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आपमें से जिन लोगों ने सलमान ख़ान की फ़िल्म जय हो देखी होगी उन्हें याद होगा कि उस फ़िल्म में बताए गए कॉन्सेप्ट, कि आप तीन लोगों की मदद करिए और उनसे कहिए कि वो तीन और लोगों की मदद करें- इस तरह एक दूसरे की मदद की एक चेन सी बन सकती है। ये फ़िल्म आई थी साल 2014 में।
मगर उसके पहले से ही ये कॉन्सेप्ट इस्तेमाल में ला रहे हैं रुषभ तुरखिया। रुषभ लोगों में काइन्डनेस यानी उनके दयालु होने के इसी तरह के सिस्टम की वकालत करते हैं- जिसका नाम है योर टर्न नाउ।
रेडियो सबरंग की स्वाति चौहान ने सबसे पहले उनसे पूछा कि ये योर टर्न नाउ का क्या कॉन्सेप्ट है-
मोटर स्पोर्ट्स का नाम लिया जाए तो तुरंत चेहरा उभरता है व्हील के पीछे बैठे किसी यंग आदमी का. मगर इस इमेज को तोड़ने वाली एक शख़्सियत हैं 51 साल की डॉक्टर बानी यादव. वो एक जानी मानी रैली ड्राइवर हैं और सबसे तेज़ ड्राइवर्स में एक मानी जाती हैं. वो लेडीज़ क्लास में एशिया पैसिफ़िक रैली कप की डबल विनर हैं. रेडियो सबरंग की स्वाति चौहान ने बात की बानी यादव से.
हर रोज़ गिरकर मुकम्मल खड़े हैं, ऐ ज़िंदग़ी देख मेरे हौसले तुझसे भी बढ़े हैंअंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर मिलिए एक ऐसी प्रतिभाशाली बास्केटबॉल खिलाड़ी से जिन्हें एक दुर्घटना के चलते व्हील चेयर पर आना पड़ा मगर उनकी लगन ने उनकी तमाम मुश्किलें दूर की हैं। रेडियो सबरंग की स्वाति चौहान ने तसनीम फ़ातिमा से बात की, जो कि दिल्ली बास्केटबॉल फ़ेडरेशन की प्रमुख भी हैं।
परीक्षाओं के दिनों में बच्चों के साथ ही बहुत बार उनके माँ-बाप भी काफ़ी तनाव ले लेते हैं। उनके मन में यही चलता रहता है कि कैसे बच्चों के नंबर बेहतर आएँ। मगर इस तनाव से क्या उनका या बच्चों का कोई फ़ायदा होता भी है? क्लिनिकल साइकॉलॉजिस्ट डॉक्टर वंदना प्रकाश से रेडियो सबरंग की रमणी श्याम ने बात की और पूछा कि कैसे इस स्ट्रेस या तनाव का सामना करना चाहिए।
चिल्ड्रन्स डे पर रेडियो सबरंग के ख़ास एपिसोड में हम आपकी मुलाक़ात करवाएँगे दो ऐसे बच्चों से जिनकी प्रतिभा हमारे लिए उम्मीद जगाती है। सबसे पहले मिलिए रायबरेली के बाल विज्ञानी नैतिक श्रीवास्तव से। नैतिक ने आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से ऐसा चश्मा तैयार किया है जो नेत्रहीन व्यक्तियों को सेंसर की मदद से व्यक्ति या वस्तु के बारे में सचेत करता है। उनके अलावा मुलाक़ात होगी कथक डांसर पृथ्वी प्रकाश से भी।
नवरात्र का समय आते ही माँ दुर्गा के नव रूपों की पूजा शुरू हो जाती है और हर जगह कन्याओं के महत्त्व का अहसास होने लगता है। मगर अब भी कई घर ऐसे हैं जहाँ लड़की के जन्म लेते ही मायूसी का माहौल हो जाता है। स्थितियाँ अब सुधर रही हैं और शहरों में काफ़ी प्रगति हुई है। गाँवों में भी लोग प्रयास कर रहे हैं सोच बदलने की। ऐसी ही एक कोशिश की है ग़ाज़ियाबाद के भोजपुर ब्लॉक की प्रमुख सुचेता सिंह ने। क्या है वो कोशिश आइए जानते हैं रेडियो सबरंग की रमणी श्याम के साथ-
भागती-दौड़ती ज़िंदग़ी में हमारे त्यौहार एक हल्की फुहार लेकर आते हैं। ऐसा समय जब हम परिवार, समाज और अपनी संस्कृति से वापस जुड़ते हैं। रामायण हमारे घरों का एक अभिन्न हिस्सा रहा है जिसने जीवन के कई पाठ सिखाए हैं। ऐसे में राम लीला के ज़रिए हम तक वो सीख एक क़िस्से-कहानी और नाटक की तरह आते रहे हैं। आज की पीढ़ी भी वो उसी तरह समझ सके इसके लिए ग़ाज़ियाबाद में इंदिरापुरम् के शिप्रा कृष्णा विस्टा में कुछ सदस्य बच्चों से राम-लीला का मंचन करवा रहे हैं। रेडियो सबरंग की अनुराधा श्रीवास्तव उन बच्चों से मिलने पहुँचीं-
देश-दुनिया में आपने तरह-तरह के पंडालों के बारे में सुना, पढ़ा-देखा होगा। इस समय हम-आप भी माँ का आशीर्वाद लेने उन पंडालों में जाते हैं, माँ की पूजा-आराधना करते हैं। मगर क्या आप जानते हैं कि माँ दुर्गा की जो मूर्ति इन पंडालों में लाई जाती है, उसे बनाने में वेश्यालय की मिट्टी मिलाने की एक परंपरा रही है। इंदिरापुरम् के शिप्रा सनसिटी में भी दुर्गा-पूजा की तैयारियाँ पूरी हो चुकी हैं। इन्हीं तैयारियों के बीच हमारी साथी लोपामुद्रा दुबे ने बात की शरदोत्सव की आयोजन करने वाली समिति बॉन्गोतोरु के शुवेन्दु मजुमदार से-
त्यौहारों के इस मौसम में जहाँ एक ओर दुर्गा पूजा की धूम है तो वहीं असम में कटी बिहू या कोंगाली बिहू की रौनक है। ये त्यौहार इस साल 18 अक्तूबर को देश भर में मनाया जा रहा है। ये बिहू अन्य बिहू से किस मायने में अलग है और क्या ख़ास होता है इस बिहू में, ये जानने के लिए रेडियो सबरंग की रमणी श्याम ने बात की टीम की साथी रूबी ठाकुरिया से जो असम क्षेत्र से ही आती हैं, जहाँ ये त्यौहार प्रमुखता से मनाया जाता है।
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