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कहते हैं किसी भी देश और काल की संस्कृति, भाषा या इतिहास को उस समय के साहित्य द्वारा बख़ूबी जाना जा सकता है। यूँ तो हमारे देश का साहित्य आदि काल से काफ़ी समृद्ध रहा है मगर सोशल मीडिया के इस दौर में साहित्य का रूप भी तेज़ी से बदल रहा है। ऐसे में साहित्य और साहित्यकारों को जनता से जोड़ने के लिए ग़ाज़ियाबाद साहित्य महोत्सव का आयोजन किया गया। इसका उदघाटन ग़ाज़ियाबाद के सांसद और केंद्रीय मंत्री जनरल वीके सिंह ने किया। कैसा था वहाँ का माहौल ये बता रही हैं रेडियो सबरंग की रंजीता गुप्ता
पिछले दिनों जी-20 समिट के चलते पूरी दिल्ली सजी हुई थी। सड़कों की साफ़-सफ़ाई से लेकर बैनर पोस्टर तक जी-20 की कहानी कह रहे थे। भारत ने इस मौक़े का इस्तेमाल किया अपनी संस्कृति दिखाने के लिए भी। ये समिट हुआ भारत मंडपम् में। एक ओर भारत मंडपम् में लगे पोस्टर और सामने लगी बड़ी नटराज की मूर्ति। तो दूसरी ओर एयरपोर्ट पर आते ख़ास मेहमानों के लिए भारतीय नृत्य की विविध कलाओं का प्रदर्शन। लोगों ने इसे काफ़ी सराहा भी। एयरपोर्ट पर बच्चे अलग-अलग देशों के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के सामने देश के विभिन्न राज्यों के नृत्य की झलकी पेश कर रहे थे। इनमें शामिल थे नोएडा के इंडस वैली स्कूल के बच्चे भी। उन्हें ट्रेन किया था वहाँ की टीचर शालिनी सोलंकी ने। रेडियो सबरंग की स्वाति चौहान ने उनसे पूछा कि किन-किन मेहमानों के सामने बच्चों को परफ़ॉर्म करने का मौक़ा मिला-
कहते हैं न कि किसी समस्या का निवारण उसके कारण में ही होता है। यदि कारण समझ में आ जाए तो उसकी जड़ में पहुँचकर सही और सटीक प्रक्रिया से सरलता से समाधान संभव है। स्वास्थ्य संबंधी विषयों पर भी यही लागू होता है। हम जोड़ों के दर्द या डायबिटीज़ के लिए आम तौर पर दवाओं पर निर्भर रहते हैं मगर कई ऐसी बीमारियों हैं जिनका इलाज बिना दवाओं के भी किया जा सकता है। रेडियो सबरंग की रंजीता गुप्ता ने न्यूरोथेरेपिस्ट डॉक्टर मृदुला त्रिवेदी से इस प्रक्रिया के बारे में और जानकारी ली-
15 अगस्त 1947 की वो सुबह कैसी रही होगी जब देश के आसमान में तिरंगा शान से लहरा रहा होगा, लंबे समय से चली आज़ादी की लड़ाई की क़ामयाबी का जश्न हर ओर होगा। उस समय आज़ादी का एक ही मतलब था- अँगरेज़ों के शासन से आज़ादी। मगर आज 76 साल बाद जब हम आज़ादी शब्द सुनते हैं तो हमारे लिए इस शब्द के क्या मायने हैं, यही जानने रेडियो सबरंग की स्वाति चौहान निकलीं ग़ाज़ियाबाद में इंदिरापुरम् की सड़कों पर। सुनिए लोगों ने क्या कहा-
ज़िंदगी की भाग-दौड़ और रोज़ की कश्मकश में ख़ुद की पहचान ख़त्म करके घर-परिवार के लिए काम करने वाली एक औरत भी एक मक़ाम पर जीना चाहती है- अपने लिए। घर वालों की सलामती और उनकी ज़िंदग़ी को पटरी पर बनाए रखने के लिए ख़ुद के बारे में नहीं सोचने वाली महिला जब ठहरकर सोचे तो लगता है कि कुछ पल तो ख़ुद के लिए भी जीने चाहिए। ऐसी ही कुछ पंक्तियाँ रेडियो सबरंग की रमणी श्याम की कलम से-
सुबह आँख खुलने से लेकर रात में सोने तक मोबाइल फ़ोन हमारी ज़िंदग़ी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। कभी अपना काम, कभी सोशल मीडिया पर रील्स देखने में लगता समय तो कभी बच्चों का काम। हम काफ़ी समय मोबाइल देखने में लगा रहे हैं। मगर ये आदत कब धीरे-धीरे मोबाइल के एडिक्शन में बदल जाए ये समझना बेहद ज़रूरी है। इसी बारे में रेडियो सबरंग की अनुराधा श्रीवास्तव ने बात की डॉक्टर वंदना प्रकाश से-
आम तौर पर सोना ख़रीदते समय हमें उसकी शुद्धता और दोबारा बेचने जाएँ तो सही क़ीमत वापस मिलने को लेकर शंका होती है।
हाल में सरकार ने सोने की ख़रीद और बिक्री को लेकर कई अहम बदलाव किए हैं।
क्या हैं वो बदलाव और कैसे आपको या हमें ये प्रभावित करते हैं, इस बारे में और जानकारी देने के लिए रेडियो सबरंग की रंजीता गुप्ता ने बात की सर्राफ़ा व्यवसायी अनिकेश चनंद्र और इंडिया बुलियन ज्वैलर्स असोसिएशन के उत्तर भारत प्रमुख अनुराग रस्तोगी से-
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