विराध का अंत करके राम लक्ष्मण सीता और मुखर सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम को जाने लगे तभी रास्ते में उनका परिचय मुनि धर्मभृत्य से हुआ। किस्से उन्हें उस स्थान की पूरी जानकारी मिली।
अत्रि ऋषि के आश्रम से दंडक वन की ओर निकलने के बाद रास्ते में राम ,सीता और लक्ष्मण का सामना राक्षस विराध से हुआ ।जिसने सीता को पकड़ लिया था पर राम के पराक्रम के आगे वो अधित देर तक टिक नहीं सका।
राम ने आगे की योजना बनाते हुए ये तय किया कि वह ब्रह्मचारियो को प्रशिक्षित करके आगे दंडक वन की ओर बढ़ जाएंगे।अब पीड़ितों को स्वयं ही राक्ष्सों का सामना करना होगा।
भारी मन से कुलपति कालकाचार्य विदा हो रहे थे।वे जानते थे वे गलत है पर वह अपना स्वभाव भी जानते थे। उन्होंने राम से ब्रह्मचारियो की रक्षा करने का आग्रह किया और विदा हो गए।
कुलपति कालकाचार्य ने ब्रह्मचारियों की दुर्दश देखकर ये फैसला लिया की वे सब राम से दूर अपना आश्रम बनाएंगे ताकि राक्षस उन्हें तंग न कर सकें पर ब्रह्मचारियों ने बदला लेने का फैसला किया
राम के जंगल में आ जाने से राक्षस बहुत कुपित थे। उन्होंने जंगल में आतंक मचाना शुरू कर दिया था। कई ऋषि मुनियों को जान से हाथ धोना पड़ा। इसी क्रम में जंगल में लकड़ी काट रहे ब्रह्मचारियों के एक समूह को राक्षसों ने बंदी बना लिया ओर अपने ठिकाने पर ले गए।
राम के मित्र चेतन ने भरत के सेना और माताओं के साथ आश्रम आने का समाचार सुनाया जिसे सुनकर लक्ष्मण थोड़ा चिंतित भी हो गए । दूसरी तरफ एक आश्रमवासी अश्विनी जो कि लक्ष्मण से धनुष का प्रशिक्षण ले रहा था राक्षस का शिकार बन गया।
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by Ritika
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