरी चर्चा.

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