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हाल ही में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक एवं सामाजिक परिषद की आठवीं यूथ फ़ॉरम हुई जिसके ज़रिए टिकाऊ विकास लक्ष्यों को हासिल करने में युवाओं की आवाज़ों और सुझावों को शामिल करने का प्रयास हुआ.
दुनिया में इस समय 6 करोड़ से ज़्यादा युवा बेरोज़गार हैं. ऐसे में युवाओं को सशक्त बनाकर टिकाऊ विकास लक्ष्यों को पाने में काफ़ी हद तक सफलता मिल सकती है.
भारत से मृदुल उपाध्याय इस फ़ॉरम में शामिल हुए जो यूथ फॉर पीस इंटरनेशनल संगठन के संस्थापक हैं. यह संगठन टिकाऊ समाज और शांतिपूर्ण दुनिया के निर्माण में योगदान देने के लिए युवाओं की भूमिका को बढ़ावा देने में जुटा है.
महिलाओं के प्रति भेदभाव को रोकने और उनके अधिकारों को सुनिश्चित करने के लक्ष्य के साथ 1979 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक संधि पारित हुई. इसे 'Convention on the Elimination of All Forms of Discrimination Against Women' (CEDAW) या 'महिलाओं के प्रति हर प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन पर संधि' का नाम दिया गया और यह 1981 में प्रभावी हो गई.
खादी वस्त्र नहीं विचार है. भारत के स्वाधीनता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी का यह सूत्र वाक्य ग्रामीण आत्मनिर्भरता, विकेंद्रित विकास और आर्थिक स्वावलंबन का प्रतीक बन गया.
खादी का इतिहास यूं तो 100 साल से भी ज़्यादा पुराना है लेकिन वर्तमान दौर में भी इसका महत्व कायम है. टिकाऊ विकास, जलवायु परिवर्तन, रोज़गार सृजन और महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण सहित कई वैश्विक चुनौतियां हैं जिनसे निपटने में खादी का उपयोग और उसका प्रचार-प्रसार अहम भूमिका निभा सकता है.
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