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14 नवंबर को 'विश्व डायबिटीज़ दिवस' के मौक़े पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि डायबिटीज़ पूरे दक्षिण पूर्वी एशिया क्षेत्र के देशों में लोगों के स्वास्थ्य के लिए एक प्रमुख ख़तरा है और इन देशों में लगभग 9 करोड़ 10 लाख लोग डायबिटीज़ के मरीज़ हैं.
इनमें से आधे से भी ज़्यादा संख्या यानी क़रीब 4 करोड़ 90 लाख मरीज़ों को ये ही नहीं मालूम है कि उन्हें डायबिटीज़ है भी.
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ़) और भारत सरकार ने पहले व्यापक राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण (CNNS) के नतीजे जारी किए हैं, जिनके अनुसार भारत में बाल कुपोषण कम करने में थोड़ी प्रगति तो हुई है, लेकिन अभी भी स्थिति में सुधार देखने के लिए प्रयास किए जाने की आवश्यकता है.
यूनीसेफ़ में बाल विकास और पोषण विशेषज्ञ डॉक्टर गायत्री सिंह का कहना है कि बच्चों में कुपोषण के लिए ख़राब आर्थिक हालात के अलावा अन्य कारण भी ज़िम्मेदार हैं और महज़ छह फ़ीसदी बच्चों को ही पर्याप्त आहार मिल पा रहा है.
वर्ष 2019 का अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार तीन विद्वानों को दिया गया है जिनके नाम हैं – एस्थर डफ़लो, अभिजीत बैनर्जी और माइकल क्रेमर. एस्थर डफ़लो औरअभिजीत बैनर्जी एमआईटी में अर्धशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं जबकि माइकल क्रेमर हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं.
इन तीनों अर्थशास्त्रियों ने ग़रीबी दूर करने के लिए भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश सहित अनेक देशों में ऐसे प्रयोग किए हैं - जिनके तहत ग़रीब लोगों को कुछ संपदा व कारोबार करने का कुछ प्रशिक्षण देकर उन्हें हालात सुधारने का मौक़ा दिया जाता है.
भारत की राजधानी दिल्ली में पर्यावरण प्रदूषण ख़तरनाक स्तर पर पहुँच गया है जिसके मद्देनज़र वहाँ स्वास्थ्य एमरजेंसी घोषित की गई है. दिल्ली के कुछ इलाक़ों में वायु प्रदूषण विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तय की गई सीमा से 30 गुना ज़्यादा ख़तरनाक स्तर पर पहुँच गया है.
पृथ्वी के तापमान में बढ़ोत्तरी को दो डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने के स्पष्ट फ़ायदे हैं और मौजूदा दौर की कार्रवाई ही महासागरों और क्रायोस्फ़ेयर - पृथ्वी का बर्फ़ से ढंका क्षेत्र - का भविष्य तय करेगी.
यह कहा है 'द एनर्जी एंड रिसोर्सेज़ इंस्टीट्यूट' में एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ अंजल प्रकाश ने जिन्होंने हाल ही में 'इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज’ (आईपीसीसी) की ओर से जारी की गई नई रिपोर्ट को तैयार करने में 'कोऑर्डिनेटिंग लीड ऑथर' के तौर पर ज़िम्मेदारी संभाली.
जोखिम भरे समुद्री मार्गों से होकर अफ़्रीका से योरोप तक की यात्रा में अब तक हज़ारों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं.
लेकिन इन ख़तरों के बावजूद संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की प्रवासन पर एक नई रिपोर्ट - Scaling Fences: Voices of Irregular African Migrants to Europe दर्शाती है कि अगर ज़रूरत हुई तो 93 फ़ीसदी अफ़्रीकी प्रवासी अपनी जान को जोखिम में डाल कर दोबारा ऐसी यात्राएं करने से नहीं हिचकेंगे.
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