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तुम ही हो
उनकी रात जो मख़मल सी सिलवट पर गुज़रती है।
मेरी तो छत भी तुम, बहती हवा, तुम ही सितारा हो।
"ज़ेहन" तुम ही हो उगता चाँद, हर इक नज़ारा हो।।
लो माना डूब जाते है वो अक्सर एक दूजे में।
तुम्हारी आंख उर्दू, मेरी नज़्मों का सहारा हो।
"ज़ेहन" तुम ही हो ढलती शाम, सागर का किनारा हो।
दो तरफा प्यार है जिनको, महज़ इक बार जीतेगा।
एक मेरा प्यार है जो रोज़ जीता, फिर भी हारा है;
"ज़ेहन" इस प्यार में रो रोकर हंसना भी गवारा है।।
आंखों से पढ़ ली जाए, ऐसी बात होती।
जुगनू भी न सुन पाए, वो आवाज़ होती।
ना होता दूसरा, तेरे मेरे खामोशियों के बीच
ना झूठा मुस्कुरा पाते, "ज़ेहन" गर पास होती।
किसी तकिये पे ना ही, आँसुवों कि छाप होती।
अभी बस चाँद है, तब रोशनी भी साथ होती।
बाहें बन जाती पर्दा, मैं तुम्हे मेहफ़ूज़ कर लेता
और लिखता रात तेरे नाम, "ज़ेहन" गर पास होती।
धड़कन चले पर शांत, ऐसी रात होती।
तेरी बातों में सच्चाई, मेरे में राज़ होती।
उलझ कर एकदूजे में, कोई कहानियां पढ़ते;
ना होता दिन न कोई रात, ज़ेहन गर पास होती।
कमी सी है
मेरी बातों में कुछ, अल्फ़ाज़ की कमी सी है,
तेरी आंखों में कुछ, एहसास की कमी सी है।
ऐ मेरी रूह, मेरे अख़्स को आज़ाद रहने दे,
तेरे दिल में भी कुछ, जज़्बात की कमी सी है।।
मेरी लोरी में तेरे रात की, कमी सी है,
जलती शाख़ में, कुछ राख़ की, कमी सी है।
सुनाता हूँ कई सपने, सुबह में आईने को अब;
उन्ही हर आज जिनमे, साथ की कमी सी है ।।
सच्चा क्या है
मेरी सोच तेरी सच्चाई में अच्छा क्या है?
"ज़ेहन" मेरे प्यार तेरी दोस्ती में सच्चा क्या है?
जो होना है यहाँ उसने तो पहले से ही लिख़ डाला, फिर
मेरी इबादत तेरी प्रार्थना में अब रखा क्या है?
"ज़ेहन" मेरे प्यार तेरी दोस्ती में सच्चा क्या है?
मिले हार हमे या जीत मगर बस ये समझ आये
हमारी जात तेरी विश्वास में कच्चा क्या है?
"ज़ेहन" मेरे प्यार तेरी दोस्ती में सच्चा क्या है?
हाँ जब भी अंत हो दोनों कलेवर साथ रख देना, देखें तो
हमारी कब्र तेरी राख़ में पक्का क्या
"ज़ेहन" मेरे प्यार तेरी दोस्ती में सच्चा क्या है? है?
कैसे नींद आएगी
वो कहते कर्म करते जा ज़िन्दगी चल कर आएगी।
"ज़ेहन" अब तू बता दे आज़ कैसे नींद आएगी?
कभी मेरे हाथ थामे कोई सीने से लगा लेता।
कहे, मुहब्बत नही फिर क्यों है उसका चाँद सा सजदा।
मगर मालूम है मुझको तू इक दिन दूर जाएगी।
"ज़ेहन" अब तू बता दे आज़ कैसे नींद आएगी?
जो पन्नो पे लिखा है नाम तेरा, मुझसे था संभव।
थोड़ी काबिलियत होती तो उसमे रंग भर देता।
ख़ुदा कल रात बोला सब्र तेरे काम आएगी।
"ज़ेहन" अब तू बता दे आज़ कैसे नींद आएगी?
"ज़ेहन" तू ही बता, ये क्यू है मेरी रोज़ की उल्फ़त।
लो मानो सो गया जो आज़ कल फिर लौट आएगी।
ये मेरी चादरें, सपनें ये पन्ने फिर जलाएगी
"ज़ेहन" इस रोज़ कोई केहदे, कल को कैसे नींद आएगी?ाएंगी।
"ज़ेहन" मधुशाला
"ज़ेहन" मधुशाला उनका प्यार हाला सा, ख़ुद प्याला बन गयी ।
आज पीने वाला साकी, "ज़ेहन" मधुशाला बन गयी ।।
लिखा है नाम उनका इस शहर की, हर दीवारों पे।
नहीं साकी मिला अबतक जो भर दे, प्याला हाले से।।
कोई ग़म में, कोई शौक़ में, प्याले को पकड़ा है।
दो बूँद महज़ जर्ज़र कलम का सहारा बन गयी।।
आज पीने वाला साकी, "ज़ेहन" मधुशाला बन गयी।
कभी एक वक्त था प्याला पकड़ना, शौक़ लगता था।
मगर होठों ना छू जाए हाला, ख़ौफ लगता था ।।
यहाँ कुछ बात थी जब भी तसव्वुर, रूह तक पहुँची ।
नशे में नाम मोती सा लिखा, अब माला बन गयी।।
आज पीने वाला साकी, "ज़ेहन" मधुशाला बन गयी।
Accha Nahi Lagta (अच्छा नही लगता)
उनका प्यार मेरी ज़िंदगी, हैं इस बात से वाकिफ;
जो कर देता कभी इज़हार,उन्हें अच्छा नही लगता।
पकड़कर हाथ हमने साथ, लांघी है कई सरहद;
मगर मांगू कभी वो हाथ, उन्हें अच्छा नही लगता।
वो करते हैं दुआ,मेरे सपने साकार होने की;
है वो खुद मेरा सपना, उन्हें अच्छा नही लगता।
कहते फ़र्क किसे पड़ता, मेरे हँसने या रोने से;
जो मैं दो वक्त ना बोलूं, उन्हें अच्छा नही लगता।
काली रात, आधी नींद, ज़िंदा ख़ाब है मेर;
जो बीती रात ना सोऊँ, उन्हें अच्छा नही लगता।
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Zehan is a weekly podcast where Ayan Sharma recites his poems.