Zehan
Download on the App Store

Zehan episodes

  • Tu Likhe Ya Na Likhe
    तू लिखे या ना लिखे


    तू लिखे या ना लिखे, मसरूफ़ होना चाहिए।

    अनकहे से वाक्य को, मशहूर होना चाहिए।

    बेज़ुबानी बात के हर, मेज़बानी अक्षरों को

    काले गहरे पन्नों पर, महफूज़ होना चाहिए।।

    ***


    1 min
  • Kyun Hoon
    क्यों हूँ


    ओढ़कर छांव रहबर का भी, आहिस्ता क्यों हूँ?

    अबस मैं अजनबी इस दौड़ का, हिस्सा क्यों हूँ?

    तबस्सुम सी नज़र से, नज़्में अक्सर मुझसे पूछे है,

    हरएक अन्जाम में मैं, हार का किस्सा क्यों हूँ?

    ***

    1 min
  • Kafi Hai
    काफी है


    महफ़िल तेरी, शिरक़त मेरी, बेशक़ बड़ी ज़हमत।

    तेरे ही नाम में चर्चा मेरा, गुमनाम काफी है।।

    मेरी हैं गर्द सी गुस्ताखियां, और ग़ैरती से ग़म।

    मगर हों दिल में तेरी धड़कनें, एहसास काफी है।।

    ***


    1 min
  • Zehanaseeb
    ज़हे-नसीब


    ख़ुदा शौक़ीन है "ज़ेहन" की ज़हे-नसीब नज़्मों का।

    मौसम शांत हो अक्सर कर वो बूंदे गिराया है।।

     

    अपनी खामोशियों को यूं जो पन्नो पर उतारा है।

    बनेंगे अश्क़ के कारण या कुर्बत भी गवारा है।

    बख़ूबी जानता हर इक अदद कमज़ोरियाँ मेरी।

    आँखे बंद थी, सोया था, सपनों से जगाया है।।

     

    बहुत शौक़ीन है अल्लाह बख़ूबी ख़ुद लिखाया है।।

    ***



    1 min
  • Baaki Hai
    बाकी है


    बेपरवाहियाँ मेरी, उसी परवरिश का हिस्सा हैं,

    जहाँ मुलाकात में बिछड़ने का, रिवाज़ बाकी है।

    ये बूंदे हैं बस जो, कहकाशीं रातों में गिर आयीं,

    अभी मिलना मेरा, घुलना तेरा, बरसात बाकी है।।


    1 min
  • Mubarak
    मुबारक़


    समूचे भूधरा को, घरघटा नें घेर रखा है,

    महज़ सपना तेरा सपना, तुझे सपना मुबारक़।

    तेरी आंखें जो चाहे, जलते नभ का अंश भी देखे,

    महज़ चंदा दिखा शीतल, तुझे चंदा मुबारक़।।

    ***

    1 min
  • Haqeeqat
    हकीक़त


    गर्दिश में कुछ, गुमनाम सी, गुस्ताख़ हकीक़त,

    अनकहे, अल्फ़ाज़ के, अस्बाब हकीक़त।

    ज़मी पे तू, है आसमां तेरे आईने में,

    ज़फ़र मिलती नहीं फ़रियाद से, बे-दाद हकीक़त।।

    ***

    1 min
  • 'Zehan' Bas
    "ज़ेहन" बस…।


    नज़र से दूर इतना

    ख़ुद को मख़मल में लपेटे हो।

    "ज़ेहन" बस याद आयी है तेरी

    रोया नहीं हूँ मैं।।

     

    मैं रखता हूँ कदम कुछ

    बेतुकी सी बेरुख़ी के बीच।

    है रस्ते की समझ कच्ची थोड़ी

    खोया नहीं हूँ मैं।।

     

    मुझे अब नींद आती है

    तेरी शैतानियों के संग।

    है मेरी धड़कनें कुछ तेज़ अभी

    सोया नहीं हूँ मैं।।

    2 min
  • Kya Likhun

    क्या लिखूँ


    मैं लिखूँ कुछ अनकहा

    या वो लिखूँ, जो कहा नही?

    तू वो रंग है, जो रंगा नही

    कुछ श्वेत है, पर हवा नही।

    तू कुछ अजनबी, कुछ महज़बीं

    इक अनछुआ एहसास है।

    या ये कहूँ, तू कुछ नहीं

    कुछ तुझमे है, जो ख़ास है।

    1 min

About Zehan

From the publisher's feed

Zehan is a weekly podcast where Ayan Sharma recites his poems.